Bhagavad Geeta Adhyay 10 (Vibhuti Yoga) : श्रीमद्भगवद्गीता - दसवां अध्याय (विभूति योग)

भगवद्गीता अध्याय 10: विभूति योग – 42 श्लोक, संस्कृत और सरल हिंदी अर्थ

Bhagavad Gita Chapter 10 | Gita Adhyay 10 | Vibhuti Yoga | 42 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

Bhagavad Gita Chapter 10 | Gita Adhyay 10 | Vibhuti Yoga | 42 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

भगवद्गीता अध्याय 10 का परिचय — श्रीमद्भगवद्गीता का दसवाँ अध्याय “विभूति योग” कहलाता है। इसमें कुल 42 श्लोक हैं। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों, योगशक्ति और परम स्वरूप के बारे में बताते हैं। वे अर्जुन को बताते हैं कि संसार में जो भी श्रेष्ठ, शक्तिशाली, सुंदर, तेजस्वी और विशेष है, उसे भगवान की दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

अध्याय के आरंभ में श्रीकृष्ण अपने परम स्वरूप और भक्तों के प्रति अपनी कृपा का वर्णन करते हैं। इसके बाद अर्जुन भगवान से उनकी दिव्य विभूतियों को विस्तार से बताने का अनुरोध करते हैं। 

श्रीकृष्ण समझाते हैं कि संसार में जो कुछ भी श्रेष्ठ, शक्तिशाली, तेजस्वी, सुंदर, ज्ञानपूर्ण या प्रभावशाली दिखाई देता है, उसे उनकी दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। वे बताते हैं कि संसार में जो कुछ विशेष रूप से विभूतिमान, श्रीसम्पन्न, शक्तिशाली या तेजस्वी दिखाई देता है, उसे उनकी दिव्य विभूति का अंश समझना चाहिए।

इसी क्रम में वे सूर्य, चंद्रमा, हिमालय, गंगा, पीपल, सिंह, गरुड़, श्रीराम, अर्जुन, समय, मृत्यु, ज्ञान आदि को अपनी प्रमुख विभूतियों के उदाहरण के रूप में बताते हैं।

अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनकी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है। उन्होंने केवल प्रमुख उदाहरण बताए हैं और अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से पूरे जगत को धारण किए हुए हैं।

भगवद्गीता अध्याय 10: विभूति योग

अध्याय का संक्षिप्त परिचय

गीता के सातवें अध्‍याय से लेकर नौवें अध्‍याय तक विज्ञान सहित ज्ञान का जो वर्णन किया गया, उसके बहुत गम्‍भीर हो जाने के कारण अब पुन: उसी विषय को दूसरे प्रकार से भली भाँति समझाने के लिये दसवें अध्‍याय का आरम्‍भ किया जाता है। यहाँ पहले श्लोक में भगवान् पूर्वोक्‍त विषय का ही पुन: वर्णन करने की प्रतिज्ञा करते हैं। 

गीता के सातवें अध्याय से नौवें अध्याय तक भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान, विज्ञान, अपनी प्रकृति, भक्ति, ब्रह्म और अपनी व्यापक सत्ता का वर्णन किया। दसवें अध्याय में वे इसी विषय को एक अलग दृष्टिकोण से समझाते हैं।

अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि वे किस प्रकार श्रीकृष्ण का निरंतर चिंतन करें और किन-किन रूपों में उन्हें पहचानें। इसके उत्तर में श्रीकृष्ण अपनी प्रमुख दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं।

“विभूति” का सामान्य अर्थ भगवान की विशेष शक्ति, महिमा या दिव्य अभिव्यक्ति से है।

विभूति योग क्या है?

