Sanatan Dharma Is About Truth, Not Fanaticism : अंधभक्ति नहीं, विवेक ही सनातन का आधार है
मैं जब भी कहीं पर नॉनवेज के खिलाफ पोस्ट डालती हूँ, तब मुझे एक कॉमेंट जरूर देखने को मिलता है कि
"स्वामी विवेकानंद जी भी तो नॉनवेज खाते थे, क्या तुम उनको भी गलत कहोगी?"
हां कहूंगी! क्योंकि मैंने तो यही सीखा है कि गलत काम तो गलत ही होता है, वह गलत काम मात्र इसलिए सही नहीं हो जाएगा कि वह काम किसी बहुत बड़े या प्रसिद्ध ज्ञानी व्यक्ति ने किया है, बल्कि अगर कोई गलत काम किसी बड़े या ज्ञानी या प्रसिद्ध व्यक्ति ने किया है, तब तो उसे और भी बड़ा दंड मिलना चाहिए, क्योंकि समाज जिस पर विश्वास कर रहा है, जिसे फॉलो कर रहा है, अगर वही व्यक्ति गलत काम करेगा तो निश्चित सी बात है कि वह समाज को या एक बहुत बड़ी पब्लिक को गलत दिशा में ही ले जाएगा.
कोई प्रसिद्ध व्यक्ति या कोई हमारा आदर्श व्यक्ति चाहे जो काम करे, उसका अंध समर्थन मजहबी विचारधारा है, सनातन धर्म की नहीं.....
मजहबी विचारधारा कहती है कि हमने जिसे आदर्श मान लिया, जिसे भगवान का दूत मान लिया, अब वप चाहे जो करे, कुछ गलत नहीं है, क्योंकि वह भगवान का दूत है, उसके लिए सब जायज है.....
ऐसी ही विचारधारा से पूरी की पूरी श्रृंखला दूषित हो जाती है, संक्रमित हो जाती है, कट्टर हो जाती है, जिसके सुधरने की भी कोई गुंजाइश नहीं रह जाती....
जबकि सनातन धर्म की विचारधारा कहती है कि अगर कोई अपराध या कोई गलत कार्य जिसने भी किया, उसे दंड अवश्य मिलेगा, फिर चाहे वो कोई भी हो.....
जैसे श्रीमद्भागवत पुराण में एक कथा आती है कि ब्रह्मा जी अपनी ही पुत्री पर काममोहित हो गए, और इसी कथा को लेकर यह भी कहा गया है कि ब्रह्मा जी को इस अपराध के लिए भगवान शिव ने दंडित किया या भूल का अहसास होते ही ब्रह्मा जी ने स्वयं को नष्ट कर दिया.....
तो जहां पर गलत कार्यों के लिए भगवान तक दंड भोग रहे हैं, तो इंसान क्या चीज है.... हमारे यहां कहीं भी यह कहकर किसी भी गलत काम का समर्थन नहीं किया गया कि "भगवान है, जो चाहे कर सकते हैं, सब जायज है...."
नहीं! यही कहा जा रहा है कि अगर कोई गलत कार्य भगवान ने किया है तो उन्हें भी दंड मिलेगा फिर चाहे वह स्वयं सृष्टि का रचयिता ही क्यों ना हो.....
मुझसे एक व्यक्ति का रहा था कि श्रीराम भी तो शिकार पर गए थे हिरण को मारने के लिए.....
तो पहली बात कि पूरी वाल्मीकि रामायण में श्रीराम द्वारा मृगों का शिकार करने जैसी कोई बात कहीं भी नहीं लिखी है, सिवाय सीता-हरण के प्रसंग के, और उसमें भी मायापति राक्षसी माया को पहचान चुके थे.....
फिर भी एक पल को हम इसे साधारण घटना मान भी लें, तो उसमें भी उस बात का समर्थन नहीं किया जा रहा, बल्कि उसके दुष्परिणाम ही बताये जा रहे हैं.....
चाहे राजा दशरथ जी शिकार पर गए हों और चाहे पंचवटी में श्रीराम, दोनों ने ही उसके बाद बुरे समय को ही देखा है, अपनी उस गलती का दंड भोगा है, यानी भगवान यही बता रहे हैं कि गलत कार्यों का दंड मिलता है, फिर चाहे भगवान का पिता हो या स्वयं भगवान.....
हमारे यहां कोई भी गलत कार्य इस नाम से सही नहीं हो जाता कि उसे भगवान ने किया है, या इस ज्ञानी व्यक्ति ने किया है, या इस प्रसिद्ध या आदर्श व्यक्ति ने किया है .…..
यहां किसी को आरक्षण नहीं मिला है....
यहां एक साधारण से साधारण मनुष्य भी अपने पुण्यकर्मों से देवताओं से ऊंचा स्थान प्राप्त कर सकता है, और गलत कार्य करके देवता भी अधोगति को प्राप्त हो सकते हैं.....
स्वामी विवेकानंद नॉनवेज के शौकीन थे, यह फैक्ट दिखाकर नॉनवेज का समर्थन किया जाता है, तो साथ ही यह भी तो फैक्ट दिखाना चाहिए कि इतनी सी उम्र में ही विवेकानंद 30 से ज्यादा बीमारियों के शिकार हो चुके थे, डॉक्टर के मना करने के बाद भी नॉनवेज का लालच न त्याग सके (मैंने ऐसा पढ़ा है).....
हम चाहे जिसको भी फॉलो करें, चाहे जिसको भी आदर्श मानें, यह गलत नहीं है, लेकिन अपना दिमाग और अपनी आंखें हमेशा खुली रखनी चाहिए.....
पूर्ण रूप से सही केवल भगवान ही हो सकते हैं, लेकिन अगर उनकी भी बातों का सही मतलब निकाला जाए तो. क्योंकि भगवान कभी गलत नहीं कहते, लेकिन हम उनकी बातों का क्या अर्थ निकालते हैं, वो हमारे ही चरित्र पर निर्भर करता है....
हर बात में अपने मन के अपवादों को नहीं ठूंस देना चाहिए.
गलत काम गलत ही रहेगा, फिर चाहे पूरी दुनिया उसके साथ क्यों ना खड़ी हो, और सही बात सही ही रहेगी फिर चाहे पूरी दुनिया उसके खिलाफ ही क्यों ना खड़ी हो....!
By Aditi Singhal

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