Bhagavad Geeta Adhyay 16 (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) : श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 16 (दैवासुर सम्पद्विभाग योग)

भगवद्गीता अध्याय 16: दैवासुर सम्पद्विभाग योग – 24 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ

Bhagavad Gita Chapter 16 | Gita Adhyay 16 | Daivasura Sampad Vibhaga Yoga | 24 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

Bhagavad Gita Chapter 16 | Gita Adhyay 16 | Daivasura Sampad Vibhaga Yoga | 24 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

भगवद्गीता अध्याय 16: दैवासुर सम्पद्विभाग योग का परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता का सोलहवाँ अध्याय “दैवासुर सम्पद्विभाग योग” (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) कहलाता है। इसमें कुल 24 श्लोक हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य के चरित्र और व्यवहार को प्रभावित करने वाली दो प्रकार की प्रवृत्तियों—दैवी सम्पदा और आसुरी सम्पदा—का विस्तार से वर्णन करते हैं।

भगवान पहले दैवी गुणों जैसे निर्भयता, मन की शुद्धता, आत्मसंयम, दान, अहिंसा, सत्य, क्षमा, दया, सरलता और विनम्रता का वर्णन करते हैं। 

इसके बाद आसुरी प्रवृत्तियों जैसे दम्भ, घमण्ड, अहंकार, क्रोध, कठोरता, अज्ञान, अत्यधिक कामना और लोभ के बारे में बताते हैं।

अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण विशेष रूप से काम, क्रोध और लोभ को मनुष्य के पतन के तीन द्वार बताते हैं और शास्त्र को कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय में प्रमाण मानने की शिक्षा देते हैं।

महत्वपूर्ण बात: गीता में “दैवी” और “आसुरी” सम्पदा को मुख्यतः मनुष्य के गुणों, प्रवृत्तियों और आचरण के रूप में समझाया गया है। इसलिए इन्हें केवल किसी व्यक्ति की स्थायी पहचान या जन्म से जुड़ी श्रेणी के रूप में समझना उचित नहीं है।

भगवद्गीता के ७वें अध्याय के १५वें श्लोक में तथा ९वें अध्याय के ११वें और १२वें श्लोकों में भगवान ने अर्जुन से कहा था कि आसुरी और राक्षसी प्रकृति को धारण करने वाले मूढ़ मेरा भजन नहीं कर सकते, वरं मेरा तिरस्कार करते हैं। 

तथा ९वें अध्याय के १३वें और १४वें श्लोक में कहा कि "दैवी-प्रकृति से युक्त महात्माजन मुझे सब भूतों (समस्त प्राणियों) का आदि और अविनाशी समझकर अनन्य प्रेम के साथ सब प्रकार के निरंतर मेरा भजन करते हैं।" 

परन्तु दूसरा प्रसंग चलता रहने के कारण वहाँ दैवी प्रकृति और आसुरी प्रकृति के लक्षणों का वर्णन नहीं किया जा सका। फिर १५वें अध्याय के उन्नीसवें श्लोक में भगवान ने कहा कि "जो ज्ञानी महात्मा मुझे 'पुरुषोत्तम' जानते हैं, वे सब प्रकार से मेरा भजन करते हैं।" इस पर स्वाभाविक ही भगवान् को पुरुषोत्तम जानकर सर्वभाव से उनका भजन करने वाले दैवी-प्रकृति युक्त महात्मा पुरुषों के और उनका भजन न करने वाले आसुरी प्रकृति युक्त अज्ञानी मनुष्यों के क्या-क्या लक्षण हैं- यह जानने की इच्छा होती है। 

अतएव अब भगवान दोनों के लक्षण और स्वभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के लिये १६वां अध्याय आरम्भ करते हैं। इसमें वे पहले तीन श्लोकों द्वारा दैवी-सम्पदा से युक्त सात्त्विक पुरुषों के स्वाभाविक लक्षणों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।

भगवद्गीता अध्याय 16 का मुख्य संदेश

अध्याय 16 को सरल शब्दों में इस तरह समझ सकते हैं:

दैवी सम्पदा → आत्मसंयम, सत्य, दया, शांति और सदाचार → मुक्ति की ओर

आसुरी सम्पदा → अहंकार, क्रोध, लोभ, छल और अनियंत्रित इच्छाएँ → बंधन और पतन की ओर

भगवान श्रीकृष्ण का संदेश केवल दूसरों को “दैवी” या “आसुरी” बताने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य अपने भीतर मौजूद प्रवृत्तियों को पहचानना और उन्हें सही दिशा देना भी है।

भगवद्गीता - षोडश अध्याय के 24 संस्कृत श्लोक (Gita Chapter 16 Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) | Bhagwat Geeta Adhyay 16, Shlok in Sanskrit

श्रीभगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। 
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥१॥ 

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। 
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२॥

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। 
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥३॥ 

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। 
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४॥

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। 
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥५॥ 

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च। 
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श‍ृणु॥६॥

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। 
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७॥ 

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। 
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८॥

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। 
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥९॥ 

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। 
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१०॥

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। 
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११॥ 

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। 
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२॥

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। 
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३॥ 

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। 
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥१४॥

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। 
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५॥ 

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। 
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥१६॥

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। 
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७॥ 

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। 
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८॥

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। 
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥१९॥ 

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। 
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२०॥

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। 
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥२१॥ 

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। 
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२॥

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। 
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३॥ 

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। 
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४॥

गीता के सोलहवाँ अध्याय का हिंदी अर्थ और भावार्थ | Gita Chapter 16 Daivasura Sampad Vibhaga Yoga | Bhagwat Geeta Adhyay 16 in Hindi Meaning

दैवी सम्पदा

श्लोक 1

भगवान श्रीकृष्ण बोले- 

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धता, ज्ञान और आत्मचिंतन में स्थिरता, दान, इन्द्रिय-संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता दैवी गुण हैं।

दार्शनिक व्याख्या
भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरंतर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान (गीता अध्याय 17 श्लोक 20 में देखें), इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता दैवी गुण हैं॥1॥ 

श्लोक 2

सरल हिंदी अर्थ:
अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शांति, दूसरों की निंदा न करना, सभी प्राणियों के प्रति दया, लोभ से दूर रहना, कोमलता, उचित लज्जा और चंचलता का अभाव भी दैवी गुण हैं।

दार्शनिक व्याख्या
मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम 'सत्यभाषण' है), अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति (अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव), किसी की भी निन्दा आदि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव॥2॥ 

श्लोक 3

सरल हिंदी अर्थ:
तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धता, किसी के प्रति द्वेष न रखना और अत्यधिक अहंकार का अभाव—ये सभी दैवी सम्पदा वाले व्यक्ति के लक्षण हैं।

दार्शनिक व्याख्या
तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी देखें) एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥3॥ 

"तेज" श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम है, जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं। 

भारी से भारी आपत्ति, भय या दुःख उपस्थित होने पर भी विचलिन न होना काम, क्रोध, भय या लोभ में किसी प्रकार भी अपने धर्म और कर्तव्य विमुख न होना "धैर्य" है। 

आसुरी सम्पदा

श्लोक 4

सरल हिंदी अर्थ:
दम्भ, घमण्ड, अहंकार, क्रोध, कठोर व्यवहार और अज्ञान आसुरी सम्पदा के प्रमुख लक्षण हैं।

दार्शनिक व्याख्या
हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान (सत्य-असत्य और धर्म-अधर्म आदि का यथार्थ न समझना या उनके संबंध में विपरीत निश्चय कर लेना "अज्ञान" है)- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं॥4॥ 

दैवी सम्पदा से मुक्ति

श्लोक 5

सरल हिंदी अर्थ:
दैवी सम्पदा मनुष्य को मुक्ति की दिशा में ले जाती है, जबकि आसुरी सम्पदा बंधन का कारण बनती है। इसलिए हे अर्जुन! तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा से युक्त हो।

दार्शनिक व्याख्या
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है. इसलिए हे अर्जुन! तुम शोक न करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए हो॥5॥ 

