गणपति अथर्वशीर्षम्: संपूर्ण पाठ, सरल हिंदी अर्थ, गणेश गायत्री और फलश्रुति | Shri Ganapati Atharvashirsha

गणपति अथर्वशीर्षम्: संपूर्ण पाठ, सरल हिंदी अर्थ, गणेश गायत्री और फलश्रुति | Shri Ganapati Atharvashirsha

“गणपति अथर्वशीर्षम्: विघ्न निवारण, आर्थिक समृद्धि, बुद्धि और यश की कामना से करें पाठ

गणपति अथर्वशीर्षम्: संपूर्ण पाठ, सरल हिंदी अर्थ, गणेश गायत्री और फलश्रुति | Shri Ganapati Ganesh Atharvashirsha lyrics in Sanskrit with Hindi

गणपति अथर्वशीर्षम् का परिचय: श्रीगणपत्यथर्वशीर्षोपनिषत् गणपत्युपनिषत् | Shri Ganapati Atharvashirsha Upanishad or Ganapati Upanishad

श्रीगणपति अथर्वशीर्षम्॥
॥Shri Ganapati Atharvashirsha॥

जिस तरह हमारे शरीर में सिर (शीर्ष) सबसे महत्वपूर्ण होता है, उसी तरह अथर्ववेद में 'अथर्वशीर्ष' का स्थान सबसे ऊँचा और महत्वपूर्ण माना गया है। वेद में कुल पाँच मुख्य अथर्वशीर्ष मिलते हैं — गणपति, शिव, देवी, नारायण और सूर्य। इनमें से एक 'गणपति अथर्वशीर्ष' है। 

गणपति अथर्वशीर्षम् (Shri Ganapati Atharvashirsha) भगवान श्रीगणेश की उपासना से संबंधित एक प्रसिद्ध उपनिषद् है, जिसे गणपत्यथर्वशीर्ष, गणेश अथर्वशीर्ष और गणपति उपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है। इसमें भगवान गणपति को प्रत्यक्ष तत्त्व, ब्रह्म और नित्य आत्मस्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है।

इस पाठ में गणेश बीज-मन्त्र “ॐ गं गणपतये नमः”, गणेश गायत्री मन्त्र, गणपति के ध्यान का स्वरूप, गणेश अथर्वशीर्ष तथा पाठ से संबंधित फलश्रुति दी गई है। गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ विशेष रूप से विघ्न-निवारण, बुद्धि, विद्या, यश, आर्थिक समृद्धि, व्यवसाय की वृद्धि, मेधा प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना से किया जाता है।

भगवान श्रीगणेश की पूजा-आराधना से हर तरह के संकट खत्म हो जाते हैं। लोग मंत्रों, श्लोकों और जप के जरिए उनकी उपासना करते हैं। सुबह स्नान करने के बाद हर दिन 'गणपति अथर्वशीर्षम्' का पाठ करने से भगवान गणेश की विशेष कृपा और आशीर्वाद जरूर मिलता है।

नीचे गीता प्रेस के पाठ को आधार बनाकर गणपति अथर्वशीर्षम् का संस्कृत पाठ और सरल हिंदी अर्थ दिया गया है।

गणपति अथर्वशीर्षम् क्या है?

“अथर्वशीर्ष” नाम में “शीर्ष” का अर्थ शीर्षस्थ या प्रधान भाग से संबंधित माना जाता है। गणपत्यथर्वशीर्ष में भगवान गणेश की उपासना को केवल विघ्न-विनाशक देवता के रूप में ही नहीं, बल्कि ब्रह्म और आत्मतत्त्व के साथ भी जोड़ा गया है।

इसमें गणपति के स्वरूप, उनकी व्यापकता, गणेश-मन्त्र, गणेश गायत्री, ध्यान तथा पाठ की फलश्रुति का वर्णन मिलता है।

अथर्ववेद की परम्परा में 'गणपत्यथर्वशीर्ष' का बहुत बड़ा स्थान है। किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य में भगवान गणेश की पूजा करने के तुरंत बाद प्रार्थना के रूप में इसका पाठ किया जाता है। यह भगवान गणपति का एक पवित्र वैदिक स्तवन (स्तुति) है। इसमें गणेश जी के महामन्त्र 'ॐ गं गणपतये नमः' और गणेश-गायत्री मन्त्र का महिमा के साथ वर्णन किया गया है।

इस पाठ को करने से व्यक्ति हर प्रकार के विघ्नों (बाधाओं) और संकटों से बच जाता है। जाने-अनजाने हुए बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिल जाती है। जीवन के चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ (धन), काम (इच्छाएं) और मोक्ष—प्राप्त होते हैं।

ध्यान देने योग्य बात: विभिन्न पुस्तकों और परंपराओं में गणपति अथर्वशीर्ष के कुछ पाठ-भेद मिलते हैं। इसलिए यदि आप किसी विशेष पुस्तक या गुरु-परंपरा के अनुसार पाठ करते हैं, तो उसी संस्करण को प्राथमिकता देना उचित है। इस लेख में प्रस्तुत पाठ गीता प्रेस के पाठ के अनुसार रखा गया है।

गणेश अथर्वशीर्ष | गणपति अथर्वशीर्षम् का संस्कृत पाठ | Shri Ganapati Atharvashirsha Stotram Lyrics in Sanskrit 

मंगलाचरण

यं नत्वा मुनयः सर्वे निर्विघ्नं यान्ति तत्पदम् ।
गणेशोपनिषद्वेद्यं तद्ब्रह्मैवास्मि सर्वगम् ॥

पाठ की शुरुआत (वैदिक शांति पाठ)

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

॥ श्रीगणपति अथर्वशीर्षम् ॥
(मुख्य पाठ)

ॐ नमस्ते गणपतये। 
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। 
त्वमेव केवलं कर्तासि। 
त्वमेव केवलं धर्तासि। 
त्वमेव केवलं हर्तासि। 
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। 
त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्॥ १॥ 

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥ २॥ 

अव त्वं माम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। 
अव दातारम्। अव धातारम्। 
अव अनूचानम्। अव शिष्यम्। 
अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्। 
अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्। 
अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधस्तात्। 
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥ ३॥ 

त्वं वाङ्‌मयस्त्वं चिन्मयः। 
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः। 
त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि। 
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। 
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥ ४॥ 

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। 
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति। 
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। 
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। 
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। 
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥ ५॥ 

त्वं गुणत्रयातीतः। 
त्वं कालत्रयातीतः। 
त्वं देहत्रयातीतः। 
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्। 
त्वं शक्तित्रयात्मकः। 
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्। 

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥ ६॥ 

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्। 
अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। 
तारेण रुद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। 
गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। 

अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। 
नादः सन्धानम्। संहिता सन्धिः। 
सैषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः। 
निचृद्गायत्री छन्दः। गणपतिर्देवता। 
ॐ गं गणपतये नमः॥ ७॥ 

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। 
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥ ८॥ 

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्। 
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥ 
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्। 
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥ 

भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। 
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥ 
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥ ९॥ 

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः॥ १०॥ 

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते। 
स ब्रह्मभूयाय कल्पते। 
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते। 
स सर्वतः सुखमेधते स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते। 

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। 
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। 

सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति। 
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति। 

इदम्अथर्वशीर्षम्अशिष्याय न देयम्। 
यो यदि मोहाद् दास्यति स पापीयान् भवति।
 
सहस्रावर्तनाद् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥ ११॥ 

अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति। 
चतुर्थ्यामनश्नञ्जपति स विद्यावान् भवति। 

इत्यथर्वण-वाक्यम्। 
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्। 
न बिभेति कदाचनेति॥ १२॥ 

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। 
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति। 
स मेधावान् भवति। 

यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति। 
यः साज्यसमिद्भिैर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥ १३॥ 
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति। 
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति। 

महाविघ्नात प्रमुच्यते। महापापात् प्रमुच्यते। 
महादोषात् प्रमुच्यते। स सर्वविद् भवति। 
स सर्वविद् भवति। य एवं वेद॥ १४॥ इत्युपनिषत्॥

वैदिक शांति पाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इति गणपत्युपनिषत्समाप्ता ॥

ध्यान देने योग्य बात

अथर्वशीर्ष का मूल मंत्र ('ॐ नमस्ते गणपतये') शुरू करने से पहले, आपको 'भद्रं कर्णेभिः' मंत्र का शांति पाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः... (पूरा मंत्र पढ़कर) ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ 
का एक बार पाठ करना चाहिए। शांति पाठ के तुरंत बाद, आपको मुख्य पाठ शुरू करना है। जब फलश्रुति समाप्त हो जाए, यानी पूरा पाठ खत्म हो जाए, तब अंत में फिर से वही शांति पाठ दोहराना चाहिए।
वैदिक परंपरा में उपनिषदों के पाठ की पूर्णता तभी मानी जाती है जब शुरुआत और अंत दोनों जगह शांति पाठ किया जाए।

गणेश अथर्वशीर्ष | गणपति अथर्वशीर्षम् का हिन्दी पाठ | Shri Ganapati Atharvashirsha Stotram with Hindi Meaning 

गणपति अथर्वशीर्ष का शान्ति पाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायुः।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
सरल अर्थ:

हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी बातें सुनें और अपनी आँखों से शुभ दृश्य देखें। हमारे शरीर के अंग स्वस्थ और स्थिर रहें तथा हम अपनी आयु को देवहित में व्यतीत करें। इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। तीनों प्रकार की शान्ति स्थापित हो।

॥ श्रीगणपति अथर्वशीर्षम् ॥

१. गणपति का तत्त्वस्वरूप

ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्वं साक्षादात्मासि नित्यम्॥ १॥ 

गणपति को नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो, तुम्हीं केवल कर्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केवल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरूप ब्रह्म हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो॥ १॥

सरल हिंदी अर्थ

हे गणपति! आपको नमस्कार है। आप ही प्रत्यक्ष तत्त्व हैं। आप ही कर्ता, धारणकर्ता और संहारकर्ता हैं। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप है और आप ही उसका स्वरूप हैं। आप ही नित्य साक्षात् आत्मा हैं।

इस मंत्र का भाव

इस मंत्र में भगवान गणपति को केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि परम तत्त्व और नित्य आत्मस्वरूप के रूप में संबोधित किया गया है।

२. ऋत और सत्य

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि॥ २॥ 

यथार्थ कहता हूँ। सत्य कहता हूँ॥ २॥

सरल हिंदी अर्थ

मैं ऋत अर्थात् यथार्थ और धर्मानुकूल बात कहता हूँ। मैं सत्य कहता हूँ।

यह छोटा मंत्र साधक को सत्य और यथार्थ के प्रति प्रतिबद्धता का भाव देता है।

३. चारों ओर से गणपति की रक्षा की प्रार्थना

अव त्वं माम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अव अनूचानम्। अव शिष्यम्। अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात्। अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्। अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधस्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥ ३॥ 

तुम मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। षडंग वेदविद् आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पीछे से रक्षा करो। आगे से रक्षा करो। उत्तर (वाम) भाग की रक्षा करो। दक्षिण भाग की रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे की ओर से रक्षा करो। सर्वतो भाव से मेरी रक्षा करो, सब दिशाओं से मेरी रक्षा करो॥ ३॥

सरल हिंदी अर्थ

हे गणपति! मेरी रक्षा करें। वक्ता की रक्षा करें, श्रोता की रक्षा करें, दाता और धाता की रक्षा करें तथा आचार्य और शिष्य की रक्षा करें।

मेरी पीछे से, आगे से, उत्तर से, दक्षिण से, ऊपर से और नीचे से रक्षा करें। सभी दिशाओं से और चारों ओर से मेरी रक्षा करें।

भाव

इस मंत्र में साधक भगवान गणपति से सर्वदिशाओं से संरक्षण की प्रार्थना करता है।

४. गणपति का ज्ञान और ब्रह्मस्वरूप

त्वं वाङ्‌मयस्त्वं चिन्मयः। त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥ ४॥ 

तुम वाङ्‌मय हो, तुम चिन्मय हो। तुम आनन्दमय हो, तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो॥ ४॥

सरल हिंदी अर्थ

आप वाङ्मय हैं, चिन्मय हैं। आप आनन्दमय और ब्रह्ममय हैं। आप अद्वितीय सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। आप प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। आप ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण हैं।

इस मंत्र में गणपति के स्वरूप को ज्ञान, चेतना, आनंद और ब्रह्म से जोड़ा गया है।

५. सम्पूर्ण जगत् का आधार

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः। त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥ ५॥ 

यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे सुरक्षित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लीन होता है। यह अखिल विश्व तुममें ही प्रतीत होता है। तुम्हीं भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् हो॥ ५॥

सरल हिंदी अर्थ

यह सम्पूर्ण जगत् आपसे उत्पन्न होता है। यह आपमें स्थित रहता है और अंत में आपमें ही लीन होता है। सम्पूर्ण जगत् की प्रतीति भी आपमें ही होती है।

आप पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। वाणी के चारों स्तर भी आप ही हैं। परंपरागत रूप से वाणी के चार स्तर परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी बताए जाते हैं।

६. गणपति का व्यापक और अतीत स्वरूप

त्वं गुणत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तित्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥ ६॥ 

तुम सत्त्व-रज-तम—इन तीनों गुणोंसे परे हो। तुम भूत-भविष्यत्-वर्तमान—इन तीनों कालोंसे परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों देहोंसे परे हो। तुम नित्य मूलाधारचक्रमें स्थित हो। तुम प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मन्त्र-शक्ति—इन तीनों शक्तियोंसे संयुक्त हो। 

योगिजन नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, तुम (सगुण) ब्रह्म हो, तुम (निर्गुण) त्रिपाद भूः भुवः स्वः एवं प्रणव हो॥ ६॥

सरल हिंदी अर्थ

आप सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों से परे हैं। आप तीनों कालों से परे हैं। आप तीनों शरीरों से परे हैं। आप नित्य मूलाधार में स्थित हैं।

आप तीन प्रकार की शक्तियों से युक्त हैं। योगीजन नित्य आपका ध्यान करते हैं।

आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्रमा हैं। आप ब्रह्मस्वरूप हैं तथा भूः, भुवः और स्वः से संबंधित व्यापक तत्त्व हैं।

महत्वपूर्ण पाठ-भेद

कुछ प्रचलित संस्करणों में यहाँ “त्वमवस्थात्रयातीतः” भी पढ़ा जाता है।

७. गणेश बीज मन्त्र और गणेश विद्या

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम्। अनुस्वारः परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण रुद्धम्। एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः सन्धानम्। संहिता सन्धिः। सैषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः। निचृद्गायत्री छन्दः। गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः॥ ७॥ 

‘गण’ शब्द के आदि अक्षर गकार का पहले उच्चारण करके अनन्तर आदिवर्ण अकार का उच्चारण करे। उसके बाद अनुस्वार रहे। इस प्रकार अर्धचन्द्रसे पहले शोभित जो ‘गं’ है, वह ओंकार के द्वारा रुद्ध हो अर्थात् उसके पहले और पीछे भी ओंकार हो। यही तुम्हारे मन्त्रका स्वरूप (ॐ गं ॐ) है। ‘गकार’ पूर्वरूप है, ‘अकार’ मध्यमरूप है, ‘अनुस्वार’ अन्त्यरूप है। ‘बिन्दु’ उत्तररूप है। ‘नाद’ संधान है। ‘संहिता’ सन्धि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस विद्या के गणक ऋषि हैं, निचृद् गायत्री छन्द है और गणपति देवता हैं। मन्त्र है —‘ॐ गं गणपतये नमः।’॥ ७॥

सरल अर्थ

इस मंत्र में “गं” गणपति के बीज-मंत्र का स्वरूप बताया गया है। गकार, अकार और अनुस्वार आदि के माध्यम से इसके मंत्र-स्वरूप की व्याख्या की गई है।

इस गणेशविद्या के ऋषि गणक, छन्द निचृद् गायत्री और देवता गणपति बताए गए हैं।

मंत्र है—

ॐ गं गणपतये नमः।

गणपति बीज मंत्र का अर्थ

ॐ गं गणपतये नमः
अर्थात् भगवान गणपति को नमस्कार। 

यह गणपति उपासना में अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है।

८. गणेश गायत्री मंत्र

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥ ८॥ 

एकदन्त को हम जानते हैं, वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। दन्ती हमको उस ज्ञान और ध्यान में प्रेरित करें॥ ८॥

