Bhagavad Geeta Adhyay 14 (Gunatraya Vibhaga Yoga) : श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग)

भगवद्गीता अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग – 27 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ

Bhagavad Gita Chapter 14 | Gita Adhyay 14 | Gunatraya Vibhaga Yoga | 27 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

Bhagavad Gita Chapter 14 | Gita Adhyay 14 | Gunatraya Vibhaga Yoga | 27 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

भगवद्गीता अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग का परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता का चौदहवाँ अध्याय “गुणत्रय विभाग योग” (Gunatraya Vibhaga Yoga) कहलाता है। इसमें कुल 27 श्लोक हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीन गुणों, उनके स्वभाव, मनुष्य के जीवन पर उनके प्रभाव और उनसे ऊपर उठने के मार्ग को समझाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि ये तीन गुण जीव को किस प्रकार शरीर और संसार के बंधनों से जोड़ते हैं।

इस अध्याय के चार core concepts हैं:

सत्त्व → रज → तम → गुणातीत अवस्था

गीता अध्याय 14 में भगवान बताते हैं कि ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होकर देहधारी जीव को शरीर और संसार के अनुभवों से बाँधते हैं। सत्त्व ज्ञान और सुख से, रजस् कर्म और आसक्ति से तथा तमस् अज्ञान, प्रमाद और आलस्य से संबंधित है। इस अध्याय में तीनों गुणों के लक्षण, उनके बढ़ने पर होने वाले प्रभाव, मृत्यु के बाद उनसे संबंधित गति, कर्म और ज्ञान पर उनके प्रभाव तथा गुणों से परे जाने वाले गुणातीत पुरुष के लक्षण बताए गए हैं। 

अध्याय के अंत में अर्जुन पूछते हैं कि गुणों से अतीत व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं और वह तीनों गुणों से कैसे ऊपर उठ सकता है? भगवान श्रीकृष्ण इसके उत्तर में गुणातीत व्यक्ति के लक्षण बताते हैं और अनन्य भक्ति को गुणों से ऊपर उठने का महत्वपूर्ण मार्ग बताते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि अनन्य भक्तियोग के द्वारा मनुष्य तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त करने योग्य बनता है।

भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय में ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के लक्षणों का निर्देश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इन दोनों के ज्ञान को ही ज्ञान बतलाया और इसके अनुसार क्षेत्र के स्वरूप, स्वभाव, विकार और इसके तत्त्वों की उत्पत्ति के क्रम आदि तथा क्षेत्रज्ञ के स्वरूप और उसके प्रभाव का वर्णन किया।

पूर्व के श्लोक १९वें में भगवान ने प्रकृति-पुरुष के नाम से प्रकरण आरम्भ करके गुणों को प्रकृतिजन्य बताया और २१वें श्लोक में यह बात भी कही कि मनुष्य के बार-बार अच्छी-बुरी योनियों में जन्म होने में गुणों का संग ही हेतु है। अब इससे गुणों के भिन्न-भिन्न स्वरूप क्या हैं, ये जीवात्मा को कैसे शरीर में बांधते हैं, किस गुण के संग से किस योनि में जन्म होता है, गुणों से छूटने के उपाय क्या हैं, गुणों से छूटे हुए मनुष्य के लक्षण तथा आचरण कैसे होते हैं, ये सब बातें बताने के लिये इस चौदहवें अध्याय को प्रारम्भ किया गया है. 

श्रीकृष्ण तेरहवें अध्याय में वर्णित ज्ञान को ही स्पष्ट करके चौदहवें अध्याय में विस्तारपूर्वक अर्जुन को समझाते हैं।


भगवद्गीता अध्याय 14: मुख्य तथ्य

तथ्यजानकारी
अध्याय14वाँ अध्याय
संस्कृत नामगुणत्रय विभाग योग
English NameGunatraya Vibhaga Yoga
कुल श्लोक27
मुख्य विषयसत्त्व, रजस् और तमस्
तीन गुणों का स्रोतप्रकृति
सत्त्व का प्रमुख संबंधज्ञान और सुख
रजस् का प्रमुख संबंधकर्म, इच्छा और आसक्ति
तमस् का प्रमुख संबंधअज्ञान, मोह, प्रमाद और आलस्य
अंतिम विषयगुणातीत व्यक्ति के लक्षण
प्रमुख साधनअनन्य भक्ति

