The Secrets of Valmiki Ramayana : Mystery of Sita's Abduction, Shri Ram and Agni Dev
The Secrets of Valmiki Ramayana : Mystery of Sita's Abduction (Maya, Agni Dev, Grammar and Brahmavidya)
टीवी सीरियलों में या चित्रों में ब्रह्मा जी को उनके प्राकट्य दिवस से ही बूढ़ा दिखाया जाता है, तो क्या ब्रह्मा जी हमेशा से केवल बूढ़े ही हैं? नहीं. देवताओं का शरीर भौतिक नहीं होता, वे परिस्थिति अनुसार उस रूप या आयु को धारण कर लेते हैं, जिस समय जिसकी आवश्यकता होती है.
जैसे, (देवी भागवत पुराण के अनुसार) जब सीता जी के हरण का समय समीप आ गया, तब अग्नि देव एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके श्रीराम के पास आए थे. अग्नि देव बूढ़े नहीं हैं. अग्नि तत्व कभी बूढ़ा नहीं होता, लेकिन उस समय वे सीता जी के पिता की भूमिका निभाना चाहते थे, अतः बूढ़े ब्राह्मण के रूप में श्रीराम के पास आते हैं और सीता जी को कुछ समय के लिए अपनी पुत्री बनाकर अपने साथ ले जाते हैं.
अब यहां पर लोग यह भी पूछ सकते हैं कि ब्राह्मण का ही रूप क्यों? तो क्योंकि हमारे यहां ब्राह्मण सदाचारी व्यक्ति को ही कहा गया है (सदाचार के बिना ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी, वेदों का पाठ करके भी और ज्ञान प्राप्त करके भी मनुष्य ब्राह्मण नहीं है), और स्कंद पुराण में श्रीराम ने स्वयं सीताजी को साक्षात् "ब्रह्मविद्या" बताया है.
उन्होंने देवताओं को बताया कि रावण जब बलपूर्वक ब्रह्मविद्या का हरण करना चाहेगा, तब उसका वध करना बहुत सुगम हो जाएगा, क्योंकि जो व्यक्ति जिस विद्या के योग्य नहीं होता (अर्थात् जिस मनुष्य ने अपने सत्कर्मों और आचरण से यह योग्यता प्राप्त नहीं की है) या जो विद्या का या ज्ञान का अर्जन उसका दुरुपयोग के लिए करना चाहता है, उसका पतन निश्चित हो जाता है.
अग्नि देव एक बूढ़े ब्राह्मण की भूमिका में आते हैं. वृद्ध इसलिए क्योंकि वे पिता की भूमिका में आए थे, और ब्राह्मण इसलिए क्योंकि एक सदाचारी व्यक्ति ही ब्रह्मविद्या को अपने साथ रखने का अधिकार रखता है.
सीता-हरण के प्रसंग में वाल्मीकि जी लिखते हैं -
तत्र रामसितापाङ्गीं शोकमोहसमन्विताम्।
निधाय रावणः सीतां मयो मायामिकासुरीम्॥ १३॥
इस श्लोक के दो अर्थ बताए जाते हैं -
पहला,
श्रीराम की ओर लगे नेत्र-प्रांतों वाली, शोक (दुख) और मोह (अचेतनावस्था/भ्रम) से पूरी तरह घिरी हुई सीता को रावण ने अपने अंतःपुर में इस प्रकार स्थापित कर दिया, जैसे मय दानव ने अपनी आसुरी माया को (छिपाकर या सुरक्षित) रख दिया हो।
दूसरा,
रामायणशिरोमणि' व्याख्या की टिप्पणी के अनुसार यहाँ 'मायामयी सीता' का तात्पर्य छाया सीता से है. अर्थात् जिस सीता का रावण ने हरण किया और लंका के अंतःपुर में रखा, वह वास्तविक (मुख्य) सीता नहीं थीं, बल्कि माया से निर्मित उनकी प्रतिच्छाया थीं. रावण जिन्हें अपने रथ में बैठाकर ले गया, वे माया से रची गई सीता थीं. इसी कारण (मायारूपिणी होने की वजह से) रावण को उनके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं हो सका.
वाल्मीकि रामायण इतिहास ग्रंथ होने के साथ साथ ध्वनि-काव्य और गूढ़ार्थ-युक्त काव्य की श्रेणी में आती है. संस्कृत साहित्य-शास्त्र (जैसे आनंदवर्धनाचार्य का ध्वन्यालोक) यह मानता है कि यह उत्तम काव्य वह है जहाँ वाच्यार्थ (सदा दिखने वाला अर्थ) से अधिक गहरा व्यंग्यार्थ या व्यंजना होता है. वाल्मीकि जी जैसे ब्रह्मर्षि और सिद्ध कवि जब 'मायाम्', 'मायामयी' या 'मायामिवासुरीम्' जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो वह केवल तुकबंदी या साधारण उपमा के लिए नहीं होता. व्याकरण जहाँ शब्दों के शरीर को देखता है, वहीं काव्य-शास्त्र और अध्यात्म उसके प्राण को देखता है.