सरल हिंदी अर्थ

हम एकदन्त भगवान को जानते हैं और वक्रतुण्ड का ध्यान करते हैं। वे दन्ती भगवान हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।

यह गणेश गायत्री मंत्र है।

९. गणपति का ध्यान

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्। रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥ रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम्॥ भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्॥ एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥ ९॥ 

गणपतिदेव एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिह्न है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित हैं। भक्तों की कामना पूर्ण करने वाले, ज्योतिर्मय, जगत् के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरुष से परे विद्यमान वे पुरुषोत्तम सृष्टि के आदि में आविर्भूत हुए। इनका जो इस प्रकार नित्य ध्यान करता है, वह योगी योगियों में श्रेष्ठ है॥ ९॥

सरल हिंदी अर्थ

भगवान गणपति एकदन्त और चतुर्भुज हैं। उनके हाथों में पाश, अंकुश, दन्त तथा वर देने की मुद्रा है और उनकी ध्वजा पर मूषक का चिह्न है।

वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा लाल वस्त्र धारण करने वाले हैं। उनके अंगों पर लाल चन्दन का लेप है और वे लाल पुष्पों से पूजित हैं।

वे भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले, जगत् के कारण और अच्युत हैं। सृष्टि के आरम्भ में प्रकृति और पुरुष से परे उनका आविर्भाव बताया गया है।

जो साधक इस स्वरूप का नित्य ध्यान करता है, वह श्रेष्ठ योगियों में माना जाता है।

१०. गणपति को नमस्कार

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः॥ १०॥ 

व्रातपति को नमस्कार, गणपति को नमस्कार, प्रमथपति को नमस्कार; लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार है॥ १०॥

सरल हिंदी अर्थ

व्रातपति को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रमथपति को नमस्कार। लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवपुत्र और श्रीवरदमूर्ति भगवान गणपति को नमस्कार।

११. गणपति अथर्वशीर्ष की फलश्रुति

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते। स ब्रह्मभूयाय कल्पते। स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते। स सर्वतः सुखमेधते स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति। सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति। इदम्अथर्वशीर्षम्अशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहाद् दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्रावर्तनाद् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्॥ ११॥ 

इस अथर्वशीर्ष का जो पाठ करता है, वह ब्रह्मीभूत होता है, वह किसी प्रकार के विघ्नों से बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता है, वह पंच महापापों से मुक्त हो जाता है। सायंकाल इसका पाठ करने वाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रातःकाल पाठ करने वाला रात्रि में किये हुए पापों का नाश करता है। सायं और प्रातःकाल पाठ करने वाला निष्पाप हो जाता है। (सदा) सर्वत्र पाठ करने वाला सभी विघ्नों से मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष उसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्य को उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी एक हजार आवृत्ति करने से उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्ध कर लेगा॥ ११॥

सरल हिंदी अर्थ

जो व्यक्ति इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन या पाठ करता है, वह ब्रह्मभाव की प्राप्ति के योग्य होता है। वह विभिन्न विघ्नों से बाधित नहीं होता और सुख प्राप्त करता है।

फलश्रुति में कहा गया है कि सायंकाल पाठ करने से दिन में किए गए पापों का तथा प्रातः पाठ करने से रात्रि में किए गए पापों का नाश होता है। प्रातः और सायं पाठ करने वाला निष्पाप होता है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों को प्राप्त करता है।

इसमें यह भी कहा गया है कि इस अथर्वशीर्ष को अशिष्य को नहीं देना चाहिए। एक हजार आवृत्तियों के संबंध में मनोकामना-सिद्धि का फल भी वर्णित है।

१२. अभिषेक और चतुर्थी पर जप

अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति। चतुर्थ्यामनश्नञ्जपति स विद्यावान् भवति। इत्यथर्वण-वाक्यम्। ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्। न बिभेति कदाचनेति॥ १२॥ 

जो इस मन्त्र के द्वारा श्रीगणपति का अभिषेक करता है, वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथि में उपवास कर जप करता है, वह विद्यावान् (अध्यात्मविद्याविशिष्ट) हो जाता है। यह अथर्वण-वाक्य है। जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता॥ १२॥

सरल हिंदी अर्थ

इस मंत्र के द्वारा गणपति का अभिषेक करने वाला वाग्मी होता है। चतुर्थी के दिन उपवासपूर्वक इसका जप करने वाला विद्यावान होता है—ऐसा अथर्वण-वचन कहा गया है।

जो ब्रह्मादि आवरण के तत्त्व को जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता।

१३. दूर्वा, लाजा और मोदक से यजन

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति। स मेधावान् भवति। यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति। यः साज्यसमिद्भिैर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥ १३॥ 

जो दूर्वांकुरों द्वारा यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजा के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान् होता है। जो सहस्र मोदकों के द्वारा यजन करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधा के द्वारा हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है॥ १३॥

सरल हिंदी अर्थ

जो दूर्वांकुरों से गणपति का यजन करता है, वह वैश्रवण अर्थात् कुबेर के समान होता है।

जो लाजाओं से यजन करता है, वह यशस्वी और मेधावी होता है।

जो एक हजार मोदकों से यजन करता है, वह इच्छित फल प्राप्त करता है।

जो घृतयुक्त समिधाओं से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है—ऐसा फलश्रुति में वर्णित है।

१४. गणपति अथर्वशीर्ष की अंतिम फलश्रुति

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति। सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति। महाविघ्नात प्रमुच्यते। महापापात् प्रमुच्यते। महादोषात् प्रमुच्यते। स सर्वविद् भवति। स सर्वविद् भवति। य एवं वेद॥ १४॥ इत्युपनिषत्॥ 

