Nasadiya Suktam in Vedas (Universe Origin) : नासदीय सूक्त (ब्रह्मांड की उत्पत्ति)

Nasdiya Sukt in Rig Veda (With Hindi Arth) : नासदीय सूक्त क्या ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में बताता है?


ऋग्वेद के १०वें मण्डल के १२९वें सूक्त के १ से ७ तक के मन्त्र 'नासदीय सूक्त' (Nasadiya Sukt) के नाम से सुविदित हैं। यह ऋग्वेद का सबसे गूढ़, दार्शनिक और रहस्यमयी सूक्तों में से एक है, जिसे आधुनिक युग के दार्शनिक वैदिक कॉस्मोलॉजी (Vedic Cosmology) का आरम्भिक बीज भी मानते हैं। यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर वैदिक चिंतन का सबसे रहस्यमय और दार्शनिक रूप है। यह सूक्त न केवल सृष्टि के आरंभिक क्षणों की बात करता है, बल्कि यह भी पूछता है कि क्या कोई वास्तव में जानता है कि यह सब कैसे हुआ?

नासदीय सूक्त में सृष्टि के मूलतत्त्व, गूढ़ रहस्य का वर्णन किया गया है। सृष्टि-रचना-जैसा महान् गम्भीर विषय ऋषि के चिन्तन में किस प्रकार प्रस्फुटित होता है, यह नासदीय सूक्त में देखने को मिलता है। गहन भावाकाश में ऋषि की मेधा किस प्रकार अबाध विचरण करती है, यह नासदीय सूक्त में उत्तम प्रकार से प्रदर्शित हुआ है। सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अत्यन्त सूक्ष्मता से विचार किया गया है। इसीलिये यह सूक्त 'सृष्टिसूक्त' अथवा 'सृष्ट्युत्पत्तिसूक्त' के नाम से भी जाना जाता है।

नासदीय सूक्त में कुल सात मन्त्र हैं। यह सूक्त उस समय की बात करता है जब कुछ भी नहीं था, न धरती, न आकाश, न समय, न दिशा। केवल एक अज्ञात अस्तित्व था, जो न देखा जा सकता था, न समझा जा सकता था। फिर कैसे यह सब बना? और किसने बनाया? इसी का चिंतन इन सात मंत्रों में है। 

सूक्त में ऋषि सर्वप्रथम कहते हैं कि सृष्टि के पूर्व प्रलयावस्थामें न तो (नामरूपविहीन) असत् था और न उस अवस्था में (नामरूपात्मक) सत् ही अस्तित्व में था। उस समय न तो अन्तरिक्ष था न कोई लोक था और न व्योम था। न कोई आवश्यक तत्त्व था अथवा न भोक्ता भोग्य की सत्ता थी। उस समय जल-तत्त्व का भी अस्तित्व नहीं था।

उस अवस्था में न तो मृत्यु थी और न अमरत्व था। न रात थी और न दिवस था। सृष्टि का अभिव्यञ्जक कोई भी चिह्न उस समय नहीं था। केवल एक तत्त्व था, जो बिना वायु के भी अपनी ऊर्जा से श्वास ले रहा था और बस उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था-

आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास।। (ऋक्० १०।१२९। २)

सृष्टि से पूर्व प्रलयावस्था में तम ही तम से आच्छन्न था अर्थात् सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार था। उस अवस्था में नाम-रूपादि विशेषताओं से परे कोई एक दुर्जेय तत्त्व था, जो सृष्टि-सर्जना के संकल्प की महिमा से स्वयं आविर्भूत हुआ। सृष्टि से पूर्व की अवस्था में उस एकाकी के मन में सृजन का भाव उत्पन्न हुआ। उसी की परिणति सृष्टि के जड़-चेतनरूप असंख्य आकारों में हुई। यही सृष्टि-तन्तु का प्रसार था। सृष्टि का विस्तार था।

ऋषि कहते हैं कि सृष्टि के पूर्व प्रलयावस्था में जब नाम रूपात्मक सत्ता ही नहीं थी, तब यथार्थरूप में कौन जानता है कि विविधस्वरूपा यह सृष्टि कहाँ से और किससे उत्पन्न हुई? देवता इस रहस्य को नहीं बतला सकते, क्योंकि देवता भी तो सृष्टि-रचना के अनन्तर ही अस्तित्व में आये थे।

अन्त में ऋषि स्वयं से प्रश्न करते हैं कि “यह सब किससे हुआ? कैसे हुआ? कौन जानता है?” क्योंकि देवता भी तो बाद में आए, अतः देवता भी नहीं जानते। जब सृष्टि ही नहीं थी, तो कोई देखने वाला भी नहीं था! इसलिए यह कहना असंभव है कि सृष्टि कब और कैसे शुरू हुई। और अंत में ऋषि कहते हैं कि जिस परम सत्ता ने यह सृष्टि बनाई, वह भी शायद नहीं जानता कि यह कैसे हुई, क्योंकि सृष्टि शायद अपने आप उस परम सत्ता के भीतर से स्वतः प्रकट हो गई। यानी यह सूक्त कहता है कि सृष्टि का रहस्य इतना गहरा है कि ज्ञान की सीमा वहाँ जाकर स्वयं रुक जाती है।

ब्रह्मांड के पहले की स्थिति ऐसी थी जहाँ कुछ भी होना या न होना नहीं कहा जा सकता। शायद वह परम सत्ता जानता है जिसने यह सब रचा, या शायद वह भी नहीं जानता, क्योंकि जब कोई ‘दूसरा’ था ही नहीं, तो ‘जानना’ भी किसने किसे? जब कोई जानने वाला ही नहीं था, तो जानना भी असंभव था। यह वाक्य अज्ञान नहीं, बल्कि पूर्ण ज्ञान का मौन है। यह वेद का सबसे विनम्र और सबसे ऊँचा वाक्य है। यह कहता है कि जहाँ जानने वाला और जानने की वस्तु, दोनों लुप्त हो जाते हैं, वहीं परम सत्य है।

ऋग्वेद 10.129

ऋषि : प्रजापति परमेष्ठी

देवता : भाववृतम् (सृष्टि का भाव)

छन्द : त्रिष्टुप्

नासदीय सूक्त के द्रष्टा ऋषि प्रजापति परमेष्ठी, देवता भाववृतम् तथा छन्द त्रिष्टुप् है। इस सूक्त में ऋषि ने बताया है कि सृष्टि का निर्माण कब, कहाँ और किससे हुआ। यह बड़ा ही रहस्यपूर्ण और देवताओं के लिये भी अगम्य है। 

सृष्टि के प्रारम्भ में द्वन्द्वात्मकता-विहीन सर्वत्र एक ही तत्त्व व्याप्त था। इसके बाद सलिल ने चतुर्दिक् इसे घेर लिया और सृष्टि-निर्माण की प्रक्रिया हुई। सृष्टि का निर्माण इसी 'मन के रेत' से होना था। सूक्तद्रष्टा ऋषि ने अपने हृदयाकाश में देखा कि सत् का सम्बन्ध असत् से है। यही सृष्टि-निर्माण की कड़ी 'सोऽकामयत्', 'तदैक्षत' है। इसी के एक अंश 'रेतोधा' और दूसरे अंश 'महिमा' में परस्पर आकर्षण हुआ। इसके बाद स्वाभाविक सृष्टि सुविदित ही है'।

नासदीय-सूक्त (Nasadiya Suktam in Hindi)

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।

किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥१॥

प्रलