Bhagavad Geeta Adhyay 17 (Shraddhatraya Vibhaga Yoga) : श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभाग योग)

भगवद्गीता अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभाग योग – 28 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ

Bhagavad Gita Chapter 17 | Gita Adhyay 17 | Shraddhatraya Vibhaga Yoga | 28 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

Bhagavad Gita Chapter 17 | Gita Adhyay 17 | Shraddhatraya Vibhaga Yoga | 28 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

भगवद्गीता अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभाग योग का परिचय

श्रीमद्भगवद्गीता का सत्रहवाँ अध्याय “श्रद्धात्रयविभाग योग” (Shraddhatraya Vibhaga Yoga) कहलाता है। इसमें कुल 28 श्लोक हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव और अंतःकरण के अनुरूप होती है और वह मुख्यतः तीन प्रकार की होती है सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।

भगवद्गीता के १६वें अध्याय के आरम्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी संपदा, काम, क्रोध और लोभ तथा शास्त्रविधि के महत्व का वर्णन किया था। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से निष्काम-भाव से सेवन किये जाने वाले शास्त्रविहित गुण और आचरणों का दैवीसम्पदा के नाम से वर्णन करके फिर शास्त्रविपरीत आसुरी सम्पदा का कथन किया। 

साथ ही आसुर-स्वभाव वाले मनुष्यों को नरकों में गिराने की बात कही और यह बतलाया कि काम, क्रोध, लोभ ही आसुरी सम्पदा के प्रधान अवगुण हैं। ये तीनों ही नरकों के द्वार हैं। इनका त्याग करके जो आत्मकल्याण के लिये साधन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। इसके अनन्तर उन्होंने यह भी कहा कि जो शास्त्रविधि का त्याग करके (जिन्हें शास्त्र की परवाह ही नहीं है) मनमाने ढंग से अपनी समझ से जिसको अच्छा कर्म समझता है, वही करता है, उसे अपने उन कर्मों का फल नहीं मिलता।

इसके बाद अर्जुन के मन में प्रश्न उठता है कि जो लोग शास्त्रविधि को पूरी तरह न जानते हुए भी श्रद्धापूर्वक पूजा या यज्ञ आदि करते हैं, उनकी श्रद्धा किस प्रकार की मानी जाए?

अर्जुन सोचते हैं यह तो ठीक ही है, किन्तु ऐसे लोग भी तो हो सकते हैं, जो न जानने के कारण (अज्ञानता के कारण) अथवा अन्य किसी कारण से शास्त्रविधि का त्याग कर बैठते हैं तथा यज्ञ-पूजादि शुभ कर्म श्रद्धापूर्व करते हैं, तो उनकी क्या स्थिति होती है? (जो शास्त्र को न जानने के कारण शास्त्रविधि का त्याग करके श्रद्धा के साथ पूजन आदि करने वाले हैं, वे कैसे स्वभाव वाले होते हैं?) इस जिज्ञासा को व्यक्त करते हुए अर्जुन भगवान से पूछते हैं।

इसी प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन प्रकार, उनके अनुसार पूजा-पद्धति, आहार, यज्ञ, तप और दान के सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भेद तथा अंत में “ॐ तत् सत्” का महत्व बताते हैं।

गीता के इस अध्याय 17 में मुख्य रूप से क्या बताया गया है?

  • श्रद्धा के तीन प्रकार: सात्त्विक, राजसिक और तामसिक
  • व्यक्ति की श्रद्धा और उसके स्वभाव का संबंध
  • सात्त्विक, राजसिक और तामसिक आहार
  • यज्ञ के तीन प्रकार
  • शरीर, वाणी और मन के तीन प्रकार के तप
  • दान के तीन प्रकार
  • “ॐ तत् सत्” का महत्व
  • श्रद्धा के बिना किए गए कर्मों की स्थिति

भगवद्गीता अध्याय 17 का मुख्य संदेश

अध्याय 17 का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि मनुष्य की श्रद्धा केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके स्वभाव, पसंद, आचरण और कर्मों से भी दिखाई देती है।

भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों के आधार पर श्रद्धा, भोजन, यज्ञ, तप और दान के अलग-अलग स्वरूप समझाते हैं। इससे यह शिक्षा मिलती है कि आध्यात्मिक जीवन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है; हमारे भोजन, बोलचाल, अनुशासन, सेवा और दान की भावना भी हमारे जीवन की गुणवत्ता से जुड़ी हैं।

भगवद्गीता - सप्तदश अध्याय के 28 संस्कृत श्लोक (Gita Chapter 17 Shraddhatraya Vibhaga Yoga) | Bhagwat Geeta Adhyay 17, Shlok in Sanskrit

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। 
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१॥

