सूर्य स्तवराज: सूर्यदेव के 21 नामों वाला दिव्य स्तोत्र (Surya Stavaraj in Hindi)
सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् (Surya Stavaraja Stotram in Hindi) क्या है?
श्री सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् (Surya Stavaraja Stotram in Hindi) — सर्वरोगनाशक सूर्य स्तुति :
“सूर्य स्तवराज स्तोत्र” एक अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली वैदिक स्तुति और संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान सूर्य को समर्पित है, जिसे महर्षि वसिष्ठ ने रचा था। यह स्तोत्र सूर्यदेव के 21 दिव्य नामों की संक्षिप्त परंतु प्रभावशाली नामावली है। इसमें सूर्यदेव के 21 दिव्य नामों का उल्लेख मिलता है, जो उनके तेज, प्रकाश, आरोग्य और जीवनदायी शक्ति का प्रतीक हैं।
इसका पाठ सूर्योदय के समय जल अर्पण करते हुए किया जाता है। नियमित पाठ से शरीर को ऊर्जा, मन को स्थिरता और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। पारंपरिक रूप से इसे “सर्वरोगनाशक स्तोत्र” कहा गया है। इसका पाठ रोगों को दूर करता है, आयु बढ़ाता है और जीवन में तेज, स्वास्थ्य एवं मानसिक शांति प्रदान करता है।
भगवान सूर्य की उत्पति ही संसार के कल्याण के लिए हुआ है, इसलिए पंचदेवोपासना में उनका विशिष्ट स्थान है। शास्त्र कहते हैं कि ‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ अर्थात् आरोग्य की कामना भगवान सूर्य से करनी चाहिए। सूर्य की उपासना से मनुष्य का तेज, बल, आयु एवं नेत्रों की ज्योति की वृद्धि होती है और मनुष्य दीर्घायु होता है। सूर्य समस्त नेत्र-रोग व चर्म-रोग को दूर करने वाले देवता हैं।
सूर्य स्तवराज में भगवान सूर्य को अत्यन्त प्रिय एवं पवित्र 21 नाम है जिनके पाठ से सूर्य सहस्त्रनाम के पाठ का फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे समस्त पापों से छूटकर धन, आरोग्य, संतान आदि वांछित फल प्राप्त करेंगे और समस्त रोगों से मुक्त हो जाएंगे।
श्री सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् संस्कृत में, हिंदी अर्थ के साथ (Surya Stavaraja Stotram Lyrics in Sanskrit and Hindi)
विनियोगः
अनुष्टुप्छन्दः।
श्रीसूर्यो देवता।
आदित्यप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः॥
ध्यानम्
दाडिमीपुष्पसङ्काशं पद्माद्यैः परिवेष्टितम्॥
भावार्थ: रथ पर विराजमान, लाल वस्त्र धारण किए, दाड़िमी पुष्प के समान रक्तवर्ण वाले, और कमल से घिरे हुए सूर्यदेव का ध्यान करें।
स्तोत्रपाठः
ॐ नमः सूर्याय आदित्याय भास्कराय नमः।
ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।
लोकप्रकाशकः श्रीमान् लोकचक्षुः ग्रहेश्वरः॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्त्ता हर्ता तमिस्रहा।
तापनः तपनो चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्येष स्तवोऽयं सर्वसिद्धिदः॥
यह एक-विंशति (21 नाम) वाला संक्षिप्त पाठ सबसे अधिक प्रकाशित और पांडुलिपि-आधारित संसाधनों (उदाहरण: SanskritDocuments / StotraNidhi इत्यादि) में सर्वाधिक प्रचलित रूप में मिलता है।
निम्नलिखित 21 नामों वाला सूर्य स्तवराज स्तोत्र कुछ पांडुलिपियों और दक्षिण भारतीय पारंपरिक पाठों में (खासकर तमिलनाडु व आन्ध्र क्षेत्र में) में देखा गया है, जहाँ “महेश्वरः” का भाव महान् ईश्वर (सर्वेश्वर) रूप में सूर्य की स्तुति के लिए लिया गया है।
ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रवि:।
लोकप्रकाशक: श्रीमान् लोकचक्षुर्महेश्वर:।।
लोकसाक्षी त्रिलोकेश: कर्ता हर्ता तमिस्त्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचि: सप्ताश्ववाहन:।।
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः
एकविंशतिरित्येष स्तवोऽयं सर्वसिद्धिदः॥
सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् का हिन्दी भावार्थ
इस स्तोत्र में सूर्यदेव के 21 नामों का वर्णन है — विकर्तन, विवस्वान, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाश, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्ता, हर्ता, तमिस्रहा, तापन, तपनो, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा और सर्वदेवनमस्कृत।
इन नामों का अर्थ है — जो अंधकार का नाश करने वाले, जगत को प्रकाशित करने वाले, सात अश्वों के रथ पर आरूढ़, सभी देवताओं द्वारा पूज्य, सृष्टि के कर्ता और संहारक हैं।