भगवद्गीता - चतुर्दश अध्याय के 27 संस्कृत श्लोक (Gita 14 Gunatray Vibhaga Yoga) | Bhagwat Geeta Adhyay 14, Shlok in Sanskrit

श्रीभगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। 
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१॥ 

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। 
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२॥

मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। 
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३॥ 

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। 
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४॥

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। 
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५॥ 

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्। 
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६॥

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। 
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७॥ 

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८॥

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। 
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९॥ 

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। 
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१०॥

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। 
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११॥ 

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। 
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२॥

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। 
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३॥ 

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। 
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥१४॥

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। 
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५॥ 

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। 
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥१६॥

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। 
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७॥ 

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८॥

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। 
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९॥ 

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। 
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२०॥

अर्जुन उवाच

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। 
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥२१॥

श्रीभगवानुवाच

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। 
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२॥ 

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। 
गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३॥

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। 
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४॥ 

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। 
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५॥

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। 
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६॥ 

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। 
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७॥

गीता के चौदहवाँ अध्याय का हिंदी अर्थ और भावार्थ | Gita 14 Gunatray Vibhaga Yoga | Bhagwat Geeta Adhyay 14 in Hindi Meaning

श्लोक 1

भगवान श्रीकृष्ण बोले- 
अर्जुन! ज्ञानों में भी अति उत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन (ज्ञानयोग के साधन द्वारा परम गति को प्राप्त ज्ञानीजन) इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि (परब्रह्म की प्राप्ति, आत्यन्तिक सुख) को प्राप्त हो गए हैं॥1॥ 

श्लोक 2

इस ज्ञान का आश्रय पाकर अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए मनुष्य सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते (जन्म-मृत्यु के बंधन से छूट जाते हैं)और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते॥2॥ 

अर्थात्, इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो लोग मेरे स्वरूप के समान परम अवस्था को प्राप्त होते हैं, वे सृष्टि के आरंभ में पुनः जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय भी विचलित नहीं होते।

श्लोक 3

हे अर्जुन! मेरी महत्‌-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों (समस्त प्राणियों) की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ की स्थापना करता हूँ. उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है॥3॥ 

अर्थात्, हे भारत! मेरी महत् प्रकृति समस्त प्राणियों की मूल योनि है। मैं उसमें चेतनता का बीज स्थापित करता हूँ और उसी से सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

श्लोक 4

अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी (देव, मनुष्य, राक्षस, पशु, और पक्षी आदि नाना प्रकार के भिन्न-भिन्न वर्ण और आकृति वाले शरीरों से युक्त समस्त प्राणी) उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज का स्थापन करने वाला पिता हूँ॥4॥
अर्थात्, हे कुन्तीपुत्र! संसार की सभी योनियों में जितने भी शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, उनकी मूल प्रकृति माता के समान है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।
मूल प्रकृति, जिसे समस्त जगत का कारणरूप भी कहा जाता है, जिसे 'अव्यक्त' और 'प्रधान' भी कहते हैं; उस प्रकृति का वाचक 'महत' विशेषण सहित ‘ब्रह्मा’ शब्द है. यहाँ उसे 'योनि' नाम देकर भगवान ने यह भाव दिखलाया है कि समस्त प्राणियों के विभिन्न शरीरों का यही उपादान-कारण है. 

सत्त्व, रजस् और तमस् क्या हैं?

