भई प्रगट कुमारी भूमि विदारी - श्री जानकी जी की प्रातः काल की स्तुति

श्री जानकी वंदना | जानकी मंगल स्तुति | तुलसीदास रचना

श्री जानकी जी की प्रातः काल की स्तुति - श्री जानकी वंदना (पूर्ण स्तुति)

श्री जानकी जी की प्रातः काल की स्तुति - यह स्तुति “जानकी-मंगल” (गोस्वामी तुलसीदास की रचना) में लिखी है। यह स्तुति सीता जी के धरती से प्रकट होने के दृश्य का वर्णन करती है, और ऋषि-मुनियों द्वारा उनकी स्तुति का भी वर्णन है। “जानकी-मंगल” तुलसीदास जी का एक स्वतंत्र काव्य है, जिसमें माता सीता के जन्म, विवाह और उनके शुभ चरित्र का विस्तार से वर्णन मिलता है। 

इस स्तुति "भई प्रगट कुमारी भूमि विदारी" को सीता जयंती, जानकी नवमी, विवाह पंचमी और विवाह-मंगल अवसरों पर बधाई - भजन के रूप में व्यापक रूप से गाया जाता है। 

(ध्यान दें कि “श्री जानकी स्तुति” नाम से एक अलग संस्कृत स्तोत्र भी प्रचलित है जिसका प्रारम्भ “जानकि त्वां नमस्यामि…” से होता है—वह अलग रचना है, ताकि कोई भ्रम न रहे।)

भई प्रगट कुमारी भूमि विदारी" को, विवाह पंचमी, सीता जयंती, जानकी नवमी और विवाह-मंगल अवसरों

श्री जानकी वंदना (पूर्ण स्तुति) - 

"भई प्रगट कुमारी, भूमि-विदारी, 

जन हितकारी भयहारी ।

अतुलित छबि भारी, मुनि-मनहारी, 

जनकदुलारी सुकुमारी ॥१॥


सुन्दर सिंहासन, तेहिं पर आसन, 

कोटि हुताशन द्युतिकारी।

सिर छत्र बिराजै, सखि संग भ्राजै, 

निज-निज कारज करधारी ॥२॥


सुर सिद्ध सुजाना, हनै निशाना, 

चढ़े बिमाना समुदाई ।

बरषहिं बहुफूला, मंगल मूला, 

अनुकूला सिय गुन गाई ॥३॥


देखहिं सब ठाढ़े, लोचन गाढ़ें, 

सुख बाढ़े उर अधिकाई ।

अस्तुति मुनि करहीं, आनन्द भरहीं, 

पायन्ह परहीं हरषाई ॥४॥


ऋषि नारद आये, नाम सुनाये, 

सुनि सुख पाये नृप ज्ञानी ।

सीता अस नामा, पूरन कामा

सब सुखधामा गुन खानी ॥५॥


सिय सन मुनिराई, विनय सुनाई

सतय सुहाई मृदुबानी ।

लालनि तन लीजै, चरित सुकीजै

यह सुख दीजै नृपरानी ॥६॥


सुनि मुनिबर बानी, सिय मुसकानी

लीला ठानी सुखदाई ।

सोवत जनु जागीं, रोवन लागीं

नृप बड़भागी उर लाई ॥७॥


दम्पति अनुरागेउ, प्रेम सुपागेउ

यह सुख लायउँ मनलाई ।

अस्तुति सिय केरी, प्रेमलतेरी

बरनि सुचेरी सिर नाई ॥८॥


दोहा

निज इच्छा मखभूमि ते, प्रगट भईं सिय आय ।

चरित किये पावन परम, बरधन मोद निकाय ॥"


संदर्भ: “जानकी-मंगल” – गोस्वामी तुलसीदास

स्तुति का प्रसंग – सीता जी के जन्म (भूमि से प्रकट होने) का वर्णन

यह स्तुति जनकनन्दिनी सीता जी के अवतरण/जन्म-महोत्सव की मंगल-वर्णना है—दरबार का दृश्य, देव-ऋषियों का आगमन, नारद द्वारा “सीता” नाम का घोष, और अंत में माता सीता के चरणों में प्रणति। इसमें पूरे प्रसंग का वर्णन मिलता है: राजदरबार का वातावरण, देवताओं और मुनियों का आगमन, पुष्पवृष्टि, नारद जी द्वारा नामकरण और स्तुति आदि।

