Shri Ram Stuti - Shri Ramchandra Kripalu Bhajman Lyrics

श्रीराम स्तुति - श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन (Shri Ram Stuti Lyrics - Shri Ramchandra Kripalu Bhajman)



श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन (Shri Ramchandra Kripalu Bhajman) ...
भगवान श्रीराम की यह स्तुति (Shri Ram Stuti) भक्ति, दर्शन और आदर्श जीवन का संक्षिप्त सूत्र है। इसे गोस्वामी तुलसीदास जी (Goswami Tulsidas ji) ने रचा था। यह रामचरितमानस की भावना से उपजी एक स्वतंत्र स्तुति है, जिसमें श्रीराम के गुण, स्वरूप और करुणा को अत्यंत कोमल भाषा में प्रकट किया गया है। इसकी भाषा अवधी मिश्रित संस्कृतनिष्ठ हिंदी है। 

तुलसीदास जी ने इसमें वेदांत या कठिन दर्शन नहीं रखा, बल्कि सीधे हृदय से हृदय तक जाने वाली भक्ति को प्रधान किया। यहाँ मन को संबोधित किया गया है, क्योंकि असली समस्या बाहर नहीं, मन के भीतर होती है, और मुक्ति भी वहीं से शुरू होती है।

इस स्तुति में श्रीराम को करुणानिधान (दया का अथाह सागर), रघुनंदन (मर्यादा और कुलधर्म के प्रतीक), कोमल, श्यामल, विशाल नेत्रों वाले (सौंदर्य और शांति का प्रतीक), कामदेव से भी सुंदर बताया गया है। अर्थात् सांसारिक मोह से परे दिव्य आकर्षण श्रीराम डराने वाले ईश्वर नहीं, बल्कि आश्रय देने वाले भगवान हैं।

यह स्तुति सिखाती है कि भक्ति का अर्थ भय नहीं, विश्वास है। भगवान को प्राप्त करने के लिए केवल योग्यता नहीं, शरणागति चाहिए। श्रीराम न्याय के साथ करुणा का संतुलन हैं। यही कारण है कि इसमें कहा गया है कि यह संसार भयावह है, लेकिन श्रीराम का स्मरण उससे पार कर देता है।

यह स्तुति श्रीराम को केवल देवता नहीं कहती, बल्कि आदर्श पुत्र, आदर्श राजा, आदर्श पति, आदर्श मानव भी कहती है। इसलिए यह स्तुति जीवन जीने की शिक्षा भी है, केवल पूजा नहीं। आज जब मनुष्य का मन अशांत है, रिश्ते टूट रहे हैं, धर्म केवल प्रदर्शन बन रहा है, तब "श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन" हमें याद दिलाती है कि धर्म बाहर नहीं, भीतर सुधरने से शुरू होता है। जय श्रीराम।

Shri Ram Stuti Lyrics (श्रीराम स्तुति)

श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं। 

नवकंज-लोचन, कंजमुख, कर कंज, पद कंजारुणं॥

कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील-नीरद-सुंदरं। 

पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥

भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्य-वंश-निकंदनं। 

रघुनंद आनंदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं॥

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं। 

आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषणं॥

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।

मम हृदय कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं॥

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। 

करुनानिधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियंँ हरषीं अली।

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

सोरठा :

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे॥

श्रीरामस्तुति हिंदी अर्थ (Shri Ram Stuti Hindi Arth)

हे मन! कृपालु श्रीरामचंद्रजी का भजन करो. वे संसार के जन्म-मरण रूप दारुण भय को दूर करने वाले है. उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान है. मुख-हाथ और चरण भी लालकमल के सदृश हैं.

उनके सौंदर्य की छटा अगणित कामदेवों से बढ़कर है. उनके शरीर का वर्ण नवीन नील-सजल मेघ के समान सुंदर है. पीताम्बर मेघरूप शरीर में मानो बिजली के समान चमक रहा है. ऐसे पावनरूप जानकीपति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ.

हे मन! दीनों के बंधु, सुर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले, आनन्दकंद, कोशल-देशरूपी आकाश में निर्मल चन्द्रमा के समान, दशरथनंदन श्रीराम का भजन करो.

जिनके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट, कानों मे कुण्डल, भाल पर तिलक और प्रत्येक अंग में सुंदर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं, जिनकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी हैं, जो धनुष-बाण लिये हुए हैं, जिन्होंने संग्राम में खर-दूषण को जीत लिया है.

जो शिव, शेष और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं का नाश करने वाले हैं. तुलसीदास जी प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे हृदय कमल में सदा निवास करें.

जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुंदर सांवला वर (श्रीरामचंद्रजी) तुम्हें मिलेगा. वे दया का सागर और सुजान (सर्वग्य) हैं. तुम्हारे शील और स्नेह को भलीभांति जानते हैं.

इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी सहित सभी सखियां हृदय में हर्षित हुईं. तुलसीदासजी कहते हैं कि भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं.

गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदय में जो हर्ष हुआ, वह कहा नहीं जा सकता. सुंदर मंगलों के मूल उनके बाएं अंग फड़कने लगे.

सियावर रामचन्द्रजी की जय॥

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