What is Heat? How is it created? Effects of Heat : ऊष्मा क्या है और यह कैसे बनती है?
ऊष्मा (Heat) क्या है?
ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है, जो किसी पदार्थ के कणों (अणुओं/परमाणुओं) की गति से उत्पन्न होती है। जब कण तेजी से हिलते-दौड़ते हैं, तो पदार्थ गर्म होता है; जब कणों की गति धीमी होती है तो पदार्थ ठंडा होता है।
सरल शब्दों में, ऊष्मा कोई अलग चीज नहीं है, यह केवल कणों की गति (motion of particles) की ऊर्जा है। कण जितनी तेज स्पीड से हिलेंगे, उतनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न होगी। उसी ऊर्जा को हम गर्मी या ऊष्मा कहते हैं। जब भी कोई चीज हिलती है, तो उसमें गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) होती है।
कल्पना कीजिए कि आपके पास लाखों-करोड़ों कण हैं। जब वे धीमे चलते हैं तो पदार्थ ठंडा होता है। जब वे तेज गति से चलते हैं तो पदार्थ गर्म होता है, और जब वे बेहद तेज गति से चलते हैं तो पदार्थ चमकने लगता है (जैसे लाल-गर्म लोहे)। तो यानी ऊष्मा = कणों की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy of Particles)। जितनी तेज गति, उतनी अधिक ऊर्जा, यानी अधिक ऊष्मा।
आपका हाथ हिलता है, तो उसमें ऊर्जा होती है। आप बोलते हैं, तो उसमें ऊर्जा होती है। हवा बहती है, उसमें ऊर्जा होती है। पानी बहता है, उसमें ऊर्जा होती है। कण हिलते हैं, उनकी गति में ऊर्जा होती है। क्योंकि कण बहुत ही सूक्ष्म होते हैं और अरबों-खरबों की संख्या में होते हैं, तो उनकी कुल ऊर्जा मिलकर ऊष्मा बनाती है।
संक्षेप में, ऊष्मा ऊर्जा का एक रूप है जो कणों की गति से बनती है और तापमान, अवस्था, आकार आदि बदल सकती है। इसका संचरण चालन, संवहन और विकिरण से होता है।
ऊष्मा कैसी दिखती है? (What Does Heat Look Like?)
ऊष्मा ऊर्जा का रूप है, कोई ठोस/दिखाई देने वाली चीज नहीं। ऊष्मा तापमान बढ़ाती है, अवस्था बदलती है, फैलाव लाती है। यानी ऊष्मा स्वयं दिखाई नहीं देती, लेकिन इसके प्रभाव दिखते हैं, जैसे चीजें गर्म होकर चमकने लगती हैं (लाल-गर्म धातु), गर्म हवा में लहरें या हवा हिलती हुई दिखाई देती है, पानी उबलता है, वस्तुएँ फैलती हैं, धुआँ या भाप उठती है।
ऊष्मा के क्या प्रभाव (Effects of Heat)
ऊष्मा का पदार्थों पर कई तरह से प्रभाव पड़ता है :
(1) तापमान बढ़ना (Increase in Temperature) : जब किसी वस्तु में ऊष्मा दी जाती है तो उसका तापमान बढ़ता है।
(2) अवस्था परिवर्तन (Change of State) : ऊष्मा से पदार्थ की अवस्था बदल सकती है। जैसे बर्फ का पानी में बदलना (पिघलना), पानी का भाप में बदलना (वाष्पीकरण), भाप का पानी में बदलना (संघनन)
(3) प्रसार (Expansion) : गर्मी मिलने पर अधिकतर पदार्थ फैलते हैं। जैसे गर्मियों में तार ढीले हो जाते हैं।
(4) रासायनिक परिवर्तन (Chemical Changes) : कई रासायनिक क्रियाओं का कारण या उत्पाद ऊष्मा होती है। जैसे भोजन पकना, धातुओं का शुद्धिकरण।
(5) विद्युत उत्पादन (Electricity Generation) : ऊष्मा से भाप बनती है जो टर्बाइन चलाकर बिजली बनाती है।
(6) जीवों के शरीर पर प्रभाव : ऊष्मा जीवित प्राणियों के शरीर का तापमान नियंत्रित रखती है।
ऊष्मा कैसे बनती है? (Heat Generation)
ऊष्मा कई तरीकों से उत्पन्न होती है :
1. घर्षण (Friction) से : दो वस्तुओं को रगड़ने पर कणों की गति बढ़ती है और ऊष्मा बनती है। जैसे हाथ रगड़ने पर गर्म हो जाते हैं।
