Satvik, Rajasik and Tamasik Tapasya : सात्विक, राजसिक और तामसिक तपस्या

Satvik, Rajasik and Tamasik Tapasya : सात्विक, राजसिक और तामसिक तपस्या 

Satvik, Rajasik and Tamasik Tapasya सात्विक, राजसिक और तामसिक तपस्या, prinsli.com

सात्त्विक तपस्या का अर्थ है : ऊर्जा + सही दिशा। 

सात्विक तपस्या का लक्ष्य आत्मशुद्धि, ज्ञान प्राप्त करना, धर्म की रक्षा करना, विश्व का कल्याण करना, ईश्वर-भक्ति, परहित आदि होता है। इस तपस्या में संयम, सत्य, अहिंसा, पवित्रता, ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना होता है। फलस्वरूप मन शुद्ध होता है, सद्गुण बढ़ते हैं, ज्ञान की प्राप्ति होती है, शक्तियां प्राप्त होती हैं, आंतरिक शांति मिलती है, ईश्वर भक्ति मिलती है। जैसे ऋषि-मुनि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, नारद, प्रह्लाद, ध्रुव, वाल्मीकि जी आदि।

राजसिक तपस्या का लक्ष्य यश, मान, पद, सत्ता प्राप्त करना होता है। इस तपस्या में अनुशासन तो है, लेकिन अहंकार और दिखावे के साथ। अतः फलस्वरूप शक्ति, सिद्धियाँ, लोक में प्रसिद्धि तो मिलती है, परन्तु मन स्थिर नहीं होता। जैसे कर्ण का दान, दुर्योधन का यज्ञ और व्रत, स्वर्ग पाने के लिए इन्द्र की तपस्या।

तामसिक तपस्या का लक्ष्य किसी को हानि पहुँचाना, दूसरों को दबाना, काला जादू, आत्मपीड़ा आदि होता है। इस तपस्या में हिंसा, हठ, दुराग्रह, असंयम, मद्य-मांस के प्रयोग होता है। फलस्वरूप शक्ति तो प्राप्त होती है, किंतु वह अल्पकालिक होती है, और आत्मविनाश भी सुनिश्चित है। जैसे रावण, हिरण्यकश्यप, मेघनाद, राक्षसों की बलिपूजा, आत्मदाह, राक्षसी तंत्र।

ब्रह्मा जी ने अनेक राक्षसों को वरदान दिए। किंतु ब्रह्मा जी केवल सात्त्विक नियमों से की गई तपस्या से प्रसन्न होते हैं। इसलिए राक्षसों को भी व्रत, मौन, एकाग्रता, आहार-नियम का पालन करना ही पड़ता था। लेकिन फिर भी राक्षसों का हृदय परिवर्तित नहीं हुआ। क्यों?

ऊर्जा का स्वरूप माध्यम नहीं, उपयोग से तय होता है।

तपस्या ऊर्जा उत्पन्न करने का विज्ञान है, और ऊर्जा तटस्थ है (neutral) जैसे बिजली। जो बिजली प्रकाश उत्पन्न कर अंधकार को दूर करती है, वही बिजली बम में लगे तो विनाश भी करती है। राक्षसों ने तप से ऊर्जा तो जुटाई, पर उसका उपयोग हिंसा और अधर्म के लिए किया।

आचरण का स्वरूप लक्ष्य से तय होता है।

तपस्या के दौरान सात्त्विक नियम केवल माध्यम हैं, जैसे प्रयोगशाला में नियम होते हैं, पर लक्ष्य ही दिशा तय करता है। जैसे ऋषियों का लक्ष्य आत्मशुद्धि, धर्म की रक्षा, विश्व का कल्याण, ज्ञान प्राप्ति होता था, अतः तप ने उन्हें शक्तियां तो दीं ही, साथ ही और भी अधिक सात्त्विक बनाया।

दूसरी ओर, राक्षसों का लक्ष्य शक्ति पाकर स्वयं को भगवान बनाना, अधर्म का विस्तार होता था, अतः तप ने उनका अहंकार और बढ़ा दिया। जैसे कोई चोर भी डाइट चार्ट फॉलो करे, व्यायाम करे, तो वह भी बलवान बनेगा, पर बलवान होकर चोरी ही करेगा, क्योंकि नियमों का पालन शरीर को बदलता है, चरित्र को नहीं।

एक कंप्यूटर कोडिंग के नियम फॉलो करने पड़ते हैं, पर कोड लिखने वाले का इरादा तय करता है कि वह App बनेगा या वायरस। नियम पालन मात्र से परिणाम शुभ नहीं होता, उद्देश्य ही असली निर्णायक है। एक ही हर्बल पौधे से दवा भी बन सकती है और जहर भी। पौधे की प्रकृति तो सात्त्विक है, पर फल उपयोग पर निर्भर है।

राक्षसों ने सात्त्विक नियमों का पालन किया, क्योंकि बिना उसके ब्रह्मा जी प्रसन्न नहीं होते, पर उनका मन और लक्ष्य तामसी रहा। अतः तपस्या ने उन्हें शक्ति दी, परन्तु सद्गुण नहीं दिए। अतः सही ज्ञान प्राप्ति के लिए, धर्म की रक्षा के लिए, विश्व कल्याण के लिए नियम और साधना ही पर्याप्त नहीं है, मन, लक्ष्य और भाव भी शुद्ध होना चाहिए।

यही कारण है कि वेदों में अधिकांश मंत्र अपने मन को शुद्ध बनाने हेतु हैं। ऋषियों ने सबसे पहले मन को शुभ संकल्पों से युक्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है, क्योंकि मन जैसा होगा, मनुष्य भी वैसा ही होगा। और जैसा मनुष्य होगा, संसार भी वैसा ही होगा।

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ब्रह्मा जी सृष्टिकर्ता हैं। उनका कार्य सृष्टि की रचना, नियमों का पालन और तपस्वियों को आशीर्वाद देना है। तपस्या करने वाले किसी भी प्राणी (सात्विक या तामसी) को उनकी तपशक्ति के अनुरूप वरदान देना ब्रह्मा जी का सामान्य नियम है। ब्रह्मा जी का दर्शन या वरदान तपस्या की तीव्रता और शुद्धता से संबंधित है, व्यक्ति की भक्ति, धर्म या अहंकार से नहीं।

सात्विक तप का उद्देश्य भक्ति, ज्ञान, परहित, ईश्वर का प्रेम प्राप्त करना होता है। साधक का मन अहंकार और लालच से मुक्त होता है। तपस्या करने वाला मन, भाव और चरित्र दोनों में शुद्ध होता है।

तामसी तप का उद्देश्य शक्ति, अहंकार, अन्याय, भय फैलाना होता है। साधक का मन इच्छा और लाभ के लिए केंद्रित, लेकिन भाव शुद्ध नहीं। इससे केवल शक्ति और वरदान मिलते हैं, लेकिन सद्गुण, विवेक और करुणा नहीं बढ़ते। जैसे रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद, हिरण्यकश्यप आदि ने तप केवल शक्ति पाने के लिए किया। इसलिए उनका मन और चरित्र नहीं बदला।

तप स्वयं नहीं बदलता, वह मन की प्रवृत्ति के अनुरूप फल देता है। यदि मन अहंकारी और तामसी है, तो तप केवल शक्ति बढ़ाता है, चरित्र नहीं बदलता। तपस्या में एकाग्रता और अनुशासन की आवश्यकता होती है, लेकिन यदि अन्तर्मन में अहंकार, लालच या क्रोध है, तो तप केवल शारीरिक और मानसिक नियम का अभ्यास बनकर रह जाता है। मन सात्विक नहीं बनता, केवल शक्ति का संचय होता है। जैसे रावण वर्षों तक कठिन तप करता रहा। उसने केवल वरदान की चाह में ध्यान किया, प्रेम, करुणा, संयम की भावना नहीं पाली। इसलिए उसकी अहंकारी और हिंसक प्रवृत्ति जस की तस बनी रही।

ब्रह्मा जी कर्म और तप का फल देने वाले हैं। वे भले ही तामसी या पापी प्राणी को भी वरदान दे देते हैं, अगर उसका तप परिपूर्ण और कठोर हो। रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण आदि ने भी एकाग्रचित्त होकर, सात्विक नियमों का पालन कर अत्यधिक कठोर तपस्या की, लेकिन उनकी तपस्या फल के लिए (इच्छा पूर्ति के लिए) थी, न कि भगवान के प्रेम या भक्ति के लिए।

यानी तपस्या की शक्ति इतनी बड़ी है कि भगवान भी उस तप को नकार नहीं सकते। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान अहंकारी को बढ़ावा देते हैं। यह प्रकृति के नियम के अनुसार है कि तप का फल अवश्य मिलता है।

ब्रह्मा जी केवल उस व्यक्ति की तपस्या या कर्म की शक्ति देखते हैं। उन्होंने जो भी वरदान दिया, वह व्यक्ति की शक्ति, साधना और परिश्रम के आधार पर होता है। ब्रह्मा जी आमतौर पर व्यक्ति के भाव, प्रेम या भक्ति को प्राथमिकता नहीं देते। इसलिए रावण जैसे राक्षस, जो सिर्फ शक्ति पाने के लिए तपस्या करते हैं, उन्हें वरदान मिल जाता है। लेकिन उनकी मन:स्थिति, चरित्र और धर्म शुद्ध नहीं होते, इसलिए वे अधर्म की ओर चले जाते हैं।

राक्षसों का तत्वज्ञान और चरित्र सात्विक नहीं था। उन्होंने केवल शक्ति पाने के लिए तप किया, धर्म, ज्ञान और सद्गुण के लिए नहीं। फलस्वरूप वे अहंकारी, हिंसक और संसार के नियमों से ऊपर समझने वाले हो गए। भगवान और ब्रह्मा ने उनका वरदान दिया, लेकिन उनका चरित्र नहीं बदला। ब्रह्मा जी कर्म के नियमों के अधीन फल देने वाले हैं। व्यक्ति का मन कैसा है, उसकी भक्ति या अहंकार, यह उनके दृष्टिकोण में नहीं आता। यही कारण है कि राक्षस तप करके शक्तिशाली बने, लेकिन उनका अहंकार और अधर्म बढ़ गया। यही कारण है कि रावण और मेघनाद की शक्ति बढ़ते हुए भी अधर्म और अत्याचार के मार्ग पर चले गए।

इसके विपरीत, भगवान विष्णु जी केवल तपस्या से नहीं, भक्ति से प्रसन्न होते हैं। भाव, भक्ति, प्रेम और मन की शुद्धता देखकर प्रसन्न होते हैं। तामसी या अहंकारी व्यक्ति द्वारा तपस्या से उन्हें प्रसन्न करना संभव नहीं। लेकिन ब्रह्मा जी सृष्टि और नियमों के अनुसार, तप का फल देते हैं। तप से शक्ति मिल सकती है, लेकिन सद्गुण, विवेक और धर्म केवल भक्ति, प्रेम और मर्यादा से मिलते हैं। यही कारण है कि राक्षसों ने वरदान पा लिया, लेकिन उनकी पापी प्रवृत्ति के कारण अंततः नाश हुआ।

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