Bhagavad Geeta Adhyay 14 (Gunatraya Vibhaga Yoga) : श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग)
भगवद्गीता अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग – 27 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ
Bhagavad Gita Chapter 14 | Gita Adhyay 14 | Gunatraya Vibhaga Yoga | 27 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

भगवद्गीता अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग का परिचय
श्रीमद्भगवद्गीता का चौदहवाँ अध्याय “गुणत्रय विभाग योग” (Gunatraya Vibhaga Yoga) कहलाता है। इसमें कुल 27 श्लोक हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीन गुणों, उनके स्वभाव, मनुष्य के जीवन पर उनके प्रभाव और उनसे ऊपर उठने के मार्ग को समझाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि ये तीन गुण जीव को किस प्रकार शरीर और संसार के बंधनों से जोड़ते हैं।
इस अध्याय के चार core concepts हैं:
सत्त्व → रज → तम → गुणातीत अवस्था
गीता अध्याय 14 में भगवान बताते हैं कि ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होकर देहधारी जीव को शरीर और संसार के अनुभवों से बाँधते हैं। सत्त्व ज्ञान और सुख से, रजस् कर्म और आसक्ति से तथा तमस् अज्ञान, प्रमाद और आलस्य से संबंधित है। इस अध्याय में तीनों गुणों के लक्षण, उनके बढ़ने पर होने वाले प्रभाव, मृत्यु के बाद उनसे संबंधित गति, कर्म और ज्ञान पर उनके प्रभाव तथा गुणों से परे जाने वाले गुणातीत पुरुष के लक्षण बताए गए हैं।
अध्याय के अंत में अर्जुन पूछते हैं कि गुणों से अतीत व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं और वह तीनों गुणों से कैसे ऊपर उठ सकता है? भगवान श्रीकृष्ण इसके उत्तर में गुणातीत व्यक्ति के लक्षण बताते हैं और अनन्य भक्ति को गुणों से ऊपर उठने का महत्वपूर्ण मार्ग बताते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि अनन्य भक्तियोग के द्वारा मनुष्य तीनों गुणों को पार करके ब्रह्मभाव को प्राप्त करने योग्य बनता है।
भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय में ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के लक्षणों का निर्देश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इन दोनों के ज्ञान को ही ज्ञान बतलाया और इसके अनुसार क्षेत्र के स्वरूप, स्वभाव, विकार और इसके तत्त्वों की उत्पत्ति के क्रम आदि तथा क्षेत्रज्ञ के स्वरूप और उसके प्रभाव का वर्णन किया।
पूर्व के श्लोक १९वें में भगवान ने प्रकृति-पुरुष के नाम से प्रकरण आरम्भ करके गुणों को प्रकृतिजन्य बताया और २१वें श्लोक में यह बात भी कही कि मनुष्य के बार-बार अच्छी-बुरी योनियों में जन्म होने में गुणों का संग ही हेतु है। अब इससे गुणों के भिन्न-भिन्न स्वरूप क्या हैं, ये जीवात्मा को कैसे शरीर में बांधते हैं, किस गुण के संग से किस योनि में जन्म होता है, गुणों से छूटने के उपाय क्या हैं, गुणों से छूटे हुए मनुष्य के लक्षण तथा आचरण कैसे होते हैं, ये सब बातें बताने के लिये इस चौदहवें अध्याय को प्रारम्भ किया गया है.
