श्री दुर्गा कवच का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, सरल हिन्दी अर्थ | देवी कवच (Shri Durga Kavach Lyrics in Sanskrit Paath)

श्री दुर्गा कवच: सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, सरल हिन्दी अर्थ (Shri Durga Kavach Lyrics in Hindi with Sanskrit Paath)          

देवी कवच | देव्याः कवचम् | Durga Kavach Sanskrit Path with Hindi Meaning

Durga Kavach Lyrics in Hindi with Sanskrit Paath: माँ दुर्गा कवच संस्कृत में हिंदी अर्थ के साथ — इस लेख में आपको श्री दुर्गा कवच का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ (दुर्गा सप्तशती, मार्कण्डेय पुराण), उसका सरल हिन्दी अर्थ तथा आवश्यक जानकारी एक ही स्थान पर मिलेगी। इस लेख में श्री दुर्गा कवच का मूल शास्त्रीय पाठ संस्कृत और हिंदी में है। इस लेख में दिए गए संस्कृत श्लोकों का उद्देश्य मूल पाठ उपलब्ध कराना है, जबकि साथ में दिया गया सरल हिन्दी अर्थ प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझने में सहायता करेगा। 

यदि आपका उद्देश्य केवल श्री दुर्गा कवच का सम्पूर्ण संस्कृत पाठ पढ़ना है, तो आप नीचे दिए गए श्लोकों का पाठ कर सकते हैं। यदि आप प्रत्येक श्लोक का अर्थ भी समझना चाहते हैं, तो प्रत्येक श्लोक के साथ उसका सरल हिन्दी भावार्थ भी पढ़ें।

श्री दुर्गा कवच क्या है?

श्री दुर्गा कवच, जिसे संस्कृत में “देव्याः कवचम्” कहा गया है, देवी-उपासना की एक प्रसिद्ध स्तुति है। श्री दुर्गा कवच, देवी महात्म्य का एक महत्वपूर्ण अंग है। देवी महात्म्य, मार्कण्डेय पुराण का प्रसिद्ध भाग है, जिसे सामान्यतः दुर्गा सप्तशती, चण्डी पाठ या श्री चण्डी के नाम से भी जाना जाता है। देवी उपासना की परंपरा में श्री दुर्गा कवच का विशेष स्थान है और अनेक साधक इसे श्रद्धा के साथ पढ़ते हैं।

इसमें साधक देवी के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करते हुए शरीर के अलग-अलग अंगों, दिशाओं, जीवन के विभिन्न पक्षों और अपने मार्ग की रक्षा के लिए देवी से प्रार्थना करता है।

देवी कवच कहाँ मिलता है?

देवी कवच का आरम्भ “अथ देव्याः कवचम्” से होता है। पाठ में मार्कण्डेय ऋषि ब्रह्माजी से उस परम गुप्त और सर्वरक्षाकर कवच के विषय में पूछते हैं, जिसके उत्तर में ब्रह्माजी देवी के कवच का वर्णन करते हैं।

देवी कवच का पाठ दुर्गासप्तशती/देवीमाहात्म्य की पाठ-परम्परा में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके साथ विभिन्न परम्पराओं में अर्गला स्तोत्र, कीलक स्तोत्र आदि का भी पाठ किया जाता है। इनके पाठ-क्रम और विधि में परम्परा के अनुसार अंतर हो सकता है।

"कवच" शब्द का सामान्य अर्थ रक्षा करने वाला आवरण होता है। यह दुर्गा कवच नकारात्मक शक्तियों के प्रभावों को दूर करने के लिए बहुत ही शक्तिशाली मंत्र (कवच) माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में "कवच" ऐसे स्तोत्र को कहा जाता है जिसमें साधक देवी या देवता की शरण ग्रहण कर उनकी कृपा और संरक्षण की प्रार्थना करता है। 

श्री दुर्गा कवच में भी माँ भगवती के अनेक दिव्य स्वरूपों का स्मरण करते हुए शरीर के विभिन्न अंगों, दसों दिशाओं तथा जीवन के विविध पक्षों की रक्षा की प्रार्थना की गई है। दुर्गा कवच का पाठ माता दुर्गा से रक्षा की प्रार्थना करने के लिए किया जाता है। दुर्गा कवच (Durga Kavach) का पाठ किसी भी बुरी आत्मा से बचाव के लिए एक कवच के रूप में कार्य करता है। यह दिव्य दुर्गा कवच भगवान ब्रह्मा जी के द्वारा ऋषि मार्कंडेय जी को सुनाया गया था।

इस पाठ में देवी के अनेक स्वरूपों जैसे चामुण्डा, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ब्राह्मी, महालक्ष्मी और भैरवी, का वर्णन मिलता है। साथ ही शरीर के सिर से लेकर पैरों तक विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए अलग-अलग देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है। देवी कवच की फलश्रुति में इसके पाठ और धारण से अनेक प्रकार के आध्यात्मिक एवं लौकिक लाभों का वर्णन मिलता है।

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श्री दुर्गा कवच या देवी कवच: सम्पूर्ण संस्कृत पाठ हिन्दी अर्थ के साथ | Maa Durga Kavach Lyrics in Sanskrit with Hindi Arth

(दुर्गा सप्तशती, मार्कण्डेय पुराण, गीता प्रेस से लिया गया मूल संस्कृत पाठ)

