Marriage in Hindu Sanatan Dharma : हिंदू सनातन धर्म में विवाह का अर्थ

Meaning of Marriage (Wedding) in Hindu Sanatan Dharma, Duties of a Husband in Hinduism

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आज के सोशल मीडिया युग में विवाह का अर्थ बहुत सतही और विकृत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जबकि हिंदू धर्म में विवाह कोई सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संस्कार है, आत्मा की उन्नति का एक माध्यम। हिंदू संस्कृति में विवाह केवल दो शरीरों या दो व्यक्तियों का नहीं, दो आत्माओं का मिलन (Divine union of souls) माना गया है।

यह काम का साधन नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थों में संतुलन लाने का एक मार्ग है।

ऋग्वेद में कहा गया है, 

सम्राज्ञी श्वशुरे भव, सम्राज्ञी श्वश्व्रां भव। (ऋग्वेद 10.85.46)

अर्थात् हे वधू! तुम अपने ससुराल में सम्राज्ञी बनो, तुम सबका सम्मान और प्रेम पाओ।

शतपथ ब्राह्मण 13.2.6.7 में कहा गया है कि 

'पति-पत्नी एक-दूसरे के सखा और सहधर्मी हैं। दोनों का समान स्थान है। कहीं कोई किसी से छोटा या बड़ा नहीं है। पाणिग्रहण के बाद प्रत्येक कर्म में दोनों का सहयोग अपेक्षित है। पत्नी लक्ष्मी का स्वरूप है, अतः उसका सम्मान करना चाहिए। विवाह के समय वर वधू का दाहिना हाथ पकड़कर कहता है कि-

"प्रिये! मैं विष्णु हूँ और तुम मेरी लक्ष्मी हो। तुम त्रिदेवी हो और मैं त्रिदेव। मैं सङ्गीतमय सामवेद हूँ और तुम कवितामयी ऋचा हो, मैं अंतरिक्ष हूँ और तुम पृथ्वी। मैं अपने सौभाग्य के लिए तुम्हारा हाथ पकड़ता हूँ।"

शतपथ ब्राह्मण का यह अंश वास्तव में वैदिक विवाह की आत्मा को उजागर करता है। यह दिखाता है कि हिंदू धर्म में विवाह न तो वासना का अनुबंध है, न किसी एक का दूसरे पर अधिकार;

बल्कि यह दो चेतन शक्तियों, पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति, विष्णु और लक्ष्मी का पवित्र मिलन है।

सखा भव अर्थात् "तुम मेरी सखी बनो।" यह कोई सामान्य संबोधन नहीं, बल्कि गहराई से भरा आध्यात्मिक स्वीकार है। यह बताता है कि विवाह में समानता, सहयोग और सहयात्रा मूल भाव हैं। पति-पत्नी गुरु-शिष्य नहीं, मालिक-सेवक नहीं, बल्कि समान स्तर के सहधर्मी हैं, जो जीवन के हर धर्मकर्म में एक-दूसरे के सहयोगी हैं।

"प्रिये! मैं विष्णु हूँ और तुम मेरी लक्ष्मी हो।" तो इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुष ईश्वर है और स्त्री उसकी संपत्ति है, बल्कि यह है कि वह उसके जीवन में ईश्वरीय ऊर्जा का स्वरूप है। जैसे विष्णु बिना लक्ष्मी के पूर्ण नहीं, वैसे ही कोई भी पुरुष बिना स्त्री के शक्तिहीन है। जैसे लक्ष्मी विष्णु की शक्ति हैं, वैसे ही पत्नी पति की शक्ति है।

"मैं सामवेद हूँ और तुम ऋचा हो।" यह बताता है कि वह लय है और वह शब्द है, दोनों के मिलन से सृष्टि में संगीत उत्पन्न होता है।

"मैं अंतरिक्ष हूँ और तुम पृथ्वी।" अर्थात् वह आकाश है, वह आधार है; दोनों मिलकर ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि "

पत्नीं मित्रं गृहस्थस्य। (महाभारत, शान्ति पर्व 144.5)

अर्थात् पत्नी गृहस्थ का सबसे सच्चा मित्र है। वह घर में लक्ष्मी, धर्म में शक्ति, और जीवन में प्रेरणा है। वह केवल संतान की जननी नहीं, बल्कि पुरुष की आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है।

इसीलिए वैदिक विवाह में कहा गया है कि 

"हे वधू! हम दोनों सौभाग्य में समान भागी बनें।"

आधुनिक समाज ने विवाह को भोग का बंधन बना दिया है, परंतु वैदिक दृष्टि से यह आत्मा और ऊर्जा का योग है। पति और पत्नी का रिश्ता तब पवित्र होता है जब दोनों एक-दूसरे को देवत्व से देखते हैं। एक दूसरे को केवल बदलने नहीं, पूर्ण करने का प्रयत्न करते हैं। धर्म, सत्य और प्रेम के मार्ग पर साथ चलते हैं।

