Bhagavad Gita Chapter 15 Worksheet in Hindi | पुरुषोत्तम योग Interactive Quiz, Questions & Answers

भगवद्गीता अध्याय 15 Interactive Worksheet

MCQ Worksheet Bhagavad Gita Chapter 15 | Gita Adhyay 15 | Purushottama Yoga | 20 Shlokas in Sanskrit with Hindi Meaning

इस Interactive Worksheet में अध्याय 15 के मूल श्लोकों के भाव और शिक्षाओं पर आधारित MCQ, True/False, Fill in the Blanks, Match the Following, Think & Reflect, Today's Generation और Final Quiz शामिल हैं।

कैसे करें?
  1. हर प्रश्न को ध्यान से पढ़ें।
  2. जहाँ उपलब्ध हो, उत्तर देखें से सही उत्तर और explanation देख सकते हैं।
  3. Fill in the Blanks और Matching में अपना उत्तर चुनें/लिखें।
  4. Think & Reflect में अपने वास्तविक जीवन से जोड़कर उत्तर चुनें।
  5. अंत में Final Submit & Get Score दबाएँ।

नोट: Think & Reflect के अंक यह देखते हैं कि चुना गया व्यवहार अध्याय 15 की शिक्षा से कितना मेल खाता है।

Part A — Multiple Choice Questions

प्रत्येक प्रश्न 1 अंक

1. श्लोक 15.1 में संसार की तुलना किस वृक्ष से की गई है?

सही उत्तर: B — अश्वत्थ।
श्लोक 15.1 में संसार को ऊर्ध्वमूल और अधःशाखा वाले अश्वत्थ वृक्ष के रूप में बताया गया है।

2. श्लोक 15.3 में संसार-वृक्ष को किस साधन से काटने की बात कही गई है?

सही उत्तर: C — असंगता के दृढ़ साधन से।
यहाँ "असङ्गशस्त्रेण" अर्थात् आसक्ति से मुक्त होने के दृढ़ साधन की शिक्षा है।

3. श्लोक 15.9 के अनुसार जीव किन साधनों से विषयों का अनुभव करता है?

सही उत्तर: A.
श्लोक में श्रोत्र, चक्षु, त्वचा, रसना, घ्राण और मन का उल्लेख है।

4. श्लोक 15.15 के अनुसार भगवान कहाँ स्थित हैं?

सही उत्तर: D — सभी के हृदय में।
"सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः" — भगवान सभी के हृदय में स्थित होने की बात कहते हैं।

5. अध्याय 15 में "पुरुषोत्तम" किसे कहा गया है?

सही उत्तर: C.
श्लोक 15.17–15.18 में उत्तम पुरुष और पुरुषोत्तम की शिक्षा दी गई है।

Part B — True / False

प्रत्येक प्रश्न 1 अंक। उत्तर चुनते ही instant feedback मिलेगा।

6. श्लोक 15.1 में संसार-वृक्ष की जड़ ऊपर और शाखाएँ नीचे बताई गई हैं।

उत्तर: सही।

7. श्लोक 15.6 के अनुसार परम धाम सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है।

उत्तर: गलत।
श्लोक में कहा गया है कि वहाँ सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि उसे प्रकाशित नहीं करते।

8. श्लोक 15.15 के अनुसार भगवान सभी के हृदय में स्थित हैं।

उत्तर: सही।

9. श्लोक 15.16 में सभी प्राणियों को अक्षर कहा गया है।

उत्तर: गलत।
श्लोक 15.16 में "क्षरः सर्वाणि भूतानि" कहा गया है।

Part C — Fill in the Blanks

प्रत्येक प्रश्न 1 अंक। उत्तर लिखकर Check Answer दबाएँ।

10. श्लोक 15.3 में संसार-वृक्ष को काटने के लिए दृढ़ __________ के साधन की बात कही गई है।

उत्तर: असंगता / आसक्ति से मुक्त होने का भाव
मूल शब्द: "असङ्गशस्त्रेण"।

11. श्लोक 15.7 में पाँच इन्द्रियों के साथ __________ का उल्लेख किया गया है।

उत्तर: मन।
"मनःषष्ठानीन्द्रियाणि" — मन को छठी इन्द्रिय के रूप में बताया गया है।

12. श्लोक 15.18 के अनुसार भगवान को __________ कहा गया है।

उत्तर: पुरुषोत्तम।

13. श्लोक 15.15 के अनुसार भगवान से स्मृति, __________ और अपोहन की बात कही गई है।

उत्तर: ज्ञान।

Part D — Match the Following

प्रत्येक सही मिलान 1 अंक। कुल 5 अंक।

14. श्लोक और मुख्य विचार का सही मिलान करें:

15.1 — संसार-वृक्ष
15.14 — भोजन
15.16 — दो पुरुष
15.15 — हृदय
15.18 — सर्वोच्च पुरुष
सही मिलान:
15.1 → अश्वत्थ वृक्ष का रूपक
15.14 → वैश्वानर अग्नि
15.16 → क्षर-अक्षर
15.15 → सभी के हृदय में स्थित
15.18 → पुरुषोत्तम