विभूति योग का अर्थ भगवान की उन दिव्य शक्तियों और विशेष अभिव्यक्तियों को समझना है, जिनके माध्यम से संसार में उनकी महिमा दिखाई देती है।

अध्याय 10 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार में जो कुछ अत्यंत श्रेष्ठ, तेजस्वी, शक्तिशाली, सुंदर या प्रभावशाली है, उसे उनकी दिव्य विभूति के रूप में देखा जा सकता है। इसी कारण इस अध्याय में सूर्य, चंद्रमा, हिमालय, गंगा, पीपल, सिंह, गरुड़, श्रीराम, अर्जुन और अनेक अन्य उदाहरण दिए गए हैं।

भगवद्गीता - दशम अध्याय के 42 संस्कृत श्लोक (Gita 10 Vibhuti Yog) | Bhagwat Geeta Adhyay 10 Shlok in Sanskrit

श्रीभगवानुवाच

भूय एव महाबाहो श‍ृणु मे परमं वचः। 
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१॥ 

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। 
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२॥

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। 
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३॥ 

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। 
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥४॥

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। 
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५॥ 

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। 
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६॥

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। 
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७॥ 

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। 
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८॥

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। 
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९॥ 

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। 
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१०॥

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। 
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११॥

अर्जुन उवाच

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। 
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥१२॥ 

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। 
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३॥

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। 
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४॥ 

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। 
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥१५॥

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। 
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६॥ 

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। 
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥१७॥

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। 
भूयः कथय तृप्तिर्हि श‍ृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८॥

श्रीभगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। 
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९॥ 

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। 
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥२०॥

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। 
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१॥ 

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। 
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२॥

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। 
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३॥ 

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्। 
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४॥

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। 
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५॥ 

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। 
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६॥

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्। 
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७॥ 

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। 
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८॥

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। 
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९॥ 

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। 
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३०॥

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। 
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१॥ 

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। 
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२॥

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। 
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥३३॥ 

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। 
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥३४॥

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। 
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥३५॥ 

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्। 
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६॥

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। 
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७॥ 

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। 
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८॥

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। 
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥३९॥ 

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। 
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४०॥

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। 
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१॥ 

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। 
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥४२॥

गीता के दसवां अध्याय का हिंदी अर्थ और भावार्थ | Gita 10 Vibhuti Yoga | Bhagwat Geeta Adhyay 10 in Hindi Meaning

भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले- 
हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुनो, जिसे मैं तुम्हें अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा॥1॥ 
 
अर्जुन! मेरी उत्पत्ति को अर्थात्‌ लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ॥2॥ 

जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है॥3॥ 
 
निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं॥4-5॥  

सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है॥6॥ 

जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥7॥ 

श्लोक 8 — अध्याय 10 का प्रमुख श्लोक

मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं॥8॥ 

(यह श्लोक हमें अपनी सफलता पर अहंकार करने के बजाय कृतज्ञता और विनम्रता रखने की प्रेरणा देता है। जीवन में हमारी उपलब्धियों के पीछे ज्ञान, परिवार, समाज, प्रकृति और अनेक परिस्थितियों का योगदान होता है।)

निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं॥9॥ 

श्लोक 10 — जीवन में सही दिशा का संदेश

उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥10॥ 

(जब व्यक्ति किसी श्रेष्ठ उद्देश्य के प्रति निरंतरता, समर्पण और ईमानदारी से काम करता है, तो उसके भीतर सही दिशा पहचानने की क्षमता विकसित होती है।)

अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥11॥

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अर्जुन द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति

अर्जुन बोले- 
आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। आप सनातन, दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी हैं॥12॥

सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल ऋषि और महर्षि व्यास भी आपको ऐसा ही बताते हैं और स्वयं आप भी मुझे यही बता रहे हैं॥13॥ 

हे केशव! आप जो कुछ भी मुझे बता रहे हैं, मैं उसे पूर्ण सत्य मानता हूँ। हे भगवान! आपके वास्तविक और लीलामय स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही॥14॥ 
 
हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं॥15॥ 

(हे पुरुषोत्तम! हे समस्त प्राणियों के उत्पन्न करने वाले, प्राणियों के स्वामी, देवों के देव और जगत के स्वामी! आप स्वयं ही अपने स्वरूप को जानते हैं।)

इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं॥16॥ 

हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?॥17॥ 

(हे योगेश्वर! मैं निरंतर आपका चिंतन करते हुए आपको किस प्रकार जान सकता हूँ? हे भगवान! किन-किन रूपों और भावों में मैं आपका चिंतन करूँ?)
 
फिर भी हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात्‌ सुनने की उत्कंठा बनी ही रहती है॥18॥

(हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति और दिव्य विभूतियों को फिर विस्तार से बताइए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर मुझे कभी तृप्ति नहीं होती।)

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भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन

श्री भगवान बोले- 
हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तुम्हारे लिए प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है॥19॥ 

अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥20॥ 

(अर्थात् हे अर्जुन! मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही सभी प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ।)

मैं आदित्यों में (अदिति के बारह पुत्रों में) विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज, अर्थात् मरुतों में मरीचि और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ॥21॥
यहाँ मरुत वैदिक परंपरा में वर्णित देवताओं का समूह है और मरीचि उनमें एक प्रमुख नाम के रूप में आता है।
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और सभी प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ॥22॥ 

मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ. मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ॥23॥ 

हे पार्थ! पुरोहितों में मुझे मुखिया बृहस्पति जानो। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ॥24॥
 
मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ. सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ॥25॥ 

(मैं महर्षियों में भृगु, वाणी में एक अक्षर अर्थात् ॐ, यज्ञों में जपयज्ञ और अचल रहने वाली वस्तुओं में हिमालय हूँ।)

श्लोक 26 — पीपल का उल्लेख

मैं सब वृक्षों में अश्वत्थ अर्थात् पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ॥26॥ 

भगवद्गीता में पीपल का महत्व

भगवद्गीता के अध्याय 10 के श्लोक 26 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सभी वृक्षों में अश्वत्थ अर्थात पीपल हैं। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थ यानी पीपल को सभी वृक्षों में अपनी विभूति बताया है। इसलिए गीता के संदर्भ में पीपल केवल एक वृक्ष का नाम नहीं, बल्कि भगवान की विशेष विभूति के उदाहरण के रूप में सामने आता है।
मुझको घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा जानो॥27॥ 

(मैं घोड़ों में अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा हूँ।)

मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ. शास्त्रोक्त रीति से संतान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ॥28॥ 

(मैं शस्त्रों में वज्र, गौओं में कामधेनु, संतानोत्पत्ति की प्रेरक शक्ति कन्दर्प अर्थात् कामदेव और सर्पों में वासुकि हूँ।)

मैं नागों में (नाग और सर्प ये दो प्रकार की सर्पों की ही जाति है) अनंत शेषनाग और जलचरों में उनका का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ॥29॥ 
 
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में समय हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ॥30॥ 

श्लोक 31 — श्रीराम और गंगा का उल्लेख

मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों (जलीय जीवों) में मकर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ॥31॥ 

(यहां "झष" का अर्थ aquatic creatures/fish के व्यापक संदर्भ में लिया जाता है।)

अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ. मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ॥32॥

मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ. अक्षयकाल अर्थात्‌ काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ॥33॥ 

(मैं सभी अक्षरों में अकार और समासों में द्वंद्व समास हूँ। मैं अविनाशी काल और सभी दिशाओं में मुख वाले धाता अर्थात् धारण-पोषण करने वाला हूँ।)

मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ॥34॥ 

(मैं सबका हरण करने वाली मृत्यु और भविष्य में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं का उद्भव हूँ। स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ। कीर्ति आदि ये सात देवताओं की स्त्रियाँ और स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी प्रसिद्ध हैं, इसलिए दोनों प्रकार से ही भगवान की विभूतियाँ हैं)

मैं सामवेद के गीतों (गायन करने योग्य श्रुतियों) में बृहत्साम, छंदों में गायत्री छंद हूँ, तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ॥35॥
 
मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ. मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ॥36॥ 

(मैं छल करने वालों में जुआ, तेजस्वियों में तेज, विजय चाहने वालों में विजय, दृढ़ निश्चय करने वालों में निश्चय और सात्त्विक लोगों में सात्त्विक भाव हूँ।)

वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात्‌ मैं स्वयं तुम्हारा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में उशना अर्थात् शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ॥37॥

