Shri Ram & Buddha : श्रीराम, बुद्ध और सनातन दृष्टि के माध्यम से जीवन का संतुलन

श्रीराम, बुद्ध और सनातन दृष्टि के माध्यम से जीवन का संतुलन


ज्ञान का अर्थ भागना नहीं, स्थिर रहकर जीतना है!

आज लोगों को समझना चाहिए कि आज हर प्रसिद्ध लेखक द्वारा सुंदर शब्दों में कही गई हर बात सही और तर्कपूर्ण नहीं हो सकती. आज के युग में, कोई प्रसिद्ध वक्ता या लेखक जब धर्म या दर्शन पर अपने विचार रखते हैं, तो लोग उसे सत्य मान लेते हैं, क्योंकि शब्द सुंदर हैं, लेकिन सुंदर शब्द हमेशा सत्य नहीं होते. सत्य वही है, जो अनुभव, तप और तथ्य की अग्नि में खरा उतरे.

अब जैसे कि कुमार विश्वास जी (Kumar Vishwas) ने अपने चैनल में बुद्ध और महाभारत की कथा का जिस प्रकार से वर्णन किया है, उससे मैं कभी सहमत नहीं हुईं. एक एपिसोड में वे कहते हैं कि महाभारत के युद्ध का कारण द्रौपदी की हंसी थी, और अन्य एपिसोड में कहते हैं कि बुद्ध (Buddha) अगर घर छोड़कर न जाते तो उनका इतना नाम न होता और दुनिया को ज्ञान न मिलता....!

क्यों भई?? क्या अपनी पत्नी और बच्चे को अचानक छोड़कर चले जाने से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है? क्या अपने परिवार को अचानक छोड़कर भाग जाने से ही दुनिया को ज्ञान दिया जा सकता है? तो क्या श्रीराम (Shri Ram) प्रसिद्ध नहीं हुए? क्या उन्होंने दुनिया को ज्ञान नहीं दिया, या क्या श्रीराम ने अपनी सभी जिम्मेदारियों का पालन नहीं किया?

श्रीराम की 14 वर्षों तक कोई संतान न होने पाए, इसके लिए मंथरा के कहने पर माता कैकेई ने राजा दशरथ से श्रीराम के लिए 14 वर्षों तक वन में ब्रह्मचर्य व्रत या संन्यास धर्म का पालन करने का वर माँगा था. लेकिन श्रीराम तो अपनी पत्नी सीताजी के साथ ही गए थे, वनवास में हर समय सीताजी का विशेष ध्यान रखते थे, बीच-बीच में उनके प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित भी करते थे कि "सीते! मैं तुम्हारे साथ वन में कंद-मूल खाकर भी बहुत प्रसन्न हूँ." 

सैंकड़ों ऋषियों से ज्ञान लेने के लिए गए, दण्डकारण्य में राक्षसों का वध करने के लिए गए, और हर जगह सीताजी को अपने साथ ही लेकर गए. वन में मिलने वाली तरह-तरह की सुंदर चीजों से उनका मन बहलाते रहते थे, सुन्दर कहानियां सुनाते रहते थे, स्वयं ज्ञान लेते रहते थे और सीताजी को भी देते रहते थे.

श्रीराम ने बता दिया था कि गृहस्थ आश्रम में रहकर भी और अपनी पत्नी के सुखों का ध्यान रखकर भी ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है, देश के प्रति भी अपनी सभी जिम्मेदारियों को निभाया जा सकता है, क्योंकि ब्रह्मचर्य और ज्ञान प्राप्ति तो मन की तपस्या है, और इसीलिए सभी सुख-सुविधाओं के बीच में रहकर भी राजा जनक योगी या ऋषि ही कहे गए हैं.

भगवान शिव तो सबसे बड़े संन्यासी हैं, फिर भी गृहस्थ हैं और अपनी पत्नी के साथ ही रहते हैं और सभी दायित्वों को इस प्रकार निभाते हैं कि स्त्रियां शिव जैसा पति पाने के लिए व्रत रखती हैं.

