राधा कृष्ण मय विश्व: 'मिश्री के अनुभव से तीनों गुण' – दिव्य ज्ञान-भक्ति वाणी और व्याख्या

राधा कृष्ण मय विश्व: 'मिश्री के अनुभव से तीनों गुण' – दिव्य ज्ञान-भक्ति वाणी और व्याख्या

राधा कृष्ण मय विश्व: 'मिश्री के अनुभव से तीनों गुण' – दिव्य ज्ञान-भक्ति वाणी और व्याख्या — यह रचना 'राधा कृष्ण मय विश्व' ज्ञान, भक्ति और इंद्रिय विज्ञान (ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव) का एक अद्भुत संगम है। इसमें मिश्री के व्यावहारिक उदाहरण और प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के माध्यम से संपूर्ण जगत में राधा-कृष्ण (परम चेतना) के दर्शन करने की बात कही गई है। जब एक भक्त की दृष्टि शुद्ध होती है, तो उसे इस संसार के कण-कण में, हर वस्तु और हर क्रिया में केवल अपने आराध्य के ही दर्शन होते हैं।

राधा कृष्ण मय विश्व: 'मिश्री के अनुभव से तीनों गुण

इस रचना में अध्यात्म को हमारे रोजमर्रा के अनुभवों और पांचों ज्ञानेन्द्रियों (आँख, नाक, कान, त्वचा, जीभ) के विज्ञान से जोड़कर समझाया गया है। यहां मिश्री का एक सरल उदाहरण देकर यह सिद्ध किया है कि यह संपूर्ण विश्व किस प्रकार राधा-कृष्ण के स्वरूप से ओत-प्रोत है।

॥ॐ श्री परमात्मने नमः॥
॥ॐ श्री सद्गुरुवे नमः॥

'राधा कृष्ण मय विश्व'

गोपी नित प्रात को, कृष्ण की बात को सुनके आती।
उसको सत्संग-चर्चा ही भाती।

वस्तु मिश्री से अनुभव कराया, 
मिश्र है तीनों वस्तु लखाया।
रूप राधा ही राधा दिखाया, 
ज्ञानेन्द्रियों ने स्थूल पाया॥

नेत्र ने देखकर, नाक ने सूँघकर, 
त्वचा छू-छू है दृ को पाया।
श्रोत्र को शब्द से ज्ञान आया, 
रसना को रस सभी में दिखाया॥

तीनों गुणों की क्रिया अब बताऊँ, 
सूक्ष्म इस हेतु मन को बुलाऊँ।

वस्तु को साथ जल के जो खाया, 
क्रिया होने से रज ही दिखाया।
सूखी खाने से तुमको ही पाया, 
घी से खाया सतोगुण में आया।

पंच तत्वों की यह मात्रायें,
तीन गुण इनमें हलचल मचायें।
अष्ट वस्तु का सारा पसारा,
यह है राधा का दरशन हमारा।

अष्ट वस्तु का सारा पसारा 
दीखती सत नजारा
अष्टधा प्रकृति विश्व ही विश्व 
दर्शन है दर्शन हमारा॥

​गोपी बुद्धि को निश्चय कराऊँ,
प्रिय मिठास को अब लखाऊँ
बीज मक्खन का सारा पसारा।
सत निराकार आकार सारा, है ज्ञान पाया।

मेरा स्वभाव है बीज का भाव, दृष्टि से सबको दिखाया
दिव्य दृष्टि से सबको दिखाया।

नाम शक्कर में दोनों का लय है, 
कृष्ण है मैं समाया।
सर्व ही कृष्ण है कृष्ण ही सद्रूप
सद्रूप पाया।

ज्ञानरूप अपना ही सबको लखाया।
कवि ने सत् निश्चय कराया।

विस्तृत व्याख्या: ज्ञानेन्द्रियों का विज्ञान और त्रिगुण बोध

गोपी भाव और सत्संग की महिमा

इस रचना के प्रारंभ में ही शुद्ध भक्ति यानी गोपी भाव है: 

