Gautam Buddha's answer on the existence of God
Gautam Buddha's answer on the existence of God : ईश्वर के अस्तित्व पर गौतम बुद्ध का उत्तर
गौतम बुद्ध के संबंध में एक कहानी का उल्लेख मिलता है -
एक दिन सुबह-सुबह गौतम बुद्ध अपने शिष्यों की सभा में बैठे हुए थे. वहां एक व्यक्ति आया. वह ईश्वर का बहुत बड़ा भक्त था. खूब पूजा-पाठ किया करता था. अब वह बूढ़ा हो रहा था. हालांकि वह जानता था कि ईश्वर है, पर उसके मन में एक छोटा सा संदेह आ गया कि वास्तव में ईश्वर है या नहीं. उसने सोचा कि, "यदि कोई ईश्वर नहीं है, तब तो मेरा पूरा जीवन बेकार ही चला गया. एक अलौकिक आदमी यहां उपस्थित है, उससे बात कर मुझे अपना संदेह दूर कर लेना चाहिए."
लेकिन सबके सामने यह प्रश्न कैसे पूछा जाए? इसलिए वह व्यक्ति सूर्योदय से पहले आया और एक कोने में खड़े होकर उसने बुद्ध से प्रश्न किया, "क्या ईश्वर है या नहीं?"
गौतम बुद्ध ने उसकी ओर देखा और कहा, "नहीं है".
शिष्यों के बीच से 'ohhh' की आवाज निकली, उन्होंने राहत भरी सांस ली. ईश्वर है या नहीं, यह द्वंद उनमें प्रतिदिन चलता रहता था. उन्होंने कई बार गौतम बुद्ध से यह प्रश्न किया था और हर बार गौतम बुद्ध चुप रह जाते थे. यह पहला मौका था, जब उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, "नहीं".
सच में, ईश्वर के बिना रहना कितना आनंददायक था. एक स्वतंत्रता मिल जाती है कि कोई हमारे कर्मों को नहीं देख रहा, तो जो चाहे मर्जी वह करो. शिष्यों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई. वह दिन उन सबके लिए एक खुशी का दिन था.
शाम को, फिर बुद्ध अपने शिष्यों के बीच बैठे हुए थे, उसी समय एक दूसरा व्यक्ति आया. वह भौतिकवादी और नास्तिक था. वह केवल उसी में विश्वास करता था, जिसे वह अपनी आँखों से देख सकता था. उसकी नजर में जो दिखाई नहीं देता, उसका अस्तित्व ही नहीं होता.
वह व्यक्ति भी अब बूढ़ा हो रहा था और उसके मन में एक छोटा सा संदेह आ गया. उसने सोचा कि "मैं पूरे जीवन लोगों को कहता रहा कि ईश्वर नहीं है. लेकिन मान लो अगर ईश्वर है तो जब मैं वहां अपने कर्मों को लेकर जाऊंगा तो क्या वह मुझे छोड़ेगा?" लोगों से वह नरक के बारे में कई बार सुन चुका था.
हालांकि वह जानता था कि ईश्वर नहीं है, पर उसे थोड़ा सा संदेह हो गया. उसने सोचा कि "मान लो अगर ईश्वर है तो संकट क्यों मोल लिया जाए? अब भी समय है, कुछ धर्म-कर्म या अच्छे कर्म कर लूंगा. शहर में एक अलौकिक पुरुष है. उनसे जरा मैं पूछ ही लूं."
देर शाम को, अंधेरा होने के बाद वह गौतम बुद्ध के पास पहुंचा और उनसे पूछा, "क्या ईश्वर है या नहीं?” बुद्ध ने उसे भी देखा और कहा, ''हां है”.
Hainnn....?? एक बार फिर शिष्यों के बीच बड़ा संघर्ष शुरू हो गया. सुबह से वे बेचारे बहुत खुश थे, क्योंकि गौतम बुद्ध ने कहा था कि ईश्वर नहीं है, लेकिन शाम को वे कह रहे हैं कि ईश्वर है. आखिर ऐसा क्यों?