स्तुति का भावार्थ –

ये स्तुति — "भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी" सीता जी के धरती से प्रकट होने (भूमिजा रूप) का दृश्य है। 

भई प्रगट कुमारी – कुमारी (सीता जी) प्रकट हुईं।

भूमि-विदारी – वे भूमि को चीरकर प्रकट हुई थीं (सीता जी का जन्म भूमिजा के रूप में हुआ था)।

जन हितकारी भयहारी – वे सबका हित करने वाली और भय को हरने वाली हैं।

अतुलित छबि भारी – उनकी छवि अनुपम और अलौकिक है।

मुनि-मनहारी – वे मुनियों के मन को भी हर लेती हैं।

जनक दुलारी सुकुमारी – वे जनक जी की प्यारी पुत्री और अत्यंत कोमल स्वभाव वाली हैं।

अर्थात् 

श्री जानकी जी भूमि से उत्पन्न होकर प्रकट हुईं। वे जनक महाराज की लाड़ली, सबका भय दूर करने वाली और हितकारी हैं। उनकी अतुलनीय छवि, रूप और कोमलता मुनियों के मन को भी मोहित कर लेती है। उनके श्रृंगार, गजगामिनी चाल, कमल-नयन, चंद्र-सा मुख और करुणामयी स्वभाव का वर्णन तुलसीदासजी ने किया है।

अंत में तुलसीदासजी प्रार्थना करते हैं कि जैसे सीता जी ने करुणा करके जनक के यहां पुत्री रूप में जन्म लीं, वैसे ही कृपा वे नित्य हम पर करें।

“जानकी-मंगल” का पूरा जन्म प्रसंग (भूमि से प्रकट होने से लेकर नारद जी द्वारा नामकरण तक)

जनक की तपस्या और यज्ञ

मिथिला के महाराज जनक बड़े धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा थे। वे केवल राजकाज में ही नहीं, बल्कि अध्यात्म और साधना में भी रमे रहते थे। कहते हैं, एक बार उन्होंने एक महायज्ञ का संकल्प किया। यज्ञ की भूमि स्वयं तैयार कराना उन्होंने उचित समझा—क्योंकि राजा का धर्म होता है कि वह अपने कर्म में भी भाग ले।

हल लेकर वे स्वयं खेत जोतने लगे। धरती की पवित्र मिट्टी उनके हाथों से उखड़ रही थी, और वे मंत्रोच्चारण करते हुए हल की रेखा खींचते जा रहे थे।

माता सीता का प्राकट्य : भूमि-विदारी से प्रकट हुईं जानकी जी (धरती का चीरना और प्राकट्य)

तभी, एक अद्भुत घटना हुई। खेत जोतते हुए, जैसे ही हल की नोक भूमि में गड़ी, धरती चीर गई—और वहाँ से अचानक एक दिव्य बालिका प्रकट हुई।

धरती फट गई, और वहाँ से एक अलौकिक, अनुपम छवि वाली कुमारी प्रकट हुईं। मानो स्वर्ग से स्वयं लक्ष्मीजी अवतरित हो गई हों। 

उनका रूप देखकर हर कोई स्तब्ध रह गया — मुख पर चंद्रमा-सी शीतल आभा, नेत्र कमल जैसे कोमल, अंगों से अलौकिक ज्योति निकल रही थी। मानो स्वयं लक्ष्मीजी ने धरती का आँचल पकड़कर प्रकट होने का निश्चय किया हो।

राजा जनक ने जैसे ही उस कन्या को देखा, उनका हृदय वात्सल्य से भर उठा। वे समझ गए कि यह कोई साधारण बालिका नहीं, बल्कि स्वयं भगवान की लीला है।

तुलसीदासजी ने इस दिव्य दृश्य को शब्दों में ढालते हुए कहा —

भई प्रगट कुमारी, भूमि-विदारी, 
जन-हितकारी भयहारी । 
अतुलित छबि भारी, मुनि-मनहारी, 
जनकदुलारी सुकुमारी॥