2. रासायनिक अभिक्रिया (Chemical Reaction) से : कुछ अभिक्रियाएँ ऊष्मा छोड़ती हैं। जैसे लकड़ी जलना, कोयला जलना, भोजन पकाना।
3. विद्युत ऊर्जा से (Electrical Heating) : करंट बहने से तारों में ऊष्मा उत्पन्न होती है। जैसे हीटर, गीजर, इस्त्री।
4. सूर्य किरणों से (Radiatio) : सूर्य से आने वाले विद्युतचुंबकीय विकिरण पृथ्वी और वस्तुओं को गर्म करते हैं।
5. परमाण्विक क्रियाओं से (Nuclear Reactions) : नाभिकीय विखंडन/संलयन में बड़ी मात्रा में ऊष्मा बनती है। सूर्य, परमाणु ऊर्जा संयंत्र।
ऊष्मा के गुण और विशेषताएँ (Properties & Characteristics of Heat)
1. ऊष्मा एक ऊर्जा है : यह ऊर्जा का एक रूप है जिसे जूल (Joule) या कैलोरी (calorie) में मापा जाता है।
2. ऊष्मा गर्म वस्तु से ठंडी वस्तु की ओर बहती है : तापमान-संतुलन बनने तक ऊष्मा स्थानांतरित होती रहती है।
3. ऊष्मा तापमान बदल सकती है : ऊष्मा के बढ़ने से तापमान बढ़ता है; कम होने से घटता है।
4. ऊष्मा पदार्थ की अवस्था बदल सकती है। जैसे बर्फ का पानी में बदलना (पिघलना), या पानी का भाप बनना (वाष्पीकरण)।
5. ऊष्मा का संचार तीन तरीकों से होता है : चालन (Conduction) यानी ठोस माध्यम से, संवहन (Convection) यानी तरल/गैस में और विकिरण (Radiation) यानी बिना माध्यम के।
6. ऊष्मा वस्तु के द्रव्यमान और विशिष्ट ऊष्मा पर निर्भर करती है : एक ही ऊष्मा से अलग-अलग पदार्थों का तापमान अलग-अलग बढ़ता है।
7. ऊष्मा अदृश्य होती है लेकिन प्रभाव महसूस किया जा सकता है। जैसे गर्मी का अहसास, वस्तु का फैलना आदि।
सूर्य में ऊष्मा कैसे आई? (How Did the Sun Get Its Heat?)
सूर्य की गर्मी सामान्य कणों की हलचल से नहीं बनती। वह परमाणु स्तर पर होने वाली विशाल ऊर्जा से बनती है। सूर्य में ऊष्मा परमाणु संलयन (Nuclear Fusion) से आती है। सूर्य के केंद्र में बहुत अधिक तापमान (लगभग 1.5 करोड़ °C) है, बहुत अधिक दबाव है। इस दबाव और तापमान में हाइड्रोजन के नाभिक आपस में टकराते हैं और जुड़कर हीलियम बनाते हैं। इसे कहते हैं परमाणु संलयन (Nuclear Fusion)। फ्यूज़न ने सूर्य को एक विशाल गतिज–ऊर्जा + प्रकाश + ऊष्मा का गोला बना दिया, क्योंकि इस प्रक्रिया में बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा (ऊष्मा और प्रकाश) निकलती है। जब दो हाइड्रोजन परमाणु मिलकर हीलियम बनाते हैं, तब थोड़ा सा द्रव्यमान गायब हो जाता है। वह द्रव्यमान ऊर्जा में बदल जाता है (E = mc²)। यही ऊर्जा है सूर्य की गर्मी।
ब्रह्माण्ड में पहली बार ऊष्मा कैसे और किससे बनी?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, पहली ऊष्मा बिग बैंग से (Heat from the Big Bang) बनी। यानी ब्रह्माण्ड में ऊष्मा का पहला स्रोत बिग बैंग ही था। लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले ब्रह्माण्ड अत्यंत छोटा, अत्यंत घना और अनंत गर्म था। इसी स्थिति से अत्यधिक विस्फोट/विस्तार हुआ, जिसे बिग बैंग कहते हैं। बिग बैंग के ठीक बाद ऊर्जा अत्यधिक घनत्व में थी, तापमान लगभग 10¹⁰–10³²°C तक था। जैसे ही ब्रह्माण्ड विस्तृत हुआ, ऊर्जा कणों में बदली, कणों की तेज गति के कारण ऊष्मा ऊर्जा उत्पन्न हुई। इसलिए ऊष्मा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही बनी, किसी बाहरी स्रोत से नहीं।
ऊष्मा, तापमान और गर्मी में क्या अंतर है?