(महाभारत में व्याधगीता में) कौशिक ऋषि अपने माता-पिता की इच्छा के बिना ही ज्ञान प्राप्ति और तपस्या करने के लिए संन्यासी बनकर घर छोड़कर चले जाते हैं. लेकिन सारे वेदों का अध्ययन करने के बावजूद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती. इसलिए जगह-जगह अपने अहंकार का प्रदर्शन कर देते हैं.

उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई उस स्त्री और शूद्र से, जो पूरी निष्ठा के साथ अपने पारिवारिक दायित्वों को निभा रहे होते हैं, और तब कौशिक ऋषि भी भागे-भागे अपने माता-पिता के पास जाते हैं और उनकी सेवा में लग जाते हैं, और तब जाकर वे तपस्वी और ज्ञानी कहलाते हैं.

और शायद इसीलिए भगवान् विष्णु के अवतार माने जाने के बावजूद बुद्ध को सनातन परंपरा में कभी पूजनीय नहीं माना गया.

एक लम्बे कालखण्ड तक भारत में बौद्धमत राजधर्म रहा. फिर भी बौद्धमत जनमत नहीं बन सका. जैसे ही बौद्ध सत्ता समाप्त हुई, लोग पुनः सनातन की ओर भाग आये. भारत की माताएं ईश्वर को मनाती रहीं कि उनके आँगन में श्रीकृष्ण खेलें, उनकी गोदी में श्रीराम उतरें, श्रवण कुमार आएं, पर किसी माँ ने यह प्रार्थना नहीं की होगी कि उसके घर बुद्ध जन्में.

सिद्धार्थ के बुद्ध बनने के पीछे की कहानी बस इतनी सी है कि वे जीवन के दुखों को सह नहीं पाये. सिद्धार्थ ने देखा, जीवन कष्टप्रद है, रोगी होना पड़ता है, मरना पड़ता है, दुख ही दुख... सो वे निकल गए, बिना बताए सोती हुई पत्नी और नवजात बच्चे को छोड़कर.

ऐसा चरित्र तथाकथित ज्ञानियों के लिए आदर्श हो सकता है, आम जनमानस के लिए नहीं. आम जनमानस दुखों से भागने को स्वीकार नहीं करता, बल्कि दुखों से लड़ने और उन्हें हराने में विश्वास करता है. भारत ने उन लोगों को ही आदर्श समझा जिन्होंने विपरीत परिस्थियों से टकराकर स्वयं को स्थापित किया.

देशरक्षा के लिए एक सैनिक अपने परिवार को छोड़कर चला जाता है, वह जायज है. एक राजा को कुछ परिस्थितियों में अपने परिवार के सुखों की उपेक्षा करनी पड़ती है, वह भी जायज है, क्योंकि उसके ऊपर हजारों-लाखों परिवारों की रक्षा का दायित्व आ जाता है, जिससे वह भाग नहीं सकता, तो ऐसे में उसे अपने परिवार को भी अपनी प्रजा ही मानकर चलना पड़ता है.

लेकिन ज्ञान प्राप्ति के लिए या ज्ञान बांटने के लिए या संन्यासी के लिए अपने परिवार को छोड़कर चले जाना क्यों जरूरी है, यह समझ नहीं आता.

अरे संन्यास धर्म में यही तो कहा गया है कि क्रोध, अहंकार आदि का त्याग कर दो, तो अकेले रहकर तो कोई भी ऐसा कर लेगा, लेकिन परिवार के साथ रहकर सब जिम्मेदारियों को निभाकर भी क्रोध आदि का त्याग करके दिखाओ, तब मानेंगे कि हाँ, तुम सच में संन्यासी हो.

मोबाइल के पास ही न होने पर तो उससे दूर रहना फिर भी आसान है, लेकिन मोबाइल के पास रखे होने पर भी अपने ऊपर कंट्रोल रखकर दिखाओ, तब मानेंगे कि हाँ, तुमने अपनी इन्द्रियों पर विजय पा ली है.

