Bhagwan Vishnu Stuti : भगवान् श्री विष्णु जी की स्तुति - शान्ताकारं भुजगशयनं...जय जय सुरनायक...

Bhagwan Vishnu Ki Stuti : Jai Jai Surnayak.. Shantakaram Bhujagashayanam.. Bhagwan Vishnu ki Aarti Ramcharitmanas


प्रकृति के बनाए नियम के अनुसार, जो भी कर्म करेगा, तप करेगा, कठिन परिश्रम करेगा, उसे शक्तियां मिलेंगी. फिर चाहे वह देवता हो या राक्षस, पुरुष हो या स्त्री, या किसी भी वर्ण का अनुसरण करता हो. प्रकृति के इसी नियम के अनुसार अनेकों राक्षसों ने कठोर तपस्या करके बड़ी शक्तियां अर्जित कर लीं. लेकिन गलत हाथों में शक्तियां आ जाने से संसार में बड़े भयंकर परिणाम देखने को मिलते हैं. 

प्रकृति के नियम में देव, असुर, स्त्री, पुरुष, वर्णभेद कुछ भी बाधा नहीं बनते. परंतु जब शक्ति का उपयोग अधर्म और अहंकार के लिए होता है, तब वही शक्ति विनाश का कारण भी बन जाती है. राक्षस प्रवृत्तियों की प्रीति हिंसा में ही होती है. वे संतों, ब्राह्मणों, स्त्रियों, गौओं, यहाँ तक कि समस्त जीवों पर अत्याचार करते हैं. रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद ने कठोर तपस्या से वरदान पाए, परंतु उनका उपयोग केवल हिंसा, आतंक और पाप में किया. यही उनके पतन का कारण बना. 

प्रकृति के दण्ड में भी कोई भेदभाव नहीं है. अर्थात् वरदान देने अथवा दण्ड देने, दोनों में ही प्रकृति निष्पक्ष है.

कर्म और प्रकृति के नियम निष्पक्ष हैं, शक्ति प्राप्त करने के लिए तप आवश्यक है, परंतु उसका सदुपयोग ही स्थायी है. अधर्म का अंत निश्चित है, चाहे वह कितना भी प्रबल क्यों न लगे. सत्य और धर्म की रक्षा हेतु भगवान का अवतार होता है, यही गीता और रामचरितमानस दोनों का केन्द्रीय सिद्धांत है. पाप में ही पापी का विनाश छिपा होता है, रावण की कथा हमें यही सबसे बड़ी सीख देती है.

निश्चय ही शिवतांडवस्तोत्र को पढ़कर हमारे मस्तिष्क में रावण की छवि एक ज्ञानी और महान शिवभक्त के रूप में बनने लगती है. हमारा प्राचीन इतिहास इस सम्बन्ध में हमें बहुत कुछ सिखाता है. हमारी परम्परा में रावण की छवि एक ऐसे शक्तिशाली, बलिष्ठ और ज्ञानी पुरुष की है, जो अपने अधर्म के कारण पतन को प्राप्त हुआ. रावण के रूप में धर्मज्ञान यह है कि यदि आचरण में धर्म न हो, स्त्रियों के प्रति सम्मान न हो, जीवों के प्रति करुणा न हो, तो हमारा ज्ञान, कुलवंश, शक्ति, ऐश्वर्य सब महत्वहीन है.

इसीलिए हमारे शास्त्र कहते हैं कि “धर्मो रक्षति रक्षितः”

अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है (अर्थात् वही सुरक्षित रहता है).

केवल ज्ञान या शक्ति से जीवन सफल नहीं होता. अगर आचरण में धर्म न हो, स्त्रियों का सम्मान न हो, निर्दोष प्राणियों के प्रति दयाभाव न हो, अहंकार पर नियंत्रण न हो, तो संपूर्ण वैभव भी व्यर्थ है. रावण का जीवन हमें यही शिक्षा देता है कि –

भक्ति बिना विनय अधूरी है, ज्ञान बिना आचरण खोखला है, और शक्ति बिना धर्म विनाशकारी है. इसलिए, रावण की छवि इतिहास में महान ज्ञानी और शिवभक्त के साथ-साथ अहंकार और अधर्म से नष्ट हुए व्यक्ति के रूप में अंकित है.

यह पूरा प्रसंग न केवल एक धार्मिक कथा है, बल्कि एक दार्शनिक और सामाजिक शिक्षा भी है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब सत्य की रक्षा, पृथ्वी और प्रकृति की रक्षा, धर्म की रक्षा के लिए कोई न कोई दिव्य शक्ति अवश्य प्रकट होती है.

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रावण और उसकी राक्षस सेना के आतंक का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी (Goswami Tulsidas) रामचरितमानस (Ramcharitmanas) में लिखते हैं कि, "जिनकी प्रीति हिंसा पर ही होती है, उनके पापों का क्या ठिकाना. राक्षसों ने मनुष्यों, संतों, ब्राह्मणों, स्त्रियों, गौओं और अन्य जीव-जंतुओं का भी जीना मुश्किल कर दिया. अपने अत्याचारों से सबको त्रस्त कर दिया. रावण के बड़े पुत्र मेघनाद के आतंक से तो स्वर्गलोक में अक्सर भगदड़ मची रहती".

