Bhagavad Geeta Adhyay 7 (Gyan Vigyan Yoga) : श्रीमद्भगवद्गीता - सातवां अध्याय (ज्ञान-विज्ञान योग)

भगवद्गीता अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग – 30 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ

Bhagavad Gita Chapter 7 | Gita Adhyay 7 | Gyan Vigyan Yog| 30 Shlok in Sanskrit and Hindi Meaning

Bhagavad Gita Chapter 7 | Gita Adhyay 7 | Gyan Vigyan Yog| 30 Shlok in Sanskrit and Hindi Meaning

भगवद्गीता का सातवां अध्याय “ज्ञान-विज्ञान योग” कहलाता है। इस अध्याय में कुल 30 श्लोक हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वरूप, अपनी प्रकृति, माया, भक्ति, भक्तों के प्रकार और परम सत्य को जानने के विषय में बताते हैं।

भगवद्गीता के छठे अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने योगियों में उस भक्त को श्रेष्ठ बताया है जो श्रद्धा और प्रेम के साथ अपना मन भगवान में लगाकर उनका भजन करता है। इसके बाद सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि उन्हें किस प्रकार जाना जा सकता है और उनकी प्रकृति, माया, भक्ति तथा परम स्वरूप को समझने का मार्ग क्या है।

इसी कारण इस अध्याय का नाम ज्ञान-विज्ञान योग है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वरूप, प्रकृति, माया, भक्तों के प्रकार और परम सत्य के ज्ञान के बारे में बताते हैं। इसी कारण यह अध्याय केवल “ज्ञान” की बात नहीं करता, बल्कि ज्ञान के साथ उस सत्य के वास्तविक अनुभव यानी विज्ञान की ओर भी संकेत करता है।

छठे अध्‍याय के अंतिम श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि,  "अंतरात्‍मा को मुझमें लगाकर जो श्रद्धा और प्रेम के साथ मुझे भजता है, वह सब प्रकार के योगियों में उत्तम योगी है." परंतु भगवान् के स्‍वरूप, गुण और प्रभाव को मनुष्‍य जब तक नहीं जान पाता, तब तक उसके द्वारा अंतरात्‍मा से निरंतर भजन होना बहुत कठिन है; साथ ही भजन का प्रकार जानना भी आवश्‍यक है। इसलिये अब भगवान् अपने गुण, प्रभाव के सहित समग्र स्‍वरूप का तथा अनेक प्रकारों से युक्‍त भक्तियों का वर्णन करने के लिये सातवें अध्‍याय का आरम्‍भ करते हैं और सबसे पहले दो श्लोकों में अर्जुन को उसे सावधानी के साथ सुनने के लिये प्रेरणा देकर ज्ञान-विज्ञान के कहने की प्रतिज्ञा करते हैं।

भगवद्गीता अध्याय 7 (Bhagavad Geeta Adhyay 7) में क्या बताया गया है?

श्रीमद्भगवद्गीता के सातवां अध्याय के ज्ञान-विज्ञान योग में मुख्य रूप से इन विषयों की चर्चा की गई है:

  • ज्ञान और विज्ञान — भगवान को पूर्ण रूप से जानने की बात
  • प्रकृति — अपरा और परा प्रकृति का वर्णन
  • जगत का आधार — भगवान को सम्पूर्ण जगत का मूल कारण बताया गया है
  • भगवान का स्वरूप — भगवान को जगत का मूल कारण बताया गया है
  • भगवान की व्यापकता — जल के रस, सूर्य-चंद्रमा के प्रकाश आदि में भगवान की उपस्थिति का वर्णन
  • तीन गुण — सत्त्व, रज और तम से उत्पन्न भावों की चर्चा
  • माया — त्रिगुणमयी माया को समझाया गया है
  • चार प्रकार के भक्त — आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी
  • भक्ति — भगवान की शरण और अनन्य भक्ति
  • अन्य देवताओं की उपासना — श्रद्धा और उसके फल का वर्णन
  • परम सत्य— भगवान के अविनाशी और व्यापक स्वरूप का वर्णन

भगवद्गीता - सप्तम अध्याय संस्कृत श्लोक (Bhagwat Gita Adhyay 7 Sanskrit Shlok)

श्रीभगवानुवाच

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। 
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१॥ 

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। 
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२॥

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥३॥ 

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। 
अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४॥

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌। 
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌॥५॥ 

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। 
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६॥

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। 
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७॥ 

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। 
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८॥

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। 
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९॥ 

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्‌। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌॥१०॥

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌। 
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११॥ 

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये। 
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२॥

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्‌। 
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्‌॥१३॥ 

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। 
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४॥

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५॥ 

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। 
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६॥

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। 
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७॥ 

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌। 
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्‌॥१८॥

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। 
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९॥ 

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। 
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२०॥

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। 
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌॥२१॥ 

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। 
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌॥२२॥

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌। 
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३॥
 
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। 
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्‌॥२४॥

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। 
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्‌॥२५॥ 

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। 
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६॥

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। 
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७॥ 

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्‌। 
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८॥

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। 
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌॥२९॥ 

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। 
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३०॥

भगवद्गीता अध्याय 7 — ज्ञान-विज्ञान योग हिंदी अर्थ / Bhagwat Geeta Adhyay 7 in Hindi

भगवान श्रीकृष्ण बोले- 
हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगे हुए तुम जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्य आदि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानोगे, उसको सुनो।

(श्रीकृष्ण कहते हैं— हे पार्थ! अपना मन मुझमें लगाकर और मेरा आश्रय लेकर योग का अभ्यास करते हुए तुम मुझे पूर्ण रूप से और बिना किसी संदेह के किस प्रकार जान सकते हो, यह सुनो)।॥1॥ 

मैं तुम्हें ज्ञान के साथ उस ज्ञान के वास्तविक अनुभव का भी पूर्ण वर्णन करूँगा। इसे जान लेने के बाद इस विषय में जानने के लिए और कुछ शेष नहीं रहेगा। किसी बात को केवल सुन लेना और उसे वास्तव में समझ लेना, दोनों अलग बातें हैं॥2॥

हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है। (गहरी समझ और आत्मिक उन्नति लगातार प्रयास और गंभीर साधना से आती है।)॥3॥
 
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार- इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है (गीता के तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने जिस अव्यक्त मूल प्रकृति के तेईस कार्य बतलाये हैं, उसी को यहाँ आठ भेदों में विभक्त बतलाया है). 

ये आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात मेरी जड़ प्रकृति है और इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जानो॥4-5॥ 

(गीता मनुष्य और संसार को केवल भौतिक वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि शरीर, मन और चेतना के व्यापक संदर्भ में देखने की दृष्टि देती है, साथ ही प्रकृति और जीव के बीच अंतर समझने की ओर ध्यान दिलाती है।)
 
अर्जुन! तुम ऐसा समझो कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात्‌ सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ॥6॥ 

(सृष्टि को समझने के लिए उसके मूल और आधार पर विचार करना आवश्यक है।)

हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है. यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के समान मुझमें गुँथा हुआ है॥7॥ 

(गीता संसार की विविधता के पीछे एक व्यापक आधार को देखने की दृष्टि देती है।)

अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ॥8॥ 

(ईश्वर को केवल किसी एक स्थान तक सीमित न मानकर जीवन और प्रकृति में उनकी उपस्थिति को देखने की दृष्टि यहाँ मिलती है।)
 
मैं पृथ्वी में पवित्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध से इस प्रसंग में इनके कारण रूप तन्मात्राओं का ग्रहण है, इस बात को स्पष्ट करने के लिए उनके साथ 'पवित्र' शब्द जोड़ा गया है) गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ॥9॥ 

(जीवन में मौजूद प्राकृतिक शक्तियों और सकारात्मक गुणों के प्रति सम्मान रखना चाहिए।)

अर्जुन! तुम सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जानो. मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ॥10॥ 

(बुद्धि, प्रतिभा और क्षमता को अहंकार का कारण बनाने के बजाय ईश्वर की देन मानकर उनका सदुपयोग करना चाहिए।)
 
भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूँ॥11॥ 

(हर इच्छा गलत नहीं होती। महत्वपूर्ण यह है कि हमारी इच्छाएँ उचित और धर्मसम्मत हों।)

और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तुम 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जानो, परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं (गीता के अध्याय 9 श्लोक 4-5 में देखना चाहिए)॥12॥ 

(प्रकृति के गुण हमारे व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन मनुष्य को उनसे ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिए।)

भगवान् समस्त त्रिगुणमय भावों के कारण और आधार हैं, तथापि वास्तव में वे गुण भगवान् में नहीं हैं और भगवान् उनमें नहीं हैं. भगवान् तो सर्वथा और सर्वदा गुणातीत हैं तथा नित्य अपने-आप में ही स्थित हैं। गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणी समुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता (वे विषयों के संग्रह करने और भोगने के सिवाय जीवन का अन्य कोई कर्तव्य या लक्ष्य ही नहीं समझते, इसलिए वे भगवान् को भी नहीं जान पाते)॥13॥ 

(हमारी इच्छाएँ, पसंद और प्रतिक्रियाएँ कई बार हमारे स्वभाव और मानसिक गुणों से प्रभावित होती हैं। इन्हें पहचानना आत्मचिंतन की शुरुआत हो सकती है।)

क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परंतु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात्‌ संसार से तर जाते हैं (वे शरणागत भक्त माया से तर जाते हैं)॥14॥ 

(मनुष्य के लिए अपनी कमजोरियों, इच्छाओं और मोह से बाहर निकलना हमेशा आसान नहीं होता। गीता इसके लिए आत्मचिंतन, भक्ति और ईश्वर की शरण का मार्ग बताती है।)
 
माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते॥15॥ 

(गलत विचार और गलत कर्म धीरे-धीरे हमारी समझ और विवेक को कमजोर कर सकते हैं।)

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकट को टालने के लिए भजने वाला) जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी- ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं॥16॥ 

(लोग अलग-अलग परिस्थितियों में ईश्वर की ओर मुड़ते हैं। किसी की भक्ति संकट से शुरू होती है, किसी की जिज्ञासा से और किसी की ज्ञान की खोज से।)
 
उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यंत प्रिय है (ज्ञानी भक्त में और मुझमें कुछ भी अंतर नहीं है. भक्त है सो मैं हू और मैं हू सो भक्त है)॥17॥ 

(ज्ञान और भक्ति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को गहरा करने वाला माना जा सकता है।)

ये सभी उदार हैं, किन्तु ज्ञानी तो साक्षात्‌ मेरा स्वरूप ही है- ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है॥18॥ 

(भक्ति में केवल अपनी इच्छा पूरी कराने के बजाय परम सत्य को जानने और उससे जुड़ने की भावना अधिक गहरी अवस्था मानी गई है।)

बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है॥19॥ 

(सच्चा ज्ञान व्यक्ति की दृष्टि को व्यापक बनाता है और उसमें अहंकार के बजाय एकत्व और समर्पण की भावना विकसित कर सकता है।)

उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं॥20॥ 

(हमारी इच्छाएँ कई बार हमारी आध्यात्मिक दृष्टि और निर्णयों को प्रभावित करती हैं। इसलिए अपनी इच्छाओं को समझना महत्वपूर्ण है।)

जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ॥21॥ 

(मनुष्य की श्रद्धा उसके जीवन में बहुत प्रभाव डालती है। इसलिए श्रद्धा के साथ विवेक भी आवश्यक है।)

वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है॥22॥ 

(गीता इच्छाओं और उनसे मिलने वाले परिणामों को व्यापक दैवी व्यवस्था के संदर्भ में देखने की बात करती है।)

जन्म-जन्मान्तर में किये हुए कर्मों से संस्कारों का संचय होता है और उस संस्कार समूह से जो प्रकृति बनती है, उसे स्वभाव कहा जाता है. प्रत्येक जीव का स्वभाव अलग-अलग होता है. उस स्वभाव के अनुसार जो अन्तःकरण में भिन्न-भिन्न देवताओं का पूजन करने की भिन्न-भिन्न इच्छा उत्पन्न होती है, उसी को उससे प्रेरित होना कहते हैं. परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अंत में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥23॥ 

(हम जिस लक्ष्य को चुनते हैं, हमारी साधना और प्रयास भी उसी दिशा में जाते हैं। इसलिए जीवन के अंतिम लक्ष्य पर विचार करना जरूरी है।)

बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं॥24॥ 

(किसी व्यक्ति या सत्य को केवल उसके बाहरी रूप से देखकर उसका पूरा मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।)

अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है॥25॥ 

(सत्य को समझने के लिए केवल बाहरी अनुभव नहीं, बल्कि गहरी दृष्टि और विवेक भी आवश्यक है।)

अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु कोई भी श्रद्धारहित या भक्तिरहित पुरुष मुझे नहीं जान सकता॥26॥ 

(मनुष्य का ज्ञान सीमित है। यह समझ विनम्रता और सीखने की भावना पैदा कर सकती है।)

अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःख आदि द्वंद्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यंत अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं॥27॥ 

(पसंद और नापसंद के बीच लगातार उलझे रहने से मन की शांति प्रभावित हो सकती है।)
 
परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्व रूप मोह से मुक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं॥28॥ 

(सत्कर्म, संयम और दृढ़ता मन को अधिक स्थिर बनाने में सहायक हो सकते हैं।)

जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं (जो संसार के सब विषयों के आश्रय को छोड़कर दृढ़ विश्‍वास के साथ एकमात्र मेरा ही आश्रय लेकर निरंतर मुझमें ही मन-बुद्धि को लगाये रखते हैं, वे मेरी शरण होकर यत्न करने वाले हैं)॥29॥ 

(गीता मनुष्य को केवल रोजमर्रा की समस्याओं तक सीमित न रहकर जीवन, आत्मा और अस्तित्व के गहरे प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।)

जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव सहित तथा अधियज्ञ सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अंतकाल में भी जानते हैं, वे युक्तचित्त वाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात प्राप्त हो जाते हैं॥30॥

(जिस विषय का हम नियमित रूप से चिंतन और अभ्यास करते हैं, वही हमारे जीवन की गहरी दिशा बन सकता है।)

ज्ञान-विज्ञान योग की 5 मुख्य शिक्षाएँ

1. केवल जानकारी पर्याप्त नहीं है

गीता ज्ञान के साथ विज्ञान, यानी उस सत्य की वास्तविक समझ और अनुभूति की ओर भी संकेत करती है।

2. प्रकृति के पीछे एक व्यापक आधार है

अध्याय 7 में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार को भगवान की अपरा प्रकृति बताया गया है और जीवस्वरूप परा प्रकृति का भी वर्णन किया गया है।

3. माया और तीन गुण मनुष्य को प्रभावित करते हैं

सत्त्व, रज और तम से उत्पन्न भावों के कारण मनुष्य का व्यवहार और दृष्टिकोण प्रभावित होता है। गीता इनसे ऊपर उठने की बात करती है।

4. भक्ति के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं

भगवान चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख करते हैं, आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी।

5. जीवन का लक्ष्य केवल भौतिक उपलब्धियाँ नहीं हैं

अध्याय 7 मनुष्य को अपने अस्तित्व, परम सत्य और जीवन के अंतिम लक्ष्य पर विचार करने की दिशा देता है।

आज के जीवन में अध्याय 7 की उपयोगिता

ज्ञान-विज्ञान योग केवल धार्मिक अध्ययन का विषय नहीं है। इसके कई विचार रोजमर्रा के जीवन में आत्मचिंतन के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

जब मन किसी इच्छा में बहुत अधिक उलझ जाए, तो व्यक्ति स्वयं से पूछ सकता है कि क्या मैं अपनी इच्छा को नियंत्रित कर रहा हूँ या इच्छा मुझे नियंत्रित कर रही है?

जब सुख-दुःख में मन बहुत अधिक बदलने लगे, तो गीता का द्वंद्व और मोह संबंधी विचार आत्मचिंतन का आधार बन सकता है।

जब अपनी प्रतिभा या सफलता पर अहंकार आने लगे, तो अध्याय 7 में बुद्धि, तेज और बल के संबंध में कही गई बात हमें अपनी क्षमताओं के प्रति विनम्र दृष्टिकोण रखने की याद दिला सकती है।

जब जीवन के उद्देश्य को लेकर प्रश्न उठें, तो यह अध्याय केवल बाहरी सफलता से आगे बढ़कर आत्मा, परम सत्य और जीवन के अंतिम लक्ष्य पर विचार करने की प्रेरणा देता है।

अध्याय 7 का सबसे प्रसिद्ध और जीवन-उपयोगी श्लोक

भगवद्गीता 7.14:

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता के अध्याय 7 का नाम क्या है?