विवाह न कोई दायित्व है, न अधिकार; यह यज्ञ है, जिसमें दो आत्माएँ मिलकर अपनी अहंकार की आहुति देकर एक नव-सृष्टि रचती हैं। यह केवल वचन नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन और प्रेम के धर्म का उद्घोष है।

विवाह का उद्देश्य केवल जीवन-निर्वाह नहीं, बल्कि दो व्यक्तित्वों का परस्पर विकास और धर्म-साधना में सहयोग है। यह 16 संस्कारों में से एक है, जिसे गृहस्थाश्रम का द्वार कहा गया है। पति-पत्नी मिलकर धर्म, सत्य, सेवा और सदाचार का पालन करें। यह कुल-परंपरा, संस्कार और मूल्यों का प्रसार भी है। गृहस्थ जीवन में संयम, सेवा, त्याग और प्रेम के माध्यम से आत्मा का परिष्कार होता है।

हिंदू शास्त्रों में पति-पत्नी का संबंध सखा भाव (मित्रवत्), सहधर्मी (धर्म के सहयात्री) और अर्धांगिनी के रूप में वर्णित है।

अर्थात् पत्नी पुरुष का आधा शरीर नहीं, उसका आधा अस्तित्व है। पति और पत्नी दोनों एक-दूसरे के दर्पण होते हैं। एक का क्रोध दूसरे की परीक्षा है, एक का प्रेम दूसरे की औषधि है, और एक का धैर्य दूसरे की रक्षा है।

पति-पत्नी, दोनों को एक-दूसरे के साथ सम्मान से रहना चाहिए, अधिकार से नहीं। प्रेम में स्वामित्व नहीं, साझेदारी हो। मौन कई बार शब्दों से बड़ा समाधान होता है। धर्म, कर्तव्य और आत्म-संयम को आधार बनाएं, क्योंकि संबंध भावना से बनता है, शरीर से नहीं। एक-दूसरे की आध्यात्मिक यात्रा में सहयोगी बनें, प्रतिस्पर्धी नहीं। क्षमा और विनम्रता, यह विवाह के सबसे बड़े रक्षक हैं।

किन्तु आज सोशल मीडिया ने विवाह को रोमांस, फोटो और फ्रीडम की परिभाषाओं में सीमित कर दिया है, जबकि विवाह का अर्थ है, दो अधूरे अस्तित्वों का ऐसा मिलन, जिसमें दोनों मिलकर पूर्ण हो जाएं। यह वासना की पूर्ति नहीं, बल्कि संस्कारों की परिपक्वता है। यह बंधन नहीं, बल्कि सहयात्रा है, जहाँ दो आत्माएँ मिलकर ईश्वर की ओर एक कदम बढ़ाती हैं।

किंतु आज विवाह एक संस्कार नहीं, एक सौदा बन गया है। वेदों और उपनिषदों में स्त्री को सहधर्मिणी कहा गया, धर्म में समान भागीदारी रखने वाली। पर आज वही स्त्री घर में सेविका, बाहर में जिम्मेदारी बनकर रह गई है। विवाह अगर किसी के स्वाभिमान और अस्तित्व को मिटा दे, तो वह वैदिक संस्कार नहीं, बंधन है। और बंधन कभी धर्म का अंग नहीं हो सकता।

आज कुछ लोग ऐसा भी कहते हुए मिल जाते हैं कि “जो स्त्री विवाह नहीं करती, वह हिंदू धर्म का नाश कर रही है।”

यह भ्रम है। यह कथन न तो शास्त्र-संगत है, न ही धर्मसंगत। हिंदू धर्म की रक्षा जनसंख्या से नहीं, संस्कारों से होती है। हमारी परंपरा में तो गृहस्थ, ब्रह्मचारिणी, साध्वी, सभी को समान सम्मान मिला है। गार्गी ने विवाह नहीं किया, पर वेदों में ऋषि कही गईं। मैत्रीयी ने संसार नहीं, ब्रह्म को चुना। लोपामुद्रा, अनसूया, गंगा, सीता, राधा, इन सबने विवाह को धर्म का साधन बनाया, बंधन नहीं।

अर्थात् विवाह कोई अनिवार्यता नहीं, यह मार्गों में से एक मार्ग है आत्म-साक्षात्कार की यात्रा का। धर्म का नाश विवाह-त्याग से नहीं, अधर्म से होता है। धर्म नष्ट तब नहीं होता जब कोई विवाह नहीं करता, धर्म नष्ट तब होता है जब पुरुष स्त्रियों को वस्तु समझने लगता है। धर्म का नाश कभी किसी स्त्री के निर्णय से नहीं हुआ, बल्कि पुरुष के अहंकार, अधर्म और समाज की अज्ञानता से हुआ है।