॥ अथ श्री देव्याः कवचम् ॥

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै॥

ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

मार्कण्डेय उवाच

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

ऋषि मार्कण्डेय ब्रह्माजी से कहते हैं — मार्कण्डेय जी ने कहा हे पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइए।

ब्रह्मोवाच

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

ब्रह्माजी कहते हैं — ब्रह्मन्! हे महान् मुनि! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करनेवाला है। महामुने! उसे श्रवण करो।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥३॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चन्द्रघण्टा तथा चतुर्थ कूष्माण्डा हैं।

पाँचवीं दुर्गा का नाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ स्वरूप कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी है।

नवाँ स्वरूप सिद्धिदात्री है। इस प्रकार इन नौ स्वरूपों को नवदुर्गा कहा गया है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं।

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता।

(अर्थात् जो व्यक्ति अग्नि, युद्ध, कठिन परिस्थितियों या भय के समय देवी की शरण ग्रहण करता है, उसके लिए देवी का स्मरण आश्रय माना गया है।)

न तेषां जायते किंचित् अशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

युद्ध के समय संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती। उन्हें शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती। 

(ब्रह्माजी कहते हैं कि जो श्रद्धापूर्वक देवी का स्मरण करते हैं, उनके लिए संकट की घड़ी में देवी की कृपा की कामना की जाती है। श्लोक में ऐसे भक्तों के लिए शोक, भय और विपत्ति से रक्षा की प्रार्थना व्यक्त की गई है।)

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है, उनका कल्याण और उन्नति होती है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करती हो।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

चामुण्डादेवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं।

(इस श्लोक में देवी की चार दिव्य शक्तियों का वर्णन है। चामुण्डा प्रेत पर, वाराही महिष (भैंसे) पर, ऐन्द्री गजराज (ऐरावत) पर तथा वैष्णवी गरुड़ पर विराजमान हैं। यहाँ विभिन्न देवशक्तियों के वाहन बताए गए हैं। प्रत्येक वाहन उस देवी के विशिष्ट स्वरूप और दैवी कार्य का द्योतक है।)

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥

सरल हिन्दी भावार्थ:

माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं। कौमारी का मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमल के आसन पर विराजमान हैं, और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं।

(इस श्लोक में देवी के अन्य स्वरूपों का वर्णन है। माहेश्वरी वृषभ (बैल) पर आरूढ़ है। कौमारी मयूर (मोर) को अपना वाहन रखने वाली है। लक्ष्मी कमल पर विराजमान, हाथों में कमल धारण करने वाली तथा भगवान विष्णु की प्रिय है। इन स्वरूपों के माध्यम से देवी की विविध शक्तियों और गुणों का स्मरण किया जाता है।)

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥

सरल भावार्थ:

ईश्वरी देवी श्वेत रूप धारण करके वृषभ पर विराजमान हैं। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हैं और विविध आभूषणों से विभूषित हैं। 

(श्वेत वर्ण पवित्रता और सात्त्विकता का द्योतक माना गया है, जबकि हंस ज्ञान और विवेक का प्रतीक है।)

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥

सरल भावार्थ:

ये सभी मातृशक्तियाँ विविध योगशक्तियों से सम्पन्न हैं। वे अनेक प्रकार के आभूषणों और रत्नों से अलंकृत होकर शोभायमान हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं।

(देवी के प्रत्येक स्वरूप में विशिष्ट शक्ति और सामर्थ्य निहित है। अलंकार यहाँ केवल बाहरी सौन्दर्य नहीं, बल्कि दैवी ऐश्वर्य का भी संकेत हैं।)

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥

सरल भावार्थ:

ये सम्पूर्ण देवियाँ भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी दिखाई देती हैं और क्रोध में भरी हुई हैं। ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, ढाल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त औ त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथ में धारण करती हैं। वे इन अस्त्र-शस्त्रों को दैत्यों के विनाश, भक्तों को अभय प्रदान करने तथा देवताओं के कल्याण के लिए धारण करती हैं।

दैत्यों के शरीर का नाश करना, भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है।

(इन श्लोकों का महत्व — इन श्लोकों में देवी के अनेक आयुधों का वर्णन केवल युद्ध का चित्रण नहीं है। शास्त्रीय परम्परा में ये आयुध धर्म की रक्षा, अधर्म के दमन, भक्तों के संरक्षण तथा दैवी व्यवस्था की स्थापना के प्रतीक माने गए हैं। इसी कारण देवी को अनेक आयुधों से अलंकृत रूप में चित्रित किया जाता है।)

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥

सरल भावार्थ:

कवच आरंभ करने से पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए —  महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साह वाली देवी! तुम महान् भय का नाश करने वाली हो, तुम्हें नमस्कार है।

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥

सरल भावार्थ:

तुम्हारी और देखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिके! मेरी रक्षा करो। 

पूर्व दिशा में ऐन्द्री (इन्द्रशक्ति) मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति, दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे।

उत्तर दिशा में कौमारी और ईशानकोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे।

(इन श्लोकों में दसों दिशाओं में देवी की विभिन्न शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना की गई है। इसलिए इसे "दिग्बन्ध" या "सर्वदिक्-रक्षा" का भाव भी कहा जाता है।)

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥

सरल भावार्थ:

इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनानेवाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करे। जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे।

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥

सरल भावार्थ:

वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे।

मालाधरी ललाटे च भ्रुवो रक्षेद्यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥

सरल भावार्थ:

ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे।

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी॥२३॥

सरल भावार्थ:

दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शङ्खिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करें। कालिका देवी दोनों कपोलों की तथा भगवती शांकरी कानों के मूल भाग की रक्षा करें।

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥

सरल भावार्थ:

नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओंठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओंठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती रक्षा करे।

(यहाँ वाणी, स्वाद और इन्द्रियों की पवित्रता एवं संरक्षण का भाव व्यक्त किया गया है।)

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥

सरल भावार्थ:

कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे।

(इन श्लोकों का महत्व — श्लोक 17 से 25 तक देवी कवच में शरीर और दिशाओं की रक्षा का क्रम प्रारम्भ होता है। इसमें भक्त अपने सम्पूर्ण शरीर तथा चारों दिशाओं के लिए देवी के विविध स्वरूपों का स्मरण करता है। शास्त्रीय दृष्टि से यह सम्पूर्ण आत्मसमर्पण और देवी की शरणागति का प्रतीक है।)

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥

सरल भावार्थ:

कामाक्षी ठोढी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड) में रहकर रक्षा करे।

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खङ्‍गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥

सरल भावार्थ:

कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्‍वरी॥२८॥

सरल भावार्थ:

दोनों हाथों में दण्डिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि (पेट) में रहकर रक्षा करे।

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥

सरल भावार्थ:

महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥

सरल भावार्थ:

नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका मेढ्र (जननेंद्रिय) की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥

सरल भावार्थ:

भगवती कटि भाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥

सरल भावार्थ:

नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की उँगलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे।

(इन श्लोकों का महत्व — श्लोक 26 से 32 तक देवी कवच में भक्त अपने शरीर के विभिन्न अंगों—ग्रीवा, मेरुदण्ड, कंधे, भुजाएँ, हाथ, उँगलियाँ, नाखून, वक्षस्थल, हृदय, उदर, नाभि, कटि, घुटने, जंघाएँ, टखने, पैर तथा पैरों की उँगलियों—की रक्षा के लिए देवी के विविध स्वरूपों का स्मरण करता है। प्रत्येक अंग की रक्षा के लिए एक विशिष्ट देवी का आवाहन किया गया है।)

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा॥३३॥

सरल भावार्थ:

अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करे।

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी॥३४॥

सरल भावार्थ:

पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, माँस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे। 

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥

सरल भावार्थ:

मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूड़ामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करे।


शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्‍वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥

सरल भावार्थ:

ब्रह्माणी!आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार,मन और बुद्धि की रक्षा करे।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥

सरल भावार्थ:

हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे।

(वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—इन पाँच प्राणवायुओं की रक्षा करें तथा कल्याणशोभना देवी मेरे प्राण की रक्षा करें।)

रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्‍चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥

सरल भावार्थ:

रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्वगुण,रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे।

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥

सरल भावार्थ:

वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी (चक्र धारण करने वाली) देवी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करे।

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥

सरल भावार्थ:

इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे।

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥

सरल भावार्थ:

मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे।

(सुपथा देवी मेरे पथ की और क्षेमकरी देवी मेरे मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी और सभी ओर विजया देवी मेरी रक्षा करें।)

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥

सरल भावार्थ:

देवी! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, रक्षा से रहित है, वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥

सरल भावार्थ:

यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाए। कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। 

(जो अपने लिए मंगल चाहता है, वह इस कवच से सुरक्षित होकर ही जहाँ-जहाँ जाए, वहाँ देवी की रक्षा उसके साथ रहे।, अर्थात् जो अपने लिए शुभ चाहता है, वह कवच से आवृत हुए बिना एक कदम भी न चले; वह जहाँ-जहाँ जाए, कवच से सुरक्षित होकर जाए।)

तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम्।
परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥

सरल भावार्थ:

कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है,वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलना रहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है।

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥

सरल भावार्थ:
कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है।

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥४७॥

सरल भावार्थ:

देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है। तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु रहित हो, सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है।

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥

सरल भावार्थ:

मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर,भाँग,अफीम,धतूरे आदि का स्थावर विष,साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष-ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं,उनका कोई असर नहीं होता।

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः॥४९॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः॥५०॥

ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥

सरल भावार्थ:
इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के मन्त्र-यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। 

ये ही नहीं,पृथ्वी पर विचरने वाले ग्राम देवता,आकाशचारी देव विशेष,जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण,उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्नकोटि के देवता,अपने जन्म से साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरण करनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ,ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किए रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। 

कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान वृद्धि प्राप्ति होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है।

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥

सरल भावार्थ:

कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश से साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥

लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥

सरल भावार्थ:
देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याण शिव के साथ आनन्द का भागी होता है।

॥इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्॥


दुर्गा कवच/ देवी कवच का सरल हिन्दी अर्थ

नीचे दिए गए अर्थ शब्दशः अनुवाद का दावा नहीं करते, बल्कि प्रत्येक श्लोक का सरल और पाठक-अनुकूल अर्थ प्रस्तुत करते हैं। जहाँ कोई बात पारंपरिक भावार्थ है, उसे उसी रूप में रखा गया है।

