IPC Section 88 and 89 in Hindi | भारतीय दंड संहिता की धारा 88 और 89: किसी व्यक्ति के फायदे के लिए दी गई सम्मति या किया गया कार्य
IPC Section 88 and 89 in Hindi
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दूसरे के फायदे के लिए उसकी सहमति से किया गया कार्य अपराध नहीं है, बशर्ते कर्ता का आशय मृत्यु कारित करने का न हो और कार्य सद्भावनापूर्वक किया गया हो
IPC की धारा 88 किसी डॉक्टर को आपराधिक दायित्व से सुरक्षा देती है. इस धारा में उदाहरण भी एक डॉक्टर का ही दिया गया है कि अगर कोई डॉक्टर किसी मरीज की सहमति से उसी के फायदे के लिए उसका ऑपरेशन करता है...और ऑपरेशन असफल हो जाता है, जिससे मरीज की मौत हो जाती है, तो अगर डॉक्टर का आशय मरीज की मृत्यु कारित करने का नहीं था, या डॉक्टर ने अपना काम पूरी सावधानी से किया था, तो डॉक्टर अपराधी नहीं माना जाएगा, फिर भले हो ऑपरेशन से पहले डॉक्टर यह जानता हो कि ऑपरेशन के दौरान मरीज की मौत भी हो सकती है.IPC की धारा 88 (IPC Section 88 in Hindi)
किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्मति से सद्भावपूर्वक किया गया कार्य, जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है-
"वह कोई बात, जो मृत्यु कारित करने के आशय से न की गई हो, किसी ऐसी अपहानि के कारण अपराध नहीं है, जो उस बात से किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके फायदे के लिए वह बात सद्भावपूर्वक की जाए और जिसने उस अपहानि को सहने या उस अपहानि की जोखिम उठाने के लिए, चाहे अभिव्यक्त या चाहे विवक्षित सम्मति दे दी हो, कारित हो या कारित करने का कर्ता का आशय हो या कारित होने की संभाव्यता कर्ता को ज्ञात है."
धारा 88 के अनुसार, एक कर्ता उस कार्य के लिए दंडित नहीं किया जाएगा, जिसके लिए वह जानता है कि ऐसा कार्य करने से कोई बड़ी क्षति या मृत्यु भी हो सकती है, बशर्ते-
(1) वह कार्य क्षतिग्रस्त व्यक्ति के फायदे के उद्देश्य से किया गया है,
(2) वह कार्य उसी व्यक्ति की सहमति से किया गया है कि वह होने वाली हानि को सहन करेगा (यानी एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावनापूर्वक कोई कार्य करता है, तो उसे वह कार्य बलपूर्वक करने का अधिकार नहीं मिल जाता)
(3) सहमति अभिव्यक्ति या विवक्षित हो सकती है,
(4) कार्य सद्भावपूर्वक किया गया है,
(5) कार्य बिना मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया हो (फिर भले ही वह जानता हो कि यह कार्य करने से व्यक्ति की मौत भी हो सकती है).
कविराज बनाम स्टेट (1887) के मामले में कविराज ने बवासीर के एक मरीज का ऑपरेशन एक सामान्य चाकू से किया, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव (Bleeding) के कारण मरीज की मौत हो गई. इसमें न्यायालय ने कहा कि कविराज धारा 88 के तहत बचाव का हकदार नहीं है, क्योंकि उसने सद्भावनापूर्वक काम नहीं किया.
वहीं, ऐसे व्यक्ति जो मेडिकल प्रैक्टिशनर्स के रूप में योग्यता प्राप्त नहीं हैं, उन्हें भी धारा 88 के तहत कोई बचा नहीं मिलेगा.
इस धारा के तहत अभियुक्त को बचाव तभी मिल सकता है, जब कार्य सद्भावनापूर्वक किया गया हो, और कार्य किसी तरह की क्षति या मृत्यु कारित करने के आशय से न किया गया हो. यानी अगर अभियुक्ति का कार्य किसी भी रूप में निंदनीय नहीं है, तो वह किसी कार्य के लिए जिसमें मृत्यु भी शामिल है, दोषी नहीं है, फिर भले ही उसे पहले से पता हो कि उसके इस कार्य से मृत्यु भी हो सकती है.
इस तरह देखा जा सकता है कि कानून उस व्यक्ति के साथ कितनी उदारता दिखाता है, जो दूसरे के फायदे के लिए काम करता है.