Part E — Think & Reflect

Today's Generation Edition — प्रत्येक प्रश्न 2 अंक।

कैसे सोचें?
यह section केवल धार्मिक जानकारी की परीक्षा नहीं है। यह देखने का प्रयास है कि अध्याय 15 की शिक्षाओं को आप आज की digital life, social media, online identity और daily decisions से कैसे जोड़ते हैं।

15. Social Media Attachment 📱
अगर किसी व्यक्ति को अपनी post पर likes और comments कम मिलने पर बार-बार चिंता होने लगे, तो अध्याय 15.3 की "असंगता" की शिक्षा से सबसे बेहतर क्या सीखा जा सकता है?

सबसे उपयुक्त उत्तर: A.
अध्याय 15 की असंगता की शिक्षा का आधुनिक प्रयोग यह हो सकता है कि हम बाहरी प्रतिक्रिया को अपनी पूरी पहचान का आधार न बनाएं।

16. Digital Speech 🗣️
आपको किसी social media post पर गुस्सा आता है। अध्याय 15 की आत्म-संयम और आसक्ति से ऊपर उठने वाली शिक्षा को ध्यान में रखते हुए सबसे बेहतर कदम क्या होगा?

सबसे उपयुक्त उत्तर: B.
अध्याय 15 आत्म-जागरूकता और इन्द्रिय-मन के व्यवहार को समझने की दिशा देता है। Digital speech में pause और self-control इसका व्यावहारिक अभ्यास हो सकता है।

17. Digital Identity 🌐
अगर आपका पूरा self-worth followers, views और online popularity पर निर्भर हो जाए, तो अध्याय 15 के अनुसार कौन-सा विचार अधिक संतुलित है?

सबसे उपयुक्त उत्तर: C.
अध्याय 15 हमें केवल बाहरी अनुभवों से अपनी अंतिम पहचान तय न करने और आत्म-तत्त्व को समझने की दिशा देता है।

18. Information Overload 🧠
Social media पर लगातार नए videos, notifications और opinions आते रहते हैं। अध्याय 15.9 में मन और इन्द्रियों के विषयों से संबंध को ध्यान में रखते हुए सबसे अच्छा अभ्यास कौन-सा है?

सबसे उपयुक्त उत्तर: A.
अध्याय 15 मन और इन्द्रियों के विषयों से संबंध को समझने की शिक्षा देता है। आज के समय में attention management इसका व्यावहारिक रूप हो सकता है।

🏆 Part F — Final Quiz

5 प्रश्न × 1 अंक = 5 अंक

19. "छन्दांसि यस्य पर्णानि" में पत्तों की तुलना किससे की गई है?

उत्तर: B — वेद।

20. श्लोक 15.12 में सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का तेज किसका बताया गया है?

उत्तर: C — भगवान का तेज।

21. श्लोक 15.14 में भगवान किस रूप में भोजन पचाने की बात कहते हैं?

उत्तर: A — वैश्वानर।

22. श्लोक 15.17 में उत्तम पुरुष को किस नाम से बताया गया है?

उत्तर: D — परमात्मा।

23. श्लोक 15.20 के अनुसार इस ज्ञान को समझने वाला व्यक्ति कैसा बनता है?

उत्तर: B — बुद्धिमान और कृतकृत्य।

🎉 आपका Gita Chapter 15 Score

0 / 27

Percentage: 0%

📚 Quick Answer Key & Revision

Part Questions Main Topic
MCQ 1–5 अश्वत्थ, असंगता, इन्द्रियाँ, हृदयस्थ परमात्मा, पुरुषोत्तम
True/False 6–9 परम धाम, हृदय, क्षर-अक्षर
Fill in the Blanks 10–13 असंगता, मन, पुरुषोत्तम, ज्ञान
Matching 14 15.1, 15.14, 15.15, 15.16, 15.18
Think & Reflect 15–18 Social Media, Digital Speech, Digital Identity, Attention
Final Quiz 19–23 Chapter 15 Revision

Chapter 15 का core idea: संसार की आसक्ति और बाहरी पहचान से ऊपर उठकर आत्म-तत्त्व, परमात्मा और पुरुषोत्तम के वास्तविक स्वरूप को समझना।

📖 Chapter 15 — मूल श्लोक और सरल भावार्थ

नीचे अध्याय 15 के 20 मूल श्लोक और उनके सरल हिन्दी भावार्थ दिए गए हैं। Worksheet के प्रश्न इन्हीं शिक्षाओं पर आधारित हैं।