ऊष्मा और तापमान का रिश्ता वैसा है जैसे भीड़ और शोर का। दोनों जुड़े हुए हैं, पर एक ही चीज नहीं हैं।
ऊष्मा (Heat) ऊर्जा है। यह वह ऊर्जा है जो किसी वस्तु के कणों की गति से बनती है और एक जगह से दूसरी जगह बह सकती है। ऊष्मा बढ़ने पर कण तेज नाचने लगते हैं, और घटने पर धीरे हो जाते हैं। वहीं, तापमान (Temperature) उस नाच की स्पीड का माप है। यह बताता है कि कण कितनी तेजी से हिल रहे हैं। तापमान को हम थर्मामीटर से माप लेते हैं।
ऊष्मा = कुल ऊर्जा और तापमान = उस ऊर्जा का औसत स्तर
एक बड़े गर्म पानी के टब और एक छोटे कप में रखे गर्म पानी का तापमान एक समान हो सकता है, लेकिन टब में ऊष्मा बहुत ज्यादा होगी, क्योंकि उसमें कणों की संख्या बहुत ज्यादा है (यानी टब में गर्म पानी की मात्रा ज्यादा है)।
ऊष्मा और गर्मी में अंतर? यह भाषा का फर्क है। ऊष्मा एक वैज्ञानिक शब्द है। यह ऊर्जा का रूप है, जिसे हम जूल या कैलोरी में मापते हैं। जब हम विज्ञान की बात करते हैं यानी भौतिकी, रसायन विज्ञान, तो वहाँ "ऊष्मा" शब्द सही है। वहीं, गर्मी दैनिक भाषा में इस्तेमाल होने वाला शब्द है। गर्मी वह अनुभूति है जो हमें तब होती है जब ऊष्मा हमारे शरीर में आती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो ऊष्मा एक ऊर्जा है और गर्मी उस ऊर्जा का एहसास है। अंतर यह है जैसे प्रकाश और रोशनी में होता है। पहला वैज्ञानिक शब्द है, और दूसरा अनुभव है। यानी ऊष्मा को आप सूत्रों और माप में पकड़ सकते हैं, जबकि गर्मी को आप अपनी त्वचा से महसूस करते हैं।
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हमारे एक स्टूडेंट ने हमसे एक सवाल पूछा था कि क्या अग्नि (Fire) भी केवल कणों की तेज गति है?
नहीं। अग्नि केवल कणों के तेज हिलने-डुलने का नाम नहीं है।
अग्नि = एक रासायनिक प्रक्रिया + प्रकाश + ऊष्मा।
सूर्य में अग्नि नहीं है। यानी जैसी अग्नि लकड़ी, गैस या तेल जलने पर बनती है, वैसी आग सूर्य में नहीं होती। सूर्य में ऑक्सीजन नहीं है (बहुत थोड़ी ही मात्रा में है), लकड़ी या गैस जैसा कोई ईंधन नहीं है, उसमें रासायनिक दहन नहीं होता, तो सूर्य में अग्नि पृथ्वी वाली आग जैसी नहीं है। सूर्य में एक नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) प्रक्रिया होती है। यानी हाइड्रोजन के कण बहुत विशाल दबाव + तापमान के कारण आपस में टकराकर हीलियम बनाते हैं और इस प्रक्रिया में विशाल ऊर्जा निकलती है। ऊर्जा = प्रकाश + ऊष्मा। और यह प्रक्रिया पृथ्वी की अग्नि से अलग है।
सूर्य की गर्मी में भी कणों की तेज गति शामिल है, लेकिन अलग प्रकार के कण। सूर्य के केंद्र में प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन, और आयन अत्यधिक ऊर्जा के कारण अत्यंत तेज गति से चलते हैं। इसी गति + संलयन क्रिया के कारण विशाल मात्रा में ऊष्मा और प्रकाश बनते हैं।
नोट : सूर्य में ऑक्सीजन है, लेकिन इसकी मात्रा बहुत कम है। सूर्य का 99% से अधिक हिस्सा हाइड्रोजन और हीलियम से बना है। ऑक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन, सिलिकॉन और अन्य भारी तत्वों की थोड़ी मात्रा लगभग 0.1% है। सूर्य मुख्य रूप से हाइड्रोजन (लगभग 70% से 73%) और हीलियम (लगभग 25% से 28%) से बना है। सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 0.77% ऑक्सीजन है। इसलिए वह पृथ्वी की तरह रासायनिक दहन (जलाने) की प्रक्रिया से नहीं जलता है।
बहुत सरल भाषा में,
अग्नि = रासायनिक प्रतिक्रिया + ऊष्मा + प्रकाश
ऊष्मा = कणों की गति की ऊर्जा
कण जितने तेज, पदार्थ उतना गर्म।
सूर्य = आग का गोला नहीं, बल्कि संलयन की ऊर्जा का गोला है, जिसमें दहन नहीं, नाभिकीय संलयन चलता है।
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क्या हमारे बोलने से और हमारे विचारों से भी गर्मी पैदा होती है?