श्रीभगवानुवाच

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। 
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श‍ृणु॥२॥ 

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। 
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३॥

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। 
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४॥ 

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५॥

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। 
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥ 

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। 
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श‍ृणु॥७॥

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। 
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥८॥ 

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। 
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। 
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥ 

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। 
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। 
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥ 

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। 
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। 
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४॥ 

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। 
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५॥

मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। 
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥१६॥ 

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। 
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७॥

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। 
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥ 

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। 
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९॥

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । 
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥ 

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। 
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। 
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२॥ 

ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। 
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥२३॥

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। 
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥२४॥ 

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। 
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५॥

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। 
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६॥ 

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। 
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७॥

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। 
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८॥

गीता के सत्रहवाँ अध्याय का हिंदी अर्थ और भावार्थ | Gita Chapter 17 Shraddhatraya Vibhaga Yoga | Bhagwat Geeta Adhyay 17 in Hindi Meaning

  Bhagavad Gita Chapter 17 | Gita Adhyay 17 | Shraddhatraya Vibhaga Yoga | 28 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning 

श्लोक 17.1 — अर्जुन का प्रश्न

अर्जुन बोले—हे श्रीकृष्ण! जो लोग शास्त्रविधि को छोड़कर भी श्रद्धापूर्वक पूजा या यज्ञ आदि करते हैं, उनकी श्रद्धा किस प्रकार की मानी जाए—सात्त्विक, राजसिक या तामसिक?

हे श्रीकृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त मनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर देवादि का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विक है अथवा राजसी या तामसी? 

मुख्य सीख

अर्जुन का प्रश्न यह है कि यदि किसी व्यक्ति को शास्त्रों की पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन वह श्रद्धापूर्वक धार्मिक कर्म करता है, तो उसके कर्म और श्रद्धा का मूल्यांकन कैसे किया जाए?

श्लोक 17.2 — श्रद्धा के तीन प्रकार

भगवान श्रीकृष्ण बोले—मनुष्यों में स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा तीन प्रकार की होती है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। अब तुम इनके बारे में सुनो।

भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के संचित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है) सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है॥2॥

मुख्य सीख

हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव और अंतःकरण की प्रकृति से प्रभावित होती है।

श्लोक 17.3 — जैसी श्रद्धा, वैसा व्यक्ति

हे भारत! प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धामय है; इसलिए जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, उसका व्यक्तित्व और जीवन भी उसी के अनुरूप दिखाई देता है।

हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है. यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है॥3॥

मुख्य सीख

हम जिन मूल्यों और आदर्शों पर सच्चे मन से विश्वास करते हैं, वे हमारे विचारों और व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

श्लोक 17.4 — तीन प्रकार की श्रद्धा और उपासना

सात्त्विक प्रकृति वाले लोग देवताओं की उपासना करते हैं। राजसिक प्रकृति वाले यक्ष और राक्षसों की उपासना करते हैं, जबकि तामसिक प्रकृति वाले लोग प्रेत और भूतगणों की उपासना करते हैं।

सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं॥4॥ 

मुख्य सीख

मनुष्य की उपासना और धार्मिक प्रवृत्ति भी उसकी आंतरिक प्रकृति से जुड़ी हो सकती है।

श्लोक 17.5 — शास्त्रविरुद्ध कठोर तप

जो लोग शास्त्रविधि के विरुद्ध कठोर तप करते हैं और दंभ, अहंकार, इच्छा, आसक्ति तथा अपनी शक्ति के अभिमान से युक्त रहते हैं, उनके तप को उचित नहीं माना गया है।

जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं॥5॥

मुख्य सीख

कठोरता अपने आप में आध्यात्मिकता का प्रमाण नहीं है। तप का उद्देश्य आत्मसंयम और शुद्धि होना चाहिए।

श्लोक 17.6 — शरीर को कष्ट देने वाला तप

जो लोग अज्ञानवश अपने शरीर में स्थित प्राणियों के समुदाय को और शरीर में स्थित परमात्मा को भी कष्ट पहुँचाते हैं, उन्हें आसुरी निश्चय वाला समझो।

जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को (समस्त प्राणियों को) और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं (शास्त्र से विरुद्ध उपवास आदि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान्‌ के अंशस्वरूप जीवात्मा को क्लेश देना), उन अज्ञानियों को तुम आसुर स्वभाव वाला जानो॥6॥

मुख्य सीख

ऐसा तप जो अहंकार या अज्ञान के कारण शरीर और भीतर स्थित चेतना को अनावश्यक पीड़ा देता है, गीता के अनुसार उचित तप नहीं है।

🕉️ आहार के तीन प्रकार

श्लोक 17.7 — आहार, यज्ञ, तप और दान के तीन भेद

हर व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का आहार प्रिय हो सकता है। इसी प्रकार यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। अब उनके भेद सुनो।

भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है. और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं. मैं तुम्हें उनके इस पृथक्‌-पृथक्‌ भेद को बताता हूँ॥7॥ 

मुख्य सीख

गीता केवल श्रद्धा की बात नहीं करती, बल्कि दैनिक जीवन की आदतों और कर्मों को भी तीन गुणों के आधार पर समझाती है।

श्लोक 17.8 — सात्त्विक आहार

जो भोजन आयु, मानसिक प्रसन्नता, शक्ति, स्वास्थ्य, सुख और संतोष को बढ़ाने वाला हो तथा जो रसयुक्त, स्निग्ध, पोषण देने वाला और मन को प्रिय हो, वह सात्त्विक लोगों को प्रिय होता है।

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं) तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं॥8॥

मुख्य सीख

सात्त्विक आहार का मुख्य विचार संतुलन, पोषण और स्वास्थ्यप्रदता से जुड़ा है।

श्लोक 17.9 — राजसिक आहार

बहुत कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्यधिक गरम, तीखे, रूखे और जलन उत्पन्न करने वाले भोजन राजसिक व्यक्ति को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन को गीता दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करने वाला बताती है।

कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं ॥9॥

मुख्य सीख

यहाँ अत्यधिक तीखे, खट्टे, नमकीन या उत्तेजक भोजन से बचने की दिशा में संकेत मिलता है।

श्लोक 17.10 — तामसिक आहार

जो भोजन बहुत समय पहले बनाया गया हो, जिसका स्वाद और ताजगी समाप्त हो गई हो, जो दुर्गंधयुक्त, बासी, उच्छिष्ट या अपवित्र हो, वह तामसिक व्यक्ति को प्रिय बताया गया है।

जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो भोजन अपवित्र है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है॥10॥

महाभारत के अनुशासन पर्व के अध्याय १४५ (११) में माता पार्वती ने जब भगवान् शिव से पूछा कि, "आहार की शुद्धि कैसे होती है?" तब भगवान शिव ने बताया कि, "जिसमें मांस और मद्य न हो, जो सड़ा हुआ या पसीजा न हो, बासी न हो, अधिक कड़वा, अधिक खट्टा और अधिक नमकीन न हो, जिससे उत्तम गंध आती हो, जिसमें कीड़े या केश न पड़े हों, जो निर्मल हो, ढका हुआ हो और देखने में भी शुद्ध हो, जिसका देवताओं और ब्राह्मणों द्वारा सत्कार किया गया हो, सदा ऐसे ही अन्न का भोजन करना चाहिये. इसके विपरीत जो भोजन है, वह अशुभ है." 

मनुष्य जैसा आहार करता है, वैसा ही उसका अन्तःकरण बनता है और अन्तःकरण के अनुरूप ही उसकी श्रद्धा होती है. आहार शुद्ध होगा तो उसके परिणामस्वरूप अन्तःकरण भी शुद्ध होगा. ‘आहारशुदौ सत्त्वशुद्धिः’. (छान्दोग्य ७.२६.२) अन्तःकरण की शुद्धि से ही विचार, भाव, श्रद्धादि गुण और क्रियाएं शुद्ध होगी. सात्त्विक, राजस और तामस आहार में जो आहार जिसको प्रिय होता है, वह उसी गुणवाला होता है. अतः आहार की दृष्टि से भी किसी की पहचान की जा सकती है. यही बात यज्ञ, दान और तप के विषय में भी है।

मुख्य सीख

गीता यहाँ बासी, खराब और अपवित्र भोजन से बचने पर जोर देती है।

सात्त्विक, राजसिक और तामसिक आहार — संक्षिप्त तुलना

प्रकार गीता में वर्णन सरल समझ
सात्त्विक रसयुक्त, स्निग्ध, स्थिर, हृद्य ताजा, संतुलित और हितकारी भोजन
राजसिक अत्यधिक कड़वा, खट्टा, नमकीन, गरम, तीखा आदि अत्यधिक उत्तेजक या असुविधाजनक भोजन
तामसिक बासी, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, उच्छिष्ट, अपवित्र खराब, बासी या अशुद्ध भोजन

🕉️ यज्ञ के तीन प्रकार

श्लोक 17.11 — सात्त्विक यज्ञ

जो यज्ञ शास्त्रविधि के अनुसार केवल कर्तव्य समझकर और उसके फल की इच्छा किए बिना किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ कहलाता है।

हे अर्जुन! जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है- इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है॥11॥ 

मुख्य सीख

कर्तव्य को केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि सही भावना से करना सात्त्विक दृष्टि है।

श्लोक 17.12 — राजसिक यज्ञ

हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल की इच्छा से या दिखावे के लिए किया जाता है, उसे राजसिक यज्ञ जानो।

परन्तु केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तुम राजस जानो॥12॥

मुख्य सीख

जब धार्मिक कर्म का मुख्य उद्देश्य दिखावा, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत लाभ बन जाए, तो उसकी भावना बदल जाती है।

श्लोक 17.13 — तामसिक यज्ञ

जो यज्ञ शास्त्रविधि के विरुद्ध हो, जिसमें उचित अन्न-वितरण न हो, मंत्र-विधि और दक्षिणा का अभाव हो तथा श्रद्धा न हो, उसे तामसिक यज्ञ कहा गया है।

शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मंत्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं॥13॥

मुख्य सीख

किसी धार्मिक कर्म की बाहरी गतिविधि से अधिक महत्वपूर्ण उसकी विधि, भावना और श्रद्धा है।

🕉️ तप के तीन प्रकार

भगवान श्रीकृष्ण तप को केवल कठिन साधना नहीं मानते। वे तप को शरीर, वाणी और मन—इन तीन स्तरों पर समझाते हैं।

श्लोक 17.14 — शारीरिक तप

देवताओं, विद्वान ब्राह्मणों, गुरुजनों और ज्ञानी लोगों का सम्मान करना, शुद्धता और सरलता रखना, ब्रह्मचर्य का पालन करना तथा अहिंसा—इन्हें शरीर से संबंधित तप कहा गया है।

देवता, ब्राह्मण, गुरु (माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों) और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह शरीर- संबंधी तप कहा जाता है॥14॥

मुख्य सीख

शारीरिक अनुशासन केवल कठिन व्रत नहीं, बल्कि सम्मान, स्वच्छता, संयम और अहिंसा से भी जुड़ा है।

श्लोक 17.15 — वाणी का तप

ऐसे शब्द बोलना जिनसे अनावश्यक मानसिक पीड़ा या उद्वेग न हो, सत्य और हितकारी वाणी बोलना तथा स्वाध्याय करना—वाणी से संबंधित तप कहा गया है।

जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहना) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-संबंधी तप कहा जाता है॥15॥ 

मुख्य सीख

सच्ची बात कहना महत्वपूर्ण है, लेकिन सत्य को हितकारी और संयमित ढंग से कहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

श्लोक 17.16 — मानसिक तप

मन की प्रसन्नता, शांत और सौम्य स्वभाव, मौन या वाणी का संयम, आत्मनियंत्रण और भावों की शुद्धता—इन्हें मानसिक तप कहा गया है।

मन की प्रसन्नता, शांतभाव, भगवच्चिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन संबंधी तप कहा जाता है॥16॥

मुख्य सीख

आंतरिक शांति केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं आती। मन का संयम और भावों की शुद्धता भी महत्वपूर्ण है।

श्लोक 17.17 — सात्त्विक तप

जो तीनों प्रकार का तप गहरी श्रद्धा से और फल की इच्छा छोड़कर किया जाता है, उसे सात्त्विक तप कहा जाता है।

फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं॥17॥

मुख्य सीख

तप का मूल्य केवल उसकी कठिनाई में नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना में है।

श्लोक 17.18 — राजसिक तप

जो तप सम्मान, प्रतिष्ठा और पूजा पाने के लिए या दिखावे के उद्देश्य से किया जाता है, वह राजसिक कहलाता है। ऐसा तप स्थायी नहीं माना गया है।

जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित (जिसका फल होने न होने में शंका हो) एवं क्षणिक फलवाला तप राजस कहा गया है॥18॥ 

मुख्य सीख

यदि आत्म-अनुशासन का उद्देश्य केवल दूसरों से प्रशंसा पाना हो, तो उसकी आध्यात्मिक गुणवत्ता कम हो जाती है।

श्लोक 17.19 — तामसिक तप

जो तप अज्ञान या हठ के कारण स्वयं को पीड़ा देकर किया जाता है या दूसरे को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से किया जाता है, उसे तामसिक तप कहा गया है।

जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है॥19॥

स्पष्टीकरण में बताया गया है कि "जो अशास्त्रीय, मनःकल्पित, घोर और स्वभाव से ही तामस है, जिसमें दम्भ की प्रेरणा से या अज्ञान से पैरों को पेड़ की डाली में बांधकर सिर नीचा करके लटकना, लोहे के कांटों पर बैठना तथा इसी प्रकार की अन्यान्य घोर क्रियाएं करके बुरी भावना से अर्थात् दूसरों की सम्पत्ति का हरण करने, उसका नाश करने, उनके वंश का उच्छेद करने अथवा उसका किसी प्रकार कुछ भी अनिष्ट करने के लिये जो अपने मन, वाणी, और शरीर को ताप पहुँचाना है- उसे ‘तामस तप’ कहते हैं।" 

