Saraswati Rahasya Upanishad : सरस्वती रहस्योपनिषद् (माता सरस्वती की वैदिक स्तुति)
Saraswati Rahasya Upanishad : सरस्वती रहस्योपनिषद् (माता सरस्वती की वैदिक स्तुति)
ॐ श्रद्धा्यै नमो हृदयाय नमः, ॐ मेधायै नमः शिरसे स्वाहा, ॐ प्रज्ञायै नमः शिखायै वषट्, ॐ धारणायै नमः कवचाय हुम्, ॐ वाग्देवतायै नमो नेत्र-त्रयाय वौषट्, ॐ महासरस्वत्यै नमः अस्त्राय फट्।)
हिम, मुक्ताहार, कपूर तथा चन्द्रमा की आभा के समान शुद्ध कान्तिवाली, कल्याण प्रदान करने वाली, सुवर्ण के समान पीत चम्पक-पुष्पों की माला से विभूषित, सुपुष्ट कुचकुम्भों से मनोहर अङ्गवाली (अर्थात् समस्त संसार का पोषण करने वाले वात्सल्य एवं पूर्ण सौंदर्य से युक्त) वाणी अर्थात् देवी सरस्वती को मैं, विभूति (अष्टविध ऐश्वर्य एवं निःश्रेयस) के लिये, मन और वाणी द्वारा नमस्कार करता हूँ।
वस्तुतः वेदान्त-शास्त्र का अर्थभूत ब्रह्मतत्त्व ही एकमात्र जिनका स्वरूप है और जो नाना प्रकार के नाम-रूपों में व्यक्त हो रही हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
ॐ प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती।
धीनामवित्र्यवतु ॥१॥
दान से शोभा प्राप्त करने वाली, अन्न से सम्पन्न तथा स्तुति करने वाले उपासकों की रक्षा करने वाली देवी सरस्वती हमें अन्न से सुरक्षित करें ॥१॥
अङ्गों और उपाङ्गों सहित चारों वेदों में जिन एक ही देवता का स्तुति-गान होता है, जो ब्रह्म की अद्वैत शक्ति हैं, वे देवी सरस्वती हमारी रक्षा करें।
हमारे द्वारा यज्ञय देवी सरस्वती प्रकाशमय द्युलोक से उतरकर महान् पर्वताकार मेघों के बीच में होती हुई हमारे यज्ञ में आगमन करें। हमारी स्तुति से प्रसन्न होकर वे देवी स्वेच्छापूर्वक हमारे सम्पूर्ण सुसंस्कृत स्तोत्रों को सुनें॥२॥
जो वस्तुतः वर्ण, पद, वाक्य तथा इनके अर्थों के रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं; जिनका आदि और अन्त नहीं है, जो अनन्त स्वरूप वाली हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
जो सबको पवित्र करने वाली, अन्न से सम्पन्न तथा कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाली धन की उपलब्धि में कारण हैं, वे देवी सरस्वती हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा करें (यज्ञ में पधारकर उसे पूर्ण करने में सहायक बनें) ॥३॥
जो अध्यात्म और अधिदैवरूप हैं तथा जो देवताओं की सम्यक् ईश्वरी अर्थात् प्रेरणात्मिका शक्ति हैं, जो हमारे भीतर मध्यमा वाणी के रूप में स्थित हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
जो प्रिय एवं सत्य वचन बोलने के लिये प्रेरणा देने वाली तथा उत्तम बुद्धि वाले क्रियापरायण पुरुषों को उनका कर्तव्य सुझाती हुई सचेत करने वाली हैं, उन देवी सरस्वती ने इस यज्ञ को धारण किया है ॥४॥
जो अन्तर्यामीरूप से समस्त त्रिलोकी का नियन्थन करती हैं, जो रुद्र-आदित्य आदि देवताओं के रूप में स्थित हैं, वे देवी सरस्वती हमारी रक्षा करें।
नदी रूप में प्रकट हुई देवी सरस्वती अपने प्रवाह रूप कर्म के द्वारा अपनी अगाध जलराशि का परिचय देती हैं और ये ही अपने देवता रूप से सब प्रकार की कर्तव्य विषयक बुद्धि को उद्दीप्त (जाग्रत्) करती हैं ॥५॥
जो अन्तर्दृष्टि वाले प्राणियों के लिये नाना प्रकार के रूपों में व्यक्त होकर अनुभूत हो रही हैं। जो सर्वत्र एकमात्र ज्ञप्ति-बोधरूप से व्याप्त हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
वाणी के चार पद हैं अर्थात् समस्त वाणी चार भागों में विभक्त है - परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। इन सबको मनीषी विद्वान् ब्राह्मण जानते हैं। इनमें से तीन परा, पश्यन्ती और मध्यमा तो हृदयगुहा में स्थित हैं; अतः ये बाहर प्रकट नहीं होतीं। परंतु जो चौथी वाणी वैखरी है, उसे ही मनुष्य बोलते हैं। (इस प्रकार यहाँ वाणी रूप में देवी सरस्वती की स्तुति है) ॥६॥