श्रीकृष्ण तेरहवें अध्याय में वर्णित ज्ञान को ही स्पष्ट करके चौदहवें अध्याय में विस्तारपूर्वक अर्जुन को समझाते हैं।
भगवद्गीता अध्याय 14: मुख्य तथ्य
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| अध्याय | 14वाँ अध्याय |
| संस्कृत नाम | गुणत्रय विभाग योग |
| English Name | Gunatraya Vibhaga Yoga |
| कुल श्लोक | 27 |
| मुख्य विषय | सत्त्व, रजस् और तमस् |
| तीन गुणों का स्रोत | प्रकृति |
| सत्त्व का प्रमुख संबंध | ज्ञान और सुख |
| रजस् का प्रमुख संबंध | कर्म, इच्छा और आसक्ति |
| तमस् का प्रमुख संबंध | अज्ञान, मोह, प्रमाद और आलस्य |
| अंतिम विषय | गुणातीत व्यक्ति के लक्षण |
| प्रमुख साधन | अनन्य भक्ति |
भगवद्गीता - चतुर्दश अध्याय के 27 संस्कृत श्लोक (Gita 14 Gunatray Vibhaga Yoga) | Bhagwat Geeta Adhyay 14, Shlok in Sanskrit
श्रीभगवानुवाच
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
गीता के चौदहवाँ अध्याय का हिंदी अर्थ और भावार्थ | Gita 14 Gunatray Vibhaga Yoga | Bhagwat Geeta Adhyay 14 in Hindi Meaning
श्लोक 1
श्लोक 2
श्लोक 3
श्लोक 4
अर्थात्, हे कुन्तीपुत्र! संसार की सभी योनियों में जितने भी शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, उनकी मूल प्रकृति माता के समान है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।
सत्त्व, रजस् और तमस् क्या हैं?
श्लोक 5
भगवान यह बताना चाहते हैं कि उन सब मूर्तियों के जो सूक्ष्म-स्थूल शरीर हैं, वे सब प्रकृति के अंश से बने हुए हैं और उन सबमें जो चेतन आत्मा है, वह मेरा अंश है। उन दोनों के संबंध में समस्त मूर्तियां अर्थात शरीरधारी प्राणी प्रकट होते हैं, अतः प्रकृति उनकी माता है और मैं पिता हूँ।
श्लोक 6
श्लोक 7
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को इच्छाओं और आसक्ति से उत्पन्न जानो। यह जीव को कर्मों और उनके प्रति आसक्ति से बाँधता है।
श्लोक 8
हे भारत! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सभी देहधारियों को मोहित करने वाला जानो। यह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के माध्यम से जीव को बाँधता है।
▪️सत्त्व, रजस् और तमस् में अंतर
| गुण | मुख्य विशेषता | व्यक्ति पर प्रभाव | किससे बाँधता है? |
|---|---|---|---|
| सत्त्व | निर्मलता, प्रकाश | ज्ञान और सुख की ओर | सुख और ज्ञान की आसक्ति |
| रजस् | इच्छा, सक्रियता | कर्म और उपलब्धियों की ओर | कर्म और आसक्ति |
| तमस् | अज्ञान, मोह | प्रमाद, आलस्य और निष्क्रियता | अज्ञान, प्रमाद और निद्रा |
महत्वपूर्ण बात: गीता इन तीनों गुणों को केवल “अच्छा, बुरा और बहुत बुरा” कहकर नहीं समझाती। सत्त्व अपेक्षाकृत प्रकाश और ज्ञान से जुड़ा है, लेकिन सत्त्व भी बंधन का कारण बन सकता है, क्योंकि उसमें सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति हो सकती है।
श्लोक 9
हे भारत! सत्त्वगुण मनुष्य को सुख से जोड़ता है, रजोगुण उसे कर्मों में लगाता है और तमोगुण ज्ञान को ढककर उसे प्रमाद की ओर ले जाता है।
श्लोक 10
हे भारत! कभी सत्त्वगुण रजस् और तमस् को दबाकर प्रभावी होता है, कभी रजस् सत्त्व और तमस् को दबाता है और कभी तमस् सत्त्व और रजस् को दबाकर प्रभावी हो जाता है।
तीनों गुणों की पहचान कैसे करें?
श्लोक 11
सत्त्वगुण बढ़ने की पहचान — जब शरीर और इंद्रियों में स्पष्टता, प्रकाश और ज्ञान की स्थिति दिखाई देने लगे, तब समझना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ रहा है।
श्लोक 12
रजोगुण बढ़ने की पहचान — हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण बढ़ने पर लोभ, अत्यधिक सक्रियता, कर्मों को आरंभ करने की प्रवृत्ति, अशांति और इच्छाओं की वृद्धि होने लगती है।
श्लोक 13
तमोगुण बढ़ने की पहचान — हे कुरुनन्दन! तमोगुण बढ़ने पर अज्ञान, निष्क्रियता, प्रमाद और मोह जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
मृत्यु के बाद तीन गुणों का प्रभाव
श्लोक 14
जब सत्त्वगुण के बढ़े हुए प्रभाव में देहधारी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह निर्मल और श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है।
श्लोक 15
रजोगुण की प्रधानता में मृत्यु होने पर व्यक्ति कर्मों में आसक्त लोगों के बीच जन्म लेता है।
तमोगुण की प्रधानता में मृत्यु होने पर वह कीट, पशु आदि मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।
श्लोक 16
श्लोक 17
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 18
- सत्त्वगुण में स्थित लोग उच्चतर अवस्थाओं या स्वर्ग आदि उच्च लोकों की ओर जाते हैं।
- राजस लोग मध्य स्थिति में रहते हैं अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं।
- तमोगुण की प्रधानता वाले लोग अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं।
गुणों से ऊपर कैसे उठें?
श्लोक 19
जब मनुष्य यह देखता है कि प्रकृति के गुण ही विभिन्न कर्मों और अनुभवों में कार्य कर रहे हैं तथा वह गुणों से परे परम तत्व को जान लेता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
श्लोक 20
जब देहधारी व्यक्ति शरीर से जुड़े इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, तब वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और उनसे जुड़े दुःखों से मुक्त होकर अमृतस्वरूप अवस्था को प्राप्त करता है।
अर्जुन ने पूछा: गुणातीत व्यक्ति कैसा होता है?
श्लोक 21
श्लोक 22
जो मनुष्य परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अंतःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह आदि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं, यही उसके गुणों से अतीत होने के प्रधान लक्षण हैं।
श्लोक 23
जो व्यक्ति साक्षी की तरह स्थित रहता है, गुणों के प्रभाव से विचलित नहीं होता और यह समझता है कि प्रकृति के गुण ही अपने-अपने क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, वह अपनी स्थिति से नहीं डगमगाता।
श्लोक 24
जो सुख और दुःख में समान रहता है, अपने भीतर स्थिर रहता है, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान दृष्टि से देखता है, प्रिय और अप्रिय में समान रहता है तथा निंदा और प्रशंसा को समान समझता है, वह गुणातीत कहलाता है।
श्लोक 25
जो मान और अपमान में समान रहता है, मित्र और शत्रु के प्रति समभाव रखता है तथा कर्मों के पीछे कर्तापन के अहंकार और आसक्ति का त्याग करता है, उसे गुणातीत कहा जाता है।
गुणों से ऊपर उठने का मार्ग
श्लोक 26
जो व्यक्ति अविचल और अनन्य भक्तियोग के द्वारा मेरी उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्मस्वरूप अवस्था को प्राप्त होने योग्य बन जाता है।
श्लोक 27
क्योंकि मैं अविनाशी ब्रह्म, अमृतस्वरूप अवस्था, शाश्वत धर्म और परम, अखंड सुख का आधार हूँ।
गुणातीत अवस्था क्या है
भगवद्गीता के 14वें अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) का यह अंश अध्यात्म के सबसे ऊंचे शिखर—'गुणातीत अवस्था' (तीनों गुणों से परे होने की स्थिति) को बहुत ही सरल और व्यावहारिक तरीके से समझाता है। इस पूरे विचार को 3 मुख्य भागों में समझा जा सकता है:
1. गुणातीत पुरुष की स्थिति (ज्ञान, शांति और आनंद नित्य क्यों हैं?)