"गोपी नित प्रात को, कृष्ण की बात को सुनने आती। उसको सत्संग-चर्चा ही भाती।" 

यहाँ 'गोपी' केवल ब्रज की एक पात्र नहीं, बल्कि शुद्ध और अनन्य भक्ति की अवस्था (गोपी भाव) का प्रतीक है। गोपी किसी संसारी प्रपंच में नहीं उलझती, उसका मन केवल कृष्ण की चर्चा और सत्संग में रमता है। वह प्रतिदिन प्रातः काल उठकर सबसे पहले कृष्ण की बात सुनने, समझने और उनके ध्यान में डूबने के लिए लालायित रहती है। 

गोपी का मन संसार के प्रपंचों या व्यर्थ की बातों में नहीं रमता; उसे केवल 'सत्संग-चर्चा' यानी परमात्मा के स्वरूप और उनकी लीलाओं की बातें ही भाती हैं। इसी सत्संग के माध्यम से गुरुदेव शिष्य को 'मिश्री' जैसी साधारण वस्तु का उदाहरण देकर एक परम सत्य का अनुभव कराते हैं कि कैसे एक ही तत्व में अनेक रूप मिश्रित हैं।

पांचों ज्ञानेन्द्रियों से राधा स्वरूप का दर्शन

इस अंतरे में बहुत ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है,

"वस्तु मिश्री से अनुभव कराया, मिश्र है तीनों वस्तु लखाया। रूप राधा ही राधा दिखाया, ज्ञानेन्द्रियों ने स्थूल पाया ।।"

यहाँ मिश्री केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि अनुभूति का प्रतीक है। सत्संग के माध्यम से गुरुदेव या साधक 'मिश्री' जैसी एक साधारण वस्तु का उदाहरण देकर एक परम आध्यात्मिक सत्य का अनुभव कराते हैं कि एक ही वस्तु को हमारी अलग-अलग ज्ञानेन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुभव करती हैं। इसी प्रकार परमात्मा भी एक ही होते हुए अनेक रूपों में अनुभव किए जाते हैं। 

जैसे मिश्री मीठी, ठोस और रसयुक्त होती है (या उसमें कई तत्व मिश्रित होते हैं), वैसे ही यह दृश्य जगत भी अलग-अलग रूपों का मिश्रण है। हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ बाहर संसार में जिस भी 'स्थूल' (दिखने वाली) वस्तु को पाती हैं, उसके पीछे जो सूक्ष्म सुंदरता और सत्ता है, वह वास्तव में "रूप राधा ही राधा दिखाया" अर्थात वह साक्षात आह्लादिनी शक्ति श्री राधा जी का ही स्वरूप है

हमारा यह स्थूल शरीर संसार को पांच इंद्रियों से अनुभव करता है, परंतु एक साधक इन इंद्रियों से भी परमात्मा को ही खोज लेता है:

"नेत्र ने देखकर, नाक ने सूँघकर । त्वचा छू-छू है दृ को पाया ।। श्रोत्र को शब्द से ज्ञान आया, रसना को रस सभी में दिखाया।"

यहाँ पांचों ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ईश्वर को अनुभव करने का बेहद सुंदर और वैज्ञानिक मार्ग बताया गया हैं:

नेत्र और नाक: आँखों ने संसार में जिस भी सुंदर रूप को देखा और नाक ने जिस पावन सुगंध को सूँघा, वह सब राधा का ही रूप है।

त्वचा और कान: त्वचा ने स्पर्श के माध्यम से जिस शीतलता या चैतन्यता को छुआ, उसने वास्तव में उस 'दृ' (द्रष्टा/चेतन तत्व) को ही पाया है। कानों में शब्द के माध्यम से जो भी सत्य का ज्ञान उतरता है, वह उसी ब्रह्म का नाद है, कानों ने शब्द के माध्यम से जिस ज्ञान को सुना, वह भी वही चेतना है।