विवाह तब तक पवित्र है जब तक उसमें दोनों की स्वतंत्रता और सम्मान सुरक्षित है। जहां पत्नी लक्ष्मी है, वहाँ उसे संपत्ति नहीं, शक्ति की तरह देखा जाना चाहिए। जहां पति विष्णु है, वहाँ उसे स्वामी नहीं, संरक्षक की तरह आचरण करना चाहिए। संस्कार यह नहीं कि स्त्री चुप रहे, संस्कार यह है कि पुरुष उसे समझे।

आज समाज में "पत्नी का धर्म" तो सबको याद रहता है, पर "पति का धर्म", जिसे शास्त्रों में और भी गंभीरता से बताया गया है, वह लगभग भुला दिया गया है।

वेदों, स्मृतियों और महाभारत, पुराणों में पति के कर्तव्यों का बहुत स्पष्ट और सुंदर वर्णन मिलता है। पति का कार्य पत्नी को आर्थिक या शारीरिक सुरक्षा देने के साथ-साथ भावनात्मक, आध्यात्मिक और सामाजिक सुरक्षा देना भी है।

न हिंस्यात् कन्यां, न च भर्ता भार्यां प्रतिकूलां वदेत्। (मनुस्मृति ३.५५)

पति को कभी भी पत्नी के साथ हिंसा, अपमान या कठोर व्यवहार नहीं करना चाहिए। वह उसकी देह की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है, न कि उसके शरीर पर अधिकार रखने के लिए।

प्रियवाक्यं नित्यं वदेत्। (महाभारत, अनुशासन पर्व 146.13)

पति को पत्नी से सदैव मधुर, प्रोत्साहन देने वाले और सम्मानजनक शब्दों में बात करनी चाहिए।

शास्त्र कहते हैं कि स्त्री के आँसू घर की लक्ष्मी को नष्ट करते हैं। इसलिए पति का धर्म है कि वह ऐसा वातावरण बनाए जहाँ पत्नी का मन शांत, सम्मानित और प्रसन्न रहे।

धर्मे चार्थे च कामे च नातिचरेत् पतिः क्वचित्। (मनुस्मृति ९.१०१)

पति को धर्म, अर्थ और काम, किसी भी क्षेत्र में ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए जिससे पत्नी की आत्मा दुखी हो या उसका पतन हो। 

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। (मनुस्मृति ३.५६)

जहां स्त्री का सम्मान होता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं। पति को पत्नी में देवीत्व देखना चाहिए, केवल गृहकार्य नहीं।

शास्त्रों में कहा गया है कि पति का पहला धर्म है कि वह पत्नी और परिवार की जीविका का उचित प्रबंध करे। लेकिन यह पालनकर्ता होने का अहंकार नहीं, सेवा का भाव होना चाहिए।

पत्नीं तु रक्षितुं नित्यं भर्ता धर्मेण योजयेत्। (मनुस्मृति ९.११)

पति को अन्य स्त्रियों में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए; यह उसकी निष्ठा और धर्म की रक्षा है।

स्त्रीणां गार्ह्ये दोषेऽपि न क्रुध्येत्।

पत्नी से भूल हो जाए तो भी पति को क्रोध से नहीं, सहनशीलता से व्यवहार करना चाहिए।

वैदिक विवाह में पति पत्नी से कहता है कि 

सौभाग्यं ते सुमनसः सह भागं स्याम। (ऋग्वेद 10.85.36)

हम सौभाग्य में समान भागी बनें। यानी दुःख-सुख, सफलता-विफलता, सब में साथ रहें।

भीष्म पितामह कहते हैं कि 

पतिः भार्यायाः शरणं, भार्या पतिम् अनुगच्छेत्। (अनुशासन पर्व 146)

पति पत्नी का शरणस्थल (आश्रय) है, पर यह आश्रय भय या नियंत्रण नहीं, सुरक्षा और स्नेह का है।

पत्नीं प्रियाम् अनुगृह्णीयात् स्नेहाद् धर्मेण चान्विताम्। (महाभारत, शान्ति पर्व 144.7)

पति को चाहिए कि वह पत्नी के साथ स्नेहपूर्वक, धर्मयुक्त और आदर से व्यवहार करे, क्योंकि वही गृहस्थ के धर्म का आधार है।

पति का धर्म केवल पालन नहीं, बल्कि पत्नी के शरीर, मन और आत्मा, तीनों की रक्षा करना है। वह यदि उसे प्रेम, सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता नहीं देता, तो वह केवल पति कहलाता है, पर धर्मपत्नी का पात्र नहीं बनता। पति वही, जो पत्नी के जीवन में भय नहीं, विश्वास बन जाए।

हिंदू सनातन धर्म में सती प्रथा (click here)

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