आसुरी प्रकृति

श्लोक 6

सरल हिंदी अर्थ:
इस संसार में मनुष्यों की प्रवृत्तियों के दो प्रमुख प्रकार बताए गए हैं—दैवी और आसुरी। दैवी प्रवृत्ति का वर्णन पहले किया गया; अब आसुरी प्रवृत्ति के बारे में सुनो।

दार्शनिक व्याख्या
अर्जुन! इस लोक में भूतों (समस्त प्राणियों) की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला. उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तुम आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुनो॥6॥ 

मनुष्यों के दो समुदाय में जो सात्त्विक है, वह दैवी प्रकृति वाला है और जो रजोमिश्रित तमःप्रधान है, वह आसुरी प्रकृति वाला है।

श्लोक 7

सरल हिंदी अर्थ:
आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग उचित कर्म और अनुचित कर्म का विवेक नहीं समझते। उनमें शुद्धता, उचित आचरण और सत्य का अभाव रहता है।

दार्शनिक व्याख्या
अर्जुन! आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते. इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है॥7॥ 

श्लोक 8

सरल हिंदी अर्थ:
वे कहते हैं कि संसार असत्य, किसी स्थायी आधार से रहित और ईश्वर से रहित है तथा इसकी उत्पत्ति केवल भौतिक कारणों और इच्छाओं से हुई है। गीता यहाँ ऐसी दृष्टि को आसुरी प्रवृत्ति के संदर्भ में प्रस्तुत करती है।

दार्शनिक व्याख्या
वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत्‌ आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है. इसके सिवा और क्या है? (ये आसुर प्रकृति वाले मनुष्य की मनगढ़ंत कल्पनाएं हैं)॥8॥

जिस कर्म के आचरण से इस लोक और परलोक में मनुष्य का यथार्थ कल्याण होता है, वही कर्तव्य है। चूंकि आसुर-स्वभाव वाले मनुष्य इस कर्तव्य-अकर्तव्य संबंधी प्रवृत्ति और निवृत्ति को बिल्कुल ही नहीं समझते, इसीलिये उनके मन में जो आता है, वही करने लगते हैं।

श्लोक 9

सरल हिंदी अर्थ:
ऐसी दृष्टि को अपनाकर, विवेक से रहित और अपने वास्तविक कल्याण से दूर लोग कठोर तथा अहितकारी कर्मों में लग जाते हैं और दूसरों के लिए भी हानिकारक बनते हैं।

दार्शनिक व्याख्या
इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके (के सहारे) - जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत्‌ के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं॥9॥ 

श्लोक 10

सरल हिंदी अर्थ:
वे कभी पूरी न होने वाली इच्छाओं के वशीभूत रहते हैं और दम्भ, अहंकार तथा मोह से गलत धारणाओं को पकड़कर अनुचित आचरण करने लगते हैं।

दार्शनिक व्याख्या
वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं॥10॥ 

श्लोक 11

सरल हिंदी अर्थ:
वे जीवनभर अनेक प्रकार की चिंताओं से घिरे रहते हैं और विषय-भोग को ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य मान लेते हैं।

दार्शनिक व्याख्या
तथा वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिंताओं का आश्रय लेने वाले, विषयभोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और "इतना ही सुख है" इस प्रकार मानने वाले होते हैं॥11॥ 

जिन मनुष्यों के खानपान, रहन-सहन, बोलचाल, व्यवसाय-वाणिज्य, देन-लेन और बर्ताव-व्यवहार आदि शास्त्र विरुद्ध और भ्रष्ट होते हैं, वे भ्रष्ट आचरणों वाले कहे जाते हैं। 

नास्तिक सिद्धांत वाले मनुष्य आत्मा की सत्ता को नहीं मानते, वे केवल देहवादी या भौतिकवादी ही होते हैं। इससे उनका स्वभाव भ्रष्ट हो जाता है। उनकी किसी भी सत्कार्य के करने में प्रवृति नहीं होती। उनकी बुद्धि भी अत्यंत मंद होती है; वे जो कुछ भी निश्चय करते हैं, सब केवल भोग-सुख की दृष्टि से ही करते हैं, दूसरों के सुखों का ध्यान नहीं रखते वे।

उनका मन लगातार सबका अहित करने की बात ही सोचा करता है, और इससे वे अपना भी अहित ही कर डालते हैं।

श्लोक 12

सरल हिंदी अर्थ:
असंख्य आशाओं के बंधन में पड़े और काम-क्रोध के वशीभूत लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीके से धन और साधन जुटाने का प्रयास करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या 
वे आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धन आदि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं॥12॥ 

श्लोक 13

सरल हिंदी अर्थ:
वे सोचते हैं—“आज मैंने यह प्राप्त कर लिया है और अब अपनी दूसरी इच्छा भी पूरी कर लूँगा। मेरे पास इतना धन है और आगे भी और धन प्राप्त होगा।”

दार्शनिक व्याख्या
वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा. मेरे पास यह इतना धन है और फिर यह भी हो जाएगा॥13॥ 

श्लोक 14

सरल हिंदी अर्थ:
वे अहंकार में सोचते हैं—“मैंने इस शत्रु को पराजित कर दिया और दूसरों को भी कर दूँगा। मैं ही शक्तिशाली हूँ, मैं ही भोग करने वाला हूँ, मैं सफल और बलवान हूँ।”

दार्शनिक व्याख्या
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा. मैं ईश्वर हूँ, ऐश्वर्य को भोगने वाला हूँ. मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान्‌ तथा सुखी हूँ॥14॥ 

श्लोक 15

सरल हिंदी अर्थ:
वे अपने धन, प्रतिष्ठा और परिवार पर गर्व करते हुए सोचते हैं—“मेरे समान कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आनंद करूँगा।” इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

श्लोक 16

सरल हिंदी अर्थ:
अनेक प्रकार की इच्छाओं और भ्रम से घिरे तथा विषय-भोगों में अत्यधिक आसक्त लोग अशुद्ध और दुखद अवस्था की ओर गिरते हैं। यहाँ “नरक” को गीता के व्यापक कर्मफल और आध्यात्मिक पतन के संदर्भ में समझना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यंत आसक्त आसुरलोग महान्‌ अपवित्र नरक में गिरते हैं॥15-16॥

श्लोक 17

सरल हिंदी अर्थ:
अपने ही महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर मानने वाले, धन और प्रतिष्ठा के अहंकार से भरे लोग केवल दिखावे के लिए यज्ञ आदि करते हैं और उनमें वास्तविक श्रद्धा या उचित विधि का अभाव रहता है।

दार्शनिक व्याख्या
वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी मनुष्य धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं॥17॥ 

श्लोक 18

सरल हिंदी अर्थ:
अहंकार, शक्ति का गर्व, दर्प, कामना और क्रोध के वशीभूत लोग अपने तथा दूसरों के शरीर में स्थित परमात्मा के प्रति भी द्वेषपूर्ण भाव रखते हैं।

दार्शनिक व्याख्या
वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोध आदि के परायण और दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले होते हैं॥18॥ 

श्लोक 19

सरल हिंदी अर्थ:
भगवान कहते हैं कि ऐसे द्वेषपूर्ण, क्रूर और अधर्मपूर्ण आचरण करने वाले मनुष्य बार-बार आसुरी प्रवृत्तियों वाली योनियों को प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या
उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ (सिंह, बाघ, सर्प, बिच्छु, सूअर, कुत्ते और कौवे आदि जितने भी पशु, पक्षी, कीट, पतंग हैं- ये सभी आसुरी योनियां हैं)॥19॥ 

श्लोक 20

सरल हिंदी अर्थ:
ऐसे मूढ़ लोग बार-बार आसुरी योनियों को प्राप्त होते हैं और भगवान को प्राप्त किए बिना क्रमशः अधम गति की ओर जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या
हे अर्जुन! वे मूढ़ मनुष्य मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ घोर नरकों में पड़ते हैं॥20॥ 

