Sankatmochan Hanuman Ashtak Path Lyrics (Baal Samay Ravi Bhaksh Liyo) : संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ

Sankatmochan Hanuman Ashtak Path Lyrics (Baal Samay Ravi Bhaksh Liyo) : संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ

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संकटमोचन हनुमानाष्टक (Sankatmochan Hanuman Ashtak Path) आठ छंदों (अष्टक) में रचित स्तुति है, जिसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी माने जाते हैं। हर छंद में एक बड़ा संकट वर्णित है और अंत में वही पंक्ति आती है, "को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो"। अर्थात् "ऐसा कौन है जो यह नहीं जानता कि हे कपिराज! आप संकटों को हरने वाले हैं।" 

यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि हनुमान जी के जीवन-कर्म और उनके संकट हरने वाले स्वरूप का काव्यात्मक इतिहास है। यह स्तोत्र केवल कथा नहीं, व्यक्तिगत प्रार्थना है। हनुमानाष्टक भय, चिंता, अवसाद, असमंजस में विशेष प्रभावी माना जाता है। मंगलवार और शनिवार को पूर्ण सात्विकता और श्रद्धा के साथ इसका पाठ विशेष फलदायी कहा गया है। इसके नियमित पाठ से आत्मबल और निर्णय शक्ति बढ़ती है। यह अष्टक "बाहरी संकट" से ही नहीं, अंदर के डर, भ्रम और टूटे आत्मविश्वास को भी हरता है।

इस स्तोत्र के माध्यम से तुलसीदास जी कहते हैं - 

हनुमान जी संकट में पड़े व्यक्ति को सही मार्ग और सही सहारा दिलाते हैं। उनकी शक्ति ब्रह्मांडीय है, पर करुणा उससे भी बड़ी। असंभव दिखने वाले संकट भी संकल्प से मिटते हैं। भय का सबसे बड़ा इलाज है आश्वासन और साहस। समय पर सही कर्म जीवन बचाता है। सबसे बड़ा संकट मोह और भ्रम होता है, और हनुमान जी उससे भी छुड़ाते हैं। संकट चाहे कितना गहरा हो, भक्ति वहाँ भी पहुँच जाती है। हनुमान जी यहाँ केवल देवता नहीं, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक संकटों के निवारक हैं।

Sankatmochan Hanuman Ashtak Path Lyrics : संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ

बाल समय रबि भक्षि लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो॥
देवन आन करि बिनती तब,
छांड़ि दियो रबि कष्ट निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महा मुनि साप दियो तब,
चाहिय कौन बिचार बिचारो॥
के द्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥

अंगद के संग लेन गये सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाय इहाँ पगु धारो॥
हेरि थके तट सिंधु सबै तब,
लाय सिया-सुधि प्राण उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥

रावन त्रास दई सिय को सब,
राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाय महा रजनीचर मारो॥
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥

बान लग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सुत रावण मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥
आनि सजीवन हाथ दई तब,
लछिमन के तुम प्राण उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥

रावण जुद्ध अजान कियो तब,
नाग कि फांस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयोयह संकट भारो॥
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥

बंधु समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पाताल सिधारो।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥
जाय सहाय भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥

काज किये बड़ देवन के तुम,
वीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसों नहिं जात है टारो॥
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥

दोहा :
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥

॥ इति संकटमोचन हनुमानाष्टक सम्पूर्ण ॥

॥  जय श्रीराम ॥

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