Charak Samhita Hindi Translation : चरक संहिता हिंदी अनुवाद

Charak Samhita Hindi Translation : चरक संहिता हिंदी अनुवाद


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Charak Samhita Hindi Translation (Truth or Fact Check) : चरक संहिता हिंदी अनुवाद


प्रसहा भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः।

गुरुष्णस्निग्ध मधुरा बलोपचयवर्धनाः॥

वृष्याः परं वातहराः कफपित्ताभिवर्धनाः।

हिता व्यायामनित्येभ्यो नरा दीप्ताग्नयश्च ये॥

(चरकसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय २७)


अब पहले तो आप इस श्लोक को ध्यान से पढ़ें। इस मूल श्लोक में कहीं भी 'मांस' शब्द आया ही नहीं है। मूल पाठ में इन वर्गों (प्रसह, भूशय आदि) का उल्लेख उनकी प्रकृति, वातावरण और आहार-गुणों (गुरु, उष्ण, स्निग्ध आदि) के संदर्भ में किया गया है, लेकिन अनुवादक ने श्लोक का अर्थ करते समय अपनी तरफ से जबरदस्ती "का मांस" शब्द जोड़ दिया। कोई विद्वान बताए कि इस श्लोक में किस शब्द के लिए "का मांस" शब्द जोड़ दिया गया?


खैर! बात करते हैं इस श्लोक के अर्थ की तो, संस्कृत में शब्द यौगिक होते हैं, यानी Root-Based होते हैं। यदि हम इन शब्दों की व्युत्पत्ति को देखें, तो ये लक्षण वनस्पतियों (शाक, कंद, फल, लता आदि) पर भी पूरी तरह लागू होते हैं - 


1. प्रसह का अर्थ होता है - जो अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों को सहकर या दूसरों पर आश्रित होकर बढ़ते हैं। तो ऐसी बेलें, लताएँ या परजीवी पौधे जो दूसरे वृक्षों का सहारा लेकर या उन्हें दबाकर फलते-फूलते हैं (जैसे अमरबेल, लताएँ) आदि के लिए भी प्रसह शब्द का प्रयोग होता है. 


2. भूशय का अर्थ होता है - जो भूमि के भीतर रहे. तो केवल नेवला, सांप, मेंढक आदि को ही भूशय नहीं कहते। कंद-मूल जैसे अदरक, हल्दी, आलू, वराहीकंद, ऋषभादि कंद जो जमीन के नीचे छिपे या दबे रहते हैं, उन्हें भी भूशय कहते हैं. 


3. आनूप अर्थात जो दलदली या जल-प्रचुर क्षेत्र में उगें। जैसे जल-प्रधान क्षेत्रों में उगने वाली वनस्पतियाँ जैसे कमल-कंद (भसीन/मखाना), सिंघाड़ा, ब्राह्मी, वच या जल-पालक  आदि.


4. वारिज/वारिचारी अर्थात जल में उत्पन्न होने वाले या जल पर तैरने वाले (वारि = पानी और ज = उत्पन्न होना/जन्म लेना)। मेरी मम्मी ने मुझे कमल के कुछ पर्यायवाची शब्द इस प्रकार से याद करवाए थे कि पानी के पर्यायवाची शब्दों के अंत में 'ज' अक्षर जोड़ दो, तो कमल के पर्यायवाची (या जल में उत्पन्न होने वाले) शब्द बन जाते हैं. जैसे जलज, नीरज आदि। जलकुंभी, शैवाल, जलीय पौधे और जलफल इसी (वारिज/वारिचारी) के उदाहरण हैं. 


तो अर्थ यह हुआ कि प्रसह (जो सहकर या दबाकर बढ़ें), भूशय (जो भूमि के भीतर रहें), आनूप (जो दलदली या जल-प्रचुर क्षेत्र में उगें) और वारिज / वारिचारी (जल में उत्पन्न होने वाले या जल पर तैरने वाले)- इन समस्त वर्गों के द्रव्यों का स्वभाव पचने में भारी, उष्ण, स्निग्ध और मधुर रस वाला होता है। ये द्रव्य शरीर के बल तथा मांसपेशियों के घनत्व को बढ़ाने वाले, वीर्यवर्धक और वात-दोष को दूर करने वाले होते हैं; परंतु यह कफ और पित्त को बढ़ाते हैं। इसलिए ये नित्य कठोर व्यायाम करने वाले मनुष्यों के लिए हितकारी (उपयोगी) हैं.