1. मार्कण्डेय ऋषि का प्रश्न

मार्कण्डेय ऋषि ब्रह्माजी से कहते हैं कि संसार में मनुष्यों की रक्षा करने वाला जो अत्यन्त गुप्त और महत्वपूर्ण ज्ञान है, जिसे हर किसी को नहीं बताया गया, उसके विषय में मुझे बताइए।

सरल भाव:
ऋषि ऐसा आध्यात्मिक उपाय जानना चाहते हैं जिसे शास्त्र में रक्षात्मक और अत्यन्त महत्वपूर्ण बताया गया है।

2. ब्रह्माजी द्वारा देवी कवच का परिचय

ब्रह्माजी कहते हैं कि हे विप्र! देवी का यह पवित्र कवच अत्यन्त गुप्त और सभी प्राणियों के कल्याण से जुड़ा हुआ है। हे महामुनि, इसे ध्यानपूर्वक सुनो।

भाव:
देवी कवच को कल्याणकारी देवी-उपासना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

नवदुर्गा का स्मरण

3–5. नवदुर्गा के नौ स्वरूप

कवच में देवी के नौ स्वरूपों का नाम लिया गया है,

  1. शैलपुत्री
  2. ब्रह्मचारिणी
  3. चन्द्रघण्टा
  4. कूष्माण्डा
  5. स्कन्दमाता
  6. कात्यायनी
  7. कालरात्रि
  8. महागौरी
  9. सिद्धिदात्री

इन नौ स्वरूपों को नवदुर्गा कहा गया है। पाठ में कहा गया है कि ये नाम महात्मा ब्रह्मा द्वारा बताए गए हैं।

6–8. संकट में देवी का स्मरण

कवच में कहा गया है कि अग्नि से घिरे होने, शत्रुओं के बीच होने, कठिन अथवा दुर्गम परिस्थिति में होने और भय से पीड़ित व्यक्ति यदि देवी की शरण लेता है, तो उसके लिए अशुभ और संकट से मुक्ति की प्रार्थना की गई है।

आगे कहा गया है कि जो लोग भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण करते हैं, उनकी वृद्धि होती है और देवी उनका संरक्षण करती हैं।

आधुनिक समझ:
इन श्लोकों को देवी में श्रद्धा, आश्रय और संकट के समय मानसिक-आध्यात्मिक संबल की अभिव्यक्ति के रूप में भी समझा जा सकता है।

देवी के विभिन्न स्वरूप और उनके वाहन

9–12. मातृशक्तियों का वर्णन

इन श्लोकों में देवी के अनेक स्वरूपों और उनके वाहनों का वर्णन मिलता है।

चामुण्डा, वाराही, ऐन्द्री, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, लक्ष्मी, ईश्वरी और ब्राह्मी आदि शक्तियों का उल्लेख किया गया है।

इनके साथ क्रमशः विभिन्न वाहन और आयुधों का वर्णन मिलता है।

इन श्लोकों का भाव

देवी को अनेक शक्तियों के समन्वित स्वरूप के रूप में देखा गया है। अलग-अलग देवी-स्वरूप शक्ति के अलग-अलग आयामों का प्रतीक माने जाते हैं।

देवी के आयुध

13–15. शंख, चक्र, गदा, शक्ति और अन्य आयुध

कवच में शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मुसल, खेटक, तोमर, परशु, पाश, कुन्त, त्रिशूल और शार्ङ्ग आदि आयुधों का वर्णन है।

इन आयुधों का उद्देश्य दैत्यों के विनाश, भक्तों को अभय देने और देवताओं के हित की रक्षा के रूप में बताया गया है।

प्रतीकात्मक अर्थ

भक्तिपरक व्याख्या में इन आयुधों को विभिन्न आंतरिक शक्तियों से भी जोड़ा जाता है, जैसे साहस, विवेक, आत्मसंयम और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष।

(लेकिन यह प्रतीकात्मक व्याख्या है; इसे मूल संस्कृत श्लोक का शब्दशः अर्थ नहीं समझना चाहिए।)

देवी से रक्षा की प्रार्थना

16. देवी की स्तुति

साधक देवी को अत्यन्त उग्र शक्ति, महान पराक्रम और महान सामर्थ्य वाली तथा भय का नाश करने वाली शक्ति के रूप में प्रणाम करता है।

वह देवी से अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करता है।

दसों दिशाओं की रक्षा

17–20. दिशाओं में देवी-स्वरूप

कवच में पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान दिशाओं के साथ ऊपर और नीचे की दिशा की रक्षा के लिए अलग-अलग देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

इनमें ऐन्द्री, अग्निदेवता, वाराही, खड्गधारिणी, वारुणी, मृगवाहिनी, कौमारी, शूलधारिणी, ब्राह्मी और वैष्णवी आदि के नाम आते हैं।

दसों दिशाओं की रक्षा के लिए चामुण्डा का भी स्मरण किया गया है।

इसका भाव

साधक केवल अपने शरीर की ही नहीं, बल्कि चारों ओर से देवी की कृपा और संरक्षण की प्रार्थना करता है।