जो नाम-जाति आदि भेदों से अथवा विकल्पित हो रही हैं तथा साथ ही निर्विकल्पस्वरूप में भी व्यक्त हो रही हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
राष्ट्री अर्थात् दिव्यभाव को प्रकाशित करने वाली तथा देवताओं को आनन्दमग्न कर देने वाली देवी वाणी जिस समय अज्ञानियों को ज्ञान देती हुई यज्ञ में विराजमान होती हैं, उस समय वे चारों दिशाओं के लिये अन्न और जल का दोहन करती हैं। इन मध्यमा वाक् में जो श्रेष्ठ है, वह कहाँ जाता है॥७॥
व्यक्त और अव्यक्त वाणी वाले देवादि समस्त प्राणी जिनका उच्चारण करते हैं, जो सब अभीष्ट वस्तुओं को दुहकर पुरुष को प्रदान करने वाली कामधेनु हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
प्राणरूप देवों ने जिस प्रकाशमान वैखरी वाणी को उत्पन्न किया, उसको अनेक प्रकार के प्राणी बोलते हैं। वे कामधेनु तुल्य आनन्ददायक तथा अन्न और बल देने वाली वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुतियों से सन्तुष्ट होकर हमारे समीप आये ॥८॥
जिनको ब्रह्मविद्यारूप से जानकर योगी सारे बन्धनों को नष्ट कर डालते हैं और पूर्ण भक्ति द्वारा परम पद को प्राप्त होते हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
कोई-कोई वाणी को देखते हुए भी नहीं देखता (समझकर भी नहीं समझ पाता), कोई इसे सुनकर भी नहीं सुन पाता; किंतु किसी-किसी के लिये तो वे वाग्देवी अपने स्वरूप को उसी प्रकार प्रकट कर देती हैं, जैसे पति की कामना करने वाली सुन्दर वस्त्रों से सुशोभित भार्या अपने पति के समक्ष अनावृतरूप में उपस्थित करती है ॥९॥
(अर्थात् केवल पुस्तकों को पढ़ लेना, शब्दों को रट लेना या श्लोक सुन लेना ज्ञान नहीं है। बहुत से लोग शब्दों को ऊपर-ऊपर से पढ़ और सुन तो लेते हैं, लेकिन उसके गहरे भाव और परम सत्य को नहीं समझ पाते। उनके लिए ज्ञान केवल पन्नों पर लिखे अक्षर बनकर रह जाता है। जो व्यक्ति केवल शब्दों को पकड़कर रखता है, वह अज्ञानी ही रहता है। किंतु जो साधक निष्कपट भाव से सत्य की खोज में समर्पित होता है, उसके हृदय में ज्ञान स्वयं प्रकाशित हो जाता है। जो साधक सत्यनिष्ठा, एकाग्रता, भक्ति और गहराई से ज्ञान की खोज करता है, ज्ञान की देवी (सरस्वती) उसके सामने अपने वास्तविक और रहस्यमयी अर्थ को पूरी तरह स्पष्ट कर देती हैं। इसमें पत्नी और पति के उदाहरण का असली अर्थ केवल पूर्ण समर्पण, आत्मीयता और गोपनीयता को दर्शाने के लिए है कि जिस प्रकार एक पत्नी अपने पति के सामने बिना किसी दुराव-छिपाव के, पूर्ण विश्वास और आत्मीयता के साथ अपना रूप प्रकट करती है, ठीक उसी प्रकार, वेदवाणी (ज्ञान) भी अपने सच्चे, निष्कपट और समर्पित साधक के सामने अपना सारा रहस्य और गूढ़ अर्थ उजागर कर देती हैं।)
ब्रह्मतत्त्वलीन इस नाम-रूपात्मक अखिल प्रपञ्च को जिनमें अविभाकर पुनः उनका ध्यान करते हैं, वे एकमात्र ब्रह्मरूपा देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें।
(परम कल्याणमयी) माताओं में सर्वश्रेष्ठ, नदियों में सर्वश्रेष्ठ तथा देवियों में सर्वश्रेष्ठ हे देवी सरस्वती! धनाभाव के कारण हम अप्रशस्त से हो रहे हैं, मां! हमें प्रशस्ति (धन-समृद्धि) प्रदान करो ॥१०॥
जो ब्रह्माण्ड के मूलरूपी कमल के वन में विचरने वाली राजहंसी हैं, वे सब ओर से श्वेतकान्ति वाली देवी सरस्वती हमारे मनरूपी मानस में नित्य विहार करें। हे कश्मीरपुर में निवास करने वाली शारदा देवी! तुम्हें नमस्कार है। मैं नित्य तुम्हारी प्रार्थना करता हूँ। मुझे विद्या (ज्ञान) प्रदान करो।
