What is a magnet? How is it made? The effects and importance of magnets : चुम्बक क्या है? यह कैसे बनता है? चुम्बक का प्रभाव और महत्व

आज विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र (और अन्य प्रकार के क्षेत्र भी) भौतिकी की आधारशिला है। चुंबक (Magnet) और चुंबकत्व (Magnetism) विज्ञान का एक अत्यंत रोचक और आधारभूत विषय है। यह बताता है कि वस्तुएँ एक-दूसरे को बिना स्पर्श किए आकर्षित या विकर्षित (खींचना या धकेलना) कैसे कर सकती हैं।
चुंबक को धागे से लटकाने पर उसका उत्तर ध्रुव हमेशा उत्तर दिशा की ओर मुड़ जाता है। इसी कारण कंपास (Compass) बनाया गया। समान ध्रुव एक-दूसरे को विकर्षित (Repel) करते हैं। असमान ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित (Attract) करते हैं।
हमारी पृथ्वी स्वयं एक विशाल चुंबक है। इसका चुंबकीय उत्तर ध्रुव और चुंबकीय दक्षिण ध्रुव होता है, इसी कारण कंपास की सुई हमेशा उत्तर दिशा दिखाती है।
चुंबक की शक्ति गर्मी या झटकों से कम हो जाती है। जब चुंबक को टुकड़ों में काटते हैं, तो हर टुकड़ा अपना-अपना उत्तर और दक्षिण ध्रुव बना लेता है। चुंबकत्व का कारण है इलेक्ट्रॉनों की गति। जब इलेक्ट्रॉन एक दिशा में घूमते हैं तो चुंबकीय बल उत्पन्न होता है।
चुंबक (Magnet) क्या है? (What is Magnet)
चुंबक वह पदार्थ होता है जिसमें लौह (Iron), निकेल (Nickel) या कोबाल्ट (Cobalt) जैसे धातुओं को आकर्षित करने की शक्ति होती है। यह शक्ति उस वस्तु के भीतर उपस्थित चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) के कारण होती है। सरल शब्दों में, चुंबक वह वस्तु है जो लोहे को खींच सकती है।
चुंबक के प्रकार (Types of Magnets)
(A) प्राकृतिक चुंबक (Natural Magnet) : यह प्रकृति में स्वयं मिलता है, जैसे लौह पत्थर (Magnetite या Lodestone)। इनका चुंबकीय बल सीमित होता है।
(B) कृत्रिम चुंबक (Artificial Magnet) : इन्हें मनुष्य बनाता है। यह किसी पदार्थ को चुंबकीय क्षेत्र में रखकर बनाया जाता है। जैसे, बार चुंबक (Bar Magnet), घोड़े की नाल आकार का चुंबक (Horse-shoe Magnet), इलेक्ट्रोमैग्नेट (Electromagnet)।
चुंबक के ध्रुव (Poles of a Magnet) : हर चुंबक के दो सिरों में सबसे अधिक शक्ति होती है जिन्हें ध्रुव (Poles) कहते हैं:
उत्तर ध्रुव (North Pole)
दक्षिण ध्रुव (South Pole)
चुंबकत्व (Magnetism) क्या है? (What is Magnetism)
चुंबकत्व वह बल है जिसके कारण चुंबक अन्य वस्तुओं को आकर्षित या विकर्षित करता है। यह बल चुंबक के चारों ओर एक क्षेत्र बनाता है जिसे चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) कहते हैं। यह अदृश्य बल होता है, लेकिन इसका प्रभाव हम देख सकते हैं, जैसे लोहा चुंबक की ओर खिंचता है।
चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field)
यह वह क्षेत्र है जहाँ चुंबक का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। इस क्षेत्र में कल्पित रेखाएँ (Magnetic Field Lines) बनती हैं जो हमेशा उत्तर ध्रुव से निकलती हैं, और दक्षिण ध्रुव में प्रवेश करती हैं। इन रेखाओं की दिशा चुंबकत्व की दिशा बताती है।
चुंबक कैसे बनता है?