आगे, पीछे और दोनों पार्श्वों की रक्षा

20–21. जया, विजया, अजिता और अपराजिता

कवच में कहा गया है कि—

  • जया आगे से रक्षा करें।
  • विजया पीछे से रक्षा करें।
  • अजिता बाईं ओर रक्षा करें।
  • अपराजिता दाईं ओर रक्षा करें।

शिखा, मस्तक आदि की रक्षा के लिए भी देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा

देवी कवच का यह सबसे विस्तृत भाग है। इसमें शरीर के अनेक अंगों के लिए अलग-अलग देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

सिर और चेहरे की रक्षा

कवच में मस्तक, ललाट, भौंहों, भौंहों के मध्य, नासिका, आँखों, कानों, गाल और कानों के मूल आदि की रक्षा के लिए विभिन्न देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

इसका भाव यह है कि साधक अपने ज्ञानेंद्रियों और चेतना के प्रमुख केन्द्रों को देवी की शरण में समर्पित करता है।

नासिका, मुख और वाणी

नासिका के लिए सुगन्धा, होंठों के लिए चर्चिका और अमृतकला, जिह्वा के लिए सरस्वती तथा वाणी के लिए सर्वमंगला का स्मरण किया गया है।

भाव

वाणी को देवी को समर्पित करने का अर्थ यह भी समझा जा सकता है कि मनुष्य अपनी वाणी को शुभ, सत्य और मंगलकारी बनाए।

दाँत, कण्ठ और तालु

दाँत, कण्ठ, घंटिका और तालु की रक्षा के लिए कौमारी, चण्डिका, चित्रघण्टा और महामाया आदि देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

ठोड़ी, गर्दन और पीठ

चिबुक के लिए कामाक्षी, वाणी के लिए सर्वमंगला, गर्दन के लिए भद्रकाली और पृष्ठवंश के लिए धनुर्धरी का स्मरण किया गया है।

कंधे, भुजाएँ और हाथ

कवच में कंधों, भुजाओं, हाथों, उँगलियों और नाखूनों की रक्षा के लिए खड्गिनी, वज्रधारिणी, दण्डिनी, अम्बिका और शूलेश्वरी आदि देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

छाती, हृदय और उदर: स्तन, हृदय और पेट

स्तनों की रक्षा के लिए महामाया तथा मन के शोक को दूर करने वाली देवी का स्मरण किया गया है।

हृदय के लिए ललिता और उदर के लिए शूलधारिणी का स्मरण मिलता है।

भाव

हृदय और मन को देवी के संरक्षण में सौंपना इस स्तुति का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक भाव है।

नाभि और शरीर के निचले अंग

नाभि के लिए कामिनी, गुह्य भाग के लिए गुह्येश्वरी तथा मेढ्र और गुदा आदि के लिए संबंधित देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

कमर, घुटने और पैरों की रक्षा

कटि के लिए भगवती, घुटनों के लिए विन्ध्यवासिनी, जंघाओं के लिए महाबला, गुल्फ अर्थात टखनों के लिए नारसिंही और पैरों के अन्य भागों के लिए तैजसी आदि देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

त्वचा, रक्त, मज्जा और शरीर के अन्य तत्त्व

कवच आगे शरीर के नख, केश, रोमकूप, त्वचा, रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि, मेद, आन्त्र, पित्त और कफ आदि का उल्लेख करता है।

इन विभिन्न शरीर-तत्त्वों के लिए अलग-अलग देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

इसका भाव

यहाँ कवच की प्रार्थना केवल शरीर के दिखाई देने वाले अंगों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शरीर के सूक्ष्म और आंतरिक घटकों तक देवी की रक्षा की कल्पना करती है।

प्राण, मन और बुद्धि

36–38. आंतरिक जीवन की रक्षा

कवच में अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा के लिए धर्मधारिणी का स्मरण किया गया है।

इसके बाद—

  • प्राण
  • अपान
  • व्यान
  • उदान
  • समान

इन पाँच प्राणवायु का उल्लेख मिलता है।

इनकी रक्षा के लिए देवी का स्मरण किया गया है।

आगे रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श तथा सत्त्व, रज और तम—इनका भी उल्लेख है।

महत्वपूर्ण

यह भाग यह दर्शाता है कि कवच की प्रार्थना केवल बाहरी शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रिय-अनुभवों तक देवी के संरक्षण की भावना व्यक्त की गई है।

आयु, धर्म, यश और विद्या

39–40. जीवन के विभिन्न पक्ष

कवच में आयु की रक्षा के लिए वाराही, धर्म के लिए वैष्णवी और यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या के लिए देवी-स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

इसके बाद गोत्र, पशु, पुत्र और परिवार आदि की रक्षा की प्रार्थना आती है।

भाव

यहाँ साधक अपने जीवन के व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पक्षों को देवी की शरण में समर्पित करता है।

मार्ग और यात्रा की रक्षा

41–43. सुरक्षित मार्ग की प्रार्थना

कवच में अच्छे मार्ग की रक्षा और यात्रा के दौरान कल्याण की प्रार्थना की गई है।

राजद्वार आदि परिस्थितियों में भी देवी की रक्षा का स्मरण किया गया है।

इसके बाद कहा गया है कि जहाँ कवच द्वारा किसी स्थान की विशेष रक्षा का उल्लेख न हुआ हो, वहाँ भी देवी जयन्ती और पापनाशिनी उस स्थान की रक्षा करें।