मुख्य सीख

ऐसा अनुशासन जो अज्ञान, आत्मपीड़ा या दूसरों को नुकसान पहुँचाने की भावना पर आधारित हो, गीता के अनुसार उचित नहीं है।

🕉️ दान के तीन प्रकार

श्लोक 17.20 — सात्त्विक दान

जो दान केवल कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा के, उचित स्थान, उचित समय और योग्य पात्र को दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहलाता है।

दान देना ही कर्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल (जिस देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो, वही देश-काल, उस वस्तु द्वारा प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य समझा जाता है) और पात्र के प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है॥20॥

मुख्य सीख

सच्चे दान में प्रत्युपकार की अपेक्षा कम और सेवा की भावना अधिक होती है।

श्लोक 17.21 — राजसिक दान

जो दान बदले में कुछ पाने की इच्छा से, किसी फल की अपेक्षा से या मन में संकोच अथवा अनिच्छा के साथ दिया जाता है, वह राजसिक दान कहलाता है।

किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में (अर्थात्‌ मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए) रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है॥21॥

मुख्य सीख

दान के पीछे की अपेक्षा उसके स्वरूप को प्रभावित करती है।

श्लोक 17.22 — तामसिक दान

जो दान अनुचित स्थान या समय पर, अयोग्य पात्र को, बिना सम्मान के या उपेक्षा और तिरस्कार के साथ दिया जाता है, वह तामसिक दान कहलाता है।

जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है॥22॥

जिसके पास जहाँ जिस समय जिस वस्‍तु का अभाव हो, वह वहीं और उसी समय उस वस्तु के दान का पात्र है. जैसे- भूखे, प्यासे, नंगे, दरिद्र, रोगी, आर्त, अनाथ और भयभीत प्राणी अन्न, जल, वस्त्र, निवार्हयोग्य धन, औषधि, आश्वासन, आश्रय और अभय दान के पात्र हैं। इनके अतिरिक्त जो श्रेष्ठ आचरणों वाले विद्वान्, ब्राह्मण, उत्तम ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी तथा सेवावृति लोग हैं, जिन्हें जिस वस्‍तु का दान देना शास्त्र में कर्तव्य बतलाया गया है, वे भी अपने-अपने अधिकार के अनुसार यथाशक्ति धन आदि सभी आवश्यक वस्तु के दानपात्र हैं।

यदि किसी ने हमारे ऊपर उपकार किया है, उसकी सेवा करना तथा यथासाध्य उसे सुख पहुँचाने का प्रयास करना तो हमारा कर्तव्य है ही। उसे जो लोग दान समझते हैं, वे वस्तुतः उपकारी का तिरस्कार करते हैं और जो लोग उपकारी की सेवा नहीं करना चाहते, वे तो कृतध्न की श्रेणी में हैं।

यहाँ अनुपकारी को दान देने की बात कहकर भगवान यह भाव दिखलाते हैं कि दान देने वाला दान के पात्र से बदले में किसी प्रकार की जरा भी उपकार पाने की इच्छा न रखे। मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि इस लोक और परलोक के भोगों की प्राप्ति के लिये या रोग आदि की निवृति के लिये जो किसी वस्तु का दान किसी व्यक्ति या संस्था को दिया जाता है, वे फल के उद्देश्य से दान देना है।

जिस मनुष्य को दान देने की आवश्यकता नहीं है तथा जिनको दान देने का शास्त्र में निषेध है, वे धर्मध्वजी, पाखण्डी, कपट वेषधारी, हिंसा करने वाले, मद्य-मांस आदि अभक्ष्य वस्तुओं को भक्षण करने वाले, चोरी, व्यभिचार आदि नीच कर्म करने वाले, ठग, जुआरी और नास्तिक आदि सभी दान के लिये अपात्र हैं।

मुख्य सीख

दान में केवल वस्तु या धन देना ही महत्वपूर्ण नहीं है; स्थान, समय, पात्र और देने का तरीका भी महत्वपूर्ण है।

🕉️ ॐ तत् सत् का अर्थ

श्लोक 17.23 — ॐ तत् सत्

“ॐ तत् सत्”—इन तीन शब्दों को ब्रह्म का निर्देश माना गया है। प्राचीन काल में इन्हीं के आधार पर ब्राह्मण, वेद और यज्ञ आदि की व्यवस्था बताई गई।