रसना (जीभ): जीभ ने जिस मिठास या रस का अनुभव किया, वह रस भी साक्षात रसेश्वर कृष्ण का ही है। जीभ जब किसी भी भोजन या वस्तु का स्वाद लेती है, तो वह स्वाद या रस वास्तव में साक्षात 'रसो वै सः' (रस स्वरूप कृष्ण) का ही दर्शन कराता है।

उपनिषदों में भी कहा गया है कि परमात्मा प्रत्येक अनुभव के मूल में विद्यमान हैं। इसलिए जब दृष्टि बदल जाती है, तो वही इन्द्रियाँ, जो पहले संसार में बाँधती थीं, साधक को ईश्वर की ओर ले जाने का साधन बन जाती हैं।

इस प्रकार हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ जिस भी स्थूल वस्तु को पाती हैं, उसके भीतर सूक्ष्म रूप में "रूप राधा ही राधा दिखाया" की प्रतीति होने लगती है। अर्थात, यदि दृष्टि बदल जाए तो हमारी इंद्रियां हमें संसार में फंसाने के बजाय परमात्मा से मिलाने का साधन बन जाती हैं।

राधा और कृष्ण का दार्शनिक अर्थ

इस रचना का एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक पक्ष राधा और कृष्ण के दार्शनिक स्वरूप को समझना भी है।

  • राधा परमात्मा की आह्लादिनी शक्ति, प्रेम और दिव्य प्रकृति का प्रतीक हैं।
  • कृष्ण शुद्ध परम चैतन्य, ब्रह्म और सत्य स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • राधा और कृष्ण का मिलन संपूर्ण सृष्टि में शक्ति और चेतना की अभिन्न एकता का प्रतीक है।

इसी कारण भक्त को सम्पूर्ण विश्व राधा-कृष्णमय दिखाई देता है। जहाँ शक्ति है वहाँ चेतना भी है, और जहाँ चेतना है वहाँ परमात्मा का ही प्रकाश विद्यमान है। यही दृष्टि साधक को भेदभाव से ऊपर उठाकर अद्वैत अनुभूति की ओर ले जाती है।

सूक्ष्म मन की क्रिया और तीनों गुणों का रहस्य

इस रहस्य को और गहराई से समझने के लिए हमें अपने सूक्ष्म मन को एकाग्र करना होगा,

"तीनों गुणों की क्रिया अब बताऊँ, सूक्ष्म इस हेतु मन को बुलाऊँ।" 

प्रकृति के जो तीन गुण हैं, सत्व, रज और तम; उनकी क्रिया हमारे भीतर कैसे काम करती है, इसे समझने के लिए हमें अपने 'सूक्ष्म मन' को एकाग्र करना होगा। स्थूल बुद्धि से परे जाकर जब मन अंतर्मुखी होता है, तब इन तीनों गुणों का खेल समझ में आता है। 

मिश्री के उदाहरण द्वारा त्रिगुण की प्रतीकात्मक व्याख्या — इस भजन में मिश्री को खाने के तीन अलग-अलग तरीकों से प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) का सुंदर विश्लेषण किया गया हैं:

"वस्तु को साथ जल के जो खाया, क्रिया होने से रज ही दिखाया। सूखी खाने से तुमको ही पाया, घी से खाया सतोगुण में आया।"

यहाँ मिश्री (वस्तु) को ग्रहण करने के तीन अलग-अलग तरीकों से मानव स्वभाव और प्रकृति के तीनों गुणों को बहुत ही सरल ढंग से समझाया गया है:

  • रजोगुण (रज क्रिया): जब मिश्री को जल (पानी) के साथ मिलाकर पिया जाता है, तो वह शरीर में तुरंत घुलकर एक ऊर्जा और गतिशीलता पैदा करती है। यह चंचलता और सक्रियता प्रकृति के 'रजोगुण' का प्रतीक है।
  • तमोगुण (सूखी खाने से): जब उस मिश्री को बिना किसी माध्यम के, केवल रूखा या सूखा ही खा लिया जाता है, तो वह अपनी मूल और जड़ अवस्था में रहती है। यह बिना किसी विशेष चेतना या क्रिया के केवल स्वयं तक सीमित रहना 'तमोगुण' (जड़ता/अज्ञान) को दर्शाता है।
  • सतोगुण (घी के साथ): और जब उसी मिश्री को 'घी (जो कि सात्विकता का प्रतीक है)' के साथ मिलाकर ग्रहण किया जाता है (आयुर्वेद में भी घी और मिश्री का मिश्रण अत्यंत उत्तम और बुद्धि को शांत करने वाला माना गया है), तो वह मन और मस्तिष्क को परम शांति, ओज और पवित्रता प्रदान करता है, और बुद्धि और मन में 'सतोगुण' का उदय होता है। यह सात्विक संतुलन ही 'सतोगुण' कहलाता है।

मनुष्य के भीतर ये तीनों गुण निरंतर कार्य करते रहते हैं। साधना का लक्ष्य इनका संतुलन स्थापित करते हुए सत्व की ओर अग्रसर होना है।

(यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यह आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक उदाहरण है। इसका उद्देश्य आयुर्वेद या आधुनिक विज्ञान का कोई निश्चित नियम बताना नहीं, बल्कि साधक को त्रिगुण के स्वभाव का सहज बोध कराना है।)

पंच तत्व, अष्टधा प्रकृति और विराट दर्शन

रचना आगे चलकर भगवान के विराट स्वरूप की ओर संकेत करती है,

"पंच तत्वों की यह मात्राएँ,
तीन गुण इनमें हलचल मचाएँ।
अष्ट वस्तु का सारा पसारा,
यह है राधा का दर्शन हमारा॥"

सनातन दर्शन के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड पंच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) की निश्चित मात्राओं और मेल से बना है। प्रकृति के तीनों गुण (सत्व, रज, तम) निरंतर इनमें बदलाव या हलचल पैदा करते रहते हैं, जिससे संसार में परिवर्तन और विविधता दिखाई देती है।

गीता के अनुसार, पंचतत्व और मन, बुद्धि, अहंकार को मिलाकर भगवान की 'अष्टधा प्रकृति' (आठ प्रकार की शक्तियां) बनती है, अर्थात् मन, बुद्धि और अहंकार को पंचमहाभूतों के साथ जोड़ने पर भगवान की अष्टधा प्रकृति का स्वरूप प्रकट होता है।

इस संसार में जो भी आठों वस्तुओं का फैलाव (पसारा) और दृश्य दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में कुछ और नहीं बल्कि साक्षात् श्री राधा जी का ही विराट और सत्य रूप है। संपूर्ण विश्व को इस दृष्टि से देखना ही ईश्वर का वास्तविक दर्शन है।

"अष्टधा प्रकृति विश्व ही विश्व, दर्शन है दर्शन हमारा॥"

अर्थात यह सम्पूर्ण दृश्य जगत उसी दिव्य शक्ति का विस्तार है। जब साधक की दृष्टि शुद्ध हो जाती है, तब उसे सृष्टि का प्रत्येक कण ईश्वर की अभिव्यक्ति प्रतीत होता है। यही भाव "राधा कृष्ण मय विश्व" का वास्तविक अनुभव है।

गोपी बुद्धि, बीज-मक्खन का सिद्धांत और पूर्ण आत्मज्ञान

रचना का अंतिम चरण साधक को ज्ञान की पराकाष्ठा की ओर ले जाता है,

"गोपी बुद्धि को निश्चय कराऊँ, प्रिय मिठास को अब लखाऊँ। बीज मक्खन का सारा पसारा, सत् निराकार आकार सारा, है ज्ञान पाया॥"