- स्थायी आनंद: आम इंसान का सुख, दुख, ज्ञान या शांति बाहर की परिस्थितियों (सत्त्व, रज, तम गुणों) पर निर्भर करती है। जब अच्छे दिन आते हैं तो हम खुश होते हैं, बुरे दिन आते हैं तो दुखी।
- विचलित न होना: गुणातीत (जो प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठ चुका है) पुरुष का आनंद बाहर की परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। वह अपनी आत्मा (सच्चिदानंद) में ही स्थिर रहता है। इसलिए बाहर चाहे कितना भी बड़ा तूफान आए, गुण उसके मन को जरा भी डिगा या विचलित नहीं कर सकते।
2. आत्मा का 'असंग' स्वभाव (वास्तविकता)
- आत्मा असंग है: शास्त्रों का मूलभूत सिद्धांत है कि आपकी आत्मा का प्रकृति के गुणों (सत्त्व = ज्ञान/सुख का अभिमान, रज = कामना/भागदौड़, तम = आलस्य/अज्ञान) से कोई लेना-देना नहीं है।
- अनादि अज्ञान का संबंध: जैसे शीशे पर धूल जम जाए, तो लगता है कि शीशा ही धुंधला है; वैसे ही अनादि काल के अज्ञान के कारण हमने खुद को मन, शरीर और गुणों के साथ जोड़ लिया है। हम सोचने लगते हैं कि "मैं दुखी हूँ", "मैं क्रोधी हूँ", या "मैं ज्ञानी हूँ"—जबकि यह सब गुणों का खेल है, आत्मा का नहीं।
3. 'गुणों से अतीत' होने की प्रक्रिया (अनुभव करना)
- केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव: केवल किताबों में पढ़ लेना कि "मैं आत्मा हूँ"—यह गुणातीत होना नहीं है।
- संबंध तोड़ना: ज्ञान (विवेक) की तलवार से इस झूठे तादात्म्य (अज्ञानजन्य संबंध) को काट देना और स्वयं को उस सच्चिदानंद (सत् + चित् + आनंद) ब्रह्म के साथ एक (अभिन्न) महसूस करना ही असली गुणातीत होना है।
इसी प्रत्यक्ष अनुभव को गीता में 'गुणातीत होना' कहा गया है।
भगवद्गीता अध्याय 14 का सार
भगवद्गीता का चौदहवाँ अध्याय हमें मनुष्य के व्यवहार और मानसिक अवस्थाओं को समझने के लिए सत्त्व, रजस् और तमस् की अवधारणा देता है।
सत्त्व प्रकाश, स्पष्टता और ज्ञान से जुड़ा है।
रजस् इच्छा, गतिविधि, कर्म और आसक्ति से जुड़ा है।
तमस् अज्ञान, मोह, प्रमाद और आलस्य से जुड़ा है।
लेकिन गीता का अंतिम संदेश केवल सत्त्वगुण को बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अध्याय 14 बताता है कि सत्त्व भी एक प्रकार का बंधन बन सकता है, इसलिए अंतिम लक्ष्य तीनों गुणों से ऊपर उठना है।
गुणातीत व्यक्ति परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित नहीं होता। वह सुख-दुःख, मान-अपमान, निंदा-स्तुति और प्रिय-अप्रिय में संतुलन बनाए रखता है। वह समझता है कि प्रकृति के गुण अपना कार्य कर रहे हैं और स्वयं को उनके साथ पूरी तरह अभिन्न नहीं मानता।
अध्याय के अंतिम श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अव्यभिचारी भक्तियोग को गुणों से ऊपर उठने का मार्ग बताते हैं।
Chapter 14: एक नजर में पूरा अध्याय
| श्लोक | मुख्य विषय |
|---|---|
| 1–2 | परम ज्ञान और उसकी महत्ता |
| 3–4 | प्रकृति और सृष्टि की उत्पत्ति |
| 5 | तीन गुणों का परिचय |
| 6 | सत्त्वगुण |
| 7 | रजोगुण |
| 8 | तमोगुण |
| 9–10 | तीनों गुणों की कार्यप्रणाली |
| 11–13 | गुणों की वृद्धि के लक्षण |