IPC की धारा 89 (IPC Section 89 in Hindi)
संरक्षक द्वारा या उसकी सहमति से शिशु उन्मुक्त व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक किया गया कार्य-
"वह कोई बात, जो 12 साल से कम उम्र के या विकृतचित्त व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक उसके संरक्षक के, या विधिपूर्ण भारसाधक किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा, या की अभिव्यक्ति या विवक्षित सम्मति से की जाए, किसी ऐसी अपहानि के कारण अपराध नहीं है, जो उस बात से उस व्यक्ति को कारित हो, या कारित करने का कर्ता का आशय हो, या कारित करने की संभाव्यता कर्ता को ज्ञात हो : लेकिन,
(1) इस अपवाद का विस्तार साशय मृत्यु कारित करने या मृत्यु कारित करने का प्रयत्न करने पर नहीं होगा,
(2) इस अपराध का विस्तार मृत्यु या घोर उपहति के निवारण के, या किसी घोर बीमारी या किसी अंग को काट देने के प्रयोजन से अलग किसी प्रयोजन के लिए किसी ऐसी बात करने पर ना होगा, जिसे करने वाला व्यक्ति जानता हो कि उससे मृत्यु कारित होना संभाव्य है.
(3) इस अपवाद का विस्तार स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने या घोर उपहति कारित करने का प्रयत्न करने पर ना होगा, जब तक कि मृत्यु या घोर उपहति के निवारण के, या किसी घोर बीमारी या अंग काटने की प्रयोजन से न की गई हो,
(4) इस अपवाद का विस्तार किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण पर न होगा, जिस अपराध के किए जाने पर इसका विस्तार नहीं है".
धारा 89 के तहत, किसी अवयस्क या पागल व्यक्ति के अभिभावक या संरक्षक की सहमति से किया गया कार्य अपराध नहीं है, बशर्ते वह सहमति और कार्य अवयस्क या पागल व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावनापूर्वक (पूरी सावधानी से) किया गया हो, तो ऐसे में भले ही अवयस्क या पागल व्यक्ति को कोई क्षति पहुंचे, तो भी वह अपराध नहीं माना जाएगा.
उदाहरण-
A का बच्चा किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है और डॉक्टर ने उसके लिए ऑपरेशन जरूरी बताया है. लेकिन डॉक्टर ने यह भी बता दिया है कि ऑपरेशन के दौरान बच्चे की मौत भी हो सकती है. ऐसे में अगर A डॉक्टर को अपने बच्चे के ऑपरेशन की सहमति दे देता है, इस आशय से कि शायद बच्चा बच जाए तो भले ही ऑपरेशन के दौरान बच्चे की मौत हो जाती है, तो भी A ने कोई अपराध नहीं किया, क्योकि उसका उद्देश्य अपने बच्चे को बीमारी से बचाना था.
यही बात किसी पागल व्यक्ति के अभिभावक या विधिक संरक्षक पर भी लागू होगी. इस तरह, धारा 89 के तहत बचाव का अधिकार पाने के लिए जरूरी है कि-
(1) कार्य 12 साल से कम उम्र के बच्चे या विकृतचित्त वाले व्यक्ति के फायदे के लिए किया गया हो,
(2) कार्य सद्भावपूर्वक किया गया हो,
(3) कार्य अभिभावक की तरफ से या अभिभावक की सहमति से, या उस व्यक्ति पर विधिक अधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया हो,
(4) सहमति अभिव्यक्त या विवक्षित हो सकती है.
इसी के साथ, धारा 89 में 4 अपवाद भी बताए गए हैं, यानी जिन परिस्थितियों में ये धारा लागू नहीं होगी. इन अपवादों में से किसी के भी तहत कोई कार्य नहीं होना चाहिए, नहीं तो इस धारा का बचाव नहीं मिलेगा.
अगर किसी अभिभावक या किसी विधिक संरक्षक की तरफ से अपने अवयस्क बच्चे या पागल व्यक्ति की साशय मृत्यु कारित करने या कोई गंभीर चोट पहुंचाने के मकसद से सहमति दी गई हो, तो इस धारा के तहत उसे कोई बचाव नहीं मिलेगा.
जैसे- अगर कोई संरक्षक लौकिक फायदे के लिए किसी देवता को अपने बच्चे की बलि चढ़ा देता है, तो वह धारा 89 के तहत बचाव का अधिकारी नहीं होगा.
महत्वपूर्ण कानूनी अपडेट (BNS 2023)
1 जुलाई 2024 से भारत में नया कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू हो चुका है, जिसने 1860 की भारतीय दंड संहिता (IPC) का स्थान ले लिया है।
प्रतियोगी परीक्षाओं (Judiciary, CLAT, UPSC), अकादमिक अध्ययन और 1 जुलाई 2024 से पहले के मामलों के लिए IPC की धारा 88 व 89 समझना आज भी जरूरी है, लेकिन नए कानून के तहत ये प्रावधान निम्नलिखित धाराओं में दिए गए हैं:
IPC Section 88 (बिना साशय मृत्यु कारित किए सम्मति से व्यक्ति के फायदे के लिए किया गया कार्य) → BNS Section 26
डॉक्टरों/सर्जनों का संरक्षण: BNS की धारा 26 (पुरानी IPC 88) मुख्य रूप से डॉक्टरों और सर्जनों को सुरक्षा देती है। यदि कोई डॉक्टर मरीज की जान बचाने के लिए सद्भावपूर्वक (Good faith) और मरीज की सहमति से कोई जटिल ऑपरेशन करता है, और उसमें मरीज की मृत्यु हो जाती है, तो वह अपराध नहीं माना जाता।
IPC Section 89 (संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से बच्चे या विकृतचित्त व्यक्ति के फायदे के लिए किया गया कार्य)→ BNS Section 27
शब्दावली में बदलाव (BNS धारा 27): पुरानी IPC की धारा 89 में "Insane person" (विकृतचित्त व्यक्ति) शब्द का प्रयोग था, जिसे नए कानून BNS की धारा 27 में बदलकर अधिक संवेदनशील और आधुनिक शब्द "Person of unsound mind" कर दिया गया है। इसमें 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के फायदे के लिए उनके गार्जियन (संरक्षक) की सहमति से किए गए कार्यों को संरक्षण प्राप्त है।
सद्भाव (Good Faith) शब्द की परिभाषा में पुराने कानून (IPC) की तुलना में नए कानून (BNS) में क्या बदलाव हुआ है।
सद्भाव (Good Faith) शब्द की मूल कानूनी परिभाषा और अर्थ में पुराने कानून (IPC) की तुलना में नए कानून (BNS) में कोई वैचारिक बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन इसकी धारा (Section) और संरचना में बदलाव किया गया है।
दोनों कानूनों में इस शब्द की तकनीकी परिभाषा और अंतर को नीचे स्पष्ट किया गया है:
1. धारा (Section) का स्थान बदला
पुराना कानून (IPC, 1860): 'सद्भावपूर्वक' को IPC की धारा 52 में परिभाषित किया गया था.
नया कानून (BNS, 2023): अब इसे BNS की धारा 2 की उपधारा (11) यानी Section 2(11) के अंतर्गत एक परिभाषा (Definition) के रूप में शामिल किया गया है. BNS ने सभी मुख्य कानूनी परिभाषाओं को एक ही स्थान (धारा 2) में समाहित कर दिया है.
2. परिभाषा का पाठ (Text) बिल्कुल समान है
IPC और BNS दोनों ही यह नकारात्मक परिभाषा (Negative Definition) देते हैं:
"कोई बात सद्भावपूर्वक की गई या विश्वास की गई नहीं कही जाती है जो सम्यक सतर्कता और ध्यान (Due care and attention) के बिना की गई या विश्वास की गई हो।"
3. कानूनी प्रभाव और कसौटी (Legal Standard)
भले ही शब्द नहीं बदले, लेकिन अदालतों और परीक्षाओं के लिए इसकी व्याख्या समान रहेगी:
उचित सावधानी अनिवार्य: केवल 'नेक इरादा' (Honest intention) होना ही काफी नहीं है.
यदि किसी व्यक्ति ने लापरवाही दिखाई है, तो वह 'सद्भाव' का दावा नहीं कर सकता.
जनरल क्लॉज एक्ट से अंतर:
'General Clauses Act, 1897' में सद्भाव का अर्थ केवल ईमानदारी (Honesty) से माना गया है चाहे उसमें लापरवाही हुई हो।
लेकिन BNS 2(11) / IPC 52 के आपराधिक कानून में ईमानदारी + उचित सतर्कता (Due care) दोनों का होना आवश्यक है.
मुख्य बिंदु (Key Takeaway):
1 जुलाई 2024 के बाद की सभी घटनाओं पर मुकदमे और दर्ज शिकायतें अनिवार्य रूप से BNS की धाराओं के तहत ही होंगी।

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