यहाँ "वासुदेव" से श्रीकृष्ण और "धनंजय" से अर्जुन का संकेत है।

मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ॥38॥ 

(मैं अनुशासन करने वालों का दंड, विजय की इच्छा रखने वालों की नीति, गोपनीय विषयों में मौन और ज्ञानियों का ज्ञान हूँ।)
 
और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो॥39॥ 

(हे अर्जुन! सभी प्राणियों की उत्पत्ति का बीज भी मैं ही हूँ। ऐसा कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है जो मुझसे रहित हो।)

हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तुम्हारे लिए एकदेश से अर्थात्‌ संक्षेप में कहा है॥40॥ 

श्लोक 41 — जीवन के लिए महत्वपूर्ण संदेश

जो जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तुम मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जानो॥41॥ 

(संसार में जो भी वस्तु विशेष रूप से शक्तिशाली, सुंदर, तेजस्वी या ऐश्वर्ययुक्त दिखाई देती है, उसे मेरे तेज के अंश से उत्पन्न समझो।)
इस श्लोक को जीवन में सकारात्मक दृष्टि विकसित करने के रूप में समझा जा सकता है। किसी व्यक्ति में प्रतिभा, किसी प्रकृति-दृश्य में सुंदरता या किसी कार्य में असाधारण क्षमता दिखाई दे तो उसे ईश्वर की सृष्टि में मौजूद विशेषता के रूप में देखकर प्रेरणा ली जा सकती है।

श्लोक 42 — अध्याय का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक

हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रायोजन है. मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ॥42॥

(हे अर्जुन! इन अनेक विभूतियों को जानने की आवश्यकता ही क्या है? मैं अपनी योगशक्ति के केवल एक अंश से ही इस संपूर्ण जगत को धारण करके स्थित हूँ।)

यह श्लोक भगवान की अनंत सत्ता और योगशक्ति की व्यापकता को व्यक्त करता है। "एक अंश" को यहाँ आध्यात्मिक संदर्भ में समझना चाहिए; इसका उद्देश्य भगवान की विभूतियों की अनंतता को बताना है।

भगवद्गीता अध्याय 10 का सार

भगवद्गीता का दसवाँ अध्याय विभूति योग भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य महिमा और व्यापक सत्ता को समझने का मार्ग प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों और योगशक्ति का परिचय देते हैं। वे बताते हैं कि संसार में दिखाई देने वाली श्रेष्ठता, शक्ति, ज्ञान, तेज, सौंदर्य और वैभव उनकी ही दिव्य शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं।

इसमें श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे सभी प्राणियों के आदि, मध्य और अंत हैं तथा संसार में दिखाई देने वाली अनेक श्रेष्ठ शक्तियाँ उनकी विभूतियों के रूप में देखी जा सकती हैं।

वे अर्जुन को अपनी प्रमुख विभूतियों के रूप में सूर्य, चंद्रमा, इंद्र, मन, शंकर, हिमालय, पीपल, नारद, सिंह, गरुड़, श्रीराम, गंगा, अध्यात्मविद्या, समय, ज्ञान और अनेक अन्य उदाहरण बताते हैं।

अध्याय का अंतिम संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि "भगवान की विभूतियों की कोई सीमा नहीं है। संसार में जो कुछ भी असाधारण रूप से तेजस्वी, शक्तिशाली, सुंदर या श्रेष्ठ है, उसमें उनकी दिव्य शक्ति की झलक देखी जा सकती है।"

इस प्रकार विभूति योग हमें संसार को केवल भौतिक दृष्टि से देखने के बजाय उसमें मौजूद श्रेष्ठता और व्यापकता के माध्यम से ईश्वर का स्मरण करने की दृष्टि देता है।

इस अध्याय का उद्देश्य केवल अलग-अलग वस्तुओं को भगवान से जोड़ना नहीं है, बल्कि हर श्रेष्ठ और प्रेरणादायक वस्तु के माध्यम से परम सत्ता का स्मरण करना है।

अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि उनकी विभूतियों का कोई अंत नहीं है। वे केवल कुछ प्रमुख उदाहरण बताते हैं और कहते हैं कि वे अपनी योगशक्ति के एक अंश से ही संपूर्ण जगत को धारण किए हुए हैं।


भगवद्गीता अध्याय 10 की प्रमुख विभूतियाँ

क्षेत्र भगवान श्रीकृष्ण की विभूति
आदित्य विष्णु
ज्योतियों में सूर्य
मरुतों में मरीचि
नक्षत्रों में चंद्रमा
वेदों में सामवेद
देवताओं में इंद्र
इंद्रियों में मन
रुद्रों में शंकर
यक्ष-राक्षसों में कुबेर
वसुओं में अग्नि
पर्वतों में मेरु
पुरोहितों में बृहस्पति
सेनापतियों में स्कंद
जलाशयों में समुद्र
महर्षियों में भृगु
यज्ञों में जपयज्ञ
स्थावर वस्तुओं में हिमालय
वृक्षों में अश्वत्थ/पीपल
देवर्षियों में नारद
घोड़ों में उच्चैःश्रवा
हाथियों में ऐरावत
शस्त्रों में वज्र
गौओं में कामधेनु
सर्पों में वासुकि
नागों में अनंत
दैत्यों में प्रह्लाद
पशुओं में सिंह
पक्षियों में गरुड़
पवित्र करने वालों में वायु
शस्त्रधारियों में श्रीराम
जलीय जीवों में मकर
नदियों में जाह्नवी/गंगा
विद्याओं में अध्यात्मविद्या
अक्षरों में अकार
काल में अक्षय काल
महीनों में मार्गशीर्ष
ऋतुओं में वसंत
वृष्णिवंशियों में वासुदेव
पांडवों में अर्जुन
मुनियों में व्यास
कवियों में उशना
ज्ञानियों में ज्ञान

भगवद्गीता अध्याय 10 के सबसे प्रसिद्ध और जीवनोपयोगी श्लोक

1. “मैं ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ” — श्लोक 8

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८॥
सरल हिंदी अर्थ
मैं ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। इस सत्य को समझकर ज्ञानी और श्रद्धावान भक्त प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति करते हैं।

जीवन में इसका संदेश: अपनी उपलब्धियों पर अहंकार करने के बजाय कृतज्ञता और विनम्रता रखना।

यह श्लोक हमें अपने जीवन में अहंकार कम करने, कृतज्ञता रखने और अपने कार्यों के पीछे मौजूद व्यापक शक्ति को समझने की प्रेरणा देता है। मनुष्य अपनी सफलता को केवल अपनी उपलब्धि मानने के बजाय परिवार, समाज, प्रकृति, ज्ञान और ईश्वर के योगदान को भी स्वीकार करे। यह दृष्टिकोण विनम्रता और संतुलन विकसित कर सकता है।

2. “मैं बुद्धियोग प्रदान करता हूँ” — श्लोक 10

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१०॥
सरल अर्थ
जो भक्त प्रेमपूर्वक निरंतर मुझसे जुड़े रहते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त कर सकते हैं।

जीवनोपयोगी संदेश: निरंतरता, समर्पण और सही उद्देश्य व्यक्ति को सही दिशा पहचानने में सहायता करते हैं।

यह श्लोक केवल धार्मिक संदर्भ में ही नहीं, बल्कि जीवन में भी महत्वपूर्ण है। जब व्यक्ति किसी अच्छे लक्ष्य के प्रति निरंतर, ईमानदारी और समर्पण के साथ काम करता है, तो उसके भीतर सही दिशा पहचानने की क्षमता विकसित होती है।

3. ज्ञान का प्रकाश — श्लोक 11

तेषामेवानुकम्पार्थम्... ज्ञानदीपेन भास्वता॥
इसमें ज्ञान के दीपक द्वारा अज्ञान का नाश करने की बात है।

4. “जो कुछ श्रेष्ठ है, वह मेरी विभूति है” — श्लोक 41

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१॥

संदेश: संसार में मौजूद श्रेष्ठता और प्रतिभा को ईश्वर की सृष्टि की विशेष अभिव्यक्ति के रूप में देखकर उससे प्रेरणा लें।

