पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन: 'तरह तरह के सजे बराती' – अद्भुत शिव पार्वती विवाह गीत

पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन: 'तरह तरह के सजे बराती' – अद्भुत शिव पार्वती विवाह गीत 

शिव पार्वती विवाह गीत: 'तरह तरह के सजे बराती' | भावार्थ, कीर्तन और आध्यात्मिक संदेश

पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन: शिव पार्वती विवाह गीत — 'तरह तरह के सजे बराती' भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह पर आधारित एक पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन है। इस लोकभक्ति गीत में भोलेनाथ की अलौकिक अनोखी बारात, विचित्र बारातियों और शिव-पार्वती विवाह के आनंदमय प्रसंग का सुंदर वर्णन किया गया है। यह कीर्तन शिवभक्तों के बीच विशेष रूप से महाशिवरात्रि और विवाहोत्सव के अवसर पर गाया जाता है।

सनातन परंपरा में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के मिलन का उत्सव है। महाशिवरात्रि हो या कोई भी मांगलिक अवसर, भोलेनाथ के विवाह के कीर्तन हर घर में बड़े चाव से गाए जाते हैं।

पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन: 'तरह तरह के सजे बराती' – अद्भुत शिव पार्वती विवाह गीत

यहां एक अत्यंत मनभावन और आनंदमयी भजन "शिवजी भगवान का विवाह गीत या कीर्तन" दिया गया है। इस गीत में शिवजी की अनोखी बारात, बारातियों के विचित्र स्वरूप और विवाह के समय महल में मचे कौतूहल का बहुत ही सुंदर व सजीव वर्णन है।

॥ॐ श्री परमात्मने नमः॥

शिवजी भगवान का विवाह गीत — कीर्तन, भजन

तरह तरह के सजे बराती छाई खुशी अपार।
पार्वती जी को ब्याहन चले त्रिपुरार ।।

सजे हैं दूल्हा बम-बम-बम शिव दानी है,
कमर पै मृगछाला अजब सुहानी है।
माथे पे सोहे भाल चन्द्रमा, शिवजी हुये तैयार,
पार्वती जी को व्याहन चले त्रिपुरार ।।

लंगड़े लूले चले बराती मटक-मटक,
बिच्छू ततैया संग में चलती सटक-सटक।
किसी का पेट बड़ा मटका सा, किसी के दन्त हजार,
पार्वती जी को व्याहन चले त्रिपुरार ।।

पहुँच गयी जब बरात, नगर में शोर हुआ,
बरसाते सभी देव फूल घनघोर हुआ।
अस्सी वर्ष का बूढ़ा शिव है दाढ़ी छल्लेदार,
पार्वती जी को व्याहन चले त्रिपुरार ।।

कहें हिमांचल अजब बराती ल्याये हो,
बिच्छू ततैयाँ शेषनाग लिपटाये हो।
बना जो रखा कौन खायेगा भोजन कोटि अपार,
पार्वती जी को व्याहन चले त्रिपुरार ।।

ये दो लड़के भूखे हैं इन्हें खिला दीजिये,
महाराज इतनी किरपा हम पर कीजियो।
चल दिये दोनों महलों को शिवजी रहे निहार,
पार्वती जी को व्याहन चले त्रिपुरार ।।

भोजन इतना खाया सभी मैदान हुआ।
लाते लाते सारा नगर हैरान हुआ।।
बचा नहीं जब दाना घर में राजा करे विचार
पार्वती जी को व्याहन चले त्रिपुरार।।

हर हर महादेव!

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भोलेनाथ की अलौकिक बारात और शिव पार्वती विवाह का महत्व

औघड़ दानी का दूल्हा स्वरूप और त्रिपुरारी की बारात

इस पारंपरिक कीर्तन की शुरुआत में ही शिवजी के दूल्हा स्वरूप का अद्भुत वर्णन है: 

"सजे हैं दूल्हा बम-बम-बम शिव दानी है, कमर पै मृगछाला अजब सुहानी है।" 

जहाँ संसारी शादियों में दूल्हा रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सजता है, वहीं हमारे परम दानी भोलेनाथ कमर में मृगछाला धारण किए हुए हैं और हाथ में त्रिशूल-भाला लिए माता पार्वती को ब्याहने चल दिए हैं। उनके इस अलौकिक रूप को देखकर संपूर्ण ब्रह्मांड में खुशी की लहर दौड़ जाती है।

विचित्र बाराती और प्रकृति का अनूठा मिलन

शिवजी की बारात की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें समाज द्वारा त्यागे गए जीव, भूत-पिशाच, पशु-पक्षी और देवी-देवता सभी एक साथ चलते हैं,

"लंगड़े लूले चले बराती मटक-मटक, बिच्छू ततैया संग में चलती सटक-सटक।" 

किसी का पेट घड़े जैसा बड़ा है तो किसी के हजारों दाँत हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव की शरण में हर जीव के लिए स्थान है, चाहे उसका स्वरूप कैसा भी हो। वे सबको स्वीकार करते हैं।

लोक परंपरा में शिवजी की बारात में विविध स्वरूपों वाले गण, भूत-प्रेत, योगी, नाग और अन्य अनोखे बारातियों का वर्णन प्रतीकात्मक एवं भक्तिपरक शैली में किया जाता है। इसका उद्देश्य भगवान शिव की समदृष्टि और सर्वसमावेशी स्वरूप को दर्शाना है।

हिमाचल नगर में कौतूहल और बारात का स्वागत

जब यह अनोखी बारात माता पार्वती के नगर में पहुँचती है, तो चारों ओर शोर मच जाता है। देवतागण आकाश से फूलों की वर्षा करने लगते हैं। राजा हिमाचल के महल के पुरुष, स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े जब शिवजी के गले में लिपटे बिच्छू, ततैया और शेषनाग को देखते हैं, तो वे अचरज और भय से काँप उठते हैं,

"कहें हिमांचल अजब बराती ल्याये हो, बिच्छू ततैयाँ शेषनाग लिपटाये हो।

यह दृश्य सांसरिक दृष्टि के लिए डरावना हो सकता है, लेकिन गौरा मैया के लिए यही उनके सर्वस्व का पावन आगमन है।

शिव-विवाह का आनंद और अद्भुत प्रीतिभोज

कीर्तन के अंतिम भाग में एक बहुत ही लोक-प्रसिद्ध और हास्य-रस से भरपूर प्रसंग है। जब बराती भोजन करने बैठते हैं, तो वे इतना भोजन ग्रहण करते हैं कि राजा हिमाचल का पूरा नगर हैरान हो जाता है,

"भोजन इतना खाया सभी मैदान हुआ, लाते लाते सारा नगर हैरान हुआ।" 

जब घर में अन्न का एक दाना भी नहीं बचता, तब राजा विचार करने लगते हैं कि यह साधारण बारात नहीं, बल्कि स्वयं साक्षात जगतपिता त्रिपुरारी आए हैं। अंततः संपूर्ण विधि-विधान के साथ शिव-गौरी का विवाह संपन्न होता है। यह प्रसंग हास्य-रस और लोकभक्ति की शैली में शिव-विवाह की आनंदमयी परंपरा को प्रस्तुत करता है।

निष्कर्ष

"तरह तरह के सजे बराती" केवल एक पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, लोकभक्ति और भगवान शिव की सर्वसमावेशी भावना का सुंदर प्रतीक है। इस मधुर रचना में शिवजी के अलौकिक दूल्हा स्वरूप, उनकी अनोखी बारात और माता पार्वती के साथ उनके दिव्य विवाह का अत्यंत जीवंत एवं भावपूर्ण चित्रण किया गया है।

शिवजी की बारात हमें यह संदेश देती है कि भगवान के दरबार में किसी के रूप, धन, पद या बाहरी स्वरूप का महत्व नहीं होता। वे प्रत्येक जीव को समान दृष्टि से स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि उनकी बारात में देवता, ऋषि, गण, योगी और विविध स्वरूप वाले जीव सभी एक साथ सम्मिलित दिखाई देते हैं।

यह पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन हमें भक्ति, समर्पण, समानता और सरलता का संदेश देता है। साथ ही यह हमारी समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए रखता है। महाशिवरात्रि, शिव विवाह उत्सव या अन्य धार्मिक अवसरों पर इस प्रकार के कीर्तन श्रद्धालुओं के मन में भक्ति, आनंद और उत्साह का संचार करते हैं।

यह कीर्तन हमें सनातन लोक संस्कृति की सोंधी महक से सराबोर कर देता है। शिव विवाह का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि परमात्मा के दरबार में कोई छोटा-बड़ा या सुंदर-कुरूप नहीं है; जो प्रेम से उनके साथ हो लेता है, शिव उसे अपना बना लेते हैं।

शिव-पार्वती विवाह हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा प्रेम बाहरी रूप, वैभव या सामाजिक मान्यताओं पर नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और स्वीकार भाव पर आधारित होता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. 'तरह तरह के सजे बराती' किस अवसर पर गाया जाता है?

यह पारंपरिक शिव विवाह कीर्तन मुख्य रूप से महाशिवरात्रि, शिव-पार्वती विवाह उत्सव तथा अन्य धार्मिक एवं मांगलिक अवसरों पर श्रद्धापूर्वक गाया जाता है।

2. शिवजी की बारात को अनोखा क्यों कहा जाता है?

भगवान शिव की बारात में देवता, ऋषि, गण, नाग, योगी तथा विविध स्वरूप वाले बारातियों का वर्णन मिलता है। यह भगवान शिव की समदृष्टि और सभी को समान रूप से स्वीकार करने वाली भावना का प्रतीक माना जाता है।

3. शिव-पार्वती विवाह का आध्यात्मिक महत्व क्या है?

शिव और शक्ति का मिलन सृष्टि में संतुलन, प्रेम, तप, शक्ति और शिवत्व के एकत्व का प्रतीक माना जाता है। यह विवाह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

4. इस कीर्तन में बिच्छू, नाग और शिवगणों का क्या प्रतीकात्मक अर्थ है?

लोकभक्ति परंपरा में इनका वर्णन भगवान शिव के वैराग्य, निर्भयता और सर्वसमावेशी स्वरूप को दर्शाने के लिए किया जाता है। यह संदेश देता है कि भगवान शिव सभी प्राणियों को समान भाव से स्वीकार करते हैं।

5. क्या 'तरह तरह के सजे बराती' एक पारंपरिक लोकभक्ति कीर्तन है?

हाँ। यह शिव विवाह पर आधारित एक लोकप्रिय पारंपरिक लोकभक्ति कीर्तन है, जिसके बोल विभिन्न क्षेत्रों में थोड़े-बहुत भिन्न रूपों में भी गाए जाते हैं।

6. महाशिवरात्रि पर शिव विवाह कीर्तन क्यों गाए जाते हैं?

महाशिवरात्रि भगवान शिव की उपासना का प्रमुख पर्व है। इस अवसर पर शिव-पार्वती विवाह से जुड़े भजन, कीर्तन और कथाएँ गाकर भक्त भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करते हैं तथा उनकी कृपा की कामना करते हैं।

प्रिंसली वर्ल्ड (Prinsli World ) का यह प्रयास है कि इन अनमोल और शुद्ध लोक गीतों को आप तक पहुँचाया जाए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी इन भजनों के आनंद से जुड़ सके। आपको शिव-पार्वती विवाह का यह पारंपरिक कीर्तन और इसकी व्याख्या कैसी लगी? कृपया नीचे Comment Box में अपने विचार साझा करें और इस पावन शिव-गीत को अपने मित्रों व परिवार के साथ Share ज़रूर करें। 

हर हर महादेव!

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About the Author (लेखिका के बारे में)

Mrs. ChandraBati Agarwal (श्रीमती चंद्रवती अग्रवाल)

संस्कृत विषय में एम.ए.। बचपन से ही उन्हें भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण और अन्य धर्मग्रंथों के अध्ययन एवं मनन में गहरी रुचि रही है। वर्षों के अध्ययन, चिंतन और जीवनानुभव के आधार पर वे आध्यात्मिक विचार, प्रेरणादायक धार्मिक लेख, मधुर भजन, आरतियाँ और सात्विक जीवन से जुड़ी उपयोगी जानकारी सरल एवं सहज भाषा में साझा करती हैं।।

Author at Prinsli.com


संदर्भ (References)

  • शिव पुराण (रुद्र संहिता – पार्वती खंड)
  • स्कन्द पुराण
  • लिंग पुराण
  • विभिन्न भारतीय लोकभक्ति एवं शिव-विवाह कीर्तन परंपराएँ

यह कीर्तन लोकभक्ति परंपरा का हिस्सा है। विभिन्न क्षेत्रों में इसके बोलों और प्रस्तुति में कुछ अंतर मिल सकता है।

नोट (Disclaimer): 

यह रचना लेखिका के व्यक्तिगत आध्यात्मिक चिंतन पर आधारित है। इसमें व्यक्त भाव भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, वेदांत दर्शन और धर्मग्रंथों से प्रेरित हैं। इसका उद्देश्य किसी विशेष संप्रदाय का प्रतिपादन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, सदाचार और आध्यात्मिक प्रेरणा प्रदान करना है।

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