Shri Krishna & Sudama : श्रीकृष्ण की दृष्टि में सुदामा ही इतने विशेष क्यों?

यूं तो भगवान श्रीकृष्ण के एक से बढ़कर एक भक्त हुए हैं, लेकिन उन सभी में केवल सुदामा ही ऐसे हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण ने स्वयं से ही, बिना मांगे ही तीनों लोकों का राज्य देने की इच्छा प्रकट की, यहां तक कि अपना बैकुंठ तक दान करने लगे.
भगवान को सुदामा पर इतना विश्वास, इतना प्रेम? मैंने यह कथा पहली बार टीवी पर ही देखी थी, तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था कि भगवान के लिए सुदामा ही इतने स्पेशल क्यों हैं? जबकि और भी बड़े से बड़े भक्त हुए हैं, उन्हें तो भगवान ने इतनी आसानी से कुछ नहीं दिया. सुदामा ने तो जंगल में जाकर कोई कठिन तपस्या भी नहीं की थी, तो फिर केवल सुदामा ही क्यों?
समय के साथ कई अनुभवों से बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर अपने आप ही मिल जाते हैं.
आज जब दुनियाभर में या अपने आसपास भी सब लोगों को नाम, पैसा प्रसिद्धि, सत्ता आदि कमाने के लिए सब प्रकार के कार्य करते हुए देखती हूं; कोई धोखाधड़ी कर रहा है, कोई चोरी कर रहा है, कोई लूट कर रहा है, कोई हत्या कर रहा है, कितने ही लोग अपने परिवार तक को नहीं छोड़ रहे, किसी ने झूठ को ही अपना धंधा बना रखा है, गलत बातों को फैला कर पैसा और प्रसिद्धि कमाई जा रही है, कोई नशा शराब बेच रहा है, कोई मांस बेच रहा है, कोई मांस खा रहा है, कोई गंदे वीडियो या पोस्ट्स बना रहा है, कोई अश्लीलता या फूहड़ता बेच रहा है....
कितनी चीजें गिनाऊं?
धन या पैसा या प्रसिद्ध कमाना बिल्कुल गलत नहीं है, लेकिन इनके लिए गलत कार्य करना गलत है.
लेकिन आज पैसों के लिए, प्रसिद्धि के लिए, सत्ता के लिए, हर तरह के गलत कार्य हो रहे हैं, लेकिन आज उन कार्यों को गलत नहीं माना जाता, क्योंकि हर तरफ मजबूरी का रोना रो दिया जाता है. हम जिस भी गलत कार्य के विरुद्ध आवाज उठाते हैं, लोग मजबूरी या परिस्थिति को ढाल बनाकर पेश कर देते हैं.
यह सब देखकर मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर अपने आप ही मिल गया कि क्यों भगवान ने सुदामा को ही इतना स्पेशल माना.
क्योंकि सुदामा ही थे जो सब प्रकार से योग्य होते हुए भी गरीबी की चरम सीमा को देख रहे थे. जिस राज्य में भ्रष्टाचार होता है, वहां योग्यता का सम्मान नहीं होता, वहां ईमानदारी और अच्छाइयों का सम्मान नहीं होता. वहां सच में काम करने की इच्छा रखने वालों का सम्मान नहीं होता.
सुदामा रोज अपने परिवार को भी भूख से तड़पता हुआ देखते थे, लेकिन समाज के बीच में रहते हुए भी, एक भ्रष्ट राज्य में गृहस्थ जीवन जीते हुए भी उन्होंने कोई भी गलत कार्य करके धन कमाना स्वीकार नहीं किया, किसी गलत प्रकार से अपना पेट भरना स्वीकार नहीं किया, किसी प्रकार का प्रलोभन या किसी प्रकार की विवशता सुदामा को और उनके परिवार को एक पल के लिए भी झुका नहीं सकी.
जब सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने के लिए द्वारिका जा रहे थे, तो देवराज इंद्र घबरा जाते हैं कि पता नहीं भगवान सुदामा को क्या दे दें, जबकि उस समय तक तो भगवान ने सुदामा को कुछ भी देने की घोषणा भी नहीं की थी, तब भी देवता क्यों घबरा जाते हैं?
इंद्र इसलिए नहीं घबरा रहे थे कि सुदामा भगवान के मित्र हैं या वे ब्राह्मण हैं. वे इसलिए घबरा रहे थे क्योंकि वास्तव में वे सुदामा के धर्म की शक्ति और गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उनकी तपस्या की शक्ति को जानते थे, जो किसी महर्षि की तपस्या से कम नहीं थी.
