IPC 101 and 102 in Hindi| भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 101 और 102 : शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार
IPC Section 101 and 102 in Hindi
IPC की धारा 101 (IPC 101 in Hindi)
कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न ने कोई अपहानि कारित करने तक का होता है-
"अगर अपराधी पूर्वगामी अंतिम धारा (धारा 100) में दी गईं भांतियों (प्रकारों) में से किसी भांति का नहीं है, तो शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार हमलावर की मृत्यु स्वेच्छया कारित करने तक का नहीं होता, लेकिन इस अधिकार का विस्तार धारा 99 में दिए गए निर्बंधनों के अध्यधीन हमलावर की मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का होता है."
धारा 101 के तहत, प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए हमलावर की मृत्यु कारित को छोड़कर कोई अन्य क्षति या अपहानि कारित की जा सकती है, अगर मामला धारा 100 के तहत नहीं आता है.
यानी धारा 100 के तहत, हमलावर की मृत्यु कारित करने के लिए जिन परिस्थितियों या युक्तियुक्त आशंकाओं का जिक्र किया गया है, अगर उनमें से कोई भी परिस्थिति या युक्तियुक्त आशंका नहीं बन रही है, तो ऐसे में हमलावर की मृत्यु कारित नहीं की जा सकती. अपने बचाव में उसे कोई अन्य क्षति पहुंचाई जा सकती है. धारा 100 के तहत, शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार में हमलावर की मृत्यु कारित तब की जा सकती है, जब-
(1) जब ऐसा हमला हो जिसके द्वारा मृत्यु की आशंका हो,
(2) जब ऐसा हमला हो जिसके द्वारा किसी घोर उपहति या किसी गंभीर चोट की आशंका हो (धारा 320),
(3) बलात्संग के आशय से किया गया हमला (धारा 375),
(4) प्रकृति विरुद्ध काम पिपासा तृप्त करने के आशय से किया गया हमला या कार्य (धारा 377),
(5) अपहरण (धारा 362) या व्यपहरण (धारा 359) के आशय से किया गया हमला,
(6) सदोष परिरोध (निश्चित परिसीमा से बाहर जाने से रोकना) करने के आशय से किया गया हमला, जिससे पुलिस या प्रशासन की सहायता प्राप्त न की जा सके (धारा 340),
(7) ऐसा हमला, जिसमें अम्ल या एसिड फेंकने की युक्तियुक्त आशंका हो.
अगर प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अभियुक्त (Accused) ने हमलावर की मृत्यु कारित ना करते हुए उसे कोई और क्षति पहुंचाई है, तो उसे यह साबित करना होगा कि उसने धारा 99 के तहत सीमा का उल्लंघन नहीं किया है.
IPC की धारा 102 (IPC 102 in Hindi)
शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की शुरुआत और उस अधिकार का बना रहना-
"शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण प्रारंभ हो जाता है, जब अपराध करने के प्रयत्न या धमकी से शरीर के संकट की युक्तियुक्त आशंका पैदा होती है, चाहे वह अपराध न किया गया हो और वह अधिकार तब तक बना रहता है, जब तक शरीर के संकट की ऐसी आशंका बनी रहती है."
धारा 102 यह बताती है कि शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार कब शुरू होता है और कब तक बना रहता है. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी समय शुरू हो जाता है, जैसे ही शरीर के लिए खतरे की युक्तियुक्त (उचित) आशंका उत्पन्न होती है और यह अधिकार तब तक बना रहता है, जब तक ऐसे खतरे की आशंका बनी रहती है.
महत्वपूर्ण कानूनी अपडेट (BNS 2023):
1 जुलाई 2024 से भारत में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू हो चुकी है, जिसने 1860 की भारतीय दंड संहिता (IPC) का स्थान ले लिया है।
पुराने मामलों, प्रतियोगी परीक्षाओं और कानूनी शोध के लिए IPC की धाराएँ आज भी प्रासंगिक हैं।
नए कानून (BNS) के तहत शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा (Right of Private Defence of Body) के यही प्रावधान निम्न धाराओं में दिए गए हैं:
- IPC Section 101 ➡️ BNS Section 39 (मृत्यु से भिन्न अन्य अपहानि कारित करने का अधिकार)
यह धारा प्रावधान करती है कि यदि हमला ऊपर बताई गई गंभीर श्रेणियों (जैसे हत्या, गंभीर चोट, बलात्कार आदि के प्रयास) का नहीं है, तो आत्मरक्षा का अधिकार केवल मृत्यु से भिन्न कोई अन्य अपहानि (Harm other than death) कारित करने तक ही सीमित रहेगा.
- IPC Section 102 ➡️ BNS Section 40 (शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना)
यह धारा स्पष्ट करती है कि शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण प्रारंभ (Commence) हो जाता है जैसे ही संकट की उचित आशंका पैदा होती है, और यह अधिकार तब तक बना रहता है (Continue) जब तक वह आशंका बनी रहती है.

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