श्लोक 5

हे महाबाहु अर्जुन! सत्त्व, रजस् और तमस्, ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और अविनाशी जीवात्मा को शरीर के साथ बाँधते हैं॥5॥

महाप्रलय के समय अपने अपने संस्कारों के सहित परमेश्वर में स्थित जीवसमुदाय का जो महासर्ग के आदि में प्रकृति के साथ विशेष संबंध कर देना है, वही उस चेतनसमुदायरूप गर्भ को प्रकृति रूप योनि में स्थापना करता है। उपयुक्त जड़-चेतन के संयोग से जो भिन्न-भिन्न आकृतियों में सब प्राणियों का सूक्ष्मरूप से प्रकट होना है, वही उनकी उत्पत्ति है।
भगवान यह बताना चाहते हैं कि उन सब मूर्तियों के जो सूक्ष्म-स्थूल शरीर हैं, वे सब प्रकृति के अंश से बने हुए हैं और उन सबमें जो चेतन आत्मा है, वह मेरा अंश है। उन दोनों के संबंध में समस्त मूर्तियां अर्थात शरीरधारी प्राणी प्रकट होते हैं, अतः प्रकृति उनकी माता है और मैं पिता हूँ।

श्लोक 6

हे निष्पाप अर्जुन! सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश और ज्ञान प्रदान करता है, लेकिन सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति के माध्यम से भी जीव को बाँध सकता है।

अर्थात्, हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥ उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के संबंध से और ज्ञान के संबंध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है॥6॥ 

श्लोक 7

अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जानो. वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के संबंध में बाँधता है॥7॥ 
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को इच्छाओं और आसक्ति से उत्पन्न जानो। यह जीव को कर्मों और उनके प्रति आसक्ति से बाँधता है।

श्लोक 8

हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जानो. वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टायें), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता) और निद्रा द्वारा बाँधता है॥8॥
हे भारत! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सभी देहधारियों को मोहित करने वाला जानो। यह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के माध्यम से जीव को बाँधता है।

▪️सत्त्व, रजस् और तमस् में अंतर

गुणमुख्य विशेषताव्यक्ति पर प्रभावकिससे बाँधता है?
सत्त्वनिर्मलता, प्रकाशज्ञान और सुख की ओरसुख और ज्ञान की आसक्ति
रजस्इच्छा, सक्रियताकर्म और उपलब्धियों की ओरकर्म और आसक्ति
तमस्अज्ञान, मोहप्रमाद, आलस्य और निष्क्रियताअज्ञान, प्रमाद और निद्रा

महत्वपूर्ण बात: गीता इन तीनों गुणों को केवल “अच्छा, बुरा और बहुत बुरा” कहकर नहीं समझाती। सत्त्व अपेक्षाकृत प्रकाश और ज्ञान से जुड़ा है, लेकिन सत्त्व भी बंधन का कारण बन सकता है, क्योंकि उसमें सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति हो सकती है।

श्लोक 9

अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में लगाता है॥9॥ 
हे भारत! सत्त्वगुण मनुष्य को सुख से जोड़ता है, रजोगुण उसे कर्मों में लगाता है और तमोगुण ज्ञान को ढककर उसे प्रमाद की ओर ले जाता है।

श्लोक 10

हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, और सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है (अर्थात बढ़ता है)॥10॥ 
हे भारत! कभी सत्त्वगुण रजस् और तमस् को दबाकर प्रभावी होता है, कभी रजस् सत्त्व और तमस् को दबाता है और कभी तमस् सत्त्व और रजस् को दबाकर प्रभावी हो जाता है।

तीनों गुणों की पहचान कैसे करें?

श्लोक 11

जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है॥11॥ 
सत्त्वगुण बढ़ने की पहचान — जब शरीर और इंद्रियों में स्पष्टता, प्रकाश और ज्ञान की स्थिति दिखाई देने लगे, तब समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ रहा है।

श्लोक 12

अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशांति और विषय भोगों की लालसा- ये सब उत्पन्न होते हैं॥12॥ 
रजोगुण बढ़ने की पहचान — हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण बढ़ने पर लोभ, अत्यधिक सक्रियता, कर्मों को आरंभ करने की प्रवृत्ति, अशांति और इच्छाओं की वृद्धि होने लगती है।

श्लोक 13

वहीं, तमोगुण के बढ़ने पर अंतःकरण और इंन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेष्टा और निद्रा आदि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ- ये सब ही उत्पन्न होते हैं॥13॥ 
तमोगुण बढ़ने की पहचान — हे कुरुनन्दन! तमोगुण बढ़ने पर अज्ञान, निष्क्रियता, प्रमाद और मोह जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