(A) स्पर्श विधि (Touch Method) : किसी लोहे की छड़ को चुंबक से कई बार एक ही दिशा में रगड़ने से वह चुंबक बन जाती है।
(B) विद्युत विधि (Electromagnet) : जब लोहे की छड़ के चारों ओर तार लपेटकर उसमें विद्युत प्रवाहित की जाती है, तो वह अस्थायी रूप से चुंबक बन जाती है। इसे विद्युत चुंबक (Electromagnet) कहते हैं। इसका उपयोग मोटर, घंटी, ट्रांसफॉर्मर आदि में होता है।
चुंबकत्व के प्रयोग (Uses of Magnetism)
- 1. कंपास (Compass) – दिशा बताने के लिए,
- 2. विद्युत मोटर (Electric Motor) और जनरेटर (Generator) में,
- 3. स्पीकर और हेडफोन में ध्वनि उत्पन्न करने के लिए,
- 4. MRI मशीन में शरीर की आंतरिक संरचना देखने के लिए,
- 5. मैग्नेटिक कार्ड, हार्ड डिस्क, और डेटा स्टोरेज उपकरणों में,
- 6. चुंबकीय दरवाज़ों और लिफ्ट में।
पृथ्वी स्वयं एक विशाल चुंबक है
जैसे एक चुंबक के दो ध्रुव होते हैं, उत्तर (North Pole) और दक्षिण (South Pole), वैसे ही पृथ्वी के भी चुंबकीय ध्रुव हैं। लेकिन भौगोलिक ध्रुव यानी वह धुरी (axis) जिस पर पृथ्वी घूमती है, और चुंबकीय ध्रुव यानी जहाँ पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावी है। ये दोनों एक ही स्थान पर नहीं होते, बल्कि थोड़ी दूरी पर होते हैं। इसलिए कंपास की सुई सीधे भौगोलिक उत्तर की ओर नहीं बल्कि चुंबकीय उत्तर की ओर इशारा करती है।
पृथ्वी के चारों ओर एक अदृश्य ढाल (shield) बनी हुई है, जिसे हम चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) कहते हैं। यह क्षेत्र ऐसे कार्य करता है जैसे, पृथ्वी के चारों ओर एक सुरक्षा-कवच हो, जो अंतरिक्ष से आने वाले हानिकारक कणों को रोकता है, जैसे सूर्य से आने वाली तेज सौर हवाएँ (solar wind)।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र अंतरिक्ष में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। अंतरिक्ष में इसका असर कई गुना अधिक होता है। जमीन पर हम चुंबकीय क्षेत्र को ज्यादा महसूस नहीं करते क्योंकि हवा घनी होती है, कणों की गति कम होती है, चुंबकीय बल बहुत कमजोर महसूस होते हैं, हम इसका असर केवल कुछ जगह देखते हैं, जैसे :
(1) चुंबकीय तूफान (Magnetic Storms), जब सूर्य से बहुत ऊर्जा आती है, तो पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र थोड़ा हिलता-डुलता है। इसे चुंबकीय तूफान कहा जाता है। (2) ध्रुवीय रोशनी (Aurora / Northern Lights), जब आवेशित कण पृथ्वी के ध्रुवों के पास वायुमंडल से टकराते हैं, तो आकाश में सुंदर रंगीन रोशनियाँ बनती हैं। ये रोशनियाँ नॉर्वे, अलास्का, रूस, कनाडा, जैसे उत्तरी देशों में दिखती हैं।
आसान शब्दों में, पृथ्वी एक विशाल चुंबक है, जिसके चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच है, जो अंतरिक्ष की हानिकारक ऊर्जा से हमें बचाता है, धरती पर हम इसका ज्यादा असर नहीं देखते, लेकिन अंतरिक्ष में यह बहुत शक्तिशाली है और उपग्रहों, अंतरिक्ष यात्रा, रेडियो सिग्नल्स, GPS पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ता है।
प्रकृति में चुंबकीय क्षेत्र कहाँ-कहाँ बनते हैं?
