Obscenity in Valmiki Ramayana : वाल्मीकि रामायण में अश्लीलता ?
Obscenity in Valmiki Ramayana : वाल्मीकि रामायण में अश्लीलता ?
जब हनुमान जी अशोक वाटिका में सीता जी से पहली बार मिलते हैं, तब सीता जी को विश्वास दिलाने के लिए कि वे सचमुच श्रीराम के ही दूत हैं, कोई मायावी राक्षस नहीं, हनुमान जी सीताजी के सामने श्रीराम के शारीरिक और मानसिक लक्षणों का विस्तार से वर्णन करते हैं।
तो इसी प्रसंग में एक श्लोक आता है, जिसका हिंदी अनुवाद इस प्रकार का दिया गया है कि उसे भी लेकर आज हिंदू-विरोधियों को सनातन धर्म के शास्त्रों (Sanatan Dharma Scriptures) को टारगेट करने का एक और मौका मिल जाता है। यह श्लोक और इसका (पुस्तकों में किया गया) हिंदी अनुवाद देखिए - 👇
त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिसमस्त्रिषु चोन्नत।
त्रिवाम्रस्त्रिषु च स्निग्धो गम्भीरस्त्रिषु नित्यशः॥
पुस्तकों में इस श्लोक का किया गया अनुवाद :
“उनके (श्रीराम के) तीन अंग (वक्ष: स्थल, कलाई और मुट्ठी) स्थिर (सुदूढ़) हैं। भौहें, भुजाएं और मेढ, ये तीन अंग लंबे हैं। केशों का अग्रभाग, अण्डकोष और घुटने, ये तीन समान-बराबर हैं। वक्ष:स्थल, नाभि के किनारे का भाग और उदर, ये तीन उभरे हुये हैं। नेत्रों के कोने, नख और हाथ-पैर के तलवे, ये तीन लाल हैं। शिश्न के अग्रभाग, दोनों पैरों की रेखाएं और सिर के बाल, ये तीन चिकने हैं तथा स्वर, चाल और नाभि- ये तीन गंभीर हैं।”
तो इस श्लोक को दिखाकर एक व्यक्ति ने अपनी फेसबुक आईडी में रामायण को टारगेट करते हुए पोस्ट डाली है और लिखा है कि “उस समय के लोग बिना कपड़ों के घूमते थे, और एक दूसरे के गुप्त अंगों को भी कितने ध्यान से देखते थे। ऐसी थी भारतीय संस्कृति, ऐसा था सनातन धर्म।”
खैर!
वास्तविकता यह है कि श्लोक में सीधे तौर पर "शिश्न" या "अण्डकोष" जैसे शब्द हैं ही नहीं।
त्रिस्थिरः = त्रि + स्थिरः
त्रिप्रलम्बः = त्रि + प्रलम्बः
च = च
त्रिसमः = त्रि + समः
त्रिषु = त्रिषु
चोन्न्तः = च + उन्नतः
त्रिवाम्रः (या त्रिताम्रः) = त्रि + ताम्रः
त्रिषु = त्रिषु
च = च
स्निग्धः = स्निग्धः
गम्भीरः = गम्भीरः
त्रिषु = त्रिषु
नित्यशः = नित्यशः
तो इस श्लोक का वास्तविक अर्थ यह है कि -
"वे (श्रीराम) तीन अंगों में स्थिर हैं, तीन अंगों में लंबे हैं, तीन अंगों में समान (बराबर) हैं, तीन अंगों में उन्नत (उभरे हुए) हैं, तीन अंगों में ताम्र वर्ण (लाल) हैं, तीन अंगों में स्निग्ध हैं और तीन अंगों में गंभीर (गहरे) हैं।"
तो मूल श्लोक में कहीं भी शरीर के किसी भी अंग का नाम तक नहीं लिखा है। यह श्लोक केवल एक संख्यात्मक कोड या सूत्र की तरह लिखा गया है - 3 स्थिर, 3 लंबे, 3 सम, 3 उन्नत, 3 लाल, 3 स्निग्ध और 3 गहरे।
तो फिर अनुवादक ने क्या सोचकर ऐसा अनुवाद किया होगा?