5. “एक अंश से पूरा जगत” — श्लोक 42

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥४२॥

संदेश: भगवान की सत्ता और शक्ति हमारी कल्पना से कहीं व्यापक है।


भगवद्गीता अध्याय 10 का मुख्य संदेश

विभूति योग का उद्देश्य केवल भगवान की विभूतियों की सूची बताना नहीं है। इसका गहरा संदेश यह है कि संसार में दिखाई देने वाली श्रेष्ठता, ज्ञान, शक्ति, सौंदर्य, तेज और वैभव के माध्यम से भी परम सत्ता का स्मरण किया जा सकता है।

जब मनुष्य प्रकृति की सुंदरता, किसी व्यक्ति की प्रतिभा, ज्ञान की शक्ति या किसी महान कार्य को देखकर उसके पीछे मौजूद व्यापक सृष्टि-शक्ति को पहचानता है, तो उसके भीतर आश्चर्य, कृतज्ञता और विनम्रता की भावना विकसित हो सकती है।

अध्याय 10 में श्रीकृष्ण द्वारा बताई गई विभूतियाँ इसी व्यापक दृष्टि को विकसित करने का माध्यम हैं।


अध्याय 10 से हमें जीवन में क्या सीख मिलती है?

1. सफलता में अहंकार नहीं, कृतज्ञता रखें

जो कुछ हमारे पास है, उसमें अनेक लोगों, परिस्थितियों और प्रकृति का योगदान होता है।

2. श्रेष्ठता को पहचानें

किसी व्यक्ति की प्रतिभा या किसी कार्य की उत्कृष्टता से ईर्ष्या करने के बजाय उससे प्रेरणा लेना चाहिए।

3. निरंतरता महत्वपूर्ण है

श्रीकृष्ण भक्त के निरंतर प्रयास और समर्पण पर जोर देते हैं।

4. ज्ञान अज्ञान का प्रकाश है

अध्याय 10 का श्लोक 11 ज्ञान को अंधकार दूर करने वाले प्रकाश के रूप में प्रस्तुत करता है।

5. प्रकृति के प्रति सम्मान रखें

सूर्य, चंद्रमा, हिमालय, गंगा और पीपल जैसे उदाहरण बताते हैं कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में प्रकृति के विभिन्न रूपों को भी गहरे आध्यात्मिक संदर्भ में देखा गया है।

6. अपनी सीमित दृष्टि से आगे देखें

अध्याय के अंतिम श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनकी विशाल सत्ता को समझने के लिए केवल कुछ उदाहरण ही पर्याप्त हैं; उनकी विभूतियों का विस्तार अनंत है।


भगवद्गीता अध्याय 10 से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

1. भगवद्गीता अध्याय 10 का नाम क्या है?

भगवद्गीता के दसवें अध्याय का नाम विभूति योग है।

2. भगवद्गीता अध्याय 10 में कितने श्लोक हैं?

अध्याय 10 में कुल 42 श्लोक हैं।

3. विभूति योग क्या है?

विभूति योग भगवान की दिव्य शक्तियों, महिमा और संसार में दिखाई देने वाली उनकी प्रमुख अभिव्यक्तियों को समझने का योग है।

4. भगवद्गीता अध्याय 10 का सबसे प्रसिद्ध श्लोक कौन-सा है?

श्लोक 8 विशेष रूप से प्रसिद्ध है:

“अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते...”

इसमें श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त जगत की उत्पत्ति का कारण बताते हैं।

5. गीता अध्याय 10 में पीपल का उल्लेख कहाँ है?

श्लोक 26 में श्रीकृष्ण कहते हैं:

“अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां...”

अर्थात् वे सभी वृक्षों में अश्वत्थ यानी पीपल हैं।

6. गीता अध्याय 10 में श्रीराम का उल्लेख कहाँ है?