भगवद्गीता के सातवें अध्याय का नाम ज्ञान-विज्ञान योग है।

भगवद्गीता के अध्याय 7 में कितने श्लोक हैं?

अध्याय 7 में 30 श्लोक हैं।

अध्याय 7 में मुख्य रूप से क्या बताया गया है?

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वरूप, प्रकृति, परा और अपरा प्रकृति, माया, तीन गुणों, चार प्रकार के भक्तों और परम सत्य को जानने के विषय में बताते हैं।

अध्याय 7 का प्रमुख श्लोक कौन-सा है?

अध्याय 7 के प्रमुख और प्रसिद्ध श्लोकों में 7.14 — “दैवी ह्येषा गुणमयी...” विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

ज्ञान-विज्ञान योग का अर्थ क्या है?

सरल रूप में, ज्ञान का अर्थ किसी सत्य को जानना और विज्ञान का अर्थ उस सत्य को वास्तविक रूप से समझना या अनुभव करना माना जा सकता है। अध्याय में भगवान के स्वरूप और उनकी प्रकृति को जानने की बात प्रमुख है।

अध्याय 7 में कितने प्रकार के भक्त बताए गए हैं?

भगवान श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के भक्त बताए हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी।

भगवद्गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ें

अगर आप पूरी भगवद्गीता को अध्याय-दर-अध्याय सरल हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे भगवद्गीता के 18 अध्यायों के संपूर्ण परिचय से शुरुआत कर सकते हैं।

एक जगह से सभी अध्याय पढ़ने के लिए:

  1. अध्याय 1 — अर्जुनविषाद योग
  2. अध्याय 2 — सांख्य योग
  3. अध्याय 3 — कर्म योग
  4. अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यास योग
  5. अध्याय 5 — सांख्य योग और कर्म योग
  6. अध्याय 6 — आत्मसंयम योग
  7. अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञान योग
  8. अध्याय 8 — अक्षरब्रह्म योग
  9. अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
  10. अध्याय 10 — विभूति योग
  11. अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शन योग
  12. अध्याय 12 — भक्तियोग
  13. अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग
  14. अध्याय 14 — गुणत्रयविभाग योग
  15. अध्याय 15 — पुरुषोत्तम योग
  16. अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभाग योग
  17. अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभाग योग
  18. अध्याय 18 — मोक्षसंन्यास योग

संदर्भ और स्रोत

इस लेख में भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोक, उनकी हिंदी व्याख्या और गीता-अध्ययन के संदर्भ में गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित स्वामी रामसुखदास जी की श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। 

गीता प्रेस के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अर्थ और विस्तृत टीका दी गई है। 
इसके अलावा गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित गीता तत्त्वविवेचनी में भी मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी व्याख्या उपलब्ध है। 

निष्कर्ष

भगवद्गीता का सातवाँ अध्याय—ज्ञान-विज्ञान योग—भगवान के स्वरूप, प्रकृति, माया और भक्ति को समझने का महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार की प्रकृति को समझने के साथ-साथ उसके मूल आधार को जानना भी आवश्यक है।
अध्याय 7 यह भी बताता है कि मनुष्य अलग-अलग कारणों से भगवान की ओर बढ़ सकता है, संकट, जिज्ञासा, इच्छा या ज्ञान की खोज के कारण। अंततः गीता व्यक्ति को गहरे ज्ञान, भक्ति और परम सत्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

About the Author

Sonam Agarwal

LLB with Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर research-based articles लिखती हैं। अब तक वे 500 से अधिक लेख लिख चुकी हैं।

सनातन धर्म और भगवद्गीता से संबंधित लेखों में उनका विशेष ध्यान मूल ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर जानकारी को सरल और सामान्य पाठकों के लिए समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने पर रहता है।

उनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को बिना अनावश्यक जटिलता के प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक उनके मूल विचारों को सही संदर्भ में समझ सकें।

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