मृत्यु के बाद तीन गुणों का प्रभाव

श्लोक 14

जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्ग आदि लोकों को प्राप्त होता है॥14॥
जब सत्त्वगुण के बढ़े हुए प्रभाव में देहधारी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह निर्मल और श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक 15

रजोगुण के बढ़ने पर मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होने के बाद कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है, तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है॥15॥ 
रजोगुण की प्रधानता में मृत्यु होने पर व्यक्ति कर्मों में आसक्त लोगों के बीच जन्म लेता है। 
तमोगुण की प्रधानता में मृत्यु होने पर वह कीट, पशु आदि मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

श्लोक 16

सात्त्विक कर्म का फल निर्मल होता है, राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान बताया गया है।

श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है॥16॥ 

श्लोक 17

सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है॥17॥ 
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 18

सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य स्वर्ग आदि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस मनुष्य मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्य आदि में स्थित तामस मनुष्य अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं॥18॥ 
  • सत्त्वगुण में स्थित लोग उच्चतर अवस्थाओं या स्वर्ग आदि उच्च लोकों की ओर जाते हैं।
  • राजस लोग मध्य स्थिति में रहते हैं अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं।
  • तमोगुण की प्रधानता वाले लोग अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं।

गुणों से ऊपर कैसे उठें?

श्लोक 19

जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यंत परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है॥19॥ 
जब मनुष्य यह देखता है कि प्रकृति के गुण ही विभिन्न कर्मों और अनुभवों में कार्य कर रहे हैं तथा वह गुणों से परे परम तत्व को जान लेता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

श्लोक 20

यह मनुष्य शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों का उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है॥20॥ 

बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पञ्चभूत, पाँच इन्द्रियों के विषय, इस प्रकार इन २३ तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा गया है।
जब देहधारी व्यक्ति शरीर से जुड़े इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, तब वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और उनसे जुड़े दुःखों से मुक्त होकर अमृतस्वरूप अवस्था को प्राप्त करता है।

अर्जुन ने पूछा: गुणातीत व्यक्ति कैसा होता है?

श्लोक 21

अर्जुन बोले- 
हे केशव! इन तीनों गुणों से अतीत मनुष्य किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है?॥21॥ 

अर्थात्, हे केशव! जो व्यक्ति इन तीनों गुणों से ऊपर उठ गया है, उसके क्या लक्षण होते हैं? उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनों गुणों से किस प्रकार ऊपर उठता है?

श्लोक 22

भगवान श्रीकृष्ण बोले, 
अर्जुन! जो मनुष्य सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश (अंतःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता होती है, उसका नाम 'प्रकाश' है) को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है॥22॥
जो मनुष्य परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अंतःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह आदि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं, यही उसके गुणों से अतीत होने के प्रधान लक्षण हैं। 
अर्थात् , श्री भगवान बोले कि हे अर्जुन! जो व्यक्ति सत्त्व का प्रकाश, रजस् की प्रवृत्ति और तमस् के मोह के प्रकट होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके हट जाने पर उनकी इच्छा भी नहीं करता, वह गुणों से ऊपर उठने की अवस्था में है।

श्लोक 23

जो साक्षी के समान स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते हैं- ऐसा समझता हुआ जो परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता॥23॥ 

गुणों का गुणों में बरतना — त्रिगुणमयी माया से उत्पन्न हुए अंतःकरण सहित इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों में विचरना ही 'गुणों का गुणों में बरतना' है।
जो व्यक्ति साक्षी की तरह स्थित रहता है, गुणों के प्रभाव से विचलित नहीं होता और यह समझता है कि प्रकृति के गुण ही अपने-अपने क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, वह अपनी स्थिति से नहीं डगमगाता।

श्लोक 24

जो निरंतर आत्मभाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निंदा-स्तुति में भी समान भाव वाला है॥24॥ 
जो सुख और दुःख में समान रहता है, अपने भीतर स्थिर रहता है, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान दृष्टि से देखता है, प्रिय और अप्रिय में समान रहता है तथा निंदा और प्रशंसा को समान समझता है, वह गुणातीत कहलाता है।