जो आठ ब्राह्मणों को इस उपनिषद्का सम्यक् ग्रहण करा देता है, वह सूर्य के समान तेजःसम्पन्न होता है। सूर्यग्रहण के समय महानदीमें अथवा प्रतिमा के निकट इस उपनिषद्का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नों से मुक्त हो जाता है। महापापों से मुक्त हो जाता है। महादोषों से मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है—जो इस प्रकार जानता है॥ १४॥ इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या है।

सरल हिंदी अर्थ

जो आठ ब्राह्मणों को इस उपनिषद् का सम्यक् अध्ययन कराता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी होता है।

सूर्यग्रहण के समय महानदी में अथवा प्रतिमा के समीप इसका जप करने से मंत्र-सिद्धि का फल बताया गया है। साधक महाविघ्न, महापाप और महादोष से मुक्त होता है तथा सर्वविद् होता है—ऐसा इस फलश्रुति में कहा गया है।

इत्युपनिषत्।

गणपति अथर्वशीर्ष पाठ के प्रमुख लाभ

गणपति अथर्वशीर्ष की फलश्रुति में अनेक आध्यात्मिक और धार्मिक फल बताए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं—
  • विघ्नों से मुक्ति
  • सुख की प्राप्ति
  • पापों से मुक्ति
  • धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति
  • वाणी में प्रभाव
  • विद्या की प्राप्ति
  • यश और मेधा की प्राप्ति
  • इच्छित फल की प्राप्ति
  • आध्यात्मिक उन्नति
  • भय से मुक्ति

गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ कब करें?

गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जा सकता है। विशेष रूप से गणेश-उपासना, चतुर्थी तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर इसके पाठ की परंपरा अनेक स्थानों पर देखने को मिलती है।

यदि आप नियमित पाठ करना चाहते हैं तो सबसे महत्वपूर्ण बात है कि पाठ का उच्चारण यथासंभव शुद्ध हो और एक ही प्रमाणित पाठ का अनुसरण किया जाए।

क्या गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ व्यवसाय और धन-संपत्ति के लिए किया जा सकता है?

गणपति अथर्वशीर्ष की फलश्रुति में यश, मेधा, वांछित फल तथा पुरुषार्थ चतुष्टय से संबंधित फल बताए गए हैं। इसलिए धार्मिक परंपरा में लोग इसे कार्यों में विघ्न दूर करने, बुद्धि और सफलता की कामना तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए पढ़ते हैं।

गणपति अथर्वशीर्ष और गणेश गायत्री में क्या संबंध है?

गणपति अथर्वशीर्ष के सातवें भाग में गणेशविद्या और “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र दिया गया है। इसके बाद आठवें मंत्र में गणेश गायत्री आती है—
एकदन्ताय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥
इस प्रकार गणपति अथर्वशीर्ष में गणपति के तत्त्वस्वरूप, बीज-मंत्र, गायत्री और ध्यान, इन सभी का समन्वय मिलता है।

गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करने की सबसे श्रेष्ठ और प्रामाणिक विधि

गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करने की सबसे श्रेष्ठ और प्रामाणिक विधि वैदिक शांति पाठ से शुरुआत करना माना जाता है। चूँकि यह अथर्ववेद का उपनिषद है, इसलिए इसका एक विशेष शांति मंत्र है।
गीता प्रेस की पुस्तक के अनुसार, आपको अपने पाठ की शुरुआत और अंत इस प्रकार करना चाहिए:

1. पाठ की शुरुआत (वैदिक शांति पाठ)

अथर्वशीर्ष का मूल मंत्र ('ॐ नमस्ते गणपतये') शुरू करने से पहले, आपको नीचे दिए गए 'भद्रं कर्णेभिः' मंत्र का एक बार पाठ करना चाहिए।

2. मुख्य पाठ (अथर्वशीर्ष)

शांति पाठ के तुरंत बाद, आपको मुख्य पाठ शुरू करना है:
ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि... (इसे पूरा अंत तक पढ़ें)।

3. पाठ की समाप्ति (पुनः शांति पाठ)

जब फलश्रुति समाप्त हो जाए (यानी पूरा पाठ खत्म हो जाए), तब अंत में फिर से वही शांति पाठ दोहराना चाहिए:

ॐ भद्रं कर्णेभिः... (पूरा मंत्र पढ़कर) 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

वैदिक परंपरा में उपनिषदों के पाठ की पूर्णता तभी मानी जाती है जब शुरुआत और अंत दोनों जगह शांति पाठ किया जाए।

आपके लिए एक विशेष टिप:

यदि आप किसी दिन बहुत जल्दी में हैं और पूरा शांति पाठ नहीं कर सकते, तो कम से कम तीन बार "ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः" बोलकर सीधे 'ॐ नमस्ते गणपतये' से शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन नियमित पूजा में ऊपर दी गई विधि ही सर्वोत्तम है।


गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ शुरू करने की सबसे श्रेष्ठ और प्रामाणिक विधि

आपकी नई शुरुआत को सरल और फलदायी बनाने के लिए यहाँ 4 आसान चरण दिए जा रहे हैं, जिन्हें आप पहले दिन से अपना सकते हैं:

1. संकल्प और आसन

  • दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • आसन: लाल रंग का ऊनी (woolen) आसन गणेश जी की पूजा के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।
  • दीपक: अपने दाईं ओर घी का दीपक जलाएं।

2. शुरुआत कैसे करें (पहला दिन)

  • सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और मन में कहें— "हे गणेश जी, मैं आज से आपके अथर्वशीर्ष का पाठ शुरू कर रहा/रही हूँ, मुझे बुद्धि, एकाग्रता और कार्यों में सफलता प्रदान करें।"
  • इसके बाद ऊपर बताया गया शांति पाठ (ॐ भद्रं कर्णेभिः...) पढ़ें।
  • फिर मुख्य पाठ 'ॐ नमस्ते गणपतये' से शुरू करें (गीता प्रेस की पुस्तक के अनुसार)।

3. शुरुआत में कितनी बार पढ़ें?