श्लोक 15.1
श्रीभगवानुवाच ।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
सरल भावार्थ: संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष की जड़ ऊपर और शाखाएँ नीचे कही गई हैं। जिसके पत्ते वेद हैं। जो इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को जानता है, वह वेदों के तत्त्व को जानने वाला है।
श्लोक 15.2
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
सरल भावार्थ: उस संसार-वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे फैली हैं। वे तीन गुणों से बढ़ती हैं और विषय-वासनाएँ उनकी कोंपलों के समान हैं। मनुष्य लोक में कर्मों से जुड़ी जड़ें भी फैलती रहती हैं।
श्लोक 15.3
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
सरल भावार्थ: इस संसार-वृक्ष का वास्तविक रूप आसानी से नहीं समझ आता। इसके आदि, अंत और स्थिर आधार को सामान्य दृष्टि से नहीं जाना जा सकता। इसे दृढ़ असंगता अर्थात् आसक्ति से मुक्त होने के साधन द्वारा काटने की शिक्षा दी गई है।
श्लोक 15.4
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
सरल भावार्थ: उसके बाद उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ पहुँचकर फिर संसार में लौटना नहीं पड़ता। उस आदि पुरुष की शरण लेनी चाहिए जिससे यह सनातन प्रवृत्ति चली है।
श्लोक 15.5
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर् गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
सरल भावार्थ: जो अहंकार और मोह से मुक्त हैं, आसक्ति को जीत चुके हैं, अध्यात्म में स्थिर हैं, कामनाओं से निवृत्त हैं और सुख-दुःख जैसे द्वन्द्वों से ऊपर उठते हैं, वे उस अविनाशी परम पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 15.6
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
सरल भावार्थ: वह परम धाम सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि से प्रकाशित होने वाला कोई सामान्य स्थान नहीं है। उसे प्राप्त करके जीव फिर लौटता नहीं है।
श्लोक 15.7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
सरल भावार्थ: जीव रूप में स्थित सनातन आत्मा को भगवान अपना अंश बताते हैं। मन सहित छह इन्द्रियों के माध्यम से वह प्रकृति के क्षेत्र में संघर्ष करता है।
श्लोक 15.8
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥
सरल भावार्थ: जीव जब शरीर प्राप्त करता है और जब उसे छोड़ता है, तो मन और इन्द्रियों को अपने साथ ले जाता है, जैसे वायु सुगंध को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है।
श्लोक 15.9
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
सरल भावार्थ: जीव कान, आँख, त्वचा, जिह्वा, नाक और मन के माध्यम से इन्द्रिय-विषयों का अनुभव करता है।
श्लोक 15.10
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥
सरल भावार्थ: अज्ञानी जीव की वास्तविक स्थिति को नहीं देख पाते, जबकि ज्ञान की दृष्टि वाले व्यक्ति उसे समझ पाते हैं।
श्लोक 15.11
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
सरल भावार्थ: प्रयत्नशील योगी आत्मा में स्थित इस सत्य को देखते हैं, लेकिन जिनका मन आत्म-संयम से तैयार नहीं हुआ है वे उसे नहीं देख पाते।
श्लोक 15.12
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
सरल भावार्थ: सूर्य में जो तेज पूरे जगत को प्रकाशित करता है और चन्द्रमा तथा अग्नि में जो प्रकाश है, उसे भगवान अपने तेज के रूप में बताते हैं।
श्लोक 15.13
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
सरल भावार्थ: भगवान पृथ्वी में स्थित होकर प्राणियों को धारण करते हैं और सोमरूप होकर औषधियों/वनस्पतियों का पोषण करते हैं।
श्लोक 15.14
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
सरल भावार्थ: भगवान प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि के रूप में स्थित होकर प्राण और अपान के साथ चार प्रकार के भोजन को पचाते हैं।
श्लोक 15.15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
सरल भावार्थ: भगवान सभी के हृदय में स्थित हैं। स्मृति, ज्ञान और विस्मरण का आधार भी वही हैं। सभी वेदों से जानने योग्य परम तत्त्व भी वही हैं।
श्लोक 15.16
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
सरल भावार्थ: इस संसार में दो प्रकार के पुरुष बताए गए हैं—क्षर और अक्षर। सभी परिवर्तनशील प्राणी क्षर हैं और कूटस्थ को अक्षर कहा गया है।
श्लोक 15.17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युधाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
सरल भावार्थ: इन दोनों से अलग उत्तम पुरुष परमात्मा कहलाता है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका धारण-पोषण करने वाला अविनाशी ईश्वर है।
श्लोक 15.18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
सरल भावार्थ: भगवान कहते हैं कि वे क्षर से परे और अक्षर से भी उत्तम हैं। इसी कारण वे लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हैं।
श्लोक 15.19
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
सरल भावार्थ: जो मोह से रहित होकर भगवान को पुरुषोत्तम रूप में जानता है, वह तत्त्व को जानने वाला होकर पूर्ण भाव से भगवान की भक्ति करता है।
श्लोक 15.20
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥
सरल भावार्थ: भगवान कहते हैं कि यह अत्यंत गूढ़ शास्त्र उन्होंने बताया है। इसे समझकर मनुष्य बुद्धिमान बनता है और अपने जीवन के कर्तव्य को सार्थक करता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post