दुर्मुख, अकम्पन, वज्रदन्त, धूमकेतु और अतिकाय आदि जैसे राक्षस अकेले ही जगत को जीतने की क्षमता रखते थे. रावण का भाई कुम्भकर्ण मदिरा पीकर छह महीने सोता और जागते ही तहलका मचा देता. राक्षसों के अंदर दया-धर्म सपने में भी नहीं था. उन लोगों के आतंक से सभी ऋषि-मुनि, देवी-देवता आदि अत्यंत भयभीत रहते थे.

तुलसीदास जी लिखते हैं कि, "राक्षस जितने भयंकर, दुष्ट, कुटिल, निर्दयी, हिंसक, पापी, विवेकरहित और संसार भर को दुख देने वाले हुए, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता है. वे मांस खाते थे, स्त्रियों से जबरन विवाह रचाते थे. देवताओं को ललकारकर उन्हें गालियां देते थे. जिस स्थान में वे गो और संतों-ब्राह्मणों को पाते, उसी नगर और गांव में आग लगा देते थे. इस तरह, धर्म की जड़ें काटने और अधर्म का राज फैलाने के लिए वे हर कार्य वेदविरुद्ध ही करते थे".

लेकिन प्रकृति में हर चीज की एक सीमा जरूर होती है. सभी राक्षस अयोध्या के वीर और प्रतापी राजा दशरथ, मुनि वशिष्ठ, विश्वामित्र जैसे महर्षियों और शक्तिशाली वानरों आदि से दूर ही रहते थे, लेकिन ये सब भी रावण, मेघनाद आदि को मार नहीं सकते थे, अतः धरती पर पाप, अधर्म, अनीति का राज बढ़ता ही जा रहा था.

तुलसीदास जी आगे लिखते हैं कि, "इस प्रकार धर्म के प्रति लोगों की रुचि और आस्था को कम होता देख पृथ्वी माता भी अत्यंत व्याकुल हो गईं. वह कहने लगीं कि, 'पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे दूसरों का अनिष्ट करने वाला लगता है.' यही सोचते-सोचते पृथ्वी मां वहां गईं, जहां सब देवता और संत छिपे हुए थे. फिर सभी मिलकर ब्रह्मा जी के पास गए. तब ब्रह्मा जी ने बताया कि उनके वश में भी कुछ नहीं है.

ब्रह्मा जी ने पृथ्वी माता सहित सभी देवताओं और मुनियों आदि को भगवान विष्णु जी की शरण में जाने के लिए कहा. तब सभी देवताओं ने कहा कि, 'अब उन्हें कहां ढूंढें? बैकुंठ में या क्षीर सागर में?'

तब ब्रह्मा जी ने बताया कि, "वे सब जगह होते हुए भी सबसे रहित हैं. जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, भगवान उसके लिए उसी रीति से प्रकट होते हैं. जैसे अग्नि को प्रकट करने के लिए उससे संबंधित सभी साधन जुटाने पड़ते हैं, उसी तरह भगवान को प्रकट करने के लिए भी हृदय में उनके लिए प्रेम जुटाना पड़ता है."

ब्रह्मा जी की बात सुनकर सभी देवी-देवता हाथ जोड़कर प्रेम और पूरे भक्तिभाव से भगवान श्री विष्णु जी का ध्यान और स्तुति करने लगे.

फिर देवों ने कहा, "पृथ्वी पर धर्म और सत्य का नाश हो रहा है. पाप की शक्तियां बढ़ रही हैं. आज अबलाओं की लाज और मानव की मानवता संकट में है. राक्षसों का राजा रावण अहंकार के मद में चूर सबको अपने पैरों तले रौंदने को तैयार है. कोई उसका सामना करने की हिम्मत नहीं करता, क्योंकि कर्म के विधान के अनुसार, स्वयं ब्रह्मा जी और भगवान शिव का उसे वरदान प्राप्त है."

"आज वो अवस्था आ गई है, जब कोई धर्म और सत्य के रास्ते पर चलने की कोशिश करे, तो वह जीवित ही नहीं रह सकता. आज हर प्राणी पाप और भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने के लिए विवश किया जा रहा है. जब ऐसी अवस्था आ जाए, तब सत्य और विश्वास की रक्षा के लिए किसी महान शक्ति का अवतार लेना आवश्यक हो जाता है."