काम, क्रोध और लोभ

श्लोक 21

सरल हिंदी अर्थ:
काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरक के द्वार हैं और मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं। इसलिए इन तीनों का त्याग करना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या
काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार (सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं. इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए॥21॥
अध्याय 16 का सबसे प्रसिद्ध व्यावहारिक संदेश:
काम + क्रोध + लोभ = आत्मिक पतन के तीन द्वार

श्लोक 22

सरल हिंदी अर्थ:
हे अर्जुन! जो व्यक्ति इन तीन अंधकारमय द्वारों से मुक्त हो जाता है और अपने कल्याण के मार्ग पर चलता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या
अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है (अपने उद्धार के लिए भगवदाज्ञानुसार बरतना ही "अपने कल्याण का आचरण करना" है), इससे वह परमगति को जाता है अर्थात्‌ मुझको प्राप्त हो जाता है॥22॥ 

शास्त्र का महत्व

श्लोक 23

सरल हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति शास्त्रीय मार्गदर्शन की उपेक्षा करके केवल अपनी इच्छानुसार आचरण करता है, वह न वास्तविक सिद्धि प्राप्त करता है, न स्थायी सुख और न परम गति।

दार्शनिक व्याख्या
जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही॥23॥ 

श्लोक 24

सरल हिंदी अर्थ:
इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—इसका निर्णय करने में शास्त्र को प्रमाण मानना चाहिए। शास्त्र के निर्देश को समझकर उचित कर्म करना चाहिए।

दार्शनिक व्याख्या
इससे तुम्हारे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है. ऐसा जानकर तुम शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य हो॥24॥ 
Bhagavad Gita Chapter 16 | Gita Adhyay 16 | Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

आसुर स्वभाव वाले मनुष्य मन में उठने वाली कल्पनाओं की पूर्ति के लिये भाँति-भाँति की सैकड़ों आशाएं लगाये रहते हैं। उनका मन कभी किसी विषय की आशा में लटकता है, कभी किसी में खिचता है, और कभी किसी में अटकता है. इस प्रकार आशाओं के बंधन से वे कभी छूटते ही नहीं। इसी से उन्हें सैकड़ों आशाओं की फांसियों से बंधे हुए कहा गया है।

विषय भोगों के उद्देश्य से वे काम-क्रोध का आश्रय करके अन्यायपूर्वक अर्थात् चोरी, ठगी, डाका, झूठ, कपट, छल, दम्भ, मारपीट, कूटनीति, जुआ, धोखेबाजी, विष-प्रयोग, झूठे मुकदमे और भय-प्रदान आदि शास्त्र विरुद्ध उपायों के द्वारा दूसरों के धन आदि को हरण करने की चेष्टा करते हैं. अहंकार के साथ ही वे मान में भी चूर रहते हैं, इससे ऐसा समझते हैं कि "संसार में हमसे बड़ा और है ही कौन हम जिसे चाहें मार दें, बचा दें, जिसकी चाहें जड़ उखाड़ दें या रोप दें। हम सर्वथा स्वतंत्र हैं, सब कुछ हमारे ही हाथों में है।" 

काम, क्रोध और लोभ आदि आसुरी सम्पदा का त्याग करके शास्त्र प्रतिपादित सद्गुण और सदाचार रूप दैवी-सम्पदा का निष्कामभाव से सेवन करना ही कल्याण के लिये आचरण करना है।

वेद और वेदों के आधार पर रचित स्मृति, पुराण, इतिहास आदि का नाम शास्त्र है। आसुरी सम्पदा के आचार व्यवहार आदि के त्याग का और दैवीसम्पदा रूप कल्याणकारी गुण-आचरणों के सेवन का ज्ञान शास्त्रों से ही होता है। 

कब क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये- इसकी व्यवस्था श्रुति, वेदमूलक स्मृति और पुराण-इतिहास आदि शास्त्रों से प्राप्त होती है। अर्थात इन शास्त्रों में जिन कर्मों के करने का विधान है, उन्हें करना चाहिये और जिनका निषेध है, उन्‍हें नहीं करना चाहिये।

कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान कराने वाले शास्त्रों के विधान की अवहेलना करके अपनी बुद्धि से अच्छा समझकर जो चाहे मनमाने अर्थ निकालकर मान, बड़ाई-प्रतिष्ठा आदि किसी की भी इच्छाविशेष को लेकर आचरण करना है, यही शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करना है। ऐसे कर्म करने वाले कर्ता को कोई भी फल नहीं मिलता।

भगवद्गीता अध्याय 16 का सार

अध्याय 16 का मूल संदेश यह है कि मनुष्य का जीवन उसके गुणों, विचारों, इच्छाओं और आचरण से प्रभावित होता है।

दैवी सम्पदा के प्रमुख गुण

दैवी गुण सरल अर्थ
अभय उचित कार्य करने का साहस
सत्त्व-शुद्धि मन की शुद्धता
दान दूसरों की सहायता करना
दम इन्द्रियों पर संयम
अहिंसा किसी को अनावश्यक कष्ट न देना
सत्य सत्य और उचित बात कहना
अक्रोध क्रोध पर नियंत्रण
दया प्राणियों के प्रति करुणा
क्षमा गलती होने पर क्षमा करने की क्षमता
शौच बाहरी और आंतरिक शुद्धता
अद्रोह द्वेष का अभाव
नातिमानिता अत्यधिक अहंकार का अभाव

आसुरी सम्पदा के प्रमुख गुण

आसुरी प्रवृत्ति सरल अर्थ
दम्भ दिखावा
दर्प घमण्ड
अभिमान स्वयं को अत्यधिक श्रेष्ठ मानना
क्रोध अनियंत्रित गुस्सा
पारुष्य कठोर व्यवहार
अज्ञान सही और गलत का विवेक न होना
काम अनियंत्रित इच्छा
लोभ आवश्यकता से अधिक पाने की लालसा
मोह गलत आसक्ति और भ्रम

काम, क्रोध और लोभ: पतन के तीन द्वार क्यों?

भगवद्गीता के 16वें अध्याय का श्लोक 21 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

“कामः क्रोधस्तथा लोभः”

अर्थात काम, क्रोध और लोभ मनुष्य के पतन के तीन द्वार हैं।

इसे आधुनिक जीवन में सरल रूप से समझें:

  • काम: हर इच्छा को तुरंत पूरा करने की बेचैनी।
  • क्रोध: इच्छा पूरी न होने पर नियंत्रण खो देना।
  • लोभ: प्राप्त चीजों के बावजूद लगातार और अधिक पाने की चाह।

इन तीनों पर संयम व्यक्ति को अधिक संतुलित और विवेकपूर्ण जीवन की ओर ले जा सकता है।


भगवद्गीता अध्याय 16 और अध्याय 15 का संबंध

पिछले अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने पुरुषोत्तम के स्वरूप और संसार से वैराग्य की बात कही थी। अध्याय 16 में वे बताते हैं कि मनुष्य के भीतर कौन-से गुण उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं और कौन-सी प्रवृत्तियाँ उसे बंधन की ओर ले जाती हैं।

इस प्रकार:

अध्याय 15 → संसार, आत्मा और पुरुषोत्तम का विवेचन

अध्याय 16 → दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का विवेचन

यह दोनों अध्यायों के बीच एक उपयोगी वैचारिक संबंध है।


भगवद्गीता अध्याय 16 से 10 महत्वपूर्ण जीवन सीख

  1. निर्भयता रखें, लेकिन विवेक के साथ।
  2. सत्य और अहिंसा को जीवन में महत्व दें।
  3. क्रोध को अपनी निर्णय-क्षमता पर हावी न होने दें।
  4. दूसरों की निंदा करने की आदत से बचें।
  5. अहंकार और दिखावे से दूरी रखें।
  6. इच्छाओं को नियंत्रित करना सीखें।
  7. लोभ को पहचानें और सीमित करें।
  8. दूसरों के प्रति दया और सम्मान रखें।
  9. कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच विवेक विकसित करें।
  10. अपने जीवन के निर्णयों के लिए विश्वसनीय नैतिक और शास्त्रीय मार्गदर्शन को समझें।