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प्रश्न यह है कि क्या ज्ञान का अर्थ अपने दायित्वों से भाग जाना है? क्या जो अपने बच्चे और पत्नी को बिना बताए छोड़ दे,

वह प्रबुद्ध कहलाएगा या विरक्त? श्रीराम ने तो राजपाट, परिवार, वनवास, सब स्वीकारा, पर कर्तव्य और संयम का त्याग कभी नहीं किया। श्रीराम ने दिखाया कि गृहस्थ रहते हुए भी ब्रह्मचारी हुआ जा सकता है, और कर्तव्य निभाते हुए भी योगी रहा जा सकता है।

मंथरा के बहकावे से माता कैकेई ने जो वर मांगा था, वह केवल 14 वर्षों का वनवास नहीं था, बल्कि 14 वर्षों की संयम साधना थी। श्रीराम वन में सीता जी के साथ गए, लेकिन ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण पालन किया। यह दिखाने के लिए कि ब्रह्मचर्य देह से नहीं, मन से होता है।

वन में उन्होंने ऋषियों से ज्ञान लिया, दुष्टों का नाश किया, और सीता जी को हर कष्ट से बचाने में स्वयं को समर्पित किया। उन्होंने न तो संसार से भागा, न सुख से बंधे न दुख से, वे संतुलन का जीवित प्रतीक हैं।

यदि ज्ञान का अर्थ घर छोड़ना ही होता, तो क्या भगवान शिव को कोई योगी कहता? शिव सबसे बड़े संन्यासी हैं, परंतु पार्वती के साथ रहते हैं, और साथ ही सम्पूर्ण सृष्टि के पिता भी हैं। उनका ध्यान हिमालय पर है, पर करुणा संसार पर है।

इसलिए भारतीय परंपरा में सच्चा योगी वही है जो संसार में रहकर भी असंग रहे। त्याग का अर्थ भागना नहीं, बल्कि बंधनों को भीतर से तोड़ना है।

महाभारत में कौशिक ऋषि की कथा यही सिखाती है कि उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा छोड़ी, जंगल जाकर वेदों का अध्ययन किया, फिर भी उन्हें ज्ञान नहीं मिला। जब तक उन्होंने अपने अहंकार को नहीं त्यागा और घर लौटकर माता-पिता की सेवा नहीं की, तब तक वे ऋषि नहीं बने। ज्ञान केवल पुस्तकों या पर्वतों में नहीं, विनम्रता और सेवा में है।

बुद्ध निश्चय ही एक महापुरुष थे, पर उनका दर्शन एकांगी था। उन्होंने दुख को देखा, पर उसके कारणों को माया कहकर छोड़ दिया। वे जीवन से भागे, जबकि सनातन सिखाता है कि दुख से भागो नहीं, उसे समझो और जीतो। शायद इसीलिए, बौद्धमत राजधर्म तो बना, पर जनधर्म कभी नहीं बन सका। भारतीय माताएं अपने पुत्रों से राम, कृष्ण, या शिव बनने की कामना करती हैं, बुद्ध बनने की नहीं, क्योंकि भारत संघर्ष को पूजता है, पलायन को नहीं।

सच्चा संन्यासी वह नहीं, जो संसार छोड़ दे, बल्कि वह है जो संसार के बीच रहकर भी अंदर से निष्काम और निष्प्रपंच बना रहे। मोबाइल पास रखकर भी उस पर नियंत्रण रखना कठिन है। दूर रख देने पर तो कोई भी विरक्त हो सकता है। उसी तरह पत्नी, परिवार, धन और सुख के बीच रहकर भी जिसने मन को वश में कर लिया, वही सच्चा योगी है। 

सनातन का मर्म यही है, ज्ञान भागने से नहीं, निभाने से प्राप्त होता है। गृहस्थ होकर भी योगी हुआ जा सकता है। भारत के लिए आदर्श वह है, जो जीवन के हर संघर्ष को स्वीकार करे, और फिर भी भीतर से शांत रहे, जैसे सागर में उठती लहरें उसके तल की शांति को नहीं हिला पातीं।

Note : Permission to copy this article has not been granted by the author.

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