43वें श्लोक का भाव

कवच से आवृत होकर साधक जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ देवी की रक्षा की भावना उसके साथ रहती है।

देवी कवच की फलश्रुति

44–47. पाठ से बताए गए फल

कवच की फलश्रुति में इसके पाठ से अर्थलाभ, विजय, इच्छित फल, ऐश्वर्य, निर्भयता और सम्मान आदि अनेक फलों का वर्णन किया गया है।

नियमपूर्वक और श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले व्यक्ति के लिए दीर्घायु और अन्य शुभ फलों का भी वर्णन मिलता है।

ये कथन देवी कवच की पारंपरिक शास्त्रीय फलश्रुति हैं। 

रोग और विष के संबंध में फलश्रुति

48. शास्त्रीय कथन

फलश्रुति में विभिन्न व्याधियों तथा स्थावर-जंगम और कृत्रिम विष आदि के नष्ट होने का वर्णन मिलता है।

अभिचार, भूत-पिशाच आदि का उल्लेख

49–52. पारंपरिक धार्मिक संदर्भ

कवच की फलश्रुति में अभिचार, मन्त्र-यन्त्र तथा विभिन्न प्रकार के अदृश्य या अलौकिक माने गए प्राणियों और शक्तियों का उल्लेख आता है।

पाठ के अनुसार कवच को हृदय में धारण करने वाले व्यक्ति के संबंध में इनके प्रभाव के नष्ट होने का वर्णन किया गया है।

“देवी कवच की पारंपरिक फलश्रुति में विभिन्न प्रकार के भय, अभिचार तथा अदृश्य शक्तियों से रक्षा का वर्णन मिलता है।”

मान-सम्मान और कीर्ति

फलश्रुति में राजा के मान-सम्मान, तेज की वृद्धि और यश-कीर्ति बढ़ने का भी वर्णन है।

दुर्गासप्तशती के पाठ से संबंध

53. कवच और सप्तशती

कवच की फलश्रुति में आगे चण्डी अर्थात सप्तशती के पाठ से पहले कवच करने का उल्लेख है। इसी कारण देवी उपासना की अनेक परम्पराओं में देवी कवच को सप्तशती-पाठ के आरम्भिक अंगों में स्थान दिया जाता है।

हालाँकि पाठ की पूर्ण विधि और क्रम अपनी परम्परा, गुरु या जिस संस्करण का अनुसरण किया जा रहा है, उसके अनुसार रखना चाहिए।

पुत्र-पौत्र और आध्यात्मिक फल

54–56. अंतिम फलश्रुति

अंतिम श्लोकों में पृथ्वी पर वंश की निरंतरता, मृत्यु के बाद दुर्लभ परम स्थान की प्राप्ति तथा महामाया की कृपा से परम स्वरूप की प्राप्ति जैसे आध्यात्मिक फलों का वर्णन मिलता है।

अंतिम भाव देवी की कृपा और आध्यात्मिक उन्नति की ओर संकेत करता है।


देवी कवच में किन-किन प्रकार की रक्षा की प्रार्थना है?

देवी कवच को संक्षेप में देखें तो इसमें निम्न प्रकार की रक्षा का भाव मिलता है:

क्षेत्र कवच में प्रार्थना
दिशाएँ दसों दिशाओं की रक्षा
सिर मस्तक और शिखा की रक्षा
चेहरा आँख, कान, नाक, मुख आदि
वाणी जिह्वा और वाणी की रक्षा
शरीर गर्दन से पैरों तक विभिन्न अंग
आंतरिक शरीर रक्त, मज्जा, मांस, अस्थि आदि
मन मन और अहंकार की रक्षा
बुद्धि बुद्धि की रक्षा
प्राण पाँच प्राणवायु की रक्षा
इन्द्रिय-विषय रस, रूप, गन्ध, शब्द, स्पर्श
गुण सत्त्व, रज और तम
आयु दीर्घ जीवन की प्रार्थना
धर्म धर्म की रक्षा
यश-कीर्ति सामाजिक सम्मान और कीर्ति
धन-विद्या समृद्धि और विद्या
परिवार पुत्र और परिवार की रक्षा
यात्रा मार्ग और यात्रा में कल्याण
आध्यात्मिक जीवन देवी की कृपा और परम फल की कामना

देवी कवच का पाठ कैसे करें?

देवी कवच का पाठ अपनी पारिवारिक, गुरु-परम्परा या जिस प्रमाणित ग्रन्थ का आप अनुसरण करते हैं, उसके अनुसार करना उचित है।

सामान्य भक्तिपूर्ण पाठ के लिए कुछ सरल बातें ध्यान में रखी जा सकती हैं:

  1. स्वच्छ स्थान पर बैठें।
  2. मन को शांत करके देवी का स्मरण करें।
  3. पाठ को यथासंभव सही उच्चारण के साथ पढ़ें।
  4. केवल तेज गति से पढ़ने के बजाय अर्थ को समझने का प्रयास करें।
  5. श्रद्धा और एकाग्रता रखें।
  6. यदि कोई विशेष अनुष्ठान, न्यास, जप-संख्या या संकल्प करना हो तो अपनी परम्परा या योग्य गुरु के निर्देश का पालन करें।

क्या महिलाएँ देवी कवच का पाठ कर सकती हैं?