वे जानते थे कि सुदामा ने अपने कर्मों से धर्म की शक्ति को इतना बढ़ा दिया है कि उस शक्ति से वे स्वर्गलोक का राज्य भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं.
एकांत में रहकर तपस्या करना फिर भी आसान है, लेकिन समाज के बीच में रहकर, गृहस्थ जीवन जीते हुए भी धर्म को संभालना बहुत कठिन है. अच्छे अच्छे सूरमा हार गए, क्योंकि जब हम देखते हैं कि हमारे चारों तरफ लोग कुछ भी करके धन अर्जित कर रहे हैं, चैन की और मजे की जिंदगी जी रहे हैं, उनके बच्चे बहुत खुश हैं, उनका परिवार खुश है, क्योंकि आज धन को ही सफलता, योग्यता और परिश्रम का पैमाना माना जाता है, उस बीच रहकर भी धर्म की रक्षा करना बेहद कठिन है. हर व्यक्ति के मन में आ ही जाता है कि
"जब सब लोग ही ऐसा कर रहे हैं, तो मेरा भी ऐसा करना गलत थोड़ी न होगा, मैं यदि ऐसा नहीं करूंगा तो बेवकूफ कहलाऊंगा, आज तो इसी का जमाना है, कोई कुछ भी करे, सब जायज है, बस पैसा आना चाहिए...."
और यही बात मन में आ जाने पर हम स्पेशल नहीं रह जाते, हम भी एक भेड़ बन जाते हैं.
लक्ष्मी जी ने भी भगवान को रोका कि "क्या कर रहे हो, अपना ही घर दान में दे रहे हो? तनिक अपने बारे में भी तो सोचो..."
लेकिन लक्ष्मी जी ने एक बार भी यह नहीं कहा था कि "सुदामा इतने भी योग्य नहीं हैं, कि आप उन्हें सब कुछ ही दान कर दो."
भगवान सुदामा के उस आधे चावल का ऋण नहीं चुका रहे थे, वास्तव में एक भक्त ईश्वर को जो कुछ भी चढ़ाता है, वह इस भावना के साथ चढ़ाता है कि वह लोक कल्याण में जाएगा (ईश्वर की बात कर रही हूं, जो दयालु है)
इतनी परेशानियों के बीच में रहकर भी लोक कल्याण की बात सोचना, आज किसके मन में आता है यह सब?
आज सुदामा बनना कठिन ही नहीं, नामुमकिन है.
तो आखिर भगवान सुदामा के लिए क्यों नंगे पैर दौड़े नहीं जाएंगे? क्यों उन्हें तीनों लोकों का राज्य देने में संकोच करेंगे?
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धर्म तब सबसे उज्ज्वल होता है, जब वह अंधकार के बीच भी लौ बनकर टिका रहे.
जब संसार का हर व्यक्ति धन के लिए समझौता कर रहा हो, और उस बीच भी कोई व्यक्ति शुद्ध रह जाए, वही असली तपस्वी है. सुदामा ने भूख के बीच भी नीति, धर्म, सच्चाई और शुद्धता की लौ जलाए रखी.
श्रीकृष्ण क्यों दौड़े?
क्योंकि सुदामा किसी वरदान के योग्य नहीं थे, वे तो स्वयं ही वरदान बन गए थे. भगवान केवल चावल के दाने का ऋण नहीं चुका रहे थे, वे उस भावना का, उस विश्वास का और उस धर्म-संयम की चुप्पी का सम्मान कर रहे थे.
सुदामा को स्वर्ग का राज्य देने की इच्छा क्यों? क्योंकि जिसने अपने हृदय को स्वर्ग बना लिया हो, उसे स्वर्ग देने में कैसा संकोच?
सुदामा की मौन गरीबी, लोगों की "समृद्ध बेईमानी" पर सवाल उठा देती है. आज जब हर व्यक्ति "सफलता" को केवल धन और शोहरत से तौल रहा है, वहाँ सुदामा उस विचार के विरुद्ध खड़े हैं.
एक दुर्लभ वस्तु को प्राप्त करने के लिए भगवान भी दौड़े चले जाते हैं.
श्रीकृष्ण नंगे पांव एकदम दौड़े चले जाते हैं, क्योंकि उन्हें केवल मित्र नहीं मिला था, उन्हें एक ऐसा पुरुषार्थ मिला था, जो संसार की सबसे दुर्लभ वस्तु है, अधर्म के बीच धर्म की रक्षा करने वाला पुरुषार्थ!
Note : Permission to copy this article has not been granted by the author.
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