फलश्रुति
सर्वरोगविनिर्मुक्तो दीर्घमायुः सुखान्वितः॥
भावार्थ: जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल इस सूर्य स्तवराज स्तोत्र का पाठ करता है, वह सभी रोगों से मुक्त होकर दीर्घायु और सुखी जीवन प्राप्त करता है।
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सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् (Surya Stavarāj Stotram) के प्रत्येक नाम का अर्थ (हिन्दी अर्थ सहित)
| क्रम | नाम | अर्थ / भाव |
|---|---|---|
| 1 | विकर्तन | जो सब पापों और तम (अंधकार) को काट देता है |
| 2 | विवस्वान् | जो सम्पूर्ण विश्व में प्रकाशित है |
| 3 | मार्तण्ड | जो जीवन और प्रकाश का स्रोत है (अदिति के पुत्र) |
| 4 | भास्कर | जो भास (प्रकाश) देने वाला है |
| 5 | रवि | जो सबका पोषक और प्रेरक है |
| 6 | लोकप्रकाश | जो तीनों लोकों को प्रकाशित करता है |
| 7 | श्रीमान् | जो सौभाग्य और समृद्धि का दाता है |
| 8 | लोकचक्षु | जो संसार का नेत्र (आँख) है |
| 9 | ग्रहेश्वर | जो ग्रहों का स्वामी और नियन्ता है |
| 10 | लोकसाक्षी | जो सबके कर्मों का साक्षी है |
| 11 | त्रिलोकेश | तीनों लोकों के ईश्वर |
| 12 | कर्त्ता | सृष्टि करने वाला |
| 13 | हरता | संहार करने वाला, पाप और रोग हरने वाला |
| 14 | तमिस्राह | जो अंधकार (अज्ञान) का नाशक है |
| 15 | तापन | जो सबको ऊष्मा देता है |
| 16 | शुचि | जो शुद्ध, पवित्र और तेजस्वी है |
| 17 | सप्ताश्ववाहन | जो सात घोड़ों से युक्त रथ पर चलता है |
| 18 | गभस्तिहस्त | जिसकी किरणें हाथों के समान फैलती हैं |
| 19 | ब्रह्मा | जो सृष्टि के आरम्भकर्ता हैं |
| 20 | सर्वदेवनमस्कृत | जिसे सभी देवता नमस्कार करते हैं |
| 21 | श्रीसूर्य | जो तेज, बल, आरोग्य और आयु के अधिष्ठाता हैं |
सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् का फल (पाठ का परिणाम)
सूर्य स्तवराज स्तोत्र का महत्त्व
यह स्तोत्र ब्रह्म पुराण के सूर्य उपासना खण्ड से सम्बद्ध है।
इसे सूर्य नमस्कार या अर्घ्यदान के साथ पढ़ना अत्यंत शुभ फलदायक माना गया है।
नियमित पाठ से नेत्र रोग, चर्म रोग, और मानसिक तनाव दूर होते हैं। आयु, आरोग्य और तेज की वृद्धि होती है। योग और ध्यान साधना में यह सौर ऊर्जा जागरण में सहायक है।
सूर्य के 21 नामों (स्तवराज) के पाठ का फल-
यह स्तवराज शरीर को नीरोग बनाने वाला, धन की वृद्धि करने वाला और यश देने वाला है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय इन नामों को पढ़ने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान सूर्य को यह नाम इतने प्रिय हैं कि उनका कथन है-
यही मेरे लिए जपने योग्य, हवन व सन्ध्योपासना है। बलिमंत्र (भोग का मंत्र), अर्घ्यमंत्र व धूपमंत्र भी यही है। नमस्कार, प्रदक्षिणा सभी में यह महामंत्र जपने से पापों का हरण व शुभफल की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में कहा गया है कि इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से —
- रोगों का नाश होता है (विशेषतः नेत्र, त्वचा, रक्त संबंधी रोग)।
- यश, धन, तेज और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
- जीवन में ऊर्जा, आत्मविश्वास और निर्णय शक्ति बढ़ती है।
- पाप, भय और आलस्य का नाश होता है।
“सर्वरोगनाशनं नित्यं सर्वसौख्यप्रदं शुभम्।”
सूर्य स्तवराज स्तोत्रम् की पाठ विधि (कब और कैसे करें)
समय:
प्रातःकाल सूर्योदय के समय (पूर्व दिशा में मुख करके)।
पूर्व-विधान:
स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें। ताँबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य दें।
मंत्र :
“ॐ घृणि सूर्याय नमः”
पाठ:
- सूर्य देव का ध्यान करें, “जगदेकचक्षुं” (एक नेत्र के रूप में)।
- फिर “सूर्य स्तवराज” के 21 नामों का शांत भाव से पाठ करें।
- अंत में “ॐ घृणिः सूर्याय नमः” का 7 बार जप करें।
- फिर प्रणाम मंत्र कहें :
“नमः सूर्याय आदित्याय भास्कराय नमः।”
व्रत/नियम:
- रविवार को विशेष फलदायक माना गया है।
- उपवास या सात्विक आहार रखने से फल कई गुना बढ़ जाता है।
- जो व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धा से ‘सूर्य स्तवराज स्तोत्र’ का पाठ करता है, उसके जीवन से रोग, भय और दरिद्रता दूर होती है, और वह तेज, बल, धन, और आयु से संपन्न होता है।

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