| 14–15 | मृत्यु के समय गुणों का प्रभाव |
| 16–18 | गुणों के फल और उनकी दिशाएँ |
| 19–20 | तीनों गुणों से ऊपर उठना |
| 21 | अर्जुन का प्रश्न |
| 22–25 | गुणातीत व्यक्ति के लक्षण |
| 26 | भक्तियोग द्वारा गुणातीत अवस्था |
| 27 | ब्रह्म और परम सुख का आधार |
आज के जीवन में अध्याय 14 की सीख
गीता के तीन गुणों को आधुनिक जीवन में एक उपयोगी self-reflection framework की तरह भी समझा जा सकता है।
जब सत्त्व प्रमुख हो:
- मन अपेक्षाकृत शांत और स्पष्ट रहता है।
- सीखने और समझने की इच्छा बढ़ती है।
- निर्णय अधिक संतुलित हो सकते हैं।
- व्यक्ति अपने कार्यों के प्रभाव के बारे में सोचता है।
जब रजस् प्रमुख हो:
- लगातार कुछ हासिल करने की बेचैनी हो सकती है।
- तुलना और प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
- काम करने की ऊर्जा अधिक होती है, लेकिन साथ में तनाव और आसक्ति भी हो सकती है।
- परिणाम को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
जब तमस् प्रमुख हो:
- काम टालने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
- भ्रम और निर्णय लेने में कठिनाई हो सकती है।
- आलस्य और अत्यधिक निष्क्रियता बढ़ सकती है।
- व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से बचने लग सकता है।
Gunatraya Vibhaga Yoga → Three Gunas → Sattva Rajas Tamas → Gunatita → Bhakti Yoga
भगवद्गीता अध्याय 14 से प्रेरणा
“हमेशा परिस्थितियों को बदलना ही समाधान नहीं होता; कई बार अपने भीतर की प्रतिक्रिया को समझना अधिक महत्वपूर्ण होता है।”
सत्त्व हमें स्पष्टता की ओर ले जाता है, रजस् हमें लगातार कर्म और इच्छाओं में लगाए रखता है और तमस् हमें अज्ञान तथा निष्क्रियता की ओर खींच सकता है। गीता का संदेश इससे भी आगे जाता है,
इन तीनों गुणों के प्रभाव को पहचानो, उनके साक्षी बनो और अंततः उनसे ऊपर उठने का प्रयास करो।
FAQs: Bhagavad Gita Chapter 14
1. भगवद्गीता अध्याय 14 का नाम क्या है?
भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का नाम गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) है।
2. गीता अध्याय 14 में कितने श्लोक हैं?
अध्याय 14 में कुल 27 श्लोक हैं।
3. गीता अध्याय 14 में किन तीन गुणों का वर्णन है?
इस अध्याय में सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का वर्णन किया गया है।
4. सत्त्वगुण किससे संबंधित है?
सत्त्वगुण मुख्य रूप से प्रकाश, ज्ञान और सुख से संबंधित है। यह निर्मल और प्रकाशक है, फिर भी सुख और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।
सत्त्वगुण ज्ञान और सुख प्रदान करता है, लेकिन इनका अभिमान या आसक्ति जीव के लिए बंधन का कारण बन सकती है।
5. रजोगुण किससे संबंधित है? रजोगुण के बढ़ने पर व्यक्ति में कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?
रजोगुण इच्छा, कर्म, सक्रियता और आसक्ति से संबंधित है। श्लोक 12 के अनुसार, रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, स्वार्थपूर्ण कर्मों का आरम्भ और लालसा उत्पन्न होती है।
6. तमोगुण किससे संबंधित है? तमोगुण का जीव पर क्या प्रभाव पड़ता है?