  • नियमित (Daily): रोज़ केवल 1 बार पाठ करने से शुरुआत करें। जब शब्द अच्छे से याद हो जाएं और उच्चारण शुद्ध हो जाए, तब आप इसकी संख्या बढ़ा सकते हैं।
  • समय: सुबह का समय सबसे अच्छा है, लेकिन यदि सुबह समय न मिले, तो शाम को हाथ-पैर धोकर भी इसे किया जा सकता है।

4. एक ज़रूरी बात

शुरुआत में संस्कृत के कुछ शब्दों (जैसे— वाङ्मयस्त्वं, गुणत्रयातीतः) का उच्चारण थोड़ा कठिन लग सकता है। इसके लिए आप शुरू के 3-4 दिन पुस्तक सामने रखकर किसी प्रामाणिक रिकॉर्डिंग (जैसे गीता प्रेस की ऑडियो या किसी शास्त्रीय विद्वान का पाठ) के साथ सिर्फ शब्दों को देखकर दोहराएं। इससे आपका उच्चारण पहले दिन से ही शुद्ध रहेगा।

पहले दिन की पूजा के लिए गणेश जी के लिए प्रिय भोग और चढ़ावा

भगवान गणेश की कृपा से आपकी शुरुआत बहुत शुभ और मंगलमय हो! पहले दिन की पूजा के लिए आप घर के मंदिर में ही एक छोटी सी चौकी या थाली तैयार कर सकते हैं।
गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए उनके सबसे प्रिय भोग और चढ़ावे इस प्रकार हैं:

1. सबसे प्रिय चढ़ावे (Offers)

  • दूर्वा (दूब घास): गणेश जी को दूर्वा सबसे प्रिय है। पहले दिन 21 दूर्वा घास की पत्तियां (ऊपरी हिस्सा, तीन या पांच पत्तियों वाली गांठ) लेकर आएं। इन्हें गंगाजल से धोकर भगवान के चरणों में या उनके मस्तक पर चढ़ाएं।
  • लाल फूल: गणेश जी को लाल रंग बहुत प्रिय है। यदि संभव हो तो लाल गुड़हल (Hibiscus) या लाल गुलाब का फूल उन्हें अर्पित करें।
  • रोली और सिंदूर: उन्हें सिंदूर का तिलक लगाएं और स्वयं भी अपने माथे पर लगाएं।

2. सबसे प्रिय भोग (Prasad)

  • मोदक या लड्डू: गणेश जी को मोदक या बेसन/बूंदी के लड्डू का भोग अवश्य लगाएं। पहले दिन आप बाहर से या घर में बने लड्डू का प्रसाद रख सकते हैं।
  • कोई भी एक फल: केला (Banana) गणेश जी को बहुत प्रिय है। आप दो केले प्रसाद के रूप में रख सकते हैं।

पहले दिन की संक्षिप्त पूजा विधि (Step-by-Step)

  1. शुद्धि: हाथ में थोड़ा जल लेकर अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर छिड़कें।
  2. दीपक: देसी गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
  3. तिलक और पुष्प: गणेश जी को सिंदूर/रोली लगाएं, अक्षत (चावल), दूर्वा और फूल चढ़ाएं।
  4. भोग: मोदक/लड्डू और फल सामने रखें और कहें— "हे गणेश जी, कृपया यह भोग स्वीकार करें।"
  5. पाठ: इसके बाद शांति पाठ (ॐ भद्रं कर्णेभिः) और फिर गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ शांतिपूर्वक करें।
  6. आरती: पाठ समाप्त होने पर घी के दीपक या कपूर से गणेश जी की आरती करें (जैसे— जय गणेश जय गणेश देवा...)।
एक छोटा सा सुझाव: यदि पहले दिन दूर्वा या लाल फूल न भी मिल पाए, तो चिंता न करें। गणेश जी 'भाव प्रधान' देवता हैं। आप केवल साफ मन से एक लड्डू और जल का भोग लगाकर भी पाठ शुरू कर सकते हैं।

गणपति अथर्वशीर्ष पाठ करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • किसी प्रमाणित पुस्तक से पाठ करें।
  • संस्कृत शब्दों का उच्चारण ध्यानपूर्वक करें।
  • अलग-अलग संस्करणों की पंक्तियों को मिलाकर पाठ न बनाएं।
  • पाठ के अर्थ को समझकर करने से साधना में एकाग्रता बढ़ती है।
  • फलश्रुति में बताए गए लाभों को धार्मिक ग्रंथ के वर्णित फल के रूप में समझें।
  • किसी विशेष अनुष्ठान, पुरश्चरण या बड़ी संख्या में आवृत्ति के लिए अपनी गुरु-परंपरा अथवा योग्य आचार्य की विधि का पालन करें।

गणपति अथर्वशीर्ष का सार

गणपति अथर्वशीर्ष केवल विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना तक सीमित नहीं है। इसका दार्शनिक पक्ष भगवान गणपति को तत्त्व, ब्रह्म, आत्मा, ज्ञान और चेतना के व्यापक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत करता है।

इसमें गणपति की उपासना के साथ-साथ ॐ गं गणपतये नमः, गणेश गायत्री, गणपति ध्यान और विस्तृत फलश्रुति मिलती है। इसलिए यह गणेश-उपासना और तत्त्वचिन्तन—दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण पाठ माना जाता है।

श्रद्धा, शुद्ध उच्चारण और एकाग्रता के साथ इसका पाठ साधक के लिए आध्यात्मिक साधना का माध्यम बन सकता है।

॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥
॥ श्रीगणेशार्पणमस्तु ॥

गणपति अथर्वशीर्ष में “त्वमवस्थात्रयातीतः” है या नहीं?