कवि कहते हैं कि इस ज्ञान के माध्यम से मैं जीव की बुद्धि को 'गोपी बुद्धि' (यानी संशयरहित, शुद्ध और एकाग्र बुद्धि) में बदल दूँगा, जिससे वह ईश्वर के प्रेम की असली मिठास को चख सके। यहाँ 'गोपी बुद्धि' का अर्थ ऐसी निर्मल, निष्कपट और एकाग्र बुद्धि से है, जो संशय से मुक्त होकर केवल परमात्मा में स्थिर हो जाती है। ऐसी बुद्धि संसार के बाहरी आकर्षणों में नहीं उलझती, बल्कि प्रत्येक वस्तु के पीछे छिपे सत्य का अनुभव करने लगती है।

बीज का उदाहरण भी अत्यंत गहरा है। जिस प्रकार एक छोटे से बीज में विशाल वृक्ष की संपूर्ण संभावना छिपी रहती है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव में परम चेतना विद्यमान है। साधना का उद्देश्य उस छिपे हुए दिव्य स्वरूप को पहचानना है।

जैसे दूध के भीतर घी या मक्खन छिपा होता है और बीज के भीतर पूरा वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इस संसार के दृश्य आकारों के भीतर वह 'सत्य और निराकार' परमात्मा छिपा हुआ है। जब साधक को यह दिव्य दृष्टि (आध्यात्मिक नजरिया) प्राप्त होती है, तो उसे समझ आता है कि परमात्मा का मूल स्वभाव उस 'बीज' की तरह है, जो स्वयं अदृश्य रहकर भी पूरे संसार रूपी वृक्ष को प्रकट करता है और हर आकार में स्वयं ही वास करता है।

शक्कर का लय, सर्वमयी कृष्ण और परम तत्व का निश्चय

अंत में, इस रचना में अद्वैत स्थिति (पूर्ण मिलन) का वर्णन है।

"नाम शक्कर में दोनों का लय है,कृष्ण है मैं समाया।सर्व ही कृष्ण है, कृष्ण ही सद्रूप,सद्रूप पाया॥"

जैसे शक्कर शब्द कहने मात्र से मिठास और शक्कर के अस्तित्व को अलग नहीं किया जा सकता, वे एक-दूसरे में पूरी तरह विलीन (लय) हैं, ठीक उसी तरह श्री राधा और श्री कृष्ण एक ही तत्व हैं। 

जब भक्त का अहंकार समाप्त होने लगता है, तब उसे अनुभव होता है कि 'मुझमें (मेरी आत्मा में) भी साक्षात् कृष्ण ही समाए हुए हैं, परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि स्वयं उसके भीतर और सम्पूर्ण सृष्टि में विद्यमान हैं।

यही अनुभव उपनिषदों के "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" तथा श्रीमद्भगवद्गीता के "वासुदेवः सर्वम्" जैसे महावाक्यों की ओर संकेत करता है। इस अवस्था में भेदभाव समाप्त होने लगता है और प्रत्येक जीव में वही एक परम चेतना दिखाई देती है।

संसार में जो कुछ भी सत्य रूप में विद्यमान है, वह सब श्री कृष्ण ही हैं और संपूर्ण जगत उनका ही 'सद्रूप' (सत्य स्वरूप) है। परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि स्वयं का ही वास्तविक 'ज्ञानरूप' (चैतन्य स्वरूप) है, जिसे पहचानना ही जीवन का परम लक्ष्य है। यह संपूर्ण विश्व राधा-कृष्ण मय ही है।

यह रचना हमें सिखाती है कि भक्ति कोई बाहरी आडंबर नहीं है, बल्कि अपनी दृष्टि को ऐसा बना लेना है कि संसार की हर क्रिया और हर स्वाद में हमें केवल ईश्वर की ही सत्ता दिखाई दे। मिश्री की मिठास की तरह यह संपूर्ण विश्व भी राधा-कृष्ण के आनंदमयी रस से ही भरा हुआ है।

निष्कर्ष

'राधा कृष्ण मय विश्व' केवल एक भजन नहीं, बल्कि भक्ति, वेदांत और आत्मचिंतन का सुंदर समन्वय है। मिश्री, पाँच ज्ञानेन्द्रियों और त्रिगुण के सरल उदाहरणों के माध्यम से यह रचना हमें बताती है कि परमात्मा किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं।

