Sonification (Sound in Space) : अंतरिक्ष में सचमुच ध्वनि है या नहीं?

Sonification (अंतरिक्ष में ध्वनि) : अंतरिक्ष में सचमुच ध्वनि है या नहीं? (Sound in Space)

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सोनिफिकेशन खगोलीय डेटा को ध्वनि में बदलने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य उन ब्रह्मांडीय घटनाओं का श्रवण अनुभव बनाना है, जो अक्सर केवल तस्वीरों में ही देखा जाता है। इससे लोगों को वैज्ञानिक डेटा को नए तरीके से तलाशने और समझने का मौका मिलता है, और यह दृष्टिहीन या दृष्टिबाधित लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। वैज्ञानिक अपने विभिन्न दूरबीनों से प्राप्त डेटा को ध्वनिकृत करते हैं। वे चमक और स्थिति जैसे दृश्य तत्वों को ध्वनि गुणवत्ता जैसे वॉल्यूम और पिच के साथ मैप करते हैं। 

ध्वनि (sound) यानी किसी माध्यम (जैसे हवा, पानी, ठोस) में कणों का कंपन (pressure wave)। अंतरिक्ष (outer space) लगभग निर्वात है, यानी वहाँ पर्याप्त कण नहीं हैं कि असली ध्वनि तरंग चल सके। इसका मतलब है कि हमारी समझ में आने वाली सामान्य ध्वनि अंतरिक्ष में नहीं चल सकती।

अंतरिक्ष निर्वात है, किंतु बिल्कुल पूरी तरह खाली भी नहीं है। वहाँ बहुत विरल (thin) गैस, प्लाज़्मा और डार्क मैटर जैसी चीजें फैली हुई हैं। इनमें कभी-कभी तरंगें चल सकती हैं (plasma waves, shock waves, etc.)। लेकिन वे तरंगें हमारी हवा में चलने वाली ध्वनि जैसी नहीं होतीं। यानी यह कहना सही होगा कि अंतरिक्ष में तरंगें होती हैं, पर सामान्य ध्वनि नहीं।

हमारी आँखें केवल visible light (लगभग 400–700 nm) देख सकती हैं। पर ब्रह्मांड में X-rays, Infrared, Gamma rays, Radio waves भी होते हैं, जिन्हें हम सीधे नहीं देख सकते, लेकिन मशीनें पकड़ सकती हैं। इसी तरह हमारे कान केवल 20 Hz – 20 kHz सुन सकते हैं। पर ब्रह्मांड में बहुत धीमी (milliHertz) या बहुत तेज (MegaHertz) तरंगें भी होती हैं, जिन्हें हम सीधे नहीं सुन सकते, लेकिन मशीनें उन्हें पकड़कर सुनने योग्य बना देती हैं।

ब्लैक होल, तारों और आकाशगंगाओं के आसपास गैस, प्लाज़्मा और चुंबकीय क्षेत्र होते हैं। इनमें असली कंपन (pressure waves) और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें पैदा होती हैं। ये कंपन ध्वनि जैसे होते हैं, लेकिन उनकी आवृत्ति (frequency) इतनी ज्यादा या इतनी कम होती है कि हमारा कान उन्हें कभी नहीं सुन सकता।

ब्लैक होल या किसी भी खगोलीय पिंड के चारों ओर गैस और धूल का विशाल बादल (accretion disk) होता है। इसमें बहुत तेजी से गति कर रहे कण (plasma) मौजूद रहते हैं। जब यह कण हिलते-टकराते हैं, तो दबाव तरंगें (pressure waves) बनती हैं। ये तरंगें असली sound waves जैसी होती हैं, लेकिन गैस इतनी विरल (thin) होती है कि ये तरंगें बेहद धीमी (बहुत low frequency) होती हैं।

हमारी सुनने की सीमा है 20 Hz से 20,000 Hz। लेकिन ब्लैक होल के पास बनी तरंगों की आवृत्ति है 1 Hz से भी लाखों-करोड़ों गुना कम। यानी हर तरंग कई घंटों या दिनों में एक बार आती है)। इंसानी कानों के लिए यह मौन के समान है।

इसलिए वैज्ञानिक इन कंपन या तरंगों को डेटा के रूप में रिकॉर्ड करते हैं। फिर कंप्यूटर उन्हें मानव-सुनने योग्य ध्वनि (20 Hz से 20 kHz के बीच) में बदल देता है। इस प्रक्रिया को कहते हैं Sonification (सोनिफिकेशन)। यानी डेटा को ध्वनि में बदलना।

वैज्ञानिकों ने X-ray और रेडियो टेलिस्कोप से इन तरंगों और कंपन का डेटा रिकॉर्ड किया। कंप्यूटर ने इन बहुत धीमी तरंगों की आवृत्ति को लाखों-करोड़ों गुना तेज कर दिया (frequency scaling)। इससे वे तरंगें मानव कान की सीमा (20–20,000 Hz) में आ गईं। अब हमें वे तरंगें आवाज की तरह सुनाई देने लगीं।यानी हम जो ब्लैक होल की आवाज सुनते हैं, वह असल ध्वनि नहीं, बल्कि ब्लैक होल के कंपन/तरंगों का अनुवाद है।

Perseus Galaxy Cluster के बीच एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है। उसके पास बनी गैस ने दबाव तरंगें पैदा कीं। जब वैज्ञानिकों ने उन्हें डिकोड किया, तो पता चला कि उनकी आवृत्ति B-flat (सा♭) स्वर से मेल खाती है। लेकिन यह स्वर इतना गहरा (57 ऑक्टेव नीचे) था कि हमें सीधे कभी सुनाई ही नहीं दे सकता। वैज्ञानिकों ने इसे स्केल-अप किया और हमें ब्लैक होल का संगीत सुनाया। यह संगीत या ध्वनि ब्लैक होल के कंपन का अनुवाद है।

अगर आप किसी दूरस्थ ब्रह्मांडीय वस्तु की आवृत्ति से मेल खाती ध्वनि बजाते हैं, तो आपका मस्तिष्क और शरीर उसी आवृत्ति पर कंपन करने लगते हैं। इसे entrainment कहते हैं। आपका nervous system और brainwaves ध्वनि की लय के साथ sync हो सकते हैं। इससे आपको यह अनुभव होगा कि आप उस ब्लैक होल के संगीत के साथ जुड़ गए हैं। इससे आपके मस्तिष्क और शरीर पर गहरा असर होगा।

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