Bhagavad Geeta Adhyay 6 (Atma Sanyam Yoga) : श्रीमद्भगवद्गीता - छठा अध्याय (आत्मसंयम योग)

भगवद्गीता अध्याय 6: आत्मसंयम योग – 47 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ

Bhagavad Gita Chapter 6 | Gita Adhyay 6 | Atma Sanyam Yog | 47 Shlok in Sanskrit and Hindi

भगवद्गीता अध्याय 6: आत्मसंयम योग – 47 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ Bhagavad Gita Chapter 6 | Gita Adhyay 6 | Atma Sanyam Yog | 47 Shlok in Sanskrit and Hindi, bhagavad gita, bhagwat geeta adhyay 6, bharat in mahabharat, mahabharat kab hua tha date kalyug kab start hua, mahabharat ka yuddh kyon hua, कब हुआ था महाभारत का युद्ध?, gita 6 atma sanyam yog, satvik rajsik tamasik, geeta chapter 6 shlok

भगवद्गीता का छठा अध्याय “आत्मसंयम योग” कहलाता है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक हैं। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग, ध्यानयोग, मन के संयम, अभ्यास और वैराग्य, संतुलित जीवन तथा योगी के स्वरूप के बारे में बताते हैं।

इस अध्याय में अर्जुन मन की चंचलता को लेकर अपनी कठिनाई भी व्यक्त करते हैं। इसके उत्तर में श्रीकृष्ण बताते हैं कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को नियंत्रित किया जा सकता है।

अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि सभी योगियों में वह योगी श्रेष्ठ है जो श्रद्धापूर्वक अपने मन को भगवान में लगाकर उनका भजन करता है।

भगवद्गीता अध्याय 6 में क्या बताया गया है?

आत्मसंयम योग में मुख्य रूप से इन विषयों की चर्चा की गई है:

  • कर्मयोग और संन्यास का संबंध
  • मनुष्य का अपना मन ही मित्र और शत्रु होना
  • योगी के लक्षण
  • ध्यान के लिए उचित स्थान और आसन
  • ध्यान के समय शरीर और मन की स्थिति
  • संतुलित आहार, व्यवहार, कर्म और नींद
  • मन को एकाग्र करने का अभ्यास
  • मन की चंचलता और उसका नियंत्रण
  • अभ्यास और वैराग्य का महत्व
  • सभी प्राणियों में समभाव देखना
  • योगभ्रष्ट व्यक्ति की गति
  • श्रेष्ठ योगी के लक्षण

पांचवें अध्‍याय के आरंभ में अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से यह बतलाने की प्रार्थना की थी कि "मेरे लिये 'कर्मसंन्‍यास' (सांख्‍ययोग) और 'कर्मयोग' में से कौन-सा एक साधन निश्चित रूप से कल्‍याणप्रद है"।

इस पर भगवान् ने दोनों ही साधनों को कल्‍याणप्रद बताया, किन्तु फल देने में दोनों ही समान होने पर भी, साधन में सुगमता होने के कारण ‘कर्मसंन्‍यास’ की अपेक्षा ‘कर्मयोग’ की श्रेष्‍ठता का प्रतिपादन किया।

तदनंतर दोनों साधनों के स्‍वरूप, उनकी विधि और उनके फल का भलीभाँति निरूपण करके (अच्छी तरह समझाकर) दोनों के लिये ही अत्यंत उपयोगी एवं परमात्‍मा की प्राप्ति का प्रधान उपाय समझकर संक्षेप में ध्‍यानयोग का भी वर्णन किया; परंतु दोनों में से कौन सा साधन करना चाहिये, इस बात को न तो अर्जुन को स्‍पष्‍ट शब्‍दों में आज्ञा ही की गई, और न ध्‍यानयोग का ही अंग-प्रत्‍यंगों सहित विस्‍तार से वर्णन हुआ।

इसलिये अब ध्‍यानयोग का अंगों सहित विस्‍तृत वर्णन करने के लिये छठे अध्‍याय (Gita 6 - atma sanyam yog) का आरंभ करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण सबसे पहले अर्जुन को भक्तियुक्‍त कर्मयोग में प्रवृत्त करने के उद्देश्‍य से कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं।

