Shri Ram's Perspective on Women : स्त्रियों के प्रति श्रीराम का दृष्टिकोण

Shri Ram's Perspective on Women : स्त्रियों के प्रति श्रीराम का दृष्टिकोण

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श्रीराम ने अपने जीवन में हर प्रकार की स्त्रियों को देखा, और केवल देखा ही नहीं, बल्कि उनके जीवन पर उन सभी स्त्रियों का गहरा और प्रत्यक्ष प्रभाव भी पड़ा.

उन्होंने ताड़का जैसी राक्षसी को देखा, जिसने अपने आस-पास के प्राणियों को नष्ट करके एक सुंदर स्थान को भी निर्जन बना दिया था.

उन्होंने मंथरा जैसी स्त्री को देखा, जो अपने स्वभाववश दूसरों के कान भरकर अपने भीतर की संतुष्टि खोजती रही, और अनजाने में एक पूरे राज्य को संकट में डाल दिया.

उन्होंने माता कैकेयी को देखा, जो दूसरों के बहकावे में आकर सही-गलत का भेद भूल बैठीं, "मेरा-तेरा" में भटक गईं, और फिर जीवन भर उस भूल का पश्चाताप करती रहीं.

उन्होंने अहिल्या जैसी नारी को देखा, जिसने एक क्षणिक भ्रम में मर्यादा का उल्लंघन किया, और फिर अपने अपराध की क्षमा पाने के लिए वर्षों तक तपस्या की.

उन्होंने शूर्पणखा जैसी निर्लज्ज स्त्री को भी देखा, जो कामवासना में अंधी होकर केवल अपने स्वार्थ को देखती थी.

इन सभी स्त्रियों ने किसी न किसी रूप में श्रीराम के जीवन को प्रभावित किया. एक स्त्री के कारण ही उन्हें 14 वर्ष का वनवास भोगना पड़ा, लेकिन क्या कभी श्रीराम के मुख से स्त्रियों के प्रति कटुता या अपमान का एक भी शब्द निकला?

क्या आपने पूरी रामायण में या कहीं और भी, श्रीराम के मुंह से स्त्रियों की निंदा पढ़ी है? क्या कहीं भी श्रीराम ने ऐसा कुछ कहा कि स्त्रियों को बंधक बनाकर रखा जाना चाहिए, या उन्हें यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, या उनके साथ ऐसा बुरा व्यवहार किया जाना चाहिए, या स्त्रियां तो इतनी बुरी होती हैं, इनके साथ तो ऐसा ही होना चाहिए, अगर ये ऐसा नहीं कर सकती, तो किस काम की, इन्हें ऐसी सजा मिलनी चाहिए??

किसी और का तो नहीं पता, लेकिन मैंने तो कहीं ऐसी कोई बात नहीं पढ़ी. बल्कि मैंने तो वाल्मीकि रामायण के बालकांड में पढ़ा है कि जहां कहीं भी किसी की निंदा हो रही हो, वहां श्रीराम बैठते ही नहीं, क्योंकि निंदारस में उन्हें आनंद नहीं आता.

उन्होंने ताड़का को राक्षसी होने का दंड दिया, स्त्री होने का नहीं.

शूर्पणखा जब तक केवल मुंह से प्रहार करती रही, सीता जी के लिए बहुत बुरे शब्द भी बोली, तब तक श्रीराम और लक्ष्मण जी ने उस पर किसी प्रकार का प्रहार करने की सोची भी नहीं, उन्होंने सोचा कि इसकी बातों को अनसुना करके इसे बार बार मना करेंगे, तो वह अपमानित महसूस करके स्वयं ही यहां से चली जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वह अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आकर सीता जी पर हमला करती है, तब शस्त्र उठाना जरूरी हो गया, जिसमें शूर्पणखा की नाक कट गई. वह वहां से चली गई, इसके बाद उन्होंने कभी शूर्पणखा का नाम भी नहीं लिया.

रावण सीता जी का चाहे जितना अपमान करता रहा हो, पर श्रीराम ने बदले में अपने मुंह से रावण की कभी किसी पत्नी का नाम भी नहीं लिया, और ना ही कभी मंदोदरी आदि का कोई अपमान किया. उन्होंने रावण की करनी का दण्ड रावण को ही दिया....

अहिल्या के चरण स्पर्श करके उनके तप और पश्चाताप का सम्मान किया.

मंथरा ने माता कैकेयी को समझाया कि अगर श्रीराम की संतान हो गई, तो कहीं उनकी संतान 14 वर्षों बाद आकर राज्य पर अपना दावा न ठोक दे. और इसीलिए श्रीराम के लिए ऐसा वरदान मांगा गया था कि 14 वर्षों तक उनकी कोई संतान ही ना हो सके.

श्रीराम ने माता कैकेयी की यह इच्छा भी बिना किसी शर्त या शिकायत के स्वीकार कर ली. और फिर भी उनके हृदय से माता कैकेयी के प्रति कभी क्रोध नहीं उठा, क्योंकि श्रीराम कर्तव्य के पथिक हैं, स्त्रियों पर दोषारोपण के नहीं.

