Who were Sita, Draupadi and Vedavati : सीता, द्रौपदी, वेदवती कौन थीं?

Who were Sita, Draupadi and Vedavati : सीता, द्रौपदी, वेदवती कौन थीं?


Who were Sita, Draupadi and Vedavati : सीता, द्रौपदी, वेदवती कौन थीं?

स्कंद पुराण (Skand Puran) कहता है कि -

"ब्रह्मवादी पुरुषों द्वारा जो मिथिलापति जनक की कन्या बतायी गयी हैं, वे सीता साक्षात् ब्रह्मविद्या थीं; वे देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिये ही अवतीर्ण हुई थीं। हल से भूमि जोती जा रही थी; उसी समय सीता (हल की नोक) के द्वारा पृथ्वी से प्रकट हुई थीं, इसीलिये 'सीता' के नाम से प्रसिद्ध हुईं। मिथिला में अवतार लेने के कारण इन्हें 'मैथिली' भी कहते हैं। जनक के कुल में जन्म लेने के कारण ये 'जानकी' नाम से विख्यात हुईं।"

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देवी भागवत पुराण (Devi Bhagwat Puran) कहता है कि -

(जब रावण सहित राक्षसों के संहार का समय निकट आ गया, तब पंचवटी में अग्निदेव पिता-समान एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करके आए, और श्रीराम से बोले -)

ब्राह्मणवेषधारी अग्नितत्व ने कहा- भगवान् श्रीराम! मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, साक्षात् अग्नि हूँ। सीता के हरण का समय अब आपके समीप उपस्थित हो रहा है। इसी अवसर पर इनका हरण होगा। अतएव आप इन जगत-जननी सीताजी को मुझमें स्थापित कर छायामयी सीता को अपने साथ रखिये। फिर समय पर इन्हें मैं आपको लौटा दूंगा। उसी समय इनकी परीक्षा-लीला भी हो जायगी। इसी कार्य के लिये मुझे देवताओं ने यहाँ भेजा है। 

तब भगवान् श्रीराम ने सीताजी को अग्नितत्व के हाथों उनकी पुत्री के रूप में सौंप दिया। तब अग्नि से ही मायारूपी एक सीता प्रकट हुई। उसके सभी अङ्ग और गुण साक्षात् सीताजी के समान ही थे। फिर श्रीराम उसे लेकर आगे बढ़े। लक्ष्मण भी इस रहस्य को नहीं जान सके; फिर दूसरे की बात ही क्या? 

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देवी भागवत पुराण आगे कहता है कि -

श्रीराम का रावण के साथ भयानक युद्ध हुआ और रावण तथा उसके भाई-बन्धु-सभी मृत्युके मुख में चले गये। तत्पश्चात् वास्तविक सीताजी को प्राप्त करने के लिए सीता की अग्निपरीक्षा-लीला हुई। अग्निदेव ने उसी क्षण वास्तविक सीता को भगवान् राम के सामने उपस्थित कर दिया। 

तब छाया सीता ने अत्यन्त नम्र होकर अग्निदेव और भगवान् श्रीराम दोनों से कहा- 'महानुभावो! अब मैं क्या करूँगी, बताने की कृपा कीजिये।'

तब भगवान् श्रीराम और अग्निदेव बोले- देवी! तुम तप करने के लिये अत्यन्त पुण्यप्रद पुष्करक्षेत्र में चली जाओ। वहीं रहकर तपस्या करना। इसके फलस्वरूप तुम्हें स्वर्गलक्ष्मी बनने का सुअवसर प्राप्त होगा।

भगवान् श्रीराम और अग्निदेव के वचन सुनकर छाया सीता ने पुष्करक्षेत्र में जाकर तप आरम्भ कर दिया। उसकी कठिन तपस्या बहुत लम्बे काल तक चलती रही। इसके बाद उसे स्वर्गलक्ष्मी होने का सौभाग्य प्राप्त हो गया। समयानुसार वही छाया सीता राजा द्रुपद के यहाँ यज्ञ की वेदी से प्रकट हुई। उसका नाम 'द्रौपदी' पड़ा।

इस प्रकार सत्ययुग में वही कल्याणी देवी वेदवती के रूप में कुशध्वज की कन्या हुई, त्रेतायुग में वही छायारूप से सीता हुई तथा द्वापरयुग में वही द्रुपदकुमारी द्रौपदी हुईं। तीनों युगों में विद्यमान रहने के कारण ही उन्हें 'त्रिहायणी' कहा गया है। देवी-शक्तियों का अवतार एक बड़ी दिव्य योजना के तहत आपस में जुड़ा हुआ है।

स्रोत : देवी भागवत पुराण और स्कंद पुराण

See Also : सीताजी और लव-कुश

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