भगवद्गीता - षष्टः अध्याय (Gita 6 Atma Sanyam Yog | Bhagwat Geeta Adhyay 6 Shlok in Sanskrit

श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१॥

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२॥

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३॥

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४॥

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५॥

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६॥

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७॥

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥८॥

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९॥

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१०॥

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११॥

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२॥

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३॥

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४॥

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५॥

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६॥

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७॥

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८॥

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९॥

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२०॥

सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१॥

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥२२॥

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥२३॥

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४॥

शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५॥

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥२६॥

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७॥

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८॥

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९॥

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३०॥

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१॥

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२॥

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥३३॥

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४॥

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५॥

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६॥

अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७॥

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८॥

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९॥

श्रीभगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥४०॥

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥४१॥

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२॥

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३॥

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४॥

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५॥

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥४६॥

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७॥

भावार्थ (छठा अध्याय) |(Bhagwat Geeta Adhyay 6 in Hindi)

श्लोक 1–4: कर्मयोग और योग की शुरुआत

भगवान श्रीकृष्ण बोले-
जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है॥1॥ 

हे अर्जुन! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसी को तुम योग जानो क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता॥2॥

जो सब क्रियाओं का त्‍याग करके ध्‍यान लगाकर तो बैठ गया है, किन्तु जिसके अंत:करण में अहंता, राग, द्वेष, कामना आदि दोष व्याप्त हैं, वह भी वास्‍तव में योगी नहीं है; क्‍योंकि उसने भी केवल बाहरी क्रियाओं का ही त्‍याग किया है, अभिमान, आसक्ति, कामना ओर क्रोध आदि का त्‍याग नहीं किया. संन्यास शब्द का अर्थ है- शरीर, इन्द्रिय और मन द्वारा होने वाली संपूर्ण क्रियाओं में कर्तापन का भाव मिटाकर केवल परमात्मा में ही अभिन्न-भाव से स्थित हो जाना. तथा ‘योग’ शब्द का अर्थ है- आसक्ति और कामना के त्याग द्वारा होने वाली ‘कर्मयोग’ की पराकाष्‍ठारूप नैष्‍कर्म्य-सिद्धि. दोनों में ही संकल्पों का सर्वथा अभाव हो जाता है और सांख्‍ययोगी जिस परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होता है, कर्मयोगी भी उसी को प्राप्त होता है. इस प्रकार दोनों में ही समस्त संकल्पों का त्याग है और दोनों का एक ही फल हैं; इसलिये दोनों की एकता की गई है. अर्जुन! योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु (कारण, लक्ष्य) कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है॥3॥ 

जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है॥4॥ 

श्लोक 5–9: मन ही मित्र और मन ही शत्रु

अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है॥5॥

मनुष्‍य को कभी भी यह नहीं समझना चाहिये कि मेरा प्रारब्‍ध बुरा है, इसलिये मेरी उन्‍नति होगी ही नहीं. मनुष्‍य का उत्‍थान-पतन उसी के हाथ में है. मनुष्‍य अपने स्‍वभाव और कर्मों में जितना ही अधिक सुधार कर लेता है, वह उतना ही उन्‍नत होता है. स्‍वभाव और कर्मों का सुधार ही उन्‍नति का उत्‍थान है त‍था इसके विपरीत स्‍वभाव और कर्मों में दोषों का बढ़ना ही अवनति या पतन है. जो अपने उद्धार के लिये चेष्‍टा करता है, वह अपना ही मित्र है और जो इसके विपरीत करता है, वही अपना शत्रु है, अतः अपने से भिन्‍न दूसरा कोई अपना मित्र या शत्रु नहीं है. अर्जुन! जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के समान शत्रुता बर्तता है॥6॥ 

सर्दी-गरमी और सुख-दुःख आदि में तथा मान-अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले (मन को अपने वश में रखने वाले) पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक्‌ प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं॥7॥ 
 
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है॥8॥ 

सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपात न करने वाला), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यंत श्रेष्ठ है॥9॥ 

श्लोक 10–17: ध्यानयोग की विधि

मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए॥10॥ 
 
शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा या मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके॥11॥ 

उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे॥12॥ 
 
काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ॥13॥ 

ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए॥14॥ 

वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है॥15॥ 
 
हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है॥16॥ 

दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है॥17॥ 

श्लोक 18–28: मन की एकाग्रता और ध्यान

अत्यंत वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में संपूर्ण भोगों से स्पृहारहित (इच्छा या कामना रहित) पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है॥18॥ 

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है॥19॥ 
 
योग के अभ्यास से निरुद्ध (रोका हुआ) चित्त जिस अवस्था में उपराम (विरक्त या विश्राम) हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही संतुष्ट रहता है॥20॥ 

इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनंत आनंद है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं॥21॥ 

परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता॥22॥ 

जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए. वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है॥23॥ 
 
संकल्प से उत्पन्न होने वाली संपूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से (पूरी तरह से) त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर॥24॥ 

क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिंतन न करे॥25॥ 

यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्द आदि विषय के निमित्त (कारण) से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही लगाए॥26॥ 
 
क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है॥27॥ 

वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनंत आनंद का अनुभव करता है॥28॥ 

श्लोक 29–32: समदर्शी योगी

सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में स्थित और संपूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है॥29॥ 

हे अर्जुन! जो पुरुष संपूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और संपूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अंतर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता॥30॥ 

जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर संपूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है॥31॥ 

जो योगी अपनी भाँति संपूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दु:ख को भी सब में सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्‍ठ माना गया है॥32॥ 

श्लोक 33–36: मन की चंचलता और अभ्यास-वैराग्य  

अर्जुन बोले- 
हे श्रीकृष्ण! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ॥33॥ 

क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यंत दुष्कर मानता हूँ॥34॥ 
  
भगवान श्रीकृष्ण बोले- 
अर्जुन! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है. परन्तु हे कुंतीपुत्र! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है॥35॥ 

जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य (कठिनता से प्राप्त होने वाला) है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है॥36॥ 
  
अर्जुन बोले- 
हे मधुसूदन! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अंतकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है?॥37॥ 

श्लोक 37–45: योगभ्रष्ट की गति

क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की तरह दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?॥38॥ 

हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को संपूर्ण रूप से छेदन करने में आप ही समर्थ हैं, आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना संभव नहीं है॥39॥ 
  
भगवान श्रीकृष्ण बोले- 
हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता॥40॥ 

योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है॥41॥ 
अथवा वैराग्यवान पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जो यह जन्म है, सो संसार में निःसंदेह अत्यंत दुर्लभ है॥42॥ 
 
वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे अर्जुन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है॥43॥ 

वह (यहाँ 'वह' शब्द से श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पुरुष समझना चाहिए) श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल का उल्लंघन कर जाता है॥44॥ 
 
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कारबल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर संपूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है॥45॥ 

श्लोक 46–47: श्रेष्ठ योगी कौन है?

योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन! तुम योगी बनो॥46॥ 

सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको निरंतर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है॥47॥

भगवद्गीता अध्याय 6 का सार

आत्मसंयम योग का मुख्य संदेश मन और जीवन को अनुशासित करने से जुड़ा है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि केवल बाहरी कर्मों का त्याग करना योग नहीं है। व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करते हुए कर्मफल की आसक्ति से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए।

इस अध्याय में मन को नियंत्रित करने पर विशेष जोर दिया गया है। यदि मन नियंत्रित है तो वह मनुष्य का मित्र बनता है और यदि मन अनियंत्रित है तो वही उसके लिए शत्रु जैसा बन सकता है।

ध्यानयोग के लिए श्रीकृष्ण उचित स्थान, आसन, एकाग्रता और संयमित जीवनचर्या की बात करते हैं। वे यह भी बताते हैं कि बहुत अधिक खाना, बहुत कम खाना, बहुत अधिक सोना या लगातार जागते रहना योग के लिए उचित संतुलन नहीं है।
अर्जुन जब मन की चंचलता के बारे में प्रश्न करते हैं, तब श्रीकृष्ण एक महत्वपूर्ण उपाय बताते हैं—अभ्यास और वैराग्य।