ॐ, तत्‌, सत्‌-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए॥23॥

मुख्य सीख

यहाँ भगवान धार्मिक कर्मों को परम सत्य और समर्पण की भावना से जोड़ते हैं।

श्लोक 17.24 — “ॐ” और कर्म

इसलिए ब्रह्म को जानने की इच्छा रखने वाले लोग शास्त्रविधि से किए जाने वाले यज्ञ, दान और तप आदि कर्मों को “ॐ” का उच्चारण करके आरंभ करते हैं।

अर्थात् वेद-मंत्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ मनुष्यों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं॥24॥

मुख्य सीख

धार्मिक कर्मों की शुरुआत ईश्वर-स्मरण और समर्पण की भावना से करने का महत्व बताया गया है।

श्लोक 17.25 — “तत्” और फल-त्याग

मोक्ष की इच्छा रखने वाले लोग “तत्” भाव से फल की इच्छा किए बिना विभिन्न यज्ञ, तप और दान के कर्म करते हैं।

तत्‌ अर्थात्‌ 'तत्‌' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले मनुष्यों द्वारा की जाती हैं॥25॥

मुख्य सीख

कर्म को केवल व्यक्तिगत लाभ से जोड़ने के बजाय उसे उच्च उद्देश्य के लिए समर्पित करना महत्वपूर्ण है।

श्लोक 17.26 — “सत्” का अर्थ

हे पार्थ! “सत्” शब्द का प्रयोग सत्यभाव और श्रेष्ठभाव के लिए किया जाता है। उत्तम और प्रशंसनीय कर्म के लिए भी “सत्” शब्द का प्रयोग होता है।

'सत्‌'- इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा उत्तम कर्म में भी 'सत्‌' शब्द का प्रयोग किया जाता है॥26॥ 

मुख्य सीख

“सत्” सत्य, श्रेष्ठता और शुभता से जुड़ा हुआ है।

श्लोक 17.27 — यज्ञ, तप और दान में “सत्”

यज्ञ, तप और दान में दृढ़ता को भी “सत्” कहा जाता है। और परम सत्य के उद्देश्य से किया गया कर्म भी “सत्” कहलाता है।

यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्‌' इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्‌- ऐसे कहा जाता है॥27॥

मुख्य सीख

श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए निरंतरता और समर्पण भी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा हैं।

श्लोक 17.28 — श्रद्धा के बिना कर्म

हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया गया हवन, दिया गया दान, किया गया तप और अन्य कर्म “असत्” कहलाते हैं। ऐसे कर्म का न तो इस लोक में और न ही परलोक में वास्तविक लाभ माना गया है।

बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही॥28॥

यज्ञ, तप और दान से यहाँ सात्त्विक यज्ञ, तप और दान का निर्देशन किया गया है, जिसमें कर्ता का जरा भी स्वार्थ नहीं रहता, ऐसा कर्म कर्ता के अन्तःकरण को शुद्ध बनाकर उसे परमेश्वर की प्राप्ति करा देता है, इसलिये वह ‘सत्’ है। 

हवन, दान और तप तथा अन्यान्य शुभ कर्म श्रद्धापूर्वक किये जाने पर ही अन्तःकरण शुद्धि और इस लोक या परलोक के फल देने में समर्थ होते हैं. बिना श्रद्धा के लिये हुए शुभ कर्म व्यर्थ है।

मुख्य सीख

किसी अच्छे कर्म की बाहरी गतिविधि से अधिक महत्वपूर्ण उसकी श्रद्धा और आंतरिक भावना है।


भगवद्गीता अध्याय 17 में सात्त्विक, राजसिक और तामसिक जीवन-दृष्टि

अध्याय 17 को समझने का एक आसान तरीका यह है कि भगवान श्रीकृष्ण अलग-अलग कर्मों में तीन गुणों की अभिव्यक्ति दिखाते हैं।

विषय सात्त्विक राजसिक तामसिक
श्रद्धा शुद्ध और संतुलित फल/प्रतिष्ठा से जुड़ी अज्ञान या अनुचित प्रवृत्ति से जुड़ी
आहार स्वास्थ्यवर्धक, रसयुक्त, प्रिय अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन आदि बासी, दुर्गंधयुक्त, अशुद्ध
यज्ञ कर्तव्यभाव से फल या दिखावे के लिए विधिहीन और श्रद्धारहित
तप श्रद्धा और फल-त्याग से सम्मान/प्रतिष्ठा के लिए अज्ञान, हठ या पीड़ा से
दान बिना प्रत्युपकार की अपेक्षा फल या बदले की इच्छा से अनुचित समय/स्थान या अपमानपूर्वक
कर्म की भावना समर्पण और शुद्धता व्यक्तिगत लाभ/प्रतिष्ठा अज्ञान और अविवेक

आज के जीवन में भगवद्गीता अध्याय 17 की प्रासंगिकता

भगवद्गीता का अध्याय 17 हजारों वर्ष पुराने आध्यात्मिक संदर्भ में दिया गया है, लेकिन इसके कई विचार आज के जीवन में भी आत्मचिंतन का अवसर देते हैं।

1. Social Media और Validation

आज लोग कभी-कभी अपने काम, lifestyle या धार्मिक गतिविधियों को भी दूसरों की प्रतिक्रिया से जोड़ देते हैं। अध्याय 17 का राजसिक यज्ञ और तप का विचार हमें यह सोचने का अवसर देता है कि—

क्या मैं कोई अच्छा काम इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि वह सही है, या इसलिए कि लोग मेरी प्रशंसा करें?