प्रकृति में चुंबकीय क्षेत्र कई जगह बनते हैं :
⭐ अंतरिक्ष की विरल (बहुत पतली) गैसों में। अंतरिक्ष में गैस बहुत कम और फैली हुई होती है, पर वहाँ भी तेज गति से घूमते विद्युत आवेशित कण (charged particles) चुंबकत्व पैदा कर देते हैं।
⭐ सूर्य के अंदर, विशेषकर सन स्पॉट्स में। सूर्य के धब्बे (sunspots) असल में बहुत गर्म, तीव्र ऊर्जा वाले क्षेत्र होते हैं, जहाँ गैसें तेजी से घूमती हैं। उनकी इस तीव्र गति से चुंबकीय क्षेत्र बनते हैं।
⭐ पृथ्वी के अंदर, पिघले हुए लावे वाले तरल केंद्र में। पृथ्वी का कोर (core) एक विशाल, गरम, पिघली हुई लोहे-निकेल की नदी जैसा है, जो निरंतर घूम रही है। यही घूमता हुआ धातु पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र बनाता है।
चुंबकीय क्षेत्र असल में बनते कैसे हैं?
हर चुंबकीय क्षेत्र का असली कारण विद्युत धारा (electric current) है। चाहे वह तार में हो या अंतरिक्ष में। जहाँ भी आवेशित कण (charged particles) चलते हैं, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र बनता है। धरती या सूर्य के अंदर
गरम तरल धातु या गैसें घूमती रहती हैं, उससे विद्युत आवेश भी साथ घूमते हैं, उनकी गति से एक प्राकृतिक विद्युत धारा बनती है, और यह धारा चुंबकीय क्षेत्र बनाती है।
लेकिन विद्युत धारा बनती कैसे है? यही सबसे बड़ा रहस्य है। वैज्ञानिकों को अभी पूरा-पूरा पता नहीं कि यह धारा शुरू कैसे होती है? इसे कौन चलाता है? यह इतनी स्थिर क्यों रहती है? कुछ चीजें ही समझ में आई हैं। जैसे,
(A) सूर्य में धारा कैसे बनती है? तो सूर्य के अंदर तापमान इतना ज्यादा है कि गैस प्लाज्मा बन जाती है, जहाँ इलेक्ट्रॉन और आयन अलग-अलग होकर स्वतंत्र रूप से घूमते हैं। जब यह प्लाज़्मा बहुत तेज घूमता है, ऊपर-नीचे चलता है, सौर गतिविधि बदलती है, तो यह स्वचालित रूप से विद्युत धारा बना देता है। इसे Solar Dynamo कहा जाता है।
(B) पृथ्वी के अंदर धारा कैसे बनती है? तो धरती का बाहरी कोर (outer core) तरल धातु का बना है, यह बहुत गरम है और लगातार घूम रहा है, और भूगर्भीय गर्मी उससे गतियाँ पैदा करती है। धातु में इलेक्ट्रॉन होते हैं, जब धातु घूमती है, तो इलेक्ट्रॉन भी साथ घूमते हैं, यह एक प्राकृतिक विद्युत धारा बनाती है। इसे Geodynamo कहा जाता है। यही पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र बनाता है।
(C) अंतरिक्ष में धारा कैसे बनती है? अंतरिक्ष में सूर्य से आने वाले चार्ज्ड कण, सितारों का विस्फोट, सौर हवाएँ, आकाशगंगाओं का घूमना, ये सभी कण अपनी गति से प्राकृतिक विद्युत धाराएँ पैदा करते हैं।
तो कहने का अर्थ यह है कि जहाँ भी आवेशित कण चलेंगे, वहाँ विद्युत धारा बनेगी। जहाँ भी विद्युत धारा होगी, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र बन जाएगा। और प्रकृति में, पृथ्वी, सूर्य, अंतरिक्ष, गैलेक्सियाँ हर जगह कण चलते रहते हैं, इसलिए चुंबकीय क्षेत्र हर जगह मौजूद है।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र रेडियो तरंगें क्यों बनाता है?