हाँ, जब हम बोलते हैं तो उसमें भी ऊर्जा होती है, और उसी ऊर्जा के कारण थोड़ी-बहुत गर्मी भी पैदा होती है। लेकिन यह गर्मी बहुत ही कम होती है, इसलिए हम उसे महसूस नहीं कर पाते। जब हम बोलते हैं, तो हमारे शरीर में कई प्रक्रियाएँ होती हैं, जैसे फेफड़े हवा को बाहर धकेलते हैं। यह काम मांसपेशियाँ करती हैं, जिसमें यांत्रिक ऊर्जा खर्च होती है। स्वरयंत्र (vocal cords) कंपित होते हैं, कंपन होने पर ध्वनि-ऊर्जा (sound energy) बनती है। मुंह, जीभ, होंठ हिलते हैं। यह भी मांसपेशियों का काम है, जिसमें ऊर्जा लगती है। इन सभी क्रियाओं के कारण शरीर में रासायनिक ऊर्जा, यांत्रिक ऊर्जा में, और फिर ध्वनि ऊर्जा में बदलती है।
शब्द वास्तव में ध्वनि तरंगें (sound waves) हैं। ध्वनि तरंगें क्या होती हैं? हवा के कणों का आगे-पीछे कंपन। और हर तरंग में ऊर्जा होती है। इसलिए हमारी आवाज ऊर्जा की तरंगें हैं।
हमारे बोलने में गर्मी निकलती है, पर बहुत थोड़ी। ऊर्जा संरक्षण का नियम (law of conservation of energy) कहता है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है। जब मांसपेशियाँ काम करती हैं, तो 25-30% ऊर्जा काम में जाती है (ध्वनि, गति आदि), 70-75% ऊर्जा ऊष्मा (गर्मी) में बदल जाती है। इसलिए बोलने से शरीर थोड़ा गर्म होता है, तेज बोलने या चिल्लाने पर गला गर्म हो जाता है, लंबा भाषण देने पर मुँह और गला गरम महसूस होता है। यानी बोलना यानी ऊर्जा खर्च करना और थोड़ी गर्मी पैदा होना।
हमारे शब्द भी हवा को गर्म करते हैं, लेकिन बहुत थोड़ी मात्रा में। जब ध्वनि तरंगे हवा में चलती हैं, तो वे हवा के कणों को हिलाती हैं, तो इससे थोड़ी ऊर्जा हवा में जाती है, जिससे हल्की गर्माहट पैदा हो सकती है। लेकिन यह मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए महसूस नहीं होती।
हमारे विचार भी ऊर्जा हैं
विचार ऊर्जा के रूप हैं, हालांकि वैसी ऊर्जा नहीं जैसे सूर्य, आग या बिजली। दिमाग में सूक्ष्म विद्युत संकेत बनते हैं। हमारे मस्तिष्क में लाखों-करोड़ों न्यूरॉन (Brain Cells) हैं। विचार तब बनते हैं जब न्यूरॉन एक-दूसरे को बिजली जैसी सूक्ष्म संकेत (electrical signals) भेजते हैं। इस प्रक्रिया में दो तरह की ऊर्जा शामिल होती हैं :
(1) विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy) : न्यूरॉन के अंदर छोटे-छोटे आयन (Na⁺, K⁺ आदि) आगे-पीछे जाते हैं। यह आयनों का हिलना एक तरह की विद्युत ऊर्जा पैदा करता है।
विचारों में मुख्यतः दो प्रकार के कण होते हैं :
(1). आयन (Sodium – Na⁺, Potassium – K⁺, Calcium – Ca²⁺)
(2). इलेक्ट्रॉन (बहुत कम मात्रा में)
(2) रासायनिक ऊर्जा (Chemical Energy) : न्यूरॉनों के बीच सिग्नल जाते समय न्यूरोट्रांसमीटर नामक रसायन छूटते हैं, यह भी ऊर्जा जैसी प्रक्रिया है। इसलिए विचार = विद्युत + रासायनिक प्रक्रियाओं का मेल।
विचार खुद गर्मी नहीं बनाते, लेकिन जब दिमाग बहुत सक्रिय होता है तो रक्त प्रवाह बढ़ता है, न्यूरॉनों में रासायनिक क्रिया बढ़ती है, इससे दिमाग का तापमान थोड़ा बढ़ सकता है, लेकिन यह वृद्धि बहुत मामूली होती है इसलिए महसूस नहीं होती। विचार बनते समय मस्तिष्क ऊर्जा खर्च करता है, न्यूरॉनों में विद्युत संकेत चलते हैं, मस्तिष्क की गतिविधि को ऊर्जा चाहिए होती है। यह जैव-विद्युत (bioelectric) ऊर्जा होते हैं।


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