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अब ध्यान दीजिये। चरक संहिता में ही एक स्थान पर शरीर के लिए अहितकर (नुकसानदेह) आहारों की सूची दी गई है -


सर्वे शरीरदोषा भवन्ति ग्राम्याहारात् अम्ललवणकटु प्रातःप्रयोजयेत्, जीणे च क्षीरसर्पिभ्यां शालिकक्षारशुष्कशाकमांसतिलपललपिष्टान्नभोजिनां पटिकमश्नीयात् । अस्य लिबर्षप्रयोगाद्वशतं वविसदनवशकशमीधान्यबिरुद्धाऽसात्म्यरूशक्षारा- योऽजर तिष्टति, श्रुतमवतिष्टते, सर्वामयाः भिप्यन्दिभोजिनां क्लिन्नगुरुपूतिपर्युपितभोजिनां प्रशाम्यन्ति, अप्रतिहतगतिः स्त्रीप्यपत्यवान् बिपमाध्यशनप्रायाणां दिवास्वप्मनीमद्यनित्यानां भवतीति ॥ ४ ॥ विपमातिमानव्यायामसंक्षोभितशरीराणां भयको-भवति चात्र॥ अशोकलोभायासबहुलानामतोनिमित्तं हि शिथि- वृहच्छरीरं गिरिसारसारं लोभवन्ति मांसानि, विमुच्यन्ते सन्धयः, विद- स्थिरेन्द्रियं चातिवलेन्द्रियं च । हाते रक्तम्, विप्यन्दते चानल्पं मेदः, न सन्धीय. अधृप्यमन्यरतिकान्तरूपं रोऽस्थिपु मजा, शुक्रं न प्रवर्तते, क्षयमुपैत्योजः प्रशस्तिपूजासुखचित्तभाक् च ॥५॥


अत्यधिक खट्टे, नमकीन, तीखे और क्षारीय खाद्य पदार्थ।

सूखे हुए शाक

मांस

तिलकल्क

विष्टा अन्न

बिरूढ

नए शूकधान्य व शमीधान्य

विरुद्ध और असात्म्य भोजन

शरीर के प्रतिकूल रहने वाला भोजन

रूखे, अभिष्यन्दी और क्लिन्न भोजन

भारी, सड़े हुए (पूति) तथा बासी (पर्युषित) भोजन

अस्वाभाविक खान-पान की आदतें

अनिश्चित या बिना समय का भोजन

पहला भोजन पचे बिना ही दोबारा भोजन कर लेना

केवल जीभ के स्वाद (स्वादलोलुपता) के लिए बनाए जाने वाले नुकसानदेह और कृत्रिम भोजन

शराब/मदिरा।


(चरक संहिता, चिकित्सास्थान, अध्याय १ - 'अभयामलकीय रसायनपाद')


तो इस श्लोक में अहितकर आहारों की श्रेणी में मांस को रखकर महर्षि चरक ने यह बता दिया है कि यह शरीर की मांसपेशियों को शिथिल करता है और रोग पैदा करता है, तो बताइए कि वही आचार्य पूरी पुस्तक में निरोग रहने के लिए मांसाहार करने की सलाह कैसे दे सकते हैं? यह पूर्वापर विरोध अनुवादक के अनुवाद में है, महर्षि चरक के मूल सिद्धांतों में नहीं। 


इसी के साथ, आप यह भी ध्यान दीजिये कि मूल श्लोक में केवल 'शमीधान्य' और 'शूकधान्य' जैसे वर्ग-सूचक शब्द आए हैं। श्लोक में चना, मटर, सेम नहीं लिखा था, लेकिन अनुवादक ने कोष्ठक में उनके नाम जोड़ दिए हैं। इसी प्रकार, अनुवादक ने पुस्तक में जहाँ-जहाँ मूल पाठ में पशु-पक्षियों से मिलते-जुलते वनस्पतियों के नाम देखे, वहाँ-वहाँ कोष्ठक में या सीधे अनुवाद में अपनी ओर से "मांस" या "पशु-पक्षियों का मांस" लिख दिया।


यानी अनुवादक के अनुसार चना, मटर, सेम खाना शरीर के लिए नुकसानदेह है, और मोर, तीतर, मुर्गा, गाय, भैंस, हाथी, गधा, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली का (यानी बस मनुष्य का छोड़कर सबका) मांस खा जाना और शराब के साथ इनका मल खाना आयुर्वेद है. 


वाह! क्या अनुवाद हैं!🙄


सुरां समण्डां पानात्थ्र भक्ष्यार्थे चरणा युधान्।

तित्तिरींश्च मयूरांश्च प्रयुञ्ज्याद्विषमज्वरे॥२९६॥   


अनुवादक ने यहाँ लिखा है कि विषमज्वर (तेज बुखार में) में पीने के लिए मण्डयुक्त सुरा तथा भोजन में कुक्कुट, तीतर और मोर के मांस का प्रयोग करें।


कौन-कौन मानेगा इस बात को?