श्लोक 31 में कहा गया है:

“रामः शस्त्रभृतामहम्।”

अर्थात् शस्त्रधारियों में श्रीराम भगवान की विभूति हैं।

7. गीता अध्याय 10 का मुख्य संदेश क्या है?

इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि संसार में दिखाई देने वाली श्रेष्ठता, ज्ञान, शक्ति, तेज और वैभव को भगवान की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

8. गीता अध्याय 10 में भगवान ने अपनी कितनी विभूतियाँ बताई हैं?

भगवान ने अपनी कुछ प्रमुख विभूतियों का वर्णन किया है। वे स्वयं स्पष्ट करते हैं कि उनकी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है।

9. अध्याय 10 के अंतिम श्लोक में भगवान क्या कहते हैं?

अंतिम श्लोक 42 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से पूरे जगत को धारण करके स्थित हैं।


निष्कर्ष

भगवद्गीता का अध्याय 10—विभूति योग हमें भगवान की महिमा को केवल किसी एक रूप या स्थान तक सीमित न करके संसार की विभिन्न श्रेष्ठ अभिव्यक्तियों में देखने की दृष्टि देता है। सूर्य का प्रकाश, हिमालय की विशालता, गंगा की पवित्रता, पीपल का महत्व, श्रीराम का आदर्श और ज्ञान की शक्ति—इन सभी उदाहरणों के माध्यम से श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी व्यापक सत्ता समझाते हैं।

अंततः यह अध्याय हमें याद दिलाता है कि जो कुछ भी संसार में श्रेष्ठ, तेजस्वी, शक्तिशाली और प्रेरणादायक है, उसमें परम सत्ता की झलक देखी जा सकती है। यही दृष्टि मनुष्य में कृतज्ञता, विनम्रता, भक्ति और व्यापक सोच विकसित करने में सहायक हो सकती है।

भगवद्गीता के अन्य अध्याय भी पढ़ें

अगर आप पूरी भगवद्गीता को अध्याय-दर-अध्याय सरल हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे भगवद्गीता के 18 अध्यायों के संपूर्ण परिचय से शुरुआत कर सकते हैं।

एक जगह से सभी अध्याय पढ़ने के लिए:

  1. अध्याय 1 — अर्जुनविषाद योग
  2. अध्याय 2 — सांख्य योग
  3. अध्याय 3 — कर्म योग
  4. अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यास योग
  5. अध्याय 5 — सांख्य योग और कर्म योग
  6. अध्याय 6 — आत्मसंयम योग
  7. अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञान योग
  8. अध्याय 8 — अक्षरब्रह्म योग
  9. अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्य योग
  10. अध्याय 10 — विभूति योग
  11. अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शन योग
  12. अध्याय 12 — भक्तियोग
  13. अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग
  14. अध्याय 14 — गुणत्रयविभाग योग
  15. अध्याय 15 — पुरुषोत्तम योग
  16. अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभाग योग
  17. अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभाग योग
  18. अध्याय 18 — मोक्षसंन्यास योग

संदर्भ और स्रोत

इस लेख में भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोक, उनकी हिंदी व्याख्या और गीता-अध्ययन के संदर्भ में गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित स्वामी रामसुखदास जी की श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। 

गीता प्रेस के आधिकारिक विवरण के अनुसार इसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अर्थ और विस्तृत टीका दी गई है। 
इसके अलावा गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित गीता तत्त्वविवेचनी में भी मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी व्याख्या उपलब्ध है। 

About the Author

Sonam Agarwal

LLB | Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर research-based articles लिखती हैं। अब तक वे 500 से अधिक लेख लिख चुकी हैं।

सनातन धर्म और भगवद्गीता से संबंधित लेखों में उनका विशेष ध्यान मूल ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर जानकारी को सरल और सामान्य पाठकों के लिए समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने पर रहता है।

उनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को बिना अनावश्यक जटिलता के प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक उनके मूल विचारों को सही संदर्भ में समझ सकें।

Author at Prinsli.com



Tags: भगवद्गीता अध्याय 10 के श्लोक, गीता अध्याय 10, Bhagavad Gita Chapter 10


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