यह एक महत्वपूर्ण पाठ-भेद का विषय है। 

हाँ, गणपति अथर्वशीर्ष के कुछ प्रचलित संस्करणों में
“त्वमवस्थात्रयातीतः (त्वम् अवस्था-त्रय-अतीतः)”
पंक्ति देखने को मिलती है। यह मंत्र के छठे (6वें) श्लोक का हिस्सा है जहाँ भगवान गणेश के स्वरूप की व्याख्या की गई है। पूरा छंद इस प्रकार है:
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वमवस्थात्रयातीतः।
त्वं कालत्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः।
इसका सरल अर्थ:
  • त्वं गुणत्रयातीतः: आप तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) से परे हैं।
  • त्वमवस्थात्रयातीतः: आप तीनों अवस्थाओं (जाग्रत यानी जागना, स्वप्न यानी सपना देखना और सुषुप्ति यानी गहरी नींद) से परे हैं।
  • त्वं कालत्रयातीतः: आप तीनों कालों (भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्यकाल) से परे हैं।
  • त्वं देहत्रयातीतः: आप तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर) से भी परे हैं।
लेकिन जिस गीता प्रेस पाठ को इस लेख में आधार बनाया गया है, उसमें श्लोक 6 में यह पंक्ति नहीं है। गीता प्रेस गोरखपुर की 'पंचदेव अथर्वशीर्ष संग्रह' (पुस्तक कोड: 1800) या अन्य संकलनों में छपे गणेश अथर्वशीर्ष में 'त्वमवस्थात्रयातीतः' पंक्ति नहीं मिलती है। गीताप्रेस के पाठ में केवल यह तीन पंक्तियाँ दी गई हैं:
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः।
यह अंतर पाठ-भेद (Variations in Text) के कारण है, जिसे आप इस तरह समझ सकते हैं:

1. प्रामाणिक पांडुलिपि (Manuscript) का अंतर

गीता प्रेस धार्मिक ग्रंथों के प्रकाशन में शुद्धता और पुरानी पांडुलिपियों (Manuscripts) के मिलान पर बहुत ज़ोर देता है। वैदिक परंपरा और दक्षिण भारतीय प्राचीन प्रतियों में कई जगह इस मंत्र में केवल तीन ही अतीत (गुण, देह, काल) माने गए हैं। गीता प्रेस ने उसी मूल वैदिक प्रति को प्रामाणिक मानकर छापा है।

2. 'अवस्थात्रय' का समावेश कहाँ से हुआ?

चूँकि मांडूक्य उपनिषद और अन्य वेदांत ग्रंथों में 'अवस्थात्रय' (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का बहुत महत्व है, इसलिए समय के साथ कई विद्वानों और संतों की परंपराओं में गणेश जी को इन तीनों अवस्थाओं से परे बताने के लिए 'त्वमवस्थात्रयातीतः' पंक्ति को भी पाठ में जोड़ा जाने लगा। महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कई अन्य प्रकाशनों (जैसे निर्णय सागर प्रेस या अन्य संतों की पाठ पद्धतियों) में यह पंक्ति शामिल मिलती है।

निष्कर्ष: कौन सा सही है?

दोनों ही अपनी-अपनी परंपरा में सही हैं:
  • यदि आप गीता प्रेस की पुस्तक के अनुसार अनुष्ठान या पाठ कर रहे हैं, तो उसमें लिखी पंक्तियों का ही पाठ करें।
  • यदि आप लोकप्रिय या संप्रदाय विशेष की परंपरा (जैसे महाराष्ट्र की गणेश पूजा पद्धति) से पाठ कर रहे हैं, तो वहाँ चारों पंक्तियों को बोलना सही माना जाता है।
इसलिए अलग-अलग संस्करणों के पाठ को मिलाकर एक नया पाठ बनाने के बजाय जिस पुस्तक या परंपरा से आप पाठ कर रहे हैं, उसी पाठ का अनुसरण करना बेहतर है।

सही पाठ वही रहेगा जो आपकी गुरु परंपरा, कुल की परंपरा, या आपके पास उपलब्ध प्रामाणिक पुस्तक (जैसे गीता प्रेस) में दिया गया है। सनातन धर्म की परंपरा में दोनों ही पाठ पूर्णतः सही और फलदायी माने जाते हैं।

यदि आप दुविधा में हैं कि किसे चुनें, तो आप इन दो सरल तरीकों से निर्णय ले सकते हैं:

1. यदि आप गीता प्रेस की पुस्तक से देखकर पढ़ रहे हैं

यदि आपके हाथ में गीता प्रेस की पुस्तक है, तो उसमें लिखे तीन अतीत वाले पाठ को ही सबसे सही मानकर पढ़ें:
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः।

कारण: गीता प्रेस के पाठ अत्यंत शोध और प्राचीन वैदिक संहिताओं के मिलान के बाद छपते हैं। बिना पुस्तक के बदलाव किए, जो सामने लिखा है उसे पढ़ना ही 'ग्रंथ मर्यादा' के अनुकूल है।