इसके अलावा नीचे श्लोक ३०१ के अनुवाद में तो विषमज्वर में दूध में बिल्ली के मल और साँड के गोबर तक को खाने की सलाह दे डाली है. इतनी सुन्दर सलाह तो आज का कोई झोलाछाप डॉक्टर भी नहीं दे सकता।


सीधा-सीधा दिख रहा है कि अनुवादक ने बिना बुद्धि और बिना विवेक के संस्कृत शब्दों का केवल सीधा-सपाटा कर दिया। 


अनुवादकों ने ग्रंथ के अपने ही मूल सिद्धांतों की पूरी तरह उपेक्षा कर दी। पूरी चरक संहिता में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं लिखा है कि मांसाहार करना चाहिए। कहीं भी (खाने के लिए) मांसाहार या मांसभक्षण शब्द ही नहीं आया है। 


बस जहाँ-जहाँ औषधीय वनस्पतियों के नाम आए, वहाँ-वहाँ जानवरों/पक्षियों के नाम लिखकर और जहाँ-जहाँ वनस्पति-क्षार आए, वहाँ मल-मूत्र लिखकर अनुवादकों ने पूरे ग्रंथ का कबाड़ा कर दिया.


शायद उस समय संस्कृत ग्रंथों के मनगढंत अनुवाद करके अपनी किताबें छापना और इतिहासकार, ज्ञानी या दार्शनिक बन जाना आज की तुलना में भी अधिक सस्ता था. 


एक छोटी सी चर्चा संस्कृत पर


व्याकरणशास्त्र में मांस शब्द केवल पशु-फलादेश या पशु-शरीर का वाचक नहीं है। 'मांस' शब्द 'मन्' या 'मस्' धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ होता है - 'जो पुष्ट करे, नापे, तोले या शरीर के धातु-घटकों का संवर्धन करे' ('मांसं मननाद्वृंहणाद्वा' - निरुक्त)। फलों, अनाजों और कंदों का 'मांस': जैसा कि पंडित श्रीरामनारायणदत्त जी शास्त्री के लेख में साक्ष्यों सहित दिखाया गया था, आयुर्वेद ग्रंथों में वनस्पति के मुख्य पौष्टिक भाग (गूदे/पल्प) को 'मांस' ही कहा जाता है। अनाज, दालों (जैसे उड़द), कंद-मूलों और दुग्ध-घृत को भी 'बृंहण' (शरीर का वजन और धातु बढ़ाने वाला) माना गया है।


'जांगल' शब्द का अर्थ - आयुर्वेद और संस्कृत व्याकरण में 'जांगल' शब्द का अर्थ जंगल में रहने वाले पशु नहीं, बल्कि 'जांगल देश' (Dry/Arid Region - यानी जहाँ जल की कमी हो, आकाश खुला हो, और वृक्ष कम हों) होता है। चरकसंहिता में तीन प्रकार की भूमियों का वर्णन है - आनूप (जल-प्रचुर/दलदली), जांगल (शुष्क/मरुस्थलीय), और साधारण। 


जांगल क्षेत्र (शुष्क भूमि) में उगने वाली वनस्पतियां, अनाज (जैसे बाजरा, मूँग), और कंद-मूल स्वभाव से 'दीपन' (पाचन बढ़ाने वाले), 'लघु' (हल्के), 'मधुर' और 'कफ-पित्त शामक' होते हैं। लेकिन अनुवादक न भौगोलिक शब्द 'जांगल' को केवल "जंगल के जानवरों के मांस" से जोड़ दिया। यह संस्कृत व्याकरण और आयुर्वेद के वर्ग-विभाजन की पूरी तरह अनदेखी है।


आयुर्वेद में अनेक वनस्पतियों के नाम पशु-पक्षियों के नाम पर रखे गए हैं। उदाहरण के लिए -


गो-जिह्वा (गोजभ/गोजिहा) : एक प्रसिद्ध औषधि/जड़ी-बूटी है (जिसका पत्ता गाय की जीभ जैसा होता है)।

महिषाक्ष : गुग्गुलु (एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि) का नाम है।

खरमंजरी: अपामार्ग (चिरचिटा) पौधे का नाम है।

मांसकरम् का अर्थ है - शरीर की मांसपेशियों और धातुओं का संवर्धन करने वाला।

संस्कृत भाषा में 'गो' शब्द केवल पशु (गाय) के लिए ही प्रयुक्त नहीं होता। 'गो' शब्द के अनेक अर्थ हैं - भूमि, किरण, जल, वाक् (वाणी), और औषधियाँ ('गो इति पृथिव्याः नामानि' - निरुक्त)। आयुर्वेद में 'गो-रस' या 'गो-उत्पाद' का तात्पर्य अक्सर भूमि से उत्पन्न रसों, दूध-घृत या विशिष्ट वनस्पतियों से होता है।


आयुर्वेद के प्राचीन निघंटुओं और व्याकरण में पौधों, फलों और जड़ों का नामकरण उनके आकार, रंग, रूप और गुणों के आधार पर पक्षियों व प्राणियों के नाम पर रखा गया है -