अपने चार हाथों में अक्षसूत्र, अङ्कुश, पाश और पुस्तक धारण करने वाली तथा मुखारविन्द से सुशोभित देवी सरस्वती मेरी वाणी में सदा निवास करें। शङ्ख के समान सुन्दर कण्ठ एवं सुन्दर लाल ओष्ठों वाली, सब प्रकार के भूषणों से विभूषिता महासरस्वती देवी मेरी जिह्वा के अग्रभाग में सुखपूर्वक विराजमान हों।
जो ब्रह्माण्ड की प्रथमा सरस्वती देवी श्रद्धा, धारणा और मेधा-स्वरूपा हैं, वे भक्ति के सिद्धि संमार्ग में निवासकर शम-दमादि गुणों को प्रदान करती हैं। जिनके केश-पाश चन्द्रकला से अलंकृत हैं तथा जो भव-सन्ताप को शमन करने वाली सुधा-नदी हैं, उन देवी सरस्वती का भवानी को मैं नमस्कार करता हूँ।
जिस मनुष्य को ज्ञान, निर्भयता, भोग और मुक्ति की इच्छा हो, वह इन दस मन्त्रों के द्वारा देवी सरस्वती की भक्तिपूर्वक अर्चना करके स्तुति करे। भक्ति और श्रद्धापूर्वक देवी सरस्वती की विधिपूर्वक अर्चना करके नित्य स्तवन करने वाले भक्त को छः महीने के भीतर ही उनकी कृपा की प्राप्ति हो जाती है।
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सरस्वती रहस्योपनिषद
सरस्वती रहस्योपनिषद वस्तुतः ऋग्वेद से सम्बद्ध एक अत्यंत दिव्य उपनिषद है। इसमें केवल सरस्वती देवी की पूजा का विधान नहीं है, अपितु शब्द (वाणी) से ब्रह्म (परम सत्य) तक पहुँचने की पूरी आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है।
उपनिषद में दस मुख्य मन्त्र-बीजों (जैसे ॐ, ह्रीँ, श्रीँ, ब्लीँ, सौः, ऐँ, क्लीँ, सं) का वर्णन है, जो कि मन को एकाग्र करने की तरंगें हैं। जब साधक इन मन्त्रों का जप करता है, तो उसकी बाह्य वाणी (बोलना) और आंतरिक विचार शुद्ध होने लगते हैं।
उपनिषद के छठे मन्त्र में वाणी के ४ स्तर बताए गए हैं -
परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी।
वैखरी : वह वाणी जो हम अपने मुँह से बोलते हैं और कान से सुनते हैं (सबसे बाह्य रूप)।
मध्यमा : वह विचार जो मन में चलता है (जिसका उच्चारण नहीं होता)।
पश्यन्ती : वह स्थिति जहाँ विचार चित्र या भावना के रूप में उगता है।
परा : वह मूल स्रोत (आत्मा/ब्रह्म) जहाँ से विचार उत्पन्न होता है।
हम केवल वैखरी (बोलने) में उलझे रहते हैं, जबकि देवी सरस्वती का वास्तविक स्वरूप परा (परम चैतन्य) है। नौवें मन्त्र में बताया गया है कि केवल वेद या ग्रंथ रट लेने से ज्ञान नहीं मिलता। जो व्यक्ति केवल शब्दों को पकड़कर रखता है, वह अज्ञानी ही बना रह जाता है। लेकिन जो साधक निष्कपट भाव से सत्य की खोज में समर्पित होता है, उसके हृदय में ज्ञान स्वयं प्रकाशित हो जाता है।
उपनिषद के उत्तरार्ध में अत्यंत गहरा दर्शन है। इस जगत् में केवल दो वस्तुऐं बदलती हैं - नाम और रूप। लेकिन इनके पीछे तीन तत्त्व हमेशा एक समान रहते हैं - अस्ति (होना), भाति (प्रतीत होना) और प्रिय (आनन्द)।
अर्थात् यह पूरा संसार (नदी, पर्वत, शरीर) वास्तव में एक ही ब्रह्म का नाम और रूप है। जैसे सोने से बने आभूषणों के नाम अलग होते हैं, पर मूल में सोना ही होता है। देवी सरस्वती इसी नाम-रूप वाले संसार के पीछे छिपे सच्चिदानन्द ब्रह्म की पहचान कराती हैं।
उपनिषद के अंत में साधक को अपने भीतर उतरने के लिए समाधि के ६ भेद समझाए गए हैं। अपने भीतर के विचारों (दृश्यों) और 'मैं ब्रह्म हूँ' के भाव (शब्दों) से परे हटकर शांत होना। बाहर की किसी भी वस्तु में उसके नाम और रूप को भूलकर केवल उसके पीछे छुपी ईश्वर/चेतना की अनुभूति करना।
इस प्रकार, सरस्वती रहस्योपनिषद का मुख्य संदेश यह है कि सरस्वती केवल विद्या या कला की देवी नहीं हैं, वे स्वयं ब्रह्मविद्या हैं। जब मनुष्य अपनी वाणी और विचारों को शुद्ध करके भीतर गहराई में उतरता है, तो उसे यह अनुभव होता है कि जीव और ईश्वर अलग नहीं हैं, दोनों एक ही चैतन्य आत्मा हैं।
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