इस भजन का मुख्य संदेश यही है कि जब साधक की दृष्टि शुद्ध होती है, तब संसार की प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक अनुभव और प्रत्येक जीव में उसी परम चेतना का दर्शन होने लगता है। यही दृष्टि भक्ति को अनुभव में और अनुभव को आत्मबोध में परिवर्तित करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'राधा कृष्ण मय विश्व' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि सम्पूर्ण सृष्टि में राधा-कृष्ण अर्थात शक्ति और परम चेतना का ही विस्तार विद्यमान है।

2. मिश्री के उदाहरण से क्या समझाया गया है?

मिश्री के माध्यम से यह बताया गया है कि एक ही वस्तु का अनुभव अलग-अलग इन्द्रियाँ भिन्न प्रकार से करती हैं। उसी प्रकार परमात्मा भी अनेक रूपों में अनुभव किए जाते हैं।

3. सत्व, रज और तम क्या हैं?

ये प्रकृति के तीन मूल गुण हैं। सत्व शुद्धता और संतुलन, रज सक्रियता तथा तम जड़ता और अज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

4. पाँच ज्ञानेन्द्रियों का आध्यात्मिक महत्व क्या है?

शुद्ध दृष्टि होने पर यही ज्ञानेन्द्रियाँ साधक को संसार में बाँधने के बजाय परमात्मा की अनुभूति का माध्यम बन सकती हैं।

5. अष्टधा प्रकृति क्या है?

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये भगवान की अष्टधा (आठ प्रकार की) प्रकृति हैं।

6. राधा और कृष्ण का दार्शनिक अर्थ क्या है?

राधा दिव्य शक्ति (आह्लादिनी शक्ति) और कृष्ण परम चैतन्य के प्रतीक हैं। दोनों की अभिन्न एकता सम्पूर्ण सृष्टि के प्राकट्य और संचालन का दार्शनिक आधार मानी जाती है।


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।हरि ॐ तत्सत्।

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About the Author (लेखिका के बारे में)

Mrs. ChandraBati Agarwal (श्रीमती चंद्रवती अग्रवाल)

संस्कृत विषय में एम.ए.। बचपन से ही उन्हें भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण और अन्य धर्मग्रंथों के अध्ययन एवं मनन में गहरी रुचि रही है। वर्षों के अध्ययन, चिंतन और जीवनानुभव के आधार पर वे आध्यात्मिक विचार, प्रेरणादायक धार्मिक लेख, मधुर भजन, आरतियाँ और सात्विक जीवन से जुड़ी उपयोगी जानकारी सरल एवं सहज भाषा में साझा करती हैं।।

Author at Prinsli.com


संदर्भ (References)

नीचे दिए गए ग्रंथ लेख में वर्णित आध्यात्मिक सिद्धांतों की पृष्ठभूमि के लिए संदर्भ स्वरूप हैं।

  • श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 7 (ज्ञान-विज्ञान योग), अध्याय 14 (त्रिगुण विभाग योग), अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग)
  • श्रीमद्भागवत महापुराण – दशम स्कंध (श्रीकृष्ण एवं गोपी-भाव)
  • तैत्तिरीय उपनिषद
  • छांदोग्य उपनिषद

नोट (Disclaimer): 

यह लेख आध्यात्मिक, दार्शनिक और भक्तिपरक दृष्टिकोण से तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत त्रिगुण, मिश्री तथा अन्य उदाहरण प्रतीकात्मक व्याख्या के रूप में दिए गए हैं। इनका उद्देश्य शास्त्रीय भाव को सरल भाषा में समझाना है, न कि किसी वैज्ञानिक या चिकित्सीय सिद्धांत का प्रतिपादन करना।

Tags: राधा कृष्ण मय विश्व, ज्ञानेन्द्रियों का आध्यात्मिक महत्व, तीन गुण और अध्यात्म, भजन कोष हिंदी

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