प्राचीन काल में सामुद्रिक शास्त्र (Samudrik Shastra) के ग्रंथों में कुछ ऐसे नियम बताए गए हैं कि किसी महापुरुष के कौन से तीन अंग लंबे (त्रिप्रलम्ब) होने चाहिए और कौन से तीन बराबर (त्रिसम) होने चाहिए। सामुद्रिक शास्त्र में महापुरुषों के 32 लक्षणों की एक सूची होती थी। भारतीय परंपरा में सामुद्रिक शास्त्र (शारीरिक लक्षणों से महापुरुषों और पुरुषों के गुणों को पहचानने का ज्ञान) एक प्रमुख विद्या थी। प्राचीन काल में राजघरानों के व्यक्तियों के लक्षण उनके गुप्त पहचान पत्र की तरह काम करते थे।
जैसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान या फॉरेंसिक साइंस में शरीर के हर अंग का नाम और बनावट तटस्थ होकर पढ़ी जाती है, जैसे डॉक्टर के लिए हर अंग एक समान होता है, वैसे ही सामुद्रिक शास्त्र के लिए भी। प्राचीन शास्त्रों में शरीर को केवल एक भौतिक संरचना के रूप में देखा जाता था।
तो जो हिंदी अनुवाद दिखाई दे रहा है, वह अनुवादक द्वारा सामुद्रिक शास्त्र से जोड़ी गई व्याख्या है, मूल श्लोक नहीं। और सामुद्रिक शास्त्र आज के फॉरेंसिक साइंस जैसा था - पहचान के लिए हर अंग को तटस्थ भाव से देखना। इसमें बिना कपड़ों के घूमने जैसा कुछ नहीं है।
दरअसल, समस्या यह हुई कि अनुवादक ने जब अनुवाद किया, तो उन्होंने मूल श्लोक का अनुवाद न करके, टीका में लिखी व्याख्या का शब्दशः अनुवाद कर दिया। और टीका में जो शब्द उस समय शरीर-विज्ञान के तटस्थ शब्द थे, उन्हें आज की हिंदी में बिना मर्यादा बदले रख दिया।
संस्कृत व्याकरण और कोश में शब्दों के कई अर्थ होते हैं। संस्कृत में मेढ का अर्थ कमर का निचला हिस्सा/कटि प्रदेश भी होता है और वृषण का अर्थ जांघों का जोड़/कमर का संधिस्थल भी लिया जाता है।
हनुमान जी परम ज्ञानी, व्याकरण और शास्त्रों के प्रकांड पंडित हैं। उन्होंने शास्त्रों में वर्णित मानकों के आधार पर श्रीराम का वर्णन किया।
यदि अनुवादक चाहते तो मर्यादित और शिष्ट हिंदी शब्दों का प्रयोग भी कर सकते थे (जैसे कटि प्रदेश, जांघों का संधिस्थल या शारीरिक बनावट)। लेकिन सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखे बिना भगवान के लिए भी 'शिश्न' या 'अंडकोष' जैसे अत्यंत स्थूल शब्दों का प्रयोग अनुवाद में कर देना भाषाई दृष्टि से भी सही नहीं है।
तो वाल्मीकि रामायण या महाभारत आदि के मूल श्लोकों में ऐसा कोई अश्लील या प्रत्यक्ष शब्द नहीं है। जो विवाद या आपत्ति आज दिखाई देती है, वह मूल संस्कृत श्लोक के कारण नहीं, बल्कि आधुनिक अनुवादकों द्वारा किए गए स्थूल और अमर्यादित शब्द-चयन का परिणाम है। स्थूल शब्द चुनना अनुवाद की चूक है, मूल ग्रंथ का दोष नहीं। यदि अनुवादक ने सामुद्रिक शास्त्र के नियमों को शिष्ट और मर्यादित भाषा में स्पष्ट किया होता, तो शायद ऐसे भ्रम पैदा नहीं होते।