आज के युवाओं के लिए भगवद्गीता अध्याय 16 का संदेश

अध्याय 16 का मूल संदर्भ प्राचीन आध्यात्मिक और नैतिक जीवन है, लेकिन इसके सिद्धांतों को आधुनिक जीवन में भी समझा जा सकता है।

1. Social Media और दिखावे की दुनिया

आज सोशल मीडिया पर लाइक्स, फॉलोअर्स और दूसरों से तुलना कई लोगों के लिए तनाव का कारण बन सकती है। अध्याय 16 में दम्भ, दर्प और अभिमान से सावधान किया गया है।

इसका आधुनिक takeaway है:

अपनी वास्तविक पहचान को केवल online approval से न जोड़ें।

2. Career और सफलता

सफलता की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन जब उपलब्धि ही व्यक्ति की पूरी पहचान बन जाए तो असंतुलन पैदा हो सकता है।

गीता का संदेश है कि अहंकार और अत्यधिक आसक्ति के बजाय विवेक, संयम और सही आचरण को महत्व दिया जाए।

3. Anger Management

क्रोध को अध्याय 16 में स्पष्ट रूप से आसुरी प्रवृत्तियों में रखा गया है।

इसलिए किसी कठिन परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय:

Pause → Think → Respond

जैसी आदत आत्मसंयम की आधुनिक अभिव्यक्ति मानी जा सकती है।

4. Consumerism और Greed

“और अधिक” पाने की लगातार इच्छा व्यक्ति को असंतुष्ट रख सकती है। अध्याय 16 में लोभ को पतन के तीन प्रमुख द्वारों में रखा गया है।

इसलिए आवश्यकता और लालच के बीच अंतर समझना उपयोगी जीवन-दृष्टि हो सकती है।

5. Character > Image

अध्याय 16 का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि व्यक्ति की वास्तविक गुणवत्ता केवल उसकी संपत्ति, प्रतिष्ठा या बाहरी छवि से निर्धारित नहीं होती।

चरित्र, संयम, सत्य, दया और व्यवहार अधिक महत्वपूर्ण हैं।

नोट: यह आधुनिक-life section अध्याय के सिद्धांतों की contemporary interpretation है, न कि गीता के श्लोकों का शाब्दिक अर्थ।


Bhagavad Gita Chapter 16: Key Takeaways

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga teaches a clear distinction between constructive and destructive human tendencies.

Divine qualities:

Fearlessness • Purity • Self-control • Truth • Compassion • Forgiveness • Humility

Destructive tendencies:

Ego • Arrogance • Anger • Greed • Excessive Desire • Deception • Ignorance

And the central warning of Chapter 16 is:

काम, क्रोध और लोभ से सावधान रहें।


Frequently Asked Questions (FAQs)

भगवद्गीता के 16वें अध्याय का नाम क्या है?

भगवद्गीता के 16वें अध्याय का नाम दैवासुरसम्पद्विभाग योग है। अंग्रेजी में इसे Daivasura Sampad Vibhaga Yoga कहा जाता है।

भगवद्गीता अध्याय 16 में कितने श्लोक हैं?

अध्याय 16 में कुल 24 श्लोक हैं।

गीता अध्याय 16 में क्या बताया गया है?

इस अध्याय में मुख्य रूप से दैवी सम्पदा और आसुरी सम्पदा, उनके लक्षण, उनके परिणाम तथा मनुष्य के आध्यात्मिक और नैतिक जीवन पर उनके प्रभाव का वर्णन किया गया है।

गीता अध्याय 16 के अनुसार तीन नरक के द्वार कौन-से हैं?

श्लोक 21 के अनुसार काम, क्रोध और लोभ तीन नरक के द्वार बताए गए हैं।

गीता अध्याय 16 में दैवी गुण कौन-कौन से हैं?

