Maharshi Vishvamitra & Gayatri Mantra : महर्षि विश्वामित्र और गायत्री मंत्र

प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। विश्वामित्र जी (Vishvamitra) उन्हीं गाधि के पुत्र थे। विश्वामित्र पहले एक राजा थे, उनका नाम विश्वरथ या कौशिक था। गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) की खोज करने और यह परम अद्भुत उपहार विश्व को देने के कारण उनका नाम विश्वामित्र हुआ।
विश्वामित्र शब्द विश्व और मित्र से बना है जिसका अर्थ है, विश्व का मित्र। विश्वामित्र अत्यंत पराक्रमी, ज्ञानी और तेजस्वी क्षत्रिय थे। लेकिन उनमें एक तीव्र आध्यात्मिक जिज्ञासा थी, यह जानने की कि ऋषियों की शक्ति केवल ज्ञान से कैसे आती है, तलवार से नहीं।
एक दिन विश्वामित्र जी जंगल में पहुँचे, जहाँ महर्षि वशिष्ठ (या वसिष्ठ) का आश्रम था। महर्षि वशिष्ठ (Maharshi Vasishtha) ने साधारण सी लगने वाली नन्दिनी (Nandini) नामक गाय से अपने आश्रम के सैकड़ों मेहमानों के लिए भोजन उत्पन्न कर दिया। विश्वामित्र जी ने यह चमत्कार देखा और चकित रह गए। उन्होंने सोचा कि मेरे पास तो सेनाएँ हैं, सोना है, राज्य है, पर यह ब्राह्मण तो केवल सत्य और शक्ति से सब कर रहा है!
उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से नन्दिनी मांगी, पर वशिष्ठ जी ने कहा कि यह देवशक्ति है, इसे बल से नहीं लिया जा सकता। इस पर विश्वामित्र क्रोधित हो गए, उन्होंने वशिष्ठ जी के आश्रम पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी, पर सारी सेना नन्दिनी के आह्वान से और वशिष्ठ जी के तप से ही नष्ट हो गई। उस दिन विश्वामित्र जी को यह ज्ञात हुआ कि ब्रह्मतेज, क्षत्रतेज से बड़ा होता है। और वहीं से शुरू हुआ उनका तप, राजा विश्वरथ से महर्षि विश्वामित्र बनने की सफल यात्रा।
विश्वामित्र ने हजारों वर्षों तक कठोर तप किया। वे बार-बार विचलित हुए, अप्सरा रंभा आईं, मेनका ने मोह में डाला, इंद्र ने बाधाएँ डालीं, पर हर बार वे गिरकर भी उठे। उनका लक्ष्य था कि मैं वह शक्ति प्राप्त करूँ जिससे केवल मंत्र के बल पर सृष्टि को गति दे सकूँ।
वे केवल विद्वान नहीं बनना चाहते थे, वे सृष्टि के केंद्र को छूना चाहते थे, और वहीं से गायत्री मंत्र का जन्म हुआ। जब उनका मन पूर्ण रूप से शांत हुआ, जब अहंकार, क्रोध, मोह सब भस्म हो गए, जब चेतना की लहरें ब्रह्म के साथ एक हो गईं, तब उनके भीतर एक दिव्य नाद प्रकट हुआ। वह नाद प्रकाश की अनुभूति के रूप में था, सूर्य की तरह उज्ज्वल, परंतु भौतिक सूर्य नहीं, सविता, यानी वह चेतना जो सृष्टि को प्रेरित करती है।
उस अनुभव में उन्होंने देखा कि सृष्टि का प्रत्येक कण उसी दिव्य ऊर्जा से प्रकाशित है जो मेरी बुद्धि में भी प्रवाहित हो सकती है। और उसी अनुभव से गायत्री मंत्र उद्भव हुआ। विश्वामित्र जी गायत्री मंत्र के रचयिता नहीं, उसके प्रथम दृष्टा हैं। जब मन का अंधकार मिटा, तब भीतर के सूर्य का उदय हुआ। इसलिए उन्हें गायत्री ऋषि कहा गया, और यह मंत्र केवल शब्द नहीं, ऋषि की आत्मा में जागा हुआ प्रकाश है।
इस मंत्र का छंद है गायत्री छंद, जिसमें ३ पंक्तियाँ (त्रिपदा) और प्रत्येक में ८-८ मात्राएँ हैं, यानी २४ अक्षर। परंतु गायत्री केवल छंद का नाम नहीं है, यह एक देवी का रूप है, वह शक्ति जो जो गाई जाए और जो त्राण (रक्षा) दे। इसलिए विश्वामित्र को गायत्री मन्त्र के दृष्टा ऋषि कहा गया है, यानी जिनकी साधना में यह मंत्र स्वतः प्रकट हुआ।
विश्वामित्र जी ने यह समझा कि सत्य तक पहुँचने के लिए तप आवश्यक है, लेकिन तप का लक्ष्य केवल शक्ति नहीं, बुद्धि की निर्मलता और प्रकाश की अनुभूति है। गायत्री मंत्र उनकी इस आंतरिक विजय का प्रतीक है, अहंकार से समर्पण की, राजसत्ता से ब्रह्मसत्ता की।
इस मंत्र में सवितृ देव की उपासना है, इसलिए इसे सावित्री मन्त्र भी कहा जाता है। इसे श्री गायत्री देवी के स्त्री रूप में भी पूजा जाता है। गायत्री मंत्र को वेदमाता कहा गया है। यह वेदों का सार, चेतना का बीज और प्रकाश का स्रोत है। यह मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि ज्ञान, ऊर्जा और चेतना जागरण का सूत्र है।
ॐ भूर्भुवः स्वः
तत् सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
गायत्री मंत्र का सही उच्चारण समझने के लिए-Om bhur bhuvah swah tat savitur varenyam bhargo devasya dheemahi dhiyo yo nah prachodayat.