अर्थात्, “धरती चीरकर एक दिव्य कन्या प्रकट हुईं। वे सबके लिए कल्याण करने वाली और भय दूर करने वाली थीं। उनकी छवि अनुपम थी, जो ऋषि-मुनियों के मन को भी हर ले। वे कोमल सुकुमारी, महाराज जनक की प्यारी पुत्री बनीं।”

इस घटना का प्रतीकात्मक अर्थ

राजा का हल चलाना यह भी दर्शाता है कि धरती माँ तभी फलदायी होती है जब उसके साथ श्रम और तपस्या जुड़ती है।

साथ ही यह सन्देश भी है कि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ राजा भी यदि श्रम करने लगे, तो भूमि से अमृत-सा फल (सीता) प्रकट हो सकता है।

(राजा जनक के हल उठाने के पीछे विशेष कारण और कथा भी है - 

मिथिला में एक बार बहुत लंबे समय तक बड़ा अकाल पड़ा। लोग परेशान थे, धरती सूखी थी, खेती-बाड़ी में बरकत नहीं थी। राजा जनक धर्मात्मा थे, उन्हें लगा—“कहीं हमारी शासन-व्यवस्था या कर्म में कोई कमी तो नहीं है? राजा ही प्रजा का पालक होता है। यदि भूमि फल नहीं दे रही, तो मुझे स्वयं भूमि का स्पर्श करना चाहिए, ताकि यज्ञभूमि शुद्ध और पवित्र बने।”

इसीलिए उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने हाथों से भूमि को जोतेंगे। यह कर्म उन्होंने राजधर्म और तपस्या दोनों मानकर किया — एक ओर यह राजधर्म था कि राजा हर कार्य का प्रारम्भ स्वयं करे। दूसरी ओर, यह आध्यात्मिक तपस्या थी, क्योंकि भूमि को जोतना यज्ञभूमि की शुद्धि का प्रतीक माना गया।

एक और लोककथा भी कही जाती है—

जनक जी को सन्तान प्राप्ति नहीं हो रही थी। इस चिंता को लेकर उन्होंने ऋषियों से परामर्श लिया। ऋषियों ने कहा—“आप स्वयं हल चलाकर यज्ञभूमि तैयार कीजिए। आपकी तपस्या और संकल्प से देवी कृपा करेंगी।”

इसी परामर्श को मानकर जनकजी ने स्वयं हल उठाया। और तभी हल की रेखा से भूमिजा सीता का प्राकट्य हुआ।)

दरबार का दृश्य

जब यह अद्भुत घटना हुई, तो पूरा मिथिला महक उठा।मिथिला की हवा में आज कुछ अलग है। राजमहल और नगर—दोनों सजे हैं। शहनाइयाँ बज रही हैं, झंडे-पताका लहरा रहे हैं, और दरबार में सुनहली रोशनी जैसे खुद सूरज उतर आया हो।  जनकजी के महल में आनन्द का सागर उमड़ पड़ा। दरबार में देवताओं और मुनियों का जमघट लग गया। सबने पुष्पवृष्टि की, मंगल गीत गाए। राजमहल मानो स्वर्ग से भी सुन्दर लगने लगा।

इसी शुभ वातावरण में तुलसी बाबा कहते हैं—“भई प्रगट कुमारी, भूमि-विदारी…”—अर्थात, धरती को चीरकर एक दिव्य बालिका का प्राकट्य हुआ और वही अब जनकनंदिनी के रूप में सबकी आँखों का तारा बनी बैठी हैं। सभा में खुसर-फुसर नहीं, बस विस्मय है और आनंद है। देवतागण फूल बरसा रहे हैं, ऋषि-मुनि हर्ष से भरकर स्तुति कर रहे हैं, और जनकपुर का हर आँगन आज मंगल से झूम रहा है। 