मयूरशिखा (Actiniopteris radiata) - एक अत्यंत प्रसिद्ध जड़ी-बूटी है जो रक्तस्राव और शोष (T.B.) को रोकने में प्रयुक्त होती है।

मयूरक - अपामार्ग (चिरचिटा) पौधे को भी कहा जाता है।

कुक्कुट, कुक्कुट नखी - एक प्रसिद्ध औषधीय कंद/जड़ी-बूटी है।

कुक्कुटाण्डत्वक्क - कल्पों में प्रयुक्त होने वाली औषधि।

हंसपदी (Adiantum lunulatum) - एक बहुत ही महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी है, जो फेफड़ों के रोगों और यक्ष्मा की मुख्य दवा है।

गरुड़ फल/गिद्धनखी - विशिष्ट औषधीय पौधे।


कुछ अन्य वनस्पतियों के नाम -


अश्वगन्धा गोक्षुर हस्तिशुण्डी सिंहपर्णी काकजंघा काकमाची काकोलि काकनासिका कुक्कुटाण्डी हंसपादिका चक्रवाक शुकपुच्छ शुकशिम्बा शुकनासा गरुडध्वज नागवल्ली नागदन्ती नागदमनी नागबला सर्पगन्धा सर्पाक्षी अहिभुग् / अहिभुक् व्याघ्रनखी व्याघ्रपादी ऋक्षगन्धा अश्वत्थ


लेकिन कुछ अनुवादकों ने इन वानस्पतिक नामों का निरुक्त समझे बिना सीधे पशुओं के नाम पर अर्थ कर दिया।


यदि कोई व्यक्ति यहाँ 'मांस' का अर्थ केवल पशु की हत्या करके प्राप्त मांस ही निकालता है, तो यह संस्कृत भाषा के 'यौगिक अर्थ' को नकार कर केवल लौकिक रूढ़िवादी अर्थ का आग्रह है। अनेक जड़ी-बूटियों (जैसे अश्वगंधा, शतावरी, वराहीकंद आदि) के घन-काढ़े या रस को उनके 'मांसल भाग' (गूदे) के आधार पर 'मांस-रस' या 'बृंहण-रस' कहा गया है।


सुश्रुत संहिता और भावप्रकाश निघंटु के अनुसार ऋषभ (ऋषभकन्द) अष्टवर्ग की एक प्रसिद्ध जड़ी-बूटी है, जो वीर्यवर्धक और शक्तिवर्धक औषधीय कंद है। 'उक्षा' सोम-वल्ली और सींचने वाली औषधियों का पर्याय है (धातु: उक्षँ सेचने)। अतः 'औक्ष' और 'आर्षभ' का अर्थ इन औषधियों से सिद्ध किया हुआ अन्न (माषौदन/मुद्गौदन) है, न कि किसी पशु का मांस।


संस्कृत व्याकरण में 'गौण/लाक्षणिक अर्थ' का विधान है। आयुर्वेद और सुश्रुत संहिता में पौधों और फलों के अंगों के लिए इन्हीं शब्दों का प्रयोग होता है -


फलों का गूदा = मांस (जैसे आम के गूदे को 'मांस' कहा जाता है)।

छाल/छिलका = त्वक् या चर्म।

गुठली = अस्थि (हड्डी)।

रेशा/फाइबर = स्नायु।


सुश्रुत संहिता का आम वाला श्लोक (अपक्के चूतफले स्नावस्थिमज्जानः...) इसका प्रत्यक्ष व्याकरणिक प्रमाण है कि संस्कृत ग्रंथों में वनस्पति के गूदे और रेशों को मांस और स्नायु ही कहा जाता है।


वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों में जहाँ भी यज्ञीय पशु या मांस की बात आती है, वहाँ 'संकेतात्मक/रूपकात्मक व्याकरण' होता है - "पिष्टं तन्मांसम्" - आटे को ही 'मांस' कहा गया है, भूसी को 'त्वचा', और दानों को 'रोम'। अर्थात यज्ञ में समर्पित पुरोडाश (अन्न की रोटी/हवि) ही सांकेतिक 'पशु' है। वास्तविक पशु की बलि का वेदों से कोई संबंध नहीं है। संस्कृत भाषा यौगिक (Root-based) है। जो व्यक्ति निरुक्त और व्याकरण को छोड़कर केवल शब्दों का लौकिक और सीधा अर्थ निकालेगा, वह 'अश्वगंधा' को घोड़े की गंध या 'ऋषभकन्द' को बैल का मांस मानकर अर्थ का अनर्थ ही करेगा।


यदि आप ऐसे विषयों को और अधिक गहराई से समझना चाहते हैं, तो देखें -


Mann Prinsli 


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