इस अध्याय का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि साधना में किया गया प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। योग में पूर्ण सफलता प्राप्त न कर पाने वाले साधक के संबंध में भी श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि कल्याण के मार्ग पर किया गया प्रयास नष्ट नहीं होता।
अंत में श्रीकृष्ण बताते हैं कि सभी योगियों में वह योगी श्रेष्ठ है जो श्रद्धापूर्वक भगवान में अपना मन लगाकर उनकी भक्ति करता है।

आत्मसंयम योग से मिलने वाली प्रमुख शिक्षाएँ

1. कर्म करते हुए आसक्ति छोड़ना

कर्तव्य से भागना योग नहीं है। कर्म करते हुए उसके फल की अत्यधिक आसक्ति से मुक्त होना महत्वपूर्ण है।

2. मन को मित्र बनाना

मनुष्य की आंतरिक स्थिति उसके जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है। इसलिए मन को नियंत्रित करना योग का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

3. ध्यान में नियमित अभ्यास

मन बार-बार भटक सकता है। ऐसे समय में उसे निराश होकर छोड़ने के बजाय बार-बार एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए।

4. अभ्यास और वैराग्य

श्रीकृष्ण के अनुसार चंचल मन को नियंत्रित करने में अभ्यास और वैराग्य महत्वपूर्ण हैं।

5. जीवन में संतुलन

आहार, नींद, जागना, कर्म और दैनिक गतिविधियों में उचित संतुलन रखना आवश्यक है।

6. समभाव

श्रेष्ठ योगी सुख-दुःख और विभिन्न परिस्थितियों में संतुलित दृष्टि रखने का प्रयास करता है।

7. साधना का प्रयास व्यर्थ नहीं जाता

अध्याय 6 में योगभ्रष्ट व्यक्ति के संबंध में श्रीकृष्ण बताते हैं कि आध्यात्मिक साधना का प्रयास व्यर्थ नहीं होता।

भगवद्गीता अध्याय 6: हमारे दैनिक जीवन (Daily Life) में इसका उपयोग

श्रीमद्भगवद्गीता का यह छठा अध्याय केवल साधुओं या संन्यासियों के लिए नहीं है, बल्कि आज के आधुनिक दौर में तनाव (Stress), चिंता (Anxiety) और भटकाव (Distractions) से जूझ रहे हर व्यक्ति के लिए एक प्रैक्टिकल गाइड है। आप इसके उपदेशों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इन 3 तरीकों से लागू कर सकते हैं:

1. ओवरथिंकिंग (Overthinking) और मानसिक तनाव पर नियंत्रण:

अध्याय 6 का संदेश: श्लोक 5 और 6 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य का मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र है और मन ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है।
लाइफ एप्लीकेशन: जब आप नकारात्मक सोचते हैं या अतीत और भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं, तो आपका मन आपका दुश्मन बन जाता है। अपने विचारों के प्रति जागरूक बनें। जब भी मन में नकारात्मक विचार आएं, तो खुद को याद दिलाएं कि आप अपने विचारों से बड़े हैं। अपने मन के मालिक खुद बनें, उसके गुलाम नहीं।
आज के आधुनिक जीवन में तनाव, चिंता और भटकाव जैसी परिस्थितियों को समझने के लिए गीता के इस अध्याय की शिक्षाएँ उपयोगी दृष्टिकोण देती हैं।

2. सोशल मीडिया और डिस्टर्बेंस के बीच फोकस कैसे बढ़ाएं?:

अध्याय 6 का संदेश: श्लोक 26 में कहा गया है कि यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी भटके, वहाँ-वहाँ से इसे रोककर बार-बार आत्मा (अपने लक्ष्य) में लगाना चाहिए।
लाइफ एप्लीकेशन: आज के दौर में रील, नोटिफिकेशन और सोशल मीडिया हमारे फोकस को बार-बार तोड़ते हैं। जब आप पढ़ाई या काम करने बैठते हैं और मन भटकता है, तो खुद पर गुस्सा होने के बजाय शांत रहें। जैसे ही ध्यान भटके, मन को धीरे से वापस अपने काम पर ले आएं। यह बार-बार करने से ही आपका फोकस मजबूत होगा।

3. असफलता (Failure) के डर से बाहर निकलें:

अध्याय 6 का संदेश: अर्जुन के पूछने पर कि जो व्यक्ति योग के मार्ग पर चलते हुए भी असफल हो जाता है उसका क्या होता है? श्रीकृष्ण श्लोक 40 में बहुत सुंदर आश्वासन देते हैं कि कल्याण के मार्ग पर चलने वाले किसी भी व्यक्ति का कभी विनाश या पतन नहीं होता।
लाइफ एप्लीकेशन: यदि आप किसी परीक्षा, बिजनेस या करियर के प्रयास में असफल हो जाते हैं, तो निराश न हों। आपकी मेहनत और सीख कभी बेकार नहीं जाती। आपके अच्छे प्रयास आपके अवचेतन मन में संस्कारों के रूप में जमा रहते हैं, जो आपको अगले प्रयास में दोगुनी शक्ति के साथ आगे बढ़ाते हैं।
आपका प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। उससे प्राप्त अनुभव, अनुशासन और सीख आगे के प्रयासों में आपके लिए उपयोगी हो सकती है।

गीता के अनुसार ध्यान (Meditation) योग का अभ्यास कैसे करें?

आजकल लोग मेडिटेशन के कई तरीके अपनाते हैं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अध्याय 6 के श्लोक 11 से 14 में ध्यान लगाने की सबसे सटीक और वैज्ञानिक विधि बताई है। इसे आप इन 5 स्टेप्स में समझ सकते हैं:
  • स्थान का चुनाव (The Right Place): ध्यान के लिए कोई ऐसा शांत और शुद्ध स्थान चुनें जहाँ शोर-शराबा न हो और आपका मन एकाग्र हो सके।
  • आसन की स्थिति (The Sitting Base): श्लोक 11 में, चैलाजिनकुशोत्तरम् का उल्लेख है, अर्थात् कुशा, अजिन और वस्त्र की व्यवस्था का वर्णन है। 
आपका आसन न तो बहुत ऊंचा होना चाहिए और न ही बहुत नीचा (जैसे बहुत गद्देदार सीट या बहुत कठोर फर्श नहीं)। जमीन पर कुशा (घास) या सूती कपड़ा बिछाकर बैठना सबसे उत्तम है। 
  • शारीरिक मुद्रा (The Posture): बैठते समय अपनी रीढ़ की हड्डी (Spine), गर्दन और सिर को बिल्कुल सीधा, सीधा और अचल रखें। शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें, लेकिन झुकने न दें।
  • दृष्टि को केंद्रित करना (The Gaze): श्लोक 13 में दृष्टि को नासिकाग्र की ओर रखने और इधर-उधर न देखने का निर्देश दिया गया है। आँखों को पूरी तरह बंद कर लें या फिर अपनी दृष्टि को नाक के अग्रभाग (Tip of the nose) पर टिकाएं। इधर-उधर की दिशाओं में बिल्कुल न देखें।
  • मन का समर्पण (The Mindset): श्लोक 14 में 'विगतभी' अर्थात भय से मुक्त/निर्भय होने की बात आती है। इसलिए यहां मन को शांत रखते हुए भय से मुक्त होकर अपने चित्त को भगवान में लगाने का निर्देश दिया गया है। 
मन के डर और चिंताओं को पूरी तरह छोड़ दें (भयरहित होकर), अपने चित्त को शांत करके अपना पूरा ध्यान ईश्वर या अपने आंतरिक अस्तित्व पर केंद्रित करें।

भगवद्गीता अध्याय 6 से अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

भगवद्गीता अध्याय 6 का नाम क्या है?

भगवद्गीता के छठे अध्याय का नाम आत्मसंयम योग है। इसे ध्यानयोग से भी जोड़ा जाता है क्योंकि इसमें ध्यान और मन के संयम का विस्तार से वर्णन मिलता है।

भगवद्गीता अध्याय 6 में कितने श्लोक हैं?

भगवद्गीता अध्याय 6 में 47 श्लोक हैं।

आत्मसंयम योग क्या है?

आत्मसंयम योग का मुख्य विषय मन और इंद्रियों को नियंत्रित करके योग में स्थिर होना है। इसमें कर्मयोग, ध्यान, मन का नियंत्रण, अभ्यास और वैराग्य जैसे विषयों की चर्चा होती है।

गीता अध्याय 6 में मन को नियंत्रित करने के लिए क्या कहा गया है?