दरबार का दृश्य जैसे चित्र बन जाता है—सुन्दर सिंहासन, उस पर नवनीता-सी सुकुमारी बैठी हैं; सिर पर छत्र विराज रहा है, सहेलियाँ पास-पास हैं, सबके हाथ अपने-अपने काम में लगे हैं—किसी के पास पंखा, किसी के पास आरती की थाली, किसी के पास पुष्प। चारों ओर मंगलगीत हैं, और आकाश से जैसे पुष्पवृष्टि थमती ही नहीं। तुलसीदास अपनी लोक-रीति की बोली में इसी हलचल और आनंद को रेखांकित करते हैं—देव, सिद्ध, गंधर्व सब विह्वल होकर सीता गुण गा रहे हैं। 

तुलसीदासजी लिखते हैं कि सब दिशाओं में हर्ष और उत्सव छा गया। मुनि, देवता, गंधर्व, अप्सराएँ—सबने मिलकर इस दिव्य बालिका की स्तुति की।

नारदजी का आगमन, नामकरण और महत्व

इसी भीड़ में एक परिचित वीणा की टुन-टुन सुनाई देती है— इसी समय देवऋषि नारदजी वहाँ पधारे हैं। 

जब उन्होंने इस अद्भुत बालिका का तेज देखा, तो वे मन ही मन नतमस्तक होते हैं और बड़ी सरल वाणी में कहते हैं—

“राजन्! यह कोई साधारण कन्या नहीं है। यह तो स्वयं लक्ष्मी का अंशावतार हैं। यह स्वयं लक्ष्मी का अनुपम रूप है। आपका भाग्य अपार है कि आपके घर में ये प्रकट हुई हैं। आपकी यह लाड़ली धरती से प्रकट हुई हैं, अतः इनका नाम सीता ही शोभा देता है। इनका नाम होगा — सीता।”

इस बालिका का “सीता” इसलिए रखा क्योंकि वे हल की सीत (हल द्वारा खींची गई रेखा) से प्रकट हुई थीं। और क्योंकि वे धरती से जन्मी थीं, लोग उन्हें “भूमिजा” भी कहते हैं।

इस प्रकार महाराज जनक की पुत्री का नामकरण हुआ—सीता। बस, नाम का उच्चार होते ही जैसे पूरी सभा ने एक साथ “जय जानकी (जनक की पुत्री होने के कारण उनका नाम जानकी भी है)” पुकार दी। नारद का यह सुख-समाचार सुनकर जनक का हृदय भाव से भीग जाता है, और माताएँ आशीर्वादों की वर्षा करती हैं। आगे चलकर यही “जानकी”, “मिथिलेश्वरी” और “रामपत्नी” कहलाईं।

स्तुति का महत्व

यह स्तुति केवल माता सीता के जन्म का वर्णन नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक प्रतीक भी है—

धरती से उनका प्राकट्य बताता है कि वे स्वयं “भूमिजा” हैं, सबके लिए माँ हैं। उनका स्वरूप “लाज, कोमलता, करुणा और शक्ति” का संगम है।

इसीलिए तुलसीदासजी ने पूरे मन से उनकी वंदना की—“जैसे उन्होंने करुणा करके जनकजी की पुत्री बनी, वैसे ही वे हमें भी अपनी शरण दें।”

“जानकी-मंगल” में वर्णित यह स्तुति और कथा माता सीता के जन्मोत्सव का वह दृश्य है, जब स्वयं पृथ्वी माता ने उन्हें जन्म दिया, देवताओं और मुनियों ने स्तुति की, और नारदजी ने उनका नाम “सीता” रखा।

अब ज़रा ठहरकर उस “भूमि-विदारी” शब्द पर मन लगाएँ, जिसकी वजह से यह स्तुति इतनी प्रिय है। “धरती चीरकर प्रकट”—यही तो इस पूरे प्रसंग का भाव-बीज है: माता सीता भूमिजा हैं—सबकी जननी-सी, कोमलता और करुणा का साकार रूप। इसलिए स्तुति बार-बार उनकी अतुलनीय छवि, लज्जा-विनय, करुणा, और कल्याणकारी स्वरूप पर लौटती है—“मुनि-मनहारी, जनक-दुलारी, सुकुमारी…”—यानी जिन्हें देखकर ऋषि-मुनि तक मोहित हो जाएँ। यह केवल रूप-वर्णन नहीं, आदर्श नारीत्व का सांस्कृतिक रूपक भी है—ममता, मर्यादा और धैर्य का संगम। 

यह अंश भारतीय भक्ति-साहित्य में एक अद्भुत, हृदयस्पर्शी प्रसंग है।

कथा आगे क्या कहती है? 