देवी-उपासना में महिलाओं की सहभागिता भारतीय धार्मिक परम्परा का स्वाभाविक हिस्सा है। इसलिए केवल “महिलाएँ देवी कवच नहीं पढ़ सकतीं” जैसी सामान्य पाबंदी उचित नहीं है।

हाँ, यदि कोई विशेष अनुष्ठानिक विधि, न्यास, जप या तांत्रिक साधना की जा रही हो, तो संबंधित परम्परा के नियम अलग हो सकते हैं।


क्या देवी कवच और दुर्गा कवच एक ही हैं?

लोकप्रिय हिन्दी प्रयोग में “दुर्गा कवच”, “देवी कवच” और “देव्याः कवचम्” नामों का प्रयोग इस पाठ के लिए किया जाता है। 


क्या देवी कवच दुर्गासप्तशती का एक अध्याय है?

इसे सरल रूप से “दुर्गासप्तशती का एक अध्याय” कहना ठीक नहीं है। बेहतर है:

“देवी कवच दुर्गा-सप्तशती/देवीमाहात्म्य की पाठ-परम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध स्तुति है और अनेक परम्पराओं में सप्तशती-पाठ के अंग के रूप में इसका पाठ किया जाता है।”


देवी कवच और नवदुर्गा: शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि में पूजे जाने वाले देवी मां के नौ स्वरूप 

शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि में देवी मां के ये नौ रूप क्रमशः पूजे जाते हैं। प्रत्येक स्वरूप देवी की एक विशिष्ट शक्ति और आध्यात्मिक स्वरूप का प्रतीक है। देवी कवच में स्वयं नवदुर्गा के नौ नाम आते हैं:

1. शैलपुत्री

गिरिराज हिमालय की पुत्री ‘पार्वती देवी’, पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में पूजित देवी।

यद्यपि ये सबकी अधीश्वरी हैं, तथापि हिमालय की तपस्या और प्रार्थनासे प्रसन्न हो कृपापूर्वक उनकी पुत्रीके रूपमें प्रकट हुईं। यह बात पुराणोंमें प्रसिद्ध है।

2. ब्रह्मचारिणी

तप, साधना और संयम से जुड़ा देवी का स्वरूप।

ब्रह्म चारयितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी — सच्चिदानन्दमय ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे ‘ब्रह्मचारिणी’ हैं।

3. चन्द्रघण्टा

देवी का ऐसा स्वरूप जिसमें मस्तक पर अर्धचन्द्र का विशेष महत्व है।

चन्द्रः घण्टायॉं यस्याः सा — आह्लादकारी चन्द्रमा जिनकी घण्टा में स्थित हों, उन देवी का नाम ‘चन्द्रघण्टा’ है।

4. कूष्माण्डा

देवी का तेजस्वी और सृजनात्मक शक्ति से जुड़ा स्वरूप।

कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा — त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः सा कूष्माण्डा।

अर्थात्‌ त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है, वे मां भगवती ‘कूष्माण्डा’ कहलाती हैं।

5. स्कन्दमाता

स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की माता के रूप में पूजित देवी।

छान्दोग्य श्रुति के अनुसार भगवती की शक्ति से उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है। उनकी माता होने से वे ‘स्कन्दमाता’ कहलाती हैं।

6. कात्यायनी

देवी का प्रसिद्ध उग्र एवं शक्तिशाली स्वरूप।

देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुईं और महर्षि ने उन्हें अपनी कन्या माना; इसलिये वे ‘कात्यायनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई।

7. कालरात्रि

देवी का उग्र स्वरूप, जो अंधकार और भय के विनाश से संबद्ध माना जाता है।

सबको मारने वाले काल की भी रात्रि (विनाशिका) होने से उनका नाम ‘कालरात्रि’ है।

8. महागौरी

पवित्रता और शुद्धता से जुड़ा देवी का स्वरूप।

इन्होंने तपस्या द्वारा महान्‌ गौरवर्ण प्राप्त किया था, अतः ये महागौरी कहलायीं।

9. सिद्धिदात्री

सिद्धि प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजित।

सिद्धि अर्थात्‌ मोक्षको देनेवाली होनेसे उनका नाम ‘सिद्धिदात्री’ है।

यही नौ स्वरूप शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि में क्रमशः पूजे जाते हैं। प्रत्येक स्वरूप देवी की एक विशिष्ट शक्ति और आध्यात्मिक स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।


देवी कवच का आध्यात्मिक महत्व

देवी कवच को केवल बाहरी संकटों से रक्षा की प्रार्थना के रूप में देखना इसके भाव को सीमित करता है।

इसमें शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, धर्म, आयु, परिवार, मार्ग और जीवन के अनेक पक्षों को देवी के प्रति समर्पित करने की भावना दिखाई देती है।

दुर्गा कवच सिर्फ एक प्रार्थना नही है, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा कवच है जिसे माँ दुर्गा भक्तों के चारों ओर लपेटती है। आज कल की इस टेंशन भरी दुनिया में, जहाँ नेगेटिविटी, कॉम्पिटिशन और चुनौतियों से भरी है। हम सभी को इस सुरक्षा कवच की जरुरत है।

