भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 96 और 97 : प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार

IPC 96 and 97 in Hindi | भारतीय दंड संहिता की धारा 96 और 97: प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 96 और 97 : प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार IPC Section 96 and 97 in Hindi




IPC Section 96 and 97 in Hindi 

इस लेख में हम जानेंगे कि भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) की धारा 96 और 97 क्या है (IPC Section 96 and 97 in Hindi), और नए कानून BNS के तहत इनमें क्या बदलाव हुए हैं.

भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) के अध्याय 4 में धारा 76 से लेकर धारा 106 तक उन ‘सामान्य अपवादों (General Exceptions)’ के बारे में बताया गया है, जो किए गए अपराध को भी क्षमा करने योग्य बनाते हैं, यानी इन धाराओं में उन परिस्थितियों या हालात के बारे में बताया गया है, जिनके मौजूद होने पर कोई आपराधिक कार्य होते हुए भी वह अपराध नहीं माना जाएगा, या उस आपराधिक कार्य के लिए क्षमा कर दिया जाएगा. हम इन धाराओं का अध्ययन अलग-अलग भागों में करेंगे-

भारतीय दंड संहिता की धारा 96 से 106 तक प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकारों (Right of Private Defense) के बारे में बताया गया है.

IPC की धारा 96 (IPC 96 in Hindi)

प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई बातें- "वह कोई बात अपराध नहीं है, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की जाती है". 
 
धारा 96 प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय को बताती है. यह घोषणा करती है कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई कोई भी बात अपराध नहीं है. इस संबंध में सर हेनरी मेन ने चार सिद्धांत दिए हैं- 

(1) समाज या राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के शरीर और संपत्ति की रक्षा करे, 

(2) जहां समाज की सहायता प्राप्त हो सकती है, वहां उसे जरूर प्राप्त करनी चाहिए. 

(3) लेकिन जहां समाज की सहायता प्राप्त नहीं हो सकती, वहां आत्मरक्षा के लिए जिन साधनों का इस्तेमाल किया जाएगा, वे सम्मानजनक माने जाएंगे. 

(4) प्राइवेट प्रतिरक्षा में उतनी ही हिंसा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जितनी हमले के निवारण के लिए जरूरी है. 
 
प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की दो महत्वपूर्ण सीमाएं हैं. पहला ये कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार किसी भी ऐसे कार्य को न्यायोचित नहीं ठहरा सकता, जो निश्चित रूप से प्रतिरक्षा नहीं है, बल्कि एक अपराध ही है. दूसरा ये कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल उस समय नहीं किया जा सकता, जब इसकी मांग करने वाला खुद ही आक्रमण करता हो. 
  
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम पेप्सू के मामले में कहा गया कि जो व्यक्ति खुद ही आक्रामक है और जो खुद ही अपने ऊपर आक्रमण को आमंत्रित करता है, अपने आक्रमण या प्रहार के कारण वह व्यक्ति प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने का हकदार नहीं है.

IPC की धारा 97 (IPC 97 in Hindi)

इस धारा के तहत, IPC की धारा 99 में बताए गए निर्बंधनों के अधीन रहते हुए हर एक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने या किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर, या अपनी या किसी दूसरे व्यक्ति की संपत्ति (चाहे चल हो या अचल) की रक्षा करे. 
  
शरीर और संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार- 
"धारा 99 में अंतर्विष्ट निर्बंधनों के अध्यधीन हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह- 

(1) मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के खिलाफ अपने शरीर और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा करे, 

(2) किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाषा में आने वाला अपराध है, या जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार करने का प्रयत्न है, अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चाहे जंगम (चल संपत्ति) या चाहे स्थावर संपत्ति की प्रतिरक्षा करे." 
 
धारा 97 यह बताती है कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल किस सीमा तक किया जा सकता है. धारा 97 और 99 दोनों मिलकर प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का सिद्धांत पेश करती हैं. धारा 97 के तहत प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार अपने ही शरीर और संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल दूसरे व्यक्ति के शरीर और संपत्ति की प्रतिरक्षा के लिए भी किया जा सकता है. 
 
भारत में हर एक व्यक्ति को अपने शरीर और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की, मानव शरीर को प्रभावित करने वाले किसी भी अपराध से या चल और अचल संपत्ति, चाहे अपनी हो या किसी अन्य की...चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार या इनमें से किसी एक को कारित करने के प्रयास से प्रतिरक्षित (बचाव) करने का अधिकार है.

महत्वपूर्ण कानूनी अपडेट (BNS 2023)

लागू होने की तिथि और प्रतिस्थापन

1 जुलाई 2024 से भारत में नया कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू हो चुका है, जिसने 1860 की भारतीय दंड संहिता (IPC) को प्रतिस्थापित कर दिया है।

IPC की प्रासंगिकता

पुराने पेंडिंग मुकदमों, कानूनी रिसर्च और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे Judiciary, Civil Services और Police Exams) के शैक्षणिक अध्ययन के लिए IPC 96 व 97 की इन धाराओं की जानकारी होना अनिवार्य है।

धाराओं का नया नंबर

नए कानून में यही प्रावधान निम्न धाराओं में दिए गए हैं:

  • IPC Section 96 ➡️ BNS Section 34
  • IPC Section 97 ➡️ BNS Section 35

इन धाराओं के मूल कानूनी प्रावधान (सरल शब्दों में)

1. BNS की धारा 34 (जो पहले IPC की धारा 96 थी): निजी प्रतिरक्षा में की गई बातें

मूल नियम: यह धारा एक बुनियादी सिद्धांत स्थापित करती है कि "कोई भी बात अपराध नहीं है, जो निजी प्रतिरक्षा (आत्मरक्षा) के अधिकार के प्रयोग में की जाती है।"

यह धारा सही तरीके से स्थापित करती है कि आत्मरक्षा (प्राइवेट प्रतिरक्षा) में किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं माना जाता।

अर्थ: यदि आपने खुद को या किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर नुकसान से बचाने के लिए कानून के दायरे में रहकर कोई कदम उठाया है, तो कानून उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखेगा.

2. BNS की धारा 35 (जो पहले IPC की धारा 97 थी): शरीर और संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार:

यह धारा विस्तार से बताती है कि हर व्यक्ति को किन दो चीजों की रक्षा करने का कानूनी अधिकार प्राप्त है:

(a) शरीर की रक्षा: 

स्वयं के शरीर की और किसी भी अन्य व्यक्ति के शरीर की रक्षा करने का अधिकार (उन अपराधों के विरुद्ध जो मानव शरीर पर प्रभाव डालते हैं)।

(b) संपत्ति की रक्षा: 

अपनी खुद की या किसी अन्य व्यक्ति की चल-अचल संपत्ति की रक्षा करने का अधिकार (चोरी, लूट, अनिष्ट/मिस्चिफ, या आपराधिक अतिचार/क्रिमिनल ट्रेसपास जैसे अपराधों या उनके प्रयास के विरुद्ध)।

महत्वपूर्ण नोट: BNS की धारा 35 का यह अधिकार असीमित नहीं है, यह BNS की धारा 37 (जो पहले IPC 99 थी) में दी गई सीमाओं और प्रतिबंधों के अधीन काम करता है।

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Sonam Agarwal

LLB | Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर 1000 से अधिक research-based articles लिख चुकी हैं।

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