जनक-दरबार में उत्सव थमता नहीं—मंगल-गीत, पुष्पवृष्टि, और शुभाशंसाएँ चलती रहती हैं। स्तुति में बार-बार यही दृश्य लौटता है: “सब खड़े होकर निहार रहे हैं, आँखें तृप्त नहीं होतीं, हृदय का सुख बढ़ता जाता है।” और अंत में भाव यही कि—हे सीया मात, जैसे आपने कृपा करके जनक को आनन्द दिया, वैसे ही हम पर भी अपनी दृष्टि बनाए रखिए। यह विनय “जानकी-मंगल” की सहज देहाती-अवधी में इतने अपनत्व से आती है कि श्रोता के मन में अनायास भक्ति का कंपन जाग उठता है।

एक वाक्य में सार

यह पूरी स्तुति सीता जी के दिव्य प्राकट्य और मिथिला दरबार के मंगल-उत्सव का उत्साही चित्र है—धरती-कन्या का आगमन, देव-ऋषियों की स्तुति, नारद का नामकरण, और जनकपुर के आँगन-आँगन में बजते सोहर की गूँज।

ऋषि-मुनि, देवता, गंधर्व—सभी ने पुष्पवृष्टि करके इस अवतरण का स्वागत किया। देवर्षि नारद ने भी आकर कहा—“राजन! यह आपकी पुत्री ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण लोक की जननी हैं। ये भविष्य में भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम की अर्धांगिनी बनेंगी और इनके माध्यम से धरती पर धर्म और मर्यादा की प्रतिष्ठा होगी।”

इस स्तुति का सांस्कृतिक अर्थ

सीता जी का जन्म किसी सामान्य जन्म जैसा नहीं था। उनका धरती से प्रकट होना हमें यह संदेश देता है कि वे मूलतः प्रकृति और भूमि की संतान हैं। वे क्षमा, कोमलता, ममता और धैर्य की मूर्ति हैं। साथ ही, वे शक्ति और धैर्य का ऐसा स्वरूप हैं, जो बड़े से बड़े संकट में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ता।

माता सीता का जन्म धरती के हृदय से हुआ—मिथिला में हल की रेखा से प्रकट हुईं, इसलिए वे “भूमिजा” और “सीता” नाम से पूजित हुईं। उनका आगमन ही यह संदेश है कि जब धर्म और मर्यादा की रक्षा का समय आता है, तो स्वयं प्रकृति भी भगवान के साथ खड़ी हो जाती है।

इसलिए सीता जी का जन्म केवल एक चमत्कारिक घटना नहीं, बल्कि यह बताने वाला प्रसंग है कि — “धरती और श्रम का संगम जब होता है, तभी जीवन में सुख-समृद्धि और संतति का उदय होता है।”

जानकी वंदना का अर्थ

इस स्तुति में तुलसीदास जी ने माता सीता की महिमा का गान किया है। इसे पढ़ने से भक्तों को सुख, शांति और वैवाहिक जीवन में आनंद प्राप्त होता है।

महत्व और फल

  • सीता जयंती पर इस स्तुति का पाठ करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • विवाह योग्य कन्याओं के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • पारिवारिक जीवन में सौहार्द और शांति आती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. श्री जानकी वंदना किस ग्रंथ से ली गई है?

Ans: यह तुलसीदास की रचना जानकी मंगल से ली गई है।

Q2. जानकी वंदना कब गाई जाती है?

Ans: यह स्तुति विशेषकर सीता जयंती और राम विवाह के अवसर पर गाई जाती है।

Q3. जानकी वंदना का महत्व क्या है?

Ans: इस स्तुति का पाठ करने से वैवाहिक जीवन में सुख और परिवार में शांति आती है।

Comments