श्रीकृष्ण बताते हैं कि चंचल मन को अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

गीता अध्याय 6 का सबसे प्रसिद्ध श्लोक कौन-सा है?

अध्याय 6 के कई श्लोक अत्यंत प्रसिद्ध हैं। उनमें श्लोक 5 और श्लोक 35 विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। श्लोक 35 में मन को अभ्यास और वैराग्य से नियंत्रित करने की बात कही गई है।

गीता अध्याय 6 में योगभ्रष्ट के बारे में क्या कहा गया है?

अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण बताते हैं कि योग की साधना करने वाले व्यक्ति का प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। योग में पूर्ण सिद्धि न प्राप्त होने पर भी उसके कल्याणकारी प्रयास का नाश नहीं होता।

गीता अध्याय 6 के अनुसार श्रेष्ठ योगी कौन है?

अध्याय के अंतिम श्लोक में श्रीकृष्ण उस योगी को श्रेष्ठ बताते हैं जो श्रद्धापूर्वक अपने अंतःकरण को भगवान में लगाकर उनका भजन करता है।

निष्कर्ष

भगवद्गीता अध्याय 6: आत्मसंयम योग मन, कर्म, ध्यान और आत्मसंयम को समझने वाला महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें श्रीकृष्ण बताते हैं कि योग केवल बाहरी रूप से संसार का त्याग करने का नाम नहीं है। कर्म करते हुए आसक्ति कम करना, मन को नियंत्रित करना, ध्यान का अभ्यास करना और जीवन में संतुलन रखना भी योग के महत्वपूर्ण अंग हैं।

अर्जुन के मन की चंचलता संबंधी प्रश्न के उत्तर में दिया गया “अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते” संदेश इस अध्याय की प्रमुख शिक्षाओं में से एक है।

अध्याय का अंतिम संदेश भक्ति और योग को जोड़ता है। श्रीकृष्ण श्रद्धापूर्वक भगवान में मन लगाने वाले योगी को सभी योगियों में श्रेष्ठ बताते हैं।

भगवद्गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ें

अगर आप पूरी भगवद्गीता को अध्याय-दर-अध्याय सरल हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे भगवद्गीता के 18 अध्यायों के संपूर्ण परिचय से शुरुआत कर सकते हैं।

एक जगह से सभी अध्याय पढ़ने के लिए:

  1. अध्याय 1 — अर्जुनविषाद योग
  2. अध्याय 2 — सांख्य योग
  3. अध्याय 3 — कर्म योग
  4. अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यास योग
  5. अध्याय 5 — सांख्य योग और कर्म योग
  6. अध्याय 6 — आत्मसंयम योग
  7. अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञान योग
  8. अध्याय 8 — अक्षरब्रह्म योग
  9. अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
  10. अध्याय 10 — विभूति योग
  11. अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शन योग
  12. अध्याय 12 — भक्तियोग
  13. अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग
  14. अध्याय 14 — गुणत्रयविभाग योग
  15. अध्याय 15 — पुरुषोत्तम योग
  16. अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभाग योग
  17. अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभाग योग
  18. अध्याय 18 — मोक्षसंन्यास योग

संदर्भ और स्रोत

इस लेख में भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोक, उनकी हिंदी व्याख्या और गीता-अध्ययन के संदर्भ में गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित स्वामी रामसुखदास जी की श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। 

गीता प्रेस के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अर्थ और विस्तृत टीका दी गई है। 
इसके अलावा गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित गीता तत्त्वविवेचनी में भी मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी व्याख्या उपलब्ध है। 

About the Author

Sonam Agarwal

LLB with Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर research-based articles लिखती हैं। अब तक वे 500 से अधिक लेख लिख चुकी हैं।

सनातन धर्म और भगवद्गीता से संबंधित लेखों में उनका विशेष ध्यान मूल ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर जानकारी को सरल और सामान्य पाठकों के लिए समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने पर रहता है।

उनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को बिना अनावश्यक जटिलता के प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक उनके मूल विचारों को सही संदर्भ में समझ सकें।

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Bhagwad Gita Adhyay 6 : Atma Sanyam Yog

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