प्रामाणिक पितृ स्तोत्र (Pitra Stotra Lyrics in Hindi and Sanskrit) : मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 94, श्लोक 3-13)
पितृ स्तोत्र (Pitar Stotra Lyrics) मार्कण्डेय पुराण में शामिल है, जो महात्मा रुचि (Ruchi Manu) द्वारा रचित है। यह स्तोत्र, मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 94, श्लोक 3–13 में मिलता है, जहाँ ऋषि रुचि पितरों से आशीर्वाद माँगते हैं। यह स्तोत्र विशेष रूप से पितरों के प्रति श्रद्धा, सम्मान और आशीर्वाद पाने के लिए पाठ किया जाता है। इसका पाठ विशेष रूप से श्राद्ध, संपर्क, पितृ दोष निवारण, और पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत उपयोगी माना जाता है।
इस स्तोत्र में पितृों की विविध श्रेणियों, जैसे देवता, ऋषि, सप्तर्षि, ग्रह, नक्षत्र, वायु, अग्नि, प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण आदि को मान्यता देते हुए उन्हें नमस्कार किया गया है।
प्रामाणिक पितृ स्तोत्र (Pitar Stotra Lyrics in Hindi & Sanskrit): मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 94, श्लोक 3–13)
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥३॥
अर्थ:
मैं उन पितरों को नमस्कार करता हूँ जो पूज्य, अमूर्त और तेजस्वी हैं, जो ध्यान में स्थित हैं और जिनकी दृष्टि दिव्य है।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ॥४॥
अर्थ:
इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष और मारीचि जैसे मुनियों, सप्तर्षियों और अन्य पितृगणों को नमस्कार।
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ॥५॥
अर्थ:
मैं मन्वादियों (मनु एवं उनके अनुयायी), श्रेष्ठ मुनियों, सूर्य और चंद्रमा तथा जल और समुद्र में निवास करने वाले सभी पितरों को नमस्कार करता हूँ।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥६॥
अर्थ:
नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी और आकाशगंगाओं में स्थित पितरों को नमस्कार।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृताञ्जलिः ॥७॥
अर्थ:
देवर्षियों, विश्व के सृष्टिकर्ताओं और सभी जगत में प्रतिष्ठित पितरों को नमस्कार, जो अक्षय पुण्य देने वाले हैं।
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥८॥
अर्थ:
प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण और योगेश्वर जैसे पितृगणों को नमस्कार।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥९॥
अर्थ:
सात गणों, सात लोकों और स्वयम्भु, ब्रह्मा और योगचक्षु रखने वाले पितृगणों को नमस्कार।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥१०॥
अर्थ:
सभी सोमाधार पितृगण, योगमूर्ति धारण करने वाले और जगत के पितरों को नमस्कार।
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत् एतदशेषतः ॥११॥
अर्थ:
मैं अग्निरूप और अन्य रूपों में स्थित सभी पितरों को नमस्कार करता हूँ। यह जगत अग्नि और सोममय है।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः॥१२॥
अर्थ:
जो पितर तेजस्वी हैं, जो सोम, सूर्य और अग्नि रूप हैं, जो जगत स्वरूप और ब्रह्म स्वरूप हैं, उनका नमस्कार।
तेभ्यः खिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः ॥१३॥
अर्थ:
सभी खले (लोकों) में, योगियों में, पितृगण में और श्रमशील में स्थित पितरों को नमस्कार। हे स्वधाभुज! आप सदा प्रसन्न रहें।
इस पितृ स्तोत्र की विशेषताएँ और महत्व
1. इसमें संपूर्ण पितृ वर्गों, जैसे देव, ऋषि, मनु, सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, ग्रह, योगेश्वर आदि का समावेश है।
2. यह स्तोत्र पितृ पक्ष, अमावस्या और श्राद्ध तर्पण के समय पढ़ा जाता है।
3. इस स्तोत्र के आध्यात्मिक लाभ है। इसे पढ़ने से पूर्वजों की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। संतोष, ज्ञान और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
4. यह स्तोत्र जल, अग्नि, आकाश, वायु, सूर्य, चंद्र आदि में स्थित पितरों को भी संबोधित करता है, अतः इसके द्वारा सभी लोकों और रूपों में पितरों को नमस्कार करते हैं।
Read Also - श्री पितर वंदना (pitra vandana lyrics in Hindi)

Post a Comment