Shakuntala Dushyant Story : शकुंतला और दुष्यंत

शकुन्तला-दुष्यंत की असली कहानी में न दुर्वासा ऋषि हैं, न उनका कोई शाप है, न कोई अंगूठी है और न कोई मछुआरा। दुष्यंत शकुन्तला को कभी भूले नहीं थे, बल्कि वे भरी सभा में शकुन्तला को भूलने का अभिनय करते हैं, जिससे देवगण विवश होकर प्रजा के सामने शकुन्तला की पवित्रता और महानता का परिचय स्वयं दें, क्योंकि दुष्यंत को भय था कि प्रजा उन दोनों की पवित्रता और कर्तव्यपरायणता पर संदेह कर सकती है।
महाभारत के अनुसार, विश्वामित्र और मेनका की नवजात पुत्री शकुन्तला मालिनी तट पर कण्व ऋषि को प्राप्त हुई थीं। कण्व ऋषि ने देखा कि कई शकुन्त पक्षी एक नवजात की रक्षा कर रहे हैं। कण्व ऋषि समस्त प्राणियों के प्रति अत्यंत दयालु थे। वे उस नवजात को अपने आश्रम में ले आए और अपनी पुत्री बनाकर उसका पालन पोषण किया। उन्होंने उसका नाम शकुन्तला रखा। शकुन्तला ऋषि आश्रम में बड़ी हुईं।
एक दिन, इलिल के पुत्र महाराज दुष्यंत (पुरुवंशी) कण्व ऋषि के दर्शन के लिए उनके आश्रम पर आए। उस समय कण्व ऋषि आश्रम में उपस्थित नहीं थे। तब शकुन्तला ने उनका आदर-सत्कार किया। शकुन्तला के रूप, गुणों और सदाचार को देखकर दुष्यंत उन पर मोहित हो गए। उन्होंने उसी समय अपने विषय में सब सत्य बताकर शकुन्तला के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया।
तब शकुन्तला ने भी अपने जन्म आदि के विषय पर सब सत्य राजा दुष्यंत को बता दिया, और कण्व ऋषि के आने तक प्रतीक्षा करने की बात कही। किंतु राजा दुष्यंत ने शकुन्तला से उन्हें अपनी ही इच्छा से स्वीकार करने का निवेदन किया। उन्होंने शकुंतला से कहा कि "तुम भी क्षत्रिय हो और क्षत्रियों में गान्धर्व विवाह मान्य है, अतः मैं चाहता हूँ कि तुम कृपया मुझे स्वेच्छा से स्वीकार करो।"
दुष्यंत और शकुन्तला ने विवाह कर लिया और कुछ समय साथ रहे। इसके बाद दुष्यंत शकुंतला को शीघ्र ही ले जाने का वचन देकर अपने राज्य को लौट गए। वहीं, कण्व ऋषि के लौटने पर शकुंतला भय के कारण उन्हें अपने आप कुछ नहीं बतातीं। किंतु कण्व ऋषि शकुन्तला को देखते ही अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान जाते हैं और अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हैं, और शकुन्तला को आशीर्वाद देते हैं।
कुछ समय बाद शकुंतला एक पुत्र को जन्म देती हैं, जो अत्यंत वीर, तेजस्वी और असाधारण प्रतिभाओं से युक्त था। मात्र पांच-छह वर्ष की आयु में ही वह राक्षसों पर भी विजय प्राप्त कर लेता था। वन के सभी पशु-पक्षी उस बालक के नियंत्रण में रहते थे, इसलिए ऋषियों ने उसका नाम सर्वदमन रखा।
इतने वर्षों तक भी दुष्यंत न तो शकुन्तला को लेने आए और न ही उन्हें लेने के लिए किसी को भेजा। अतः शकुन्तला बहुत चिंतित रहने लगीं। उनका भोजन करने में भी मन नहीं लगता। तब कण्व ऋषि ने अपने कुछ शिष्यों के साथ शकुन्तला और उनके पुत्र सर्वदमन को राजा दुष्यंत के राजमहल में भेज दिया। उन्होंने बहुत सारा आशीर्वाद देते हुए नम आंखों से शकुन्तला को विदा किया।
राजा दुष्यंत के समक्ष पहुंचकर शकुन्तला ने अपना और अपने पुत्र का परिचय दिया, और अपने पुत्र को युवराज पद पर बिठाने करने का आग्रह किया। किंतु दुष्यंत ने पूरी राजसभा के सामने शकुन्तला को चरित्रहीन कहते हुए उन्हें पहचानने से ही मना कर दिया।
राजा दुष्यंत की ऐसी बातें सुनकर और ऐसा व्यवहार देखकर शकुन्तला अत्यंत क्रोधित हो गईं। उनकी आँखें लाल हो गईं। किंतु तपस्या द्वारा संचित किए हुए अपने तेज को वह अपने भीतर ही धारण किए रहीं। उन्होंने राजसभा में ही दुष्यंत को सत्य और धर्म का उपदेश देते हुए बहुत से अप्रिय वचन भी कहे। अंत में शकुन्तला ने दुष्यंत से कहा -
"यदि आपकी झूठ में ही आसक्ति है और आपको मेरी बात पर श्रद्धा (विश्वास) नहीं है, तो मैं स्वयं भी यहां से चली जाती हूँ। मैं आप जैसे झूठे पुरुष के साथ रहना भी नहीं चाहतीं। किंतु एक बात स्मरण रखिएगा कि मेरा पुत्र आपके सहयोग के बिना ही समूची पृथ्वी पर शासन करेगा। देवराज इंद्र का यह वचन है कि मेरा पुत्र चक्रवर्ती सम्राट होगा।"
इतना कहकर जैसे ही शकुन्तला वहां से जाने लगीं, उसी समय सबके सामने वहां आकाशवाणी हुई। आकाशवाणी के रूप में देवगणों ने राजा दुष्यंत को संबोधित करते हुए कहा कि
"शकुंतला सत्य कह रही हैं और तुम्हें उसका सम्मान करना चाहिए।"
ऐसा कहकर देवता तथा ऋषिगण शकुन्तला पर फूलों की वर्षा करने लगे। देवगणों की बात सुनकर राजा दुष्यंत अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने शकुन्तला का आदर-सत्कार किया, और ऐसा व्यवहार करने के पीछे का सब कारण भी समझा दिया। उन्होंने कहा कि यदि मैं ऐसा नहीं करता, तो प्रजा को हमारे धार्मिक सम्बन्ध पर विश्वास नहीं होता। इसलिए मैंने यह उपाय सोचा था।
महाराज दुष्यंत ने अपने पुत्र सर्वदमन को युवराज पद पर बिठा दिया, जो आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम से विख्यात हुए। उन्हीं से इस भूखण्ड का नाम भारत (Bharat) हुआ।
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