2. यदि आप मौखिक (याद करके) या महाराष्ट्र पद्धति से कर रहे हैं

यदि आप महाराष्ट्र की गणेश पूजा पद्धति, सामूहिक अथर्वशीर्ष पाठ, या किसी रिकॉर्डिंग (जैसे अनुराधा पौडवाल, पंडित जसराज आदि) को सुनकर याद कर रहे हैं, तो चार अतीत वाला पाठ सही रहेगा:
त्वं गुणत्रयातीतः। त्वमवस्थात्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः।

कारण: लोक-परंपरा और उपासना मार्ग में भगवान गणेश को चारों अवस्थाओं से परे मानना वैदांतिक दृष्टि से पूरी तरह शुद्ध है।

निर्णय के लिए एक छोटा सा नियम (अंतिम सुझाव)

मंत्र साधना में शब्दों की संख्या से ज़्यादा 'भाव' और 'एकाग्रता' का महत्व है। यदि आपने पहले से कोई एक पाठ याद कर लिया है, तो उसे बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान गणेश दोनों ही रूपों में आपकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं।

यदि आप आज से ही नया पाठ शुरू कर रहे हैं, तो गीता प्रेस वाले पाठ को आधार मानकर शुरू करना सबसे सुरक्षित और प्रामाणिक माना जाता है।

गीता प्रेस के पाठ और लोक-परंपरा (विशेषकर महाराष्ट्र में प्रचलित पाठ) में कुछ और अंतर

गीता प्रेस के पाठ और लोक-परंपरा (विशेषकर महाराष्ट्र में प्रचलित पाठ) में कुछ और छोटे-छोटे पाठ-भेद (शब्दों और अनुस्वारों के अंतर) भी मिलते हैं।
चूँकि यह अथर्ववेद का हिस्सा है (गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद्), इसलिए गीता प्रेस ने वैदिक व्याकरण और अपनी प्रतियों के आधार पर शुद्ध शब्दों को रखा है, जबकि आम बोलचाल या पूजा पद्धतियों में कुछ शब्द थोड़े बदल गए हैं।
मुख्य रूप से 3 और बड़े अंतर जो देखने को मिलते हैं, वे इस प्रकार हैं:

1. 'वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः' बनाम 'त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः'

  • गीता प्रेस पाठ: त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः। त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।
  • अन्य प्रचलित पाठ: कई अन्य पुस्तकों या रिकॉर्डिंग्स में 'त्वं' शब्द को पहली बार में हटाकर सीधे "वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः" बोला जाता है। 
गीता प्रेस में हर विशेषण के आगे 'त्वं' (आप) शब्द स्पष्ट रूप से लिखा गया है।

2. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि' बनाम 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'

  • गीता प्रेस पाठ: त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
  • अन्य प्रचलित पाठ: कुछ अन्य प्रकाशनों में इसे "त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्म" लिखा जाता है। 
'ब्रह्मासि' का अर्थ होता है "आप ही साक्षात् ब्रह्म हैं", जबकि 'ब्रह्म' लिखने पर क्रियापद छिप जाता है।

3. फलश्रुति (मंत्र के अंत का भाग) में अंतर

स्तोत्र के अंत में जो 'फलश्रुति' (पाठ करने के लाभ) दी गई है, उसमें शब्दों का क्रम और कुछ श्लोक आगे-पीछे मिलते हैं:
  • चतुर्थ्यामनश्नन् जपति: अन्य पाठों में 'चतुर्थ्यामुपवसति' (चतुर्थी को उपवास करना) शब्द मिलता है, 
  • जबकि गीता प्रेस में "चतुर्थ्यामनश्नन्" (बिना अन्न खाए जप करना) शब्द को प्राथमिकता दी गई है।
विघ्नैर्न बाध्यते: गीता प्रेस के पाठ में फलश्रुति के श्लोक बहुत संक्षिप्त और वैदिक नियमों के अनुसार हैं, जबकि महाराष्ट्र की पोथियों में फलश्रुति में 2-3 श्लोक अधिक जुड़े होते हैं (जैसे- 'स सर्वविद् भवति स सर्वविद् भवति')।

सारांश (आपके लिए सलाह)

यह सारे अंतर बहुत सूक्ष्म हैं और इनसे मंत्र के मूल अर्थ या उसकी शक्ति में कोई बदलाव नहीं आता। सनातन धर्म में इन्हें 'शाखा-भेद' या 'पाठ-भेद' कहा जाता है।

यदि आप गीता प्रेस की पुस्तक से पाठ कर रहे हैं, तो आँख मूँदकर उसी पर विश्वास रखें। वह पूरी तरह शुद्ध और प्रामाणिक है।

स्रोत और संस्करण

मुख्य स्रोत: गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पंचदेव अथर्वशीर्ष संग्रह

About the Author

Sonam Agarwal

LLB | Media Professional | Research-Driven Writer on Sanatan Dharma, Indian Culture, Science, Law.


वे सनातन धर्म, भगवद्गीता, हिंदू धर्म, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, खगोल विज्ञान, कानून और सामान्य ज्ञान जैसे विषयों पर research-based articles लिखती हैं।


सनातन धर्म और भगवद्गीता से संबंधित लेखों में उनका विशेष ध्यान मूल ग्रंथों, प्रामाणिक टीकाओं और विश्वसनीय संदर्भों के आधार पर जानकारी को सरल और सामान्य पाठकों के लिए समझने योग्य भाषा में प्रस्तुत करने पर रहता है।


उनका उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को बिना अनावश्यक जटिलता के प्रस्तुत करना है, ताकि पाठक उनके मूल विचारों को सही संदर्भ में समझ सकें।


Author at Prinsli.com


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