ॐ अर्थात् परमात्मा का मूल नाम, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का नाद है।
भूः अर्थात् भौतिक (पृथ्वी) लोक, स्थूल जगत का प्रतीक।
भुवः अर्थात् प्राणमय लोक, दुख-नाशक ऊर्जा।
स्वः अर्थात् चेतन, दिव्य, आनंदमय लोक।
तत् अर्थात् वह (परम) दिव्य सत्ता।
सवितुः अर्थात् सृष्टिकर्ता सूर्य रूप परमात्मा।
वरेण्यम् अर्थात् श्रेष्ठ, पूजनीय।
भर्गः अर्थात् पाप, अज्ञान और अंधकार को नष्ट करने वाली तेजस्विता।
देवस्य अर्थात् दिव्य गुणों वाले प्रभु का।
धीमहि अर्थात् हम ध्यान करते हैं/चिंतन करते हैं।
धियो यो नः प्रचोदयात् अर्थात् जो हमारी बुद्धि (धियः) को प्रेरित करे/प्रकाशित करे।
अर्थात् हम उस परम दिव्य सविता देव का ध्यान करते हैं, जो समस्त ब्रह्मांड का रचयिता है, जो अंधकार को नष्ट करने वाला है। वह प्रभु हमारी बुद्धि को सत्य, ज्ञान और प्रकाश की दिशा में प्रेरित करे।
यह मंत्र बुद्धि को शुद्ध और प्रबुद्ध करने वाला है। जब मन और बुद्धि शुद्ध होती है, तो निर्णय सही दिशा में होते हैं। सविता का अर्थ सूर्य है, पर यहाँ सूर्य का आध्यात्मिक रूप है, जो चेतना का स्रोत है। नियमित जप से व्यक्ति सूर्य की ऊर्जा और आत्मप्रकाश से जुड़ता है। यह मंत्र व्यक्ति को अपने कर्मों के प्रति जागरूक बनाता है। उसका मन धीरे-धीरे आलस्य, भय, भ्रम और नकारात्मकता से मुक्त होता है। गायत्री जप के समय यदि वाणी, मन और भावना एक हो जाएं, तो वह व्यक्ति के सभी स्तरों (शारीरिक, मानसिक, आत्मिक) को शुद्ध करता है।
गायत्री मंत्र के कंपन (फ्रीक्वेंसी) लगभग ३३३३ हर्ट्ज मापे गए हैं। यह मस्तिष्क के alpha और theta वेव्स को सक्रिय करता है, जिससे ध्यान, शांति और रचनात्मकता बढ़ती है। उच्चारण के समय २४ अक्षरों के २४ विशेष कंपन शरीर के २४ प्रमुख एक्यूप्रेशर बिंदुओं को स्पर्श करते हैं। इससे शरीर में ऊर्जा का संतुलन होता है। सूर्योदय व सूर्यास्त के समय जप करने से प्राण-ऊर्जा (life force) अधिकतम रूप से ग्रहण होती है।
गायत्री मंत्र के जप की विधि :
सूर्योदय और सूर्यास्त (संध्या समय) के समय इस मंत्र का जप सर्वश्रेष्ठ होता है। स्नान के बाद शांत मन से भी किया जा सकता है। कुशासन, कमलासन या सुखासन में बैठें। पूर्व या उत्तर की दिशा की ओर मुख रखें। प्रारंभ में ११ या २१ बार जप करें, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए १०८ बार माला से जप करें। जप स्वर, लय और शुद्ध उच्चारण के साथ करें। जप करते समय मन में यह भावना रखें कि
"हे परम चेतना! मेरी बुद्धि को सत्य मार्ग में प्रेरित करो।"
यह मंत्र ऋग्वेद का तीसरा मंडल, ६२वां सूक्त, १०वां मंत्र है।। इसे त्रिपदा गायत्री कहा जाता है क्योंकि इसमें तीन पाद (भाग) हैं। इस मंत्र को किसी एक धर्म या जाति से नहीं बाँधा जा सकता, यह मानव चेतना का सार्वभौमिक मंत्र है। यह वेदमाता इसलिए कहा गया है क्योंकि बाकी सभी वेदों का सार इसी मंत्र में समाहित है, सत्य का ध्यान, तेज का आह्वान, और बुद्धि की प्रेरणा।
इस प्रकार, गायत्री मंत्र अंधकार से प्रकाश की यात्रा है। यह मनुष्य को बाहरी पूजा से आंतरिक साधना की ओर ले जाता है, जहाँ ईश्वर कोई रूप नहीं, बल्कि प्रकाश, बुद्धि और चेतना का अनुभव बन जाता है। गायत्री जप कोई कर्मकांड नहीं, यह आत्मा का जागरण है।
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