निर्भयता, मन की शुद्धता, आत्मसंयम, दान, अहिंसा, सत्य, क्षमा, दया, शांति, सरलता, शौच और विनम्रता आदि दैवी गुणों में शामिल हैं।

गीता अध्याय 16 में आसुरी गुण कौन-कौन से हैं?

दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान प्रमुख आसुरी गुण हैं। अध्याय के आगे के श्लोकों में काम, लोभ, अत्यधिक आसक्ति और अहंकार जैसी प्रवृत्तियों का भी वर्णन मिलता है।

क्या गीता का अध्याय 16 केवल धार्मिक लोगों के लिए है?

इस अध्याय की शिक्षाओं को धार्मिक संदर्भ के साथ-साथ आत्मसंयम, नैतिकता, चरित्र और व्यवहार के दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है। हालांकि इसके मूल संदेश को उसके आध्यात्मिक और शास्त्रीय संदर्भ में समझना सबसे उचित है।


निष्कर्ष

भगवद्गीता का 16वाँ अध्याय—दैवासुरसम्पद्विभाग योग—मनुष्य को अपने भीतर मौजूद सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचानने की प्रेरणा देता है।

यह अध्याय केवल यह बताने के लिए नहीं है कि कौन “दैवी” है और कौन “आसुरी”। इसका अधिक व्यावहारिक संदेश यह है कि हम अपने जीवन में सत्य, संयम, दया, क्षमा, विनम्रता और विवेक को बढ़ाएँ तथा अहंकार, क्रोध, लोभ और अनियंत्रित इच्छाओं पर नियंत्रण पाने का प्रयास करें।

अध्याय 16 का सबसे संक्षिप्त संदेश इस प्रकार समझा जा सकता है:

“दैवी गुणों को विकसित करो, आसुरी प्रवृत्तियों को पहचानो और काम, क्रोध तथा लोभ से सावधान रहो।”

Comic Bhagavad Gita Chapter 16 | Gita Adhyay 16 | Daivasura Sampad Vibhaga Yoga


भगवद्गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ें

अगर आप पूरी भगवद्गीता को अध्याय-दर-अध्याय सरल हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे भगवद्गीता के 18 अध्यायों के संपूर्ण परिचय से शुरुआत कर सकते हैं।

एक जगह से सभी अध्याय पढ़ने के लिए:

  1. अध्याय 1 — अर्जुनविषाद योग
  2. अध्याय 2 — सांख्य योग
  3. अध्याय 3 — कर्म योग
  4. अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यास योग
  5. अध्याय 5 — सांख्य योग और कर्म योग
  6. अध्याय 6 — आत्मसंयम योग
  7. अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञान योग
  8. अध्याय 8 — अक्षरब्रह्म योग
  9. अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
  10. अध्याय 10 — विभूति योग
  11. अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शन योग
  12. अध्याय 12 — भक्तियोग
  13. अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग
  14. अध्याय 14 — गुणत्रयविभाग योग
  15. अध्याय 15 — पुरुषोत्तम योग
  16. अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभाग योग
  17. अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभाग योग
  18. अध्याय 18 — मोक्षसंन्यास योग

संदर्भ और स्रोत

इस लेख में भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोक, उनकी हिंदी व्याख्या और गीता-अध्ययन के संदर्भ में गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित स्वामी रामसुखदास जी की श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। 

गीता प्रेस के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अर्थ और विस्तृत टीका दी गई है। 
इसके अलावा गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित गीता तत्त्वविवेचनी में भी मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी व्याख्या उपलब्ध है। 

About the Author

Sonam Agarwal

LLB | Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर research-based articles लिखती हैं। अब तक वे 500 से अधिक लेख लिख चुकी हैं।

सनातन धर्म और भगवद्गीता से संबंधित लेखों में उनका विशेष ध्यान मूल ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर जानकारी को सरल और सामान्य पाठकों के लिए समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने पर रहता है।

उनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को बिना अनावश्यक जटिलता के प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक उनके मूल विचारों को सही संदर्भ में समझ सकें।

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