वनवास के दौरान वे सीता जी का पूरा ध्यान रखते, हाथ पकड़कर नदी पार कराते, उन्हें सुंदर कथा-कहानियां सुनाते, सब स्थानों की जानकारी देते, तरह-तरह की सुंदर बातों से उनका मन बहलाते, जब-जब सीता जी ने उन्हें कोई उपदेश दिया, या उनसे अपने मन की कोई भी बात कही, उन्हें पूरे मन से सुना, और जब उन्हें अपने तर्कों से पूरी तरह संतुष्ट कर देते, तभी आगे बढ़ते ...

और इसलिए ही महलों की राजकुमारी (सीताजी) के लिए कठिन वन भी मधुबन बन गया, क्योंकि जहाँ प्रेम, सम्मान, विश्वास और मर्यादा हो, वहाँ जंगल भी आश्रम बन जाता है, और जहाँ अहंकार हो, वहाँ महल भी वनवास बन जाता है.

क्योंकि श्रीराम की दृष्टि में विवाह एक पूजा है, और पत्नी जीवनसाथी है, धर्मसंगिनी है, केवल वासना की पूर्ति और संतानोत्पत्ति का साधन नहीं. श्रीराम का प्रेम केवल शरीर का नहीं, चेतना का संयोग था. पत्नी की इच्छा और भावनाओं का सम्मान करना और उसकी रक्षा करना श्रीराम का पतिधर्म था, उनकी दृष्टि में पत्नी किसी की दासी नहीं, आध्यात्मिक और धर्म यात्रा की सहयात्री है.


सीताजी चाहे साथ रहीं या नहीं, प्रजा ने सीताजी पर चाहे जैसे लांछन लगाए हों, पर श्रीराम ने उनके प्रति एकनिष्ठा बनाए रखी. कभी अपनी किसी परिस्थिति का बहाना बनाकर अपनी एकनिष्ठा नहीं तोड़ी.

वैष्णो जैसी सब प्रकार से गुणी देवी भी उनसे विवाह करना चाहती थीं, पर श्रीराम का प्रेम केवल सीताजी में ही रहा, उन्होंने अपने जीवन में सीताजी का स्थान कभी किसी को नहीं दिया.

आज का स्त्रीनिंदक पुरुष समाज, जो सोशल मीडिया पर "जय श्रीराम" तो लिखता है, पर श्री राम से थोड़ा सा भी कुछ नहीं सीखना चाहता.

आज का समाज उस रावण से पूरी शिक्षा लेता है!

स्त्रियों को मादक शरीर के रूप में देखा रावण ने, अपनी लंबी जुबान से पुरुषों को पकाने वाली पत्नी के रूप में देखा रावण ने, कामवासना को पुरुषों की प्राकृतिक इच्छा बताकर अपने पापों और अपराधों को जायज ठहराया रावण ने, पत्नी को वासना पूर्ति का उद्देश्य और बच्चे पैदा करने की मशीन बनाया रावण ने.

यानी रावण के अनुसार विवाह के बाद स्त्री का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं रह जाता, उसे विवाह के बाद आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने का भी कोई अधिकार नहीं रह जाता, उसका एकमात्र उद्देश्य केवल थके हुए पुरुष की इच्छा पूर्ति और उसका घर चलाना ही रह जाता है. और सारे पाप स्वयं करके अंत में दोष दे देता है कि एक स्त्री के कारण युद्ध हुआ.

वहीं, श्रीराम अपनी तपस्या और और अपने कर्मों में विश्वास रखते हैं, केवल दूसरों को दोष देने में नहीं. श्रीराम का तो पूरा जीवन स्त्रियों से प्रभावित या संचालित रहा, लेकिन उन्होंने अपनी किसी भी परिस्थिति के लिए स्त्रियों को या नारी जाति को दोष नहीं दिया, उन्होंने स्त्रियों को अपनी पीड़ा का कारण नहीं कहा, क्योंकि वे पुरुष हैं, वीर पुरुष हैं, क्योंकि वे खुद में ही सही रहने में विश्वास रखते हैं, वे अपने चरित्र की शुद्धता के लिए स्त्रियों पर निर्भर नहीं हैं कि "तुम भी सही रहो, तभी मैं भी सही रह पाऊंगा,".

इसीलिए श्रीराम पुरुषोत्तम हैं.

श्रीराम के अनुसार, सच्चा पुरुष वह नहीं जो स्त्रियों को दोष देता फिरे, बल्कि वह जो स्वयं को ही अनुशासित रखे और स्वयं ही मर्यादा का पालन करे. स्त्री का सम्मान करना पुरुषार्थ है, और उसका अपमान करना ही रावणत्व.

श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि
"मैं शस्त्रधारियों में राम हूँ।"

क्योंकि वास्तविक क्षत्रिय धर्म क्या है, शस्त्रों का वास्तविक प्रयोग क्या है, शस्त्र न्याय की रक्षा के लिए होते हैं, संरक्षण के लिए होते हैं, अन्याय, अत्याचार और विनाश के लिए नहीं, शस्त्रों का कार्य निरपराध प्राणियों को काटकर हिंसा करना नहीं, बल्कि हिंसकों का वध कर समाज को हिंसा से बचाकर धर्म की रक्षा करना होता है.... यह सब श्रीराम ने ही विश्व को सिखाया.

पर आज के समाज ने श्रीराम को केवल नारे में बदल दिया,
और रावण को व्यवहार में उतार लिया.

साभार : Aditi Singhal 

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