तमोगुण अज्ञान, मोह, प्रमाद, आलस्य और निद्रा से संबंधित है।
यह ज्ञान को ढँककर प्रमाद, आलस्य और निद्रा में लगाता है। श्लोक 8 और 9 स्पष्ट करते हैं कि तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और जीव को मोह तथा आलस्य में बाँधता है।
7. गुणातीत व्यक्ति किसे कहा गया है? गीता के अनुसार 'गुणातीत' व्यक्ति के लक्षण क्या हैं?
जो व्यक्ति तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर उठकर सुख-दुःख, मान-अपमान, निंदा-स्तुति तथा मित्र-शत्रु में समभाव रखता है, उसे गीता में गुणातीत कहा गया है।
वह सुख-दुःख, निंदा-स्तुति और मान-अपमान में समभाव रहता है। श्लोक 24 और 25 में भगवान बताते हैं कि जो गुणों से परे है, वह द्वंद्वों में विचलित नहीं होता और स्थिर रहता है।
8. गीता अध्याय 14 में गुणों से ऊपर उठने का क्या उपाय बताया गया है?
अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा निरंतर सेवा
श्लोक 26 में भगवान श्रीकृष्ण अव्यभिचारी भक्तियोग द्वारा तीनों गुणों से ऊपर उठने की बात कहते हैं। श्लोक 26 में कहा गया है कि जो अनन्य भक्तियोग द्वारा भगवान को भजता है, वह गुणों को लाँघकर ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बनता है।
9. गीता अध्याय 14 का मुख्य संदेश क्या है?
इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव को समझकर उनके बंधन से ऊपर उठना चाहिए और अंततः परम सत्य की ओर बढ़ना चाहिए।
10. प्रकृति से उत्पन्न होने वाले तीनों गुण, सत्त्व, रजस् और तमस्, अविनाशी जीवात्मा को किसके साथ बाँधते हैं?
शरीर
अध्याय 14 के श्लोक 5 के अनुसार, ये तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर के साथ बाँधते हैं।
11. यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु 'रजोगुण' के बढ़ने पर होती है, तो उसकी क्या गति होती है?
वह कर्मों में आसक्त मनुष्यों के बीच जन्म लेता है। श्लोक 15 के अनुसार, रजोगुण की प्रधानता में मृत्यु होने पर जीव कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है।
12. सात्त्विक कर्म का फल कैसा बताया गया है?
निर्मल और सुखद
श्लोक 16 के अनुसार, सात्त्विक कर्म का फल निर्मल (पवित्र) और ज्ञानयुक्त बताया गया है।
13. गीता में 'अव्यभिचारी भक्तियोग' का क्या अर्थ बताया गया है?
स्वार्थ और अभिमान त्यागकर अनन्य प्रेम से निरंतर चिंतन। फल की इच्छा और अहंकार छोड़कर परमात्मा में लीन होना ही अव्यभिचारी भक्ति है।
14. गुणों का 'गुणों में बरतना' (Gunas acting upon Gunas) का क्या अर्थ है?
इंद्रियों का अपने-अपने विषयों में विचरना।
इसका अर्थ है कि प्रकृति के गुण ही इंद्रियों और विषयों के रूप में आपस में क्रिया कर रहे हैं, आत्मा उनसे अलग है।
भगवद्गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ें
एक जगह से सभी अध्याय पढ़ने के लिए:
- अध्याय 1 — अर्जुनविषाद योग
- अध्याय 2 — सांख्य योग
- अध्याय 3 — कर्म योग
- अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यास योग
- अध्याय 5 — सांख्य योग और कर्म योग
- अध्याय 6 — आत्मसंयम योग
- अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञान योग
- अध्याय 8 — अक्षरब्रह्म योग
- अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
- अध्याय 10 — विभूति योग
- अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शन योग
- अध्याय 12 — भक्तियोग
- अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग
- अध्याय 14 — गुणत्रयविभाग योग
- अध्याय 15 — पुरुषोत्तम योग
- अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभाग योग
- अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभाग योग
- अध्याय 18 — मोक्षसंन्यास योग
संदर्भ और स्रोत
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