श्लोक 25

जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है तथा सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है॥25॥ 
जो मान और अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु के प्रति समभाव रखता है तथा कर्मों के पीछे कर्तापन के अहंकार और आसक्ति का त्याग करता है, उसे गुणातीत कहा जाता है।

गुणों से ऊपर उठने का मार्ग

श्लोक 26

और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्ति योग द्वारा मुझको निरंतर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य बन जाता है॥26॥ 

अव्यभिचारी भक्तियोग — स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरंतर चिंतन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं।
जो व्यक्ति अविचल और अनन्य भक्तियोग के द्वारा मेरी उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्मस्वरूप अवस्था को प्राप्त होने योग्य बन जाता है।

श्लोक 27

क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनंद का आश्रय मैं हूँ (नित्य परमानंद मेरा ही स्वरूप है, मुझसे भिन्न कोई अन्य वस्तु नहीं है अतः उसकी प्राप्ति मेरी ही प्राप्ति है)॥27॥
क्योंकि मैं अविनाशी ब्रह्म, अमृतस्वरूप अवस्था, शाश्वत धर्म और परम, अखंड सुख का आधार हूँ।
गुणातीत पुरुष के अंदर ज्ञान, शांति और आनंद नित्य रहते हैं; उनका कभी अभाव नहीं होता। गुणातीत पुरुषों को गुण विचलित नहीं कर सकते, इतनी ही बात नहीं है वह स्वयं भी अपनी स्थिति से कभी किसी भी काल में विचलित नहीं होता। 

आत्मा वास्तव में असंग है। गुणों के साथ, उसका कुछ भी संबंध नहीं है, तथापि जो अनादिसिद्ध अज्ञान से इनके साथ संबंध हुआ है, उस संबंध को ज्ञान के द्वारा तोड़ देना और अपने को सच्चिदानन्‍दन ब्रह्म से अभिन्न और गुणों से सर्वथा संबंधरहित समझ लेना अर्थात प्रत्यक्ष अनुभव कर लेना ही गुणों से अतीत हो जाना यानी तीनों गुणों का उल्लंघन करना है।

गुणातीत अवस्था क्या है 

भगवद्गीता के 14वें अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) का यह अंश अध्यात्म के सबसे ऊंचे शिखर—'गुणातीत अवस्था' (तीनों गुणों से परे होने की स्थिति) को बहुत ही सरल और व्यावहारिक तरीके से समझाता है। इस पूरे विचार को 3 मुख्य भागों में समझा जा सकता है:

1. गुणातीत पुरुष की स्थिति (ज्ञान, शांति और आनंद नित्य क्यों हैं?)

  • स्थायी आनंद: आम इंसान का सुख, दुख, ज्ञान या शांति बाहर की परिस्थितियों (सत्त्व, रज, तम गुणों) पर निर्भर करती है। जब अच्छे दिन आते हैं तो हम खुश होते हैं, बुरे दिन आते हैं तो दुखी।
  • विचलित न होना: गुणातीत (जो प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठ चुका है) पुरुष का आनंद बाहर की परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। वह अपनी आत्मा (सच्चिदानंद) में ही स्थिर रहता है। इसलिए बाहर चाहे कितना भी बड़ा तूफान आए, गुण उसके मन को जरा भी डिगा या विचलित नहीं कर सकते।

2. आत्मा का 'असंग' स्वभाव (वास्तविकता)

  • आत्मा असंग है: शास्त्रों का मूलभूत सिद्धांत है कि आपकी आत्मा का प्रकृति के गुणों (सत्त्व = ज्ञान/सुख का अभिमान, रज = कामना/भागदौड़, तम = आलस्य/अज्ञान) से कोई लेना-देना नहीं है।
  • अनादि अज्ञान का संबंध: जैसे शीशे पर धूल जम जाए, तो लगता है कि शीशा ही धुंधला है; वैसे ही अनादि काल के अज्ञान के कारण हमने खुद को मन, शरीर और गुणों के साथ जोड़ लिया है। हम सोचने लगते हैं कि "मैं दुखी हूँ", "मैं क्रोधी हूँ", या "मैं ज्ञानी हूँ"—जबकि यह सब गुणों का खेल है, आत्मा का नहीं।