यदि कवि हर रहस्य को खोलकर सीधे-सीधे लिख दे, तो काव्य का सौंदर्य और उसका रस समाप्त हो जाता है. इसलिए गूढ़ बातें हमेशा संकेतों में कही जाती हैं. वाल्मीकि रामायण का मुख्य उद्देश्य भगवान के नर-रूप (मानवीय मर्यादा) को दिखाना है. यदि श्रीराम का विरह केवल एक नाटक के रूप में सीधे-सीधे उजागर कर दिया जाता, तो रामायण का मानवीय मर्यादा, कर्मयोग और संवेदना वाला पक्ष कमजोर पड़ जाता.
यदि यह स्पष्ट लिख दिया जाता कि सीता जी तो नकली हैं और श्रीराम जानते हैं, तो आगे का पूरा विरह-वर्णन, श्रीराम का वृक्षों-पशुओं से रो-रोकर सीता का पता पूछना, और लंका-युद्ध का सारा मानवीय संवेग और दर्द कृत्रिम लगने लगता. लोग उनके जीवन से वास्तविक शिक्षा को ग्रहण ही नहीं कर पाते. अतः वाल्मीकि जी ने इस रहस्य को उपमाओं के पीछे छिपा दिया, और बाद में वेदव्यास जी ने पुराणों में इसे प्रकट कर दिया, क्योंकि समय के साथ रहस्यों का उद्घाटन भी आवश्यक है.
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वेदांत में माना जाता है कि संपूर्ण जगत् ही ईश्वर की माया है. सीता साक्षात योगमाया हैं. जब रावण (जो अहंकार और दुष्टता का प्रतीक है) उनका हरण करने आता है, तो वह मूल तत्त्व (ईश्वर) को कभी बाँध ही नहीं सकता; वह केवल माया (भौतिक रूप) को ही पकड़ पाता है.
श्रीमद्भागवत में भी यह विचार मिलता है कि आसुरी शक्ति (रावण/अहंकार) केवल विद्या के बाहरी आवरण (माया) को ही हस्तगत कर सकती है, उसके मूल आनंद और ज्ञान (तत्व) को कभी नहीं छू सकती. रावण (जो काम, अहंकार और आसुरी प्रवृत्ति का प्रतीक है) कभी भी मूल ब्रह्मविद्या या साक्षात योगमाया का स्पर्श या हरण नहीं कर सकता, वह केवल माया (भौतिक आवरण/प्रतिच्छाया) को ही बंधक बना सकता है. वाल्मीकि रामायण में ही मारीच (जो श्रीराम के वास्तविक स्वरूप को कुछ-कुछ जान गया था) भी रावण को सावधान करते हुए कहता है कि "आपमें इतनी शक्ति नहीं कि आप उन्हीं सीताजी का हरण कर सकें, क्योंकि वे अपने ही तेज से सुरक्षित हैं."
वाल्मीकि जी ने इस दार्शनिक सत्य को काव्यात्मक शैली में पिरोया है. इसीलिए यहां कुछ संस्कृत आचार्यों का कहना है कि इस श्लोक में माया शब्द का प्रयोग इस बात का गुप्त प्रमाण है कि रावण केवल माया (छाया) को ही स्पर्श कर सका, मूल जगदम्बा या शक्ति को नहीं.
'मायामयी' शब्द की रचना संस्कृत में माया + मयट् (मय्) + ङीप् प्रत्यय के योग से हुई है. माया (छल, भ्रम, चमत्कार या अलौकिक शक्ति). पाणिनी व्याकरण के सूत्र 'तत्प्रकृतवचने मयट्' के अनुसार 'मयट्' प्रत्यय का प्रयोग "उससे प्रचुर", "उससे निर्मित" या "उसके स्वरूप वाले" अर्थ में होता है. 'मयट्' प्रत्यय का प्राथमिक अर्थ "प्राचुर्य" या विकार/स्वरूप होता है. 'मायामय' शब्द को स्त्रीलिंग बनाने के लिए ङीप् प्रत्यय लगता है, जिससे 'मायामयी' शब्द बनता है, "जो माया से बनी हो", "मायातुल्य" या "छद्म/काल्पनिक रूप वाली".
श्रीराम और सीताजी का पाणिग्रहण
रावण के वध के बाद अग्निपरीक्षा के बहाने श्रीराम अपनी वास्तविक सीताजी का स्मरण करते हैं. तब अग्नि देव एक पिता के समान सीता जी के साथ श्रीराम के सामने उपस्थित होते हैं.
जिस प्रकार एक योग्य पिता अग्नि को साक्षी मानकर अग्नि के ही समक्ष अपनी गुणवती पुत्री का हाथ एक गुणवान और योग्य पुरुष के हाथ में देता है, उसी प्रकार अग्नि देव ने स्वयं साक्षी बनकर अपनी पुत्री समान सीताजी का हाथ श्रीराम के हाथों में दे दिया.
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