तभी आकाशवाणी हुई. सबकी ऐसी करुण पुकार सुन भगवान श्री विष्णु ने सभी देवताओं आदि को भयमुक्त करते हुए कहा कि-

"पापी के पाप में ही उसके नाश का बीज छिपा होता है. जो रावण ये समझता है कि इस संसार में अब उससे बढ़कर कोई शक्ति नहीं रही, उसका नाश भी उसी अहंकार में छिपा हुआ है. उसी अहंकार के कारण उसने वरदान मांगते समय मनुष्य और वानर के हाथों न मरने का वरदान नहीं मांगा था" (क्योंकि रावण को लगता था कि, 'जब मुझे हराना देवताओं तक के वश की बात नहीं रही, तो भला ये मनुष्य और वानर आदि मेरा क्या बिगाड़ लेंगे').

"डरो मत. तुम्हारे लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करके पवित्र सूर्यवंश में अपनी कलाओं और अपनी पराशक्ति (महालक्ष्मी जी) सहित अवतार लूंगा. कश्यप और अदिति ने भारी तप करके मुझे पुत्र रूप में पाने का वरदान मांगा था. वे दोनों ही दशरथ और कौसल्या के रूप में अयोध्यापुरी में हैं. उन्हीं के घर जाकर मैं श्रेष्ठ चार भाइयों के रूप में अवतार लूंगा और धरती को सभी राक्षसों के आतंक से मुक्त करूंगा. अंत में जीत सदा सत्य की ही होगी."

यह सुनकर सभी देवी-देवता आदि बहुत प्रसन्न हुए. तब ब्रह्माजी ने देवताओं को भी आज्ञा दी कि वे भी वानरों का शरीर धारण करके पृथ्वी पर जाकर भगवान की सेवा और सहायता करें. और तब देवताओं ने पृथ्वी पर वानरदेह धारण की और पर्वतों और जंगलों में जहां-तहां अपनी-अपनी सेना बनाकर छा गए. वे सभी वानर (देवता) शूरवीर थे और उनमें अपार बल और प्रताप था. पर्वत, वृक्ष और नख ही उनके शस्त्र थे. वे सभी देवता वानर रूप धारण कर भगवान के आने की राह देखने लगे.

भगवान विष्णु की स्तुति

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनं योगिभिध्यार्नगम्यम्

वंदे विष्णुम् भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ- जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश की तरह सर्वत्र व्याप्त हैं, जिनका वर्ण नीलमेघ के समान है, जिनके संपूर्ण अंग अतिशय सुंदर हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण के भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ.

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै

र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।

ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो

यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:॥

अर्थ- ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव को मेरा नमस्कार है.

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।

गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥

पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।

जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥

अर्थ- हे देवताओं के स्वामी, सेवकों को सुख देने वाले, शरणागत की रक्षा करने वाले भगवान! आपकी जय हो! जय हो! हे गो-ब्राह्मणों का हित करने वाले, असुरों का विनाश करने वाले, समुद्र की कन्या (श्री लक्ष्मीजी) की प्रियस्वामी! आपकी जय हो! हे देवता और पृथ्वी का पालन करने वाले, आप की लीला अद्भुत है, उसका भेद कोई नहीं जानता, ऐसे जो स्वभाव से ही कृपालु और दीन दयालु हैं, वे (भगवान्) हम पर कृपा करें!

जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।

अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा॥

जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा।

निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥

अर्थ- हे अविनाशी, सबके हृदय में निवास करने वाले (अंतर्यामी), सर्वव्यापक परम आनंदस्वरूप, अज्ञेय इंद्रियों से परे, पवित्रचरित्र, माया से रहित मुकुंद (मोक्षदाता), आपकी जय हो! जय हो! इस लोक और परलोक के सब भोगों से विरक्त और मोह से सर्वथा छूटे हुए (ज्ञानी) मुनिवृंद भी अत्यंत अनुरागी (प्रेमी) बनकर जिनका दिन रात ध्यान करते हैं और जिनके गुणों के समूह का गान करते हैं, उन सच्चिदानंद की जय हो!

जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।

सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥

जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।

मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा॥

अर्थ- जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायता के अकेले ही (या स्वयं अपने को त्रिगुणरूप- ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप बनाकर अथवा बिना किसी उपादान कारण के अर्थात स्वयं ही सृष्टि का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बनकर तीन प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की, वे पापों का नाश करने वाले भगवान हमारी सुधि लें. हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा, जो संसार के (जन्म-मृत्यु के) भय का नाश करने वाले, मुनियों के मन को आनंद देने वाले और विपत्तियों के समूह को नष्ट करने वाले हैं, हम सब देवताओं के समूह, मन, वचन और कर्म से चतुराई करने की बात छोड़कर उन (भगवान) की शरण आए हैं.

सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।

जेहिं दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवहु सो श्रीभगवाना॥

भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।

मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥

अर्थ- सरस्वती, वेद, शेषजी और संपूर्ण ऋषि कोई भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्री भगवान हम पर दया करें. हे संसार रूपी समुद्र के (मंथन के) लिए मंदराचलरूप, सब प्रकार से सुंदर, गुणों के धाम और सुखों की राशि नाथ! आपके चरण कमलों में मुनि, सिद्ध और सारे देवता भय से अत्यंत व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं.

दोहा- जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह।

गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह॥

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