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दोनों ही व्यक्तियों को अपनी अपनी बात पर विश्वास नहीं था. न ईश्वरभक्त को और न नास्तिक को. दोनों ही संदेह में जी रहे थे और डर के कारण बुरे कर्म नहीं कर पा रहे थे. एक सोच रहा था कि यदि ईश्वर न हुआ तो? तो बेकार है ये सारे अच्छे कर्म, और दूसरा सोच रहा था कि यदि ईश्वर हुआ था, तो वो मुझे मेरे बुरे कर्मों को सजा देगा.
इससे यह भी पता चलता है कि जो लोग सच में ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन करते हैं, वे बुरे काम करने से कहीं न कहीं डरते हैं. नास्तिक लोग कहीं न कहीं अपनी मनमानी करने के लिए नास्तिकता का प्रचार करना चाहते हैं, इसलिए वे ईश्वर से मुक्ति चाहते हैं.
यह कहानी ऐतिहासिक प्रमाण से अधिक एक शिक्षात्मक दृष्टांत है. साहित्यों में ऐसी कई कथाएँ मिलती हैं जिनका उद्देश्य उत्तर देना नहीं, बल्कि मनुष्य के मन को आईना दिखाना होता है. बुद्ध का मूल उद्देश्य था, मनुष्य को डर और लालच से मुक्त करना, न कि ईश्वर है या नहीं की बहस में उलझाना.
पहला व्यक्ति (ईश्वरभक्त) बाहर से तो आस्तिक था, लेकिन भीतर से डरा हुआ और संदेहग्रस्त था. वह अच्छे कर्म श्रद्धा से नहीं, बल्कि डर से कर रहा था. बुद्ध ने उससे कहा कि ईश्वर नहीं है, ताकि वह व्यक्ति यह समझे कि अगर ईश्वर नहीं भी है, तब भी क्या तुम नैतिक रह सकते हो? यानी नैतिकता डर पर नहीं, समझ पर टिकी होनी चाहिए.
दूसरा व्यक्ति (नास्तिक) बाहर से तो नास्तिक था, लेकिन भीतर से डरा हुआ और अस्थिर था. बुरे कर्म इस भरोसे पर कि कोई देखने वाला नहीं. बुद्ध ने उससे कहा कि ईश्वर है, ताकि वह व्यक्ति यह सोचे कि अगर कोई साक्षी है, तो क्या तुम अपने कर्मों की जिम्मेदारी लोगे? यानी स्वच्छंदता के नाम पर स्वार्थ नहीं.
बुद्ध सत्य का उत्तर नहीं, बल्कि व्यक्ति की मानसिक अवस्था के अनुसार औषधि दे रहे थे. जैसे एक ही दवा सबको नहीं दी जाती. ईश्वर है या नहीं, यह नहीं, बल्कि तुम कैसे जी रहे हो, यह महत्वपूर्ण है.
दोनों की आस्था/नास्तिकता अधूरी थी. दोनों अपने कर्मों को लेकर आत्मविश्वासी नहीं थे. नास्तिक लोग मनमानी करने के लिए नास्तिकता का प्रचार करते हैं. हालांकि कई नास्तिक नैतिक होते हैं, करुणा से जीते हैं, कर्मफल, समाज और मानवता में विश्वास रखते हैं. और वहीं, कई आस्तिक ईश्वर को मानते हुए भी हिंसा, पाखंड और अन्याय करते हैं. इसलिए बुद्ध की दृष्टि में आस्तिक–नास्तिक नहीं, सजग–असजग मनुष्य का अंतर है. इस कहानी का सबसे गहरा संदेश (जो अक्सर छूट जाता है) कि यदि तुम्हारी नैतिकता किसी निगरानी से आती है, तो वह नैतिकता नहीं, भय है, और यदि तुम्हारी स्वतंत्रता दूसरों को नुकसान देने की छूट है, तो वह स्वतंत्रता नहीं, क्रूरता और अज्ञान है. बुद्ध इन दोनों से मनुष्य को मुक्त करना चाहते थे.
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