Bajrang Baan Paath Lyrics (Jai Hanumant Sant Hitkari) : बजरंग बाण का पाठ (जय हनुमंत संत हितकारी)
बजरंग बाण (Bajrang Baan ka Paath) की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की मानी जाती है। यह “बाण” शब्द इसलिए प्रयोग करता है क्योंकि यह प्रार्थना तीव्र है, सीधी है, और संकट पर तुरंत प्रभाव डालने वाली मानी जाती है। जहाँ हनुमान चालीसा साधना और नियमित भक्ति का पाठ है, वहीं बजरंग बाण संकट, भय, शत्रु, मानसिक पीड़ा, रोग या गहरे अवसाद में किया जाने वाला आपातकालीन आवाहन है।
यह पाठ (Bajrang Baan ka Paath) डर को चुनौती देता है, साधक को हनुमान जी के समक्ष निर्भय होकर खड़ा होना सिखाता है। इसमें विनय भी है और अधिकार भी। भक्त हनुमान जी से कहता है कि “हे हनुमान जी! आप श्रीराम के सच्चे दूत हैं, मेरी रक्षा कीजिए।”
जब जीवन में भय घना हो जाता है, जब मन टूटने लगता है, जब लगता है कि कोई रास्ता नहीं बचा, तब साधारण प्रार्थनाएँ अक्सर मौन हो जाती हैं। ऐसे समय में बजरंग बाण केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि पुकारा जाता है। बजरंग बाण उस क्षण की वाणी है, जब भक्त और भगवान के बीच औपचारिकता टूट जाती है। यह वह क्षण है जब आत्मा सीधे शक्ति से बात करती है।
कहा जाता है कि बजरंग बाण का पाठ (Bajrang Baan ka Paath) नकारात्मक शक्तियों, भ्रम और मन के भीतर बैठे राक्षसों को शांत या नष्ट कर देता है। जब यह पाठ श्रद्धा और संयम से किया जाता है, तो साधक के भीतर एक अद्भुत दृढ़ता जन्म लेती है। वह जान जाता है कि अब वह अकेला नहीं है।
बजरंग बाण (Bajrang Baan ka Paath) को दिखावे, क्रोध या दूसरों को हानि पहुँचाने की भावना से नहीं पढ़ना चाहिए। यह पाठ शक्ति का आह्वान है, और शक्ति हमेशा जिम्मेदारी मांगती है। इसी के साथ, हनुमान जी के भक्तों को रोज ही भोजन आदि में सात्विकता, दैनिक जीवन में तन मन की स्वच्छता आदि का विशेष ध्यान रखें।
Bajrang Baan ka Paath Lyrics
दोहा :
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
चौपाई :
जय हनुमंत संत हितकारी।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै।
आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा।
सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका।
मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा।
सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा।
अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा।
लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई।
जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी।
कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता।
आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर।
सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले।
बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा।
ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता।
शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक।
राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत प्रेत पिसाच निसाचर।
अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु तोहि सपथ राम की।
राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै।
राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा।
दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा।
नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं।
तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ।
ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा।
सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं।
यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई।
पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता।
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल।
ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ।
सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै।
ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की।
हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं।
तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा।
ताके तन नहिं रहै कलेसा॥
दोहा :
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करै हनुमान॥
। जय श्रीराम ।
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