2. Food Choices और Mindful Eating

गीता 17.8–10 में भोजन को तीन प्रकार से समझाया गया है। आधुनिक जीवन में इसे एक spiritual reflection की तरह देखा जा सकता है—क्या हमारा भोजन ताजा, संतुलित और हमारे शरीर के लिए उचित है?

3. Digital Noise और Mental Discipline

अध्याय 17 का मानसिक तप—मन की प्रसन्नता, सौम्यता, आत्मसंयम और भावों की शुद्धता—आज लगातार notifications, social media और digital distractions के बीच आत्मनिरीक्षण का एक उपयोगी framework देता है।

4. Giving Without Expecting

सात्त्विक दान का विचार आज के समय में volunteering, charity और सेवा के संदर्भ में भी प्रेरक हो सकता है।

प्रश्न यह है:

क्या मैं मदद इसलिए कर रहा हूँ कि किसी जरूरतमंद की सहायता हो, या इसलिए कि बदले में recognition मिले?

5. Words Matter

गीता 17.15 वाणी के तप की बात करती है। आज online comments, messages और social media debates के दौर में यह विचार विशेष रूप से प्रासंगिक लगता है।

हर बात जो हम कह सकते हैं, जरूरी नहीं कि उसे उसी तरीके से कहना भी चाहिए।


भगवद्गीता अध्याय 17 से मिलने वाली 7 व्यावहारिक सीख

1. अपनी श्रद्धा और विश्वास की समीक्षा करें।
हम जिन चीजों पर विश्वास करते हैं, वे हमारे व्यवहार को प्रभावित करती हैं।

2. भोजन के प्रति जागरूक रहें।
ताजगी, संतुलन और स्वास्थ्य को महत्व देना उपयोगी जीवन-अनुशासन है।

3. अच्छे काम केवल दिखावे के लिए न करें।
सेवा और धार्मिक कर्म का मूल्य केवल public recognition से तय नहीं होता।

4. तप का अर्थ स्वयं को कष्ट देना नहीं है।
शरीर, वाणी और मन का संयम भी तप है।

5. बोलने से पहले सोचें।
सत्य के साथ हित और संयम को भी महत्व दें।

6. दान में सम्मान रखें।
किसी की सहायता करते समय सामने वाले के सम्मान को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

7. कर्म के पीछे की भावना को देखें।
एक ही बाहरी कर्म अलग भावना से किया जाए तो उसका स्वरूप अलग हो सकता है।

Bhagavad Gita Chapter 17 | Gita Adhyay 17 | Shraddhatraya Vibhaga Yoga

भगवद्गीता अध्याय 17 का संक्षिप्त सार

भगवद्गीता का सत्रहवाँ अध्याय श्रद्धात्रयविभागयोग मनुष्य की श्रद्धा और उसके जीवन में तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—की अभिव्यक्ति को समझाता है।

भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि श्रद्धा तीन प्रकार की होती है और मनुष्य की प्रकृति के अनुरूप उसकी श्रद्धा दिखाई देती है। इसके बाद वे सात्त्विक, राजसिक और तामसिक आहार, यज्ञ, तप तथा दान का वर्णन करते हैं।

अध्याय के अंतिम भाग में “ॐ तत् सत्” का उल्लेख आता है और यह बताया जाता है कि श्रद्धा के बिना किया गया धार्मिक या शुभ कर्म वास्तविक आध्यात्मिक फल देने वाला नहीं माना जाता।

इस प्रकार अध्याय 17 हमें केवल यह नहीं बताता कि क्या करना चाहिए, बल्कि यह भी सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम कोई काम किस भावना से कर रहे हैं।


Bhagavad Gita Chapter 17 FAQs

भगवद्गीता का 17वाँ अध्याय कौन सा है?

भगवद्गीता का 17वाँ अध्याय श्रद्धात्रयविभागयोग (Shraddhatraya Vibhaga Yoga) है।

भगवद्गीता अध्याय 17 में कितने श्लोक हैं?

भगवद्गीता के 17वें अध्याय में कुल 28 श्लोक हैं।

भगवद्गीता अध्याय 17 का मुख्य विषय क्या है?