जब भक्त रोजाना इन शक्तिशाली श्लोकों का जाप करता है, तब वह माँ दुर्गा की ऊर्जा को अपने जीवन में बुला रहा होता है। यह दुर्गा कवच आपको नेगेटिव एनर्जी, दुश्मनों, बुरी नज़रों, बीमारियों एवं अन्य कई परेशानियों से बचाता है।

इस कवच की सभी सबसे अच्छी बात यह है कि मुश्किल विधि या पूजा पाठ की जरुरत नही होती है। बस सच्ची श्रद्धा, साफ़ दिल और नियमित प्रयास। प्रतिदिन माँ दुर्गा को दिए हुए कुछ मिनट भी आपके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लाते है।

इस दृष्टि से कवच का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश है:

मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिव्य शक्ति का स्मरण करे और अपने आचरण, विचार तथा कर्म को भी उसी के अनुरूप बनाने का प्रयास करे।


देवी कवच पढ़ते समय किन बातों का ध्यान रखें?

  • संस्कृत पाठ को प्रमाणित संस्करण से लें।
  • अलग-अलग इंटरनेट वेबसाइटों से श्लोक कॉपी करके उन्हें आपस में न मिलाएँ।
  • पाठ-भेद मिलने पर अपने मूल ग्रन्थ को प्राथमिकता दें।
  • हिन्दी अर्थ में ऐसी बातें न जोड़ें जो मूल संस्कृत में नहीं हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. दुर्गा कवच क्या है?

दुर्गा कवच, जिसे “देव्याः कवचम्” भी कहा जाता है, देवी के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करते हुए शरीर, दिशाओं और जीवन के विभिन्न पक्षों की रक्षा के लिए की जाने वाली प्रार्थना है।

2. देवी कवच में कितने श्लोक हैं?

प्रचलित पाठ में देवी कवच के श्लोक क्रमांक 1 से 56 तक जाते हैं। अलग-अलग संस्करणों की प्रस्तुति और पाठ-भेद के कारण संख्या/पाठ में अंतर दिखाई दे सकता है।

3. देवी कवच में नवदुर्गा का उल्लेख है?

हाँ। आरम्भिक भाग में शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक नवदुर्गा के नौ नामों का उल्लेख मिलता है।

4. क्या देवी कवच केवल नवरात्रि में पढ़ा जाता है?

ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं कि इसका पाठ केवल नवरात्रि में ही किया जा सकता है। विभिन्न परम्पराओं में इसके पाठ के अलग-अलग अवसर और विधियाँ मिलती हैं।

5. क्या देवी कवच का पाठ महिलाएँ कर सकती हैं?

सामान्य देवी-उपासना में महिलाओं के पाठ पर कोई सार्वभौमिक निषेध नहीं है। विशेष अनुष्ठान की स्थिति में संबंधित परम्परा के नियम देखे जाने चाहिए।

6. क्या देवी कवच और दुर्गासप्तशती एक ही हैं?

नहीं। देवी कवच एक अलग स्तुति/पाठ है, जबकि देवीमाहात्म्य या दुर्गासप्तशती एक विस्तृत शास्त्रीय पाठ है। अनेक पाठ-परम्पराओं में देवी कवच को सप्तशती-पाठ के अंग के रूप में पढ़ा जाता है।

7. क्या देवी कवच के साथ अर्गला और कीलक स्तोत्र भी पढ़े जाते हैं?

कई परम्पराओं में देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक स्तोत्र का पाठ सप्तशती की पाठ-विधि के साथ किया जाता है। लेकिन क्रम और विधि परम्परा या ग्रन्थ के अनुसार अलग हो सकती है।

श्री देवी कवच देवी-उपासना में संरक्षण, श्रद्धा और समर्पण की भावना को व्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण पाठ है। इसमें देवी के अनेक स्वरूपों का स्मरण करते हुए शरीर के विभिन्न अंगों, दिशाओं, मन, बुद्धि, प्राण, परिवार, धर्म, आयु और जीवन के अन्य पक्षों की रक्षा के लिए प्रार्थना की गई है।

इसके आरम्भ में नवदुर्गा के नौ स्वरूपों का उल्लेख आता है और आगे देवी की विभिन्न शक्तियों तथा उनके रक्षात्मक स्वरूपों का वर्णन मिलता है।

कवच की फलश्रुति में अनेक लौकिक और आध्यात्मिक फलों का वर्णन है। देवी कवच का वास्तविक भाव केवल भय से सुरक्षा माँगना नहीं, बल्कि अपने शरीर, मन, बुद्धि, प्राण, कर्म और जीवन को देवी की शक्ति के प्रति समर्पित करना भी है।

जय माता दी।


स्रोत और पाठ-संबंधी टिप्पणी

इस लेख में संस्कृत मूल पाठ के लिए गीता प्रेस संस्करण को प्राथमिक स्रोत माना है।

संपादकीय सिद्धांत:
मूल संस्कृत = प्रमाणित ग्रन्थ-पाठ
सरल हिन्दी = पाठ का अर्थ
भावार्थ/व्याख्या = अलग से स्पष्ट की गई पारंपरिक या आधुनिक व्याख्या
फलश्रुति = शास्त्रीय धार्मिक कथन

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