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में बहुत-से विद्युत आवेशित कण (charged particles) फँसे होते हैं, जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, आयन आदि। ये कण घूमते हैं, टकराते हैं, चुंबकीय क्षेत्र की रेखाओं के साथ oscillate (हिलते-डुलते) हैं। जब भी कोई charged particle चुंबकीय क्षेत्र में हिलता है, वह रेडियो तरंगें (Radio Waves) उत्पन्न करता है। बिल्कुल वैसे, जैसे एंटीना में इलेक्ट्रॉनों की गति रेडियो तरंगें बनाती है।
पृथ्वी के ऊपर कई परतें हैं, जैसे आयनमंडल (ionosphere), मैग्नेटोस्फीयर, प्लाज़्मा क्षेत्र आदि। जब रेडियो तरंगें इन परतों से गुजरती हैं, तो वे मुड़ जाती हैं, धीमी/तेज हो जाती हैं, कुछ तरंगें गायब (absorb) हो जाती हैं और कुछ तरंगें मजबूत हो जाती हैं। इसका अर्थ है कि तरंगें बदल जाती हैं और हमें बता देती हैं कि रास्ते में उन्हें किस वातावरण ने छुआ।
जैसे, यदि पानी में पत्थर फेंको तो लहरें फैलती हैं, लेकिन यदि बीच में कोई पत्थर, पौधा, या मछली हो तो लहरें बदल जाती हैं। लहर को देखकर आप बता सकते हो कि बीच में क्या था, बिल्कुल वैसा ही रेडियो तरंगों के साथ होता है।
जब तरंगें बदलती हैं, तो वैज्ञानिक समझ जाते हैं कि उस क्षेत्र में कणों की संख्या कितनी है, वे किस प्रकार के कण हैं, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, या आयन। उनकी ऊर्जा कितनी है, वे किस दिशा में घूम रहे हैं, क्या कोई तूफान (सौर तूफान) आया है, यानि तरंगें संदेश लेकर आती हैं। जिस तरह हवा हमें यह बताती है कि पेड़ हिला कि नहीं।
अन्य ग्रहों, सूर्य और ब्रह्मांड से भी ऐसी तरंगें मिलती हैं, जहाँ भी चुंबकीय क्षेत्र है और वहाँ तेज गति से घूमते कण हैं, वहाँ रेडियो तरंगें बनती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने रेडियो तरंगें खोजी हैं। जैसे बृहस्पति (Jupiter) का चुंबकीय क्षेत्र विशाल है, पृथ्वी से 20 गुना बड़ा। वहाँ से बहुत तेज रेडियो emissions आते हैं। शनि, यूरेनस, नेप्च्यून के चुंबकीय क्षेत्रों से भी विशेष रेडियो सिग्नल आते हैं। सौर तूफानों के समय सूर्य भी बहुत-सी रेडियो तरंगें भेजता है। गहरे अंतरिक्ष में (दूरस्थ तारे और आकाशगंगाएँ) अक्सर रेडियो तरंगें पाई जाती हैं, जो कणों की गतिविधि और चुंबकीय क्षेत्र के आकार का पता देती हैं।
केवल रेडियो तरंगें ही नहीं, कई बार एक्स-रे भी निकलते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि जब इलेक्ट्रॉन बहुत ज्यादा ऊर्जा वाले होते हैं, और वे बहुत तेज चुंबकीय क्षेत्र में घूमते हैं, तो वे एक्स-रे उत्सर्जित करते हैं। इसका मतलब यह होता है कि वहाँ बहुत ताकतवर चुंबकीय क्षेत्र है, कणों की गति बेहद तेज है, ऊर्जा स्तर बहुत ऊँचे हैं, कोई विस्फोट (flare), टकराव या चुंबकीय तूफान हुआ है, यानी एक्स-रे = high-energy electrons की पहचान।
Post a Comment