इस अध्याय का मुख्य विषय श्रद्धा के तीन प्रकार—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा उनके अनुसार आहार, यज्ञ, तप और दान के भेद हैं।

गीता अध्याय 17 में श्रद्धा के कितने प्रकार बताए गए हैं?

भगवान श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन प्रकार बताते हैं—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।

भगवद्गीता अध्याय 17 में आहार के कितने प्रकार हैं?

अध्याय 17 में आहार को तीन प्रकारों में समझाया गया है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।

गीता अध्याय 17 में तप के कितने प्रकार बताए गए हैं?

तप को तीन स्तरों पर समझाया गया है—शारीरिक तप, वाणी का तप और मानसिक तप। इसके बाद इनके सात्त्विक, राजसिक और तामसिक स्वरूप बताए गए हैं।

भगवद्गीता अध्याय 17 में दान के कितने प्रकार हैं?

दान तीन प्रकार का बताया गया है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।

“ॐ तत् सत्” का उल्लेख गीता के किस अध्याय में है?

“ॐ तत् सत्” का वर्णन भगवद्गीता अध्याय 17 के श्लोक 23 से 28 में मिलता है।

भगवद्गीता अध्याय 17 का सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्या है?

इस अध्याय का एक केंद्रीय संदेश यह है कि किसी कर्म का मूल्य केवल उसके बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उसके पीछे की श्रद्धा, उद्देश्य और भावना से भी जुड़ा होता है।


निष्कर्ष

भगवद्गीता अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग हमें अपने विश्वास, भोजन, वाणी, अनुशासन, सेवा और दान की भावना को देखने का अवसर देता है।

सात्त्विकता का अर्थ केवल धार्मिक कर्म करना नहीं है। यह शुद्ध उद्देश्य, संयम, संतुलन, सेवा, आत्मनियंत्रण और फल की अत्यधिक अपेक्षा से दूरी जैसे गुणों से भी जुड़ी है।

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में इस अध्याय को आत्मचिंतन के रूप में पढ़ा जा सकता है—मैं क्या कर रहा हूँ, उससे भी महत्वपूर्ण है कि मैं उसे किस भावना से कर रहा हूँ।

“जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही मनुष्य स्वयं को बनाता है।”
— भगवद्गीता 17.3 का सरल भाव

भगवद्गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ें

अगर आप पूरी भगवद्गीता को अध्याय-दर-अध्याय सरल हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे भगवद्गीता के 18 अध्यायों के संपूर्ण परिचय से शुरुआत कर सकते हैं।

एक जगह से सभी अध्याय पढ़ने के लिए:

  1. अध्याय 1 — अर्जुनविषाद योग
  2. अध्याय 2 — सांख्य योग
  3. अध्याय 3 — कर्म योग
  4. अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यास योग
  5. अध्याय 5 — सांख्य योग और कर्म योग
  6. अध्याय 6 — आत्मसंयम योग
  7. अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञान योग
  8. अध्याय 8 — अक्षरब्रह्म योग
  9. अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
  10. अध्याय 10 — विभूति योग
  11. अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शन योग
  12. अध्याय 12 — भक्तियोग
  13. अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग
  14. अध्याय 14 — गुणत्रयविभाग योग
  15. अध्याय 15 — पुरुषोत्तम योग
  16. अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभाग योग
  17. अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभाग योग
  18. अध्याय 18 — मोक्षसंन्यास योग

संदर्भ और स्रोत

इस लेख में भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोक, उनकी हिंदी व्याख्या और गीता-अध्ययन के संदर्भ में गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित स्वामी रामसुखदास जी की श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। 

गीता प्रेस के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अर्थ और विस्तृत टीका दी गई है। 
इसके अलावा गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित गीता तत्त्वविवेचनी में भी मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी व्याख्या उपलब्ध है। 

शास्त्रीय संदर्भ

  • श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग
  • श्लोक: 17.1–17.28
  • प्रमुख विषय: श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप, दान और ॐ तत् सत्

About the Author

Sonam Agarwal

LLB | Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर research-based articles लिखती हैं। अब तक वे 500 से अधिक लेख लिख चुकी हैं।

सनातन धर्म और भगवद्गीता से संबंधित लेखों में उनका विशेष ध्यान मूल ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर जानकारी को सरल और सामान्य पाठकों के लिए समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने पर रहता है।

उनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को बिना अनावश्यक जटिलता के प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक उनके मूल विचारों को सही संदर्भ में समझ सकें।

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Tags: भगवद्गीता अध्याय 17 के श्लोक, गीता अध्याय 17, Bhagavad Gita Chapter 17

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