3. 'गुणों से अतीत' होने की प्रक्रिया (अनुभव करना)

  • केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव: केवल किताबों में पढ़ लेना कि "मैं आत्मा हूँ"—यह गुणातीत होना नहीं है।
  • संबंध तोड़ना: ज्ञान (विवेक) की तलवार से इस झूठे तादात्म्य (अज्ञानजन्य संबंध) को काट देना और स्वयं को उस सच्चिदानंद (सत् + चित् + आनंद) ब्रह्म के साथ एक (अभिन्न) महसूस करना ही असली गुणातीत होना है।
सरल शब्दों में: जैसे आकाश में काले-सफेद बादल आते-जाते रहते हैं, लेकिन आकाश उन बादलों से अछूता (असंग) और स्थिर रहता है; ठीक उसी तरह गुणातीत पुरुष के जीवन में सुख-दुख, मान-अपमान और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती-जाती हैं, लेकिन वह जान लेता है कि वह बादल नहीं बल्कि अनंत आकाश (आत्मा) है।

इसी प्रत्यक्ष अनुभव को गीता में 'गुणातीत होना' कहा गया है।

भगवद्गीता अध्याय 14 का सार

भगवद्गीता का चौदहवाँ अध्याय हमें मनुष्य के व्यवहार और मानसिक अवस्थाओं को समझने के लिए सत्त्व, रजस् और तमस् की अवधारणा देता है।

सत्त्व प्रकाश, स्पष्टता और ज्ञान से जुड़ा है।
रजस् इच्छा, गतिविधि, कर्म और आसक्ति से जुड़ा है।
तमस् अज्ञान, मोह, प्रमाद और आलस्य से जुड़ा है।

लेकिन गीता का अंतिम संदेश केवल सत्त्वगुण को बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अध्याय 14 बताता है कि सत्त्व भी एक प्रकार का बंधन बन सकता है, इसलिए अंतिम लक्ष्य तीनों गुणों से ऊपर उठना है।

गुणातीत व्यक्ति परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित नहीं होता। वह सुख-दुःख, मान-अपमान, निंदा-स्तुति और प्रिय-अप्रिय में संतुलन बनाए रखता है। वह समझता है कि प्रकृति के गुण अपना कार्य कर रहे हैं और स्वयं को उनके साथ पूरी तरह अभिन्न नहीं मानता।

अध्याय के अंतिम श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अव्यभिचारी भक्तियोग को गुणों से ऊपर उठने का मार्ग बताते हैं।


Chapter 14: एक नजर में पूरा अध्याय

श्लोक मुख्य विषय
1–2 परम ज्ञान और उसकी महत्ता
3–4 प्रकृति और सृष्टि की उत्पत्ति
5 तीन गुणों का परिचय
6 सत्त्वगुण
7 रजोगुण
8 तमोगुण
9–10 तीनों गुणों की कार्यप्रणाली
11–13 गुणों की वृद्धि के लक्षण
14–15 मृत्यु के समय गुणों का प्रभाव
16–18 गुणों के फल और उनकी दिशाएँ
19–20 तीनों गुणों से ऊपर उठना
21 अर्जुन का प्रश्न
22–25 गुणातीत व्यक्ति के लक्षण
26 भक्तियोग द्वारा गुणातीत अवस्था
27 ब्रह्म और परम सुख का आधार

आज के जीवन में अध्याय 14 की सीख

गीता के तीन गुणों को आधुनिक जीवन में एक उपयोगी self-reflection framework की तरह भी समझा जा सकता है।

जब सत्त्व प्रमुख हो:

  • मन अपेक्षाकृत शांत और स्पष्ट रहता है।
  • सीखने और समझने की इच्छा बढ़ती है।
  • निर्णय अधिक संतुलित हो सकते हैं।
  • व्यक्ति अपने कार्यों के प्रभाव के बारे में सोचता है।

जब रजस् प्रमुख हो:

  • लगातार कुछ हासिल करने की बेचैनी हो सकती है।
  • तुलना और प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
  • काम करने की ऊर्जा अधिक होती है, लेकिन साथ में तनाव और आसक्ति भी हो सकती है।
  • परिणाम को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

जब तमस् प्रमुख हो:

  • काम टालने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
  • भ्रम और निर्णय लेने में कठिनाई हो सकती है।
  • आलस्य और अत्यधिक निष्क्रियता बढ़ सकती है।
  • व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से बचने लग सकता है।
Gunatraya Vibhaga Yoga → Three Gunas → Sattva Rajas Tamas → Gunatita → Bhakti Yoga

भगवद्गीता अध्याय 14 से प्रेरणा

“हमेशा परिस्थितियों को बदलना ही समाधान नहीं होता; कई बार अपने भीतर की प्रतिक्रिया को समझना अधिक महत्वपूर्ण होता है।”

सत्त्व हमें स्पष्टता की ओर ले जाता है, रजस् हमें लगातार कर्म और इच्छाओं में लगाए रखता है और तमस् हमें अज्ञान तथा निष्क्रियता की ओर खींच सकता है। गीता का संदेश इससे भी आगे जाता है,

इन तीनों गुणों के प्रभाव को पहचानो, उनके साक्षी बनो और अंततः उनसे ऊपर उठने का प्रयास करो।


FAQs: Bhagavad Gita Chapter 14

1. भगवद्गीता अध्याय 14 का नाम क्या है?

भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का नाम गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) है।

2. गीता अध्याय 14 में कितने श्लोक हैं?

अध्याय 14 में कुल 27 श्लोक हैं।

3. गीता अध्याय 14 में किन तीन गुणों का वर्णन है?

इस अध्याय में सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का वर्णन किया गया है।

4. सत्त्वगुण किससे संबंधित है?

सत्त्वगुण मुख्य रूप से प्रकाश, ज्ञान और सुख से संबंधित है। यह निर्मल और प्रकाशक है, फिर भी सुख और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।

सत्त्वगुण ज्ञान और सुख प्रदान करता है, लेकिन इनका अभिमान या आसक्ति जीव के लिए बंधन का कारण बन सकती है।

5. रजोगुण किससे संबंधित है? रजोगुण के बढ़ने पर व्यक्ति में कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

रजोगुण इच्छा, कर्म, सक्रियता और आसक्ति से संबंधित है। श्लोक 12 के अनुसार, रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, स्वार्थपूर्ण कर्मों का आरम्भ और लालसा उत्पन्न होती है।

6. तमोगुण किससे संबंधित है? तमोगुण का जीव पर क्या प्रभाव पड़ता है?

तमोगुण अज्ञान, मोह, प्रमाद, आलस्य और निद्रा से संबंधित है।

यह ज्ञान को ढँककर प्रमाद, आलस्य और निद्रा में लगाता है। श्लोक 8 और 9 स्पष्ट करते हैं कि तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और जीव को मोह तथा आलस्य में बाँधता है।

7. गुणातीत व्यक्ति किसे कहा गया है? गीता के अनुसार 'गुणातीत' व्यक्ति के लक्षण क्या हैं?

जो व्यक्ति तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर उठकर सुख-दुःख, मान-अपमान, निंदा-स्तुति तथा मित्र-शत्रु में समभाव रखता है, उसे गीता में गुणातीत कहा गया है।

वह सुख-दुःख, निंदा-स्तुति और मान-अपमान में समभाव रहता है। श्लोक 24 और 25 में भगवान बताते हैं कि जो गुणों से परे है, वह द्वंद्वों में विचलित नहीं होता और स्थिर रहता है।

8. गीता अध्याय 14 में गुणों से ऊपर उठने का क्या उपाय बताया गया है?

अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा निरंतर सेवा

श्लोक 26 में भगवान श्रीकृष्ण अव्यभिचारी भक्तियोग द्वारा तीनों गुणों से ऊपर उठने की बात कहते हैं। श्लोक 26 में कहा गया है कि जो अनन्य भक्तियोग द्वारा भगवान को भजता है, वह गुणों को लाँघकर ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बनता है।

9. गीता अध्याय 14 का मुख्य संदेश क्या है?

इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव को समझकर उनके बंधन से ऊपर उठना चाहिए और अंततः परम सत्य की ओर बढ़ना चाहिए।

10. प्रकृति से उत्पन्न होने वाले तीनों गुण, सत्त्व, रजस् और तमस्, अविनाशी जीवात्मा को किसके साथ बाँधते हैं?

शरीर

अध्याय 14 के श्लोक 5 के अनुसार, ये तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर के साथ बाँधते हैं।

11. यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु 'रजोगुण' के बढ़ने पर होती है, तो उसकी क्या गति होती है? 

वह कर्मों में आसक्त मनुष्यों के बीच जन्म लेता है। श्लोक 15 के अनुसार, रजोगुण की प्रधानता में मृत्यु होने पर जीव कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है।

12. सात्त्विक कर्म का फल कैसा बताया गया है?

निर्मल और सुखद

श्लोक 16 के अनुसार, सात्त्विक कर्म का फल निर्मल (पवित्र) और ज्ञानयुक्त बताया गया है।

13. गीता में 'अव्यभिचारी भक्तियोग' का क्या अर्थ बताया गया है?

स्वार्थ और अभिमान त्यागकर अनन्य प्रेम से निरंतर चिंतन। फल की इच्छा और अहंकार छोड़कर परमात्मा में लीन होना ही अव्यभिचारी भक्ति है।

14. गुणों का 'गुणों में बरतना' (Gunas acting upon Gunas) का क्या अर्थ है?

इंद्रियों का अपने-अपने विषयों में विचरना।

इसका अर्थ है कि प्रकृति के गुण ही इंद्रियों और विषयों के रूप में आपस में क्रिया कर रहे हैं, आत्मा उनसे अलग है।

Bhagavad Gita Chapter 14 | Gita Adhyay 14 | Gunatraya Vibhaga Yoga

भगवद्गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ें

अगर आप पूरी भगवद्गीता को अध्याय-दर-अध्याय सरल हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे भगवद्गीता के 18 अध्यायों के संपूर्ण परिचय से शुरुआत कर सकते हैं।

एक जगह से सभी अध्याय पढ़ने के लिए:

  1. अध्याय 1 — अर्जुनविषाद योग
  2. अध्याय 2 — सांख्य योग
  3. अध्याय 3 — कर्म योग
  4. अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यास योग
  5. अध्याय 5 — सांख्य योग और कर्म योग
  6. अध्याय 6 — आत्मसंयम योग
  7. अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञान योग
  8. अध्याय 8 — अक्षरब्रह्म योग
  9. अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
  10. अध्याय 10 — विभूति योग
  11. अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शन योग
  12. अध्याय 12 — भक्तियोग
  13. अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग
  14. अध्याय 14 — गुणत्रयविभाग योग
  15. अध्याय 15 — पुरुषोत्तम योग
  16. अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभाग योग
  17. अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभाग योग
  18. अध्याय 18 — मोक्षसंन्यास योग

संदर्भ और स्रोत

इस लेख में भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोक, उनकी हिंदी व्याख्या और गीता-अध्ययन के संदर्भ में गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित स्वामी रामसुखदास जी की श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। 

गीता प्रेस के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अर्थ और विस्तृत टीका दी गई है। 
इसके अलावा गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित गीता तत्त्वविवेचनी में भी मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी व्याख्या उपलब्ध है। 

About the Author

Sonam Agarwal

LLB | Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर research-based articles लिखती हैं। अब तक वे 500 से अधिक लेख लिख चुकी हैं।

सनातन धर्म और भगवद्गीता से संबंधित लेखों में उनका विशेष ध्यान मूल ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर जानकारी को सरल और सामान्य पाठकों के लिए समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने पर रहता है।

उनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को बिना अनावश्यक जटिलता के प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक उनके मूल विचारों को सही संदर्भ में समझ सकें।

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