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मैं यहां गीताप्रेस (Valmiki Ramayana Gita Press) को टारगेट नहीं कर रही हूं, क्योंकि वास्तव में मेरे मन में गीता प्रेस के लिए बहुत सम्मान और श्रद्धा है। मैं बचपन से ही गीता प्रेस की ही पुस्तकों को पढ़कर बड़ी हुई हूं। मेरे घर में वाल्मीकि रामायण, महाभारत और जितने भी पुराण आदि रखे हैं, वे सब गीता प्रेस के ही रखे हुए हैं। बहुत पुराने रखे हुए हैं। अन्य रामायण और अन्य ग्रंथों का अध्ययन मैंने इंटरनेट से किया है।
मैं यह मानती हूं कि गीता प्रेस ने अपनी स्थापना से पहले किए गए संस्कृत ग्रंथों के अनुवादों की बहुत सारी त्रुटियों को सुधारने का काम किया है। हालांकि इतनी त्रुटियों को सुधारने के बाद भी गीता प्रेस के अनुवादों में अभी भी कई अनुवादों में त्रुटियां रह गई हैं, जिनमें से कई त्रुटियों को मैं पूरे प्रूफ के साथ साबित कर सकती हूं। लेकिन मैं यह भी मानती हूं कि जो त्रुटियां रह गई हैं, उनमें गीता प्रेस की कोई दुर्भावना नहीं है। वे वास्तव में केवल गलतियां ही हैं, और इसका कारण यह है कि आज हम सब संस्कृत से बहुत दूर हो चुके हैं।
तो ऐसे में एक व्यक्ति को सभी ग्रंथों का तार्किक और तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए, तभी वह समझ सकता है और कुछ शिक्षा ग्रहण कर सकता है।
माता सरस्वती जी की एक स्तुति (Maa Saraswati Stuti) में मैंने पढ़ा था कि केवल पुस्तकों को पढ़ लेना, शब्दों को रट लेना या श्लोक सुन लेना ज्ञान नहीं है। बहुत से लोग शब्दों को ऊपर-ऊपर से पढ़ और सुन तो लेते हैं, लेकिन उसके गहरे भाव और परम सत्य को नहीं समझ पाते। उनके लिए ज्ञान केवल पन्नों पर लिखे अक्षर बनकर रह जाता है।
जो व्यक्ति केवल शब्दों को पकड़कर रखता है, वह अज्ञानी ही बना रह जाता है। किंतु जो साधक निष्कपट भाव से सत्य की खोज में समर्पित होता है, उसके हृदय में ज्ञान स्वयं प्रकाशित हो जाता है। जो साधक सत्यनिष्ठा, एकाग्रता, भक्ति और गहराई से ज्ञान की खोज करता है, ज्ञान की देवी (सरस्वती) उसके सामने अपने वास्तविक और रहस्यमयी अर्थ को पूरी तरह स्पष्ट कर देती हैं।
वेदांत (Vedanata) में माना जाता है कि संपूर्ण जगत् ही ईश्वर की माया है. सीता साक्षात योगमाया हैं। जब रावण (जो अहंकार और दुष्टता का प्रतीक है) उनका हरण करने आता है, तो वह मूल तत्त्व (ईश्वर) को कभी बाँध ही नहीं सकता; वह केवल माया (भौतिक रूप) को ही पकड़ पाता है।
श्रीमद्भागवत के भी अनुसार, आसुरी शक्ति केवल विद्या के बाहरी आवरण (माया) को ही हस्तगत कर सकती है, उसके मूल तत्व और ज्ञान (तत्व) को कभी नहीं छू सकती। रावण (जो काम, अहंकार और आसुरी प्रवृत्ति का प्रतीक है) कभी भी मूल ब्रह्मविद्या या साक्षात योगमाया का स्पर्श या हरण नहीं कर सकता, वह केवल माया (भौतिक आवरण/प्रतिच्छाया) को ही बंधक बना सकता है।
बस, यही आज के अधिकतर लोगों के साथ हो रहा है।
यदि आप ऐसे विषयों को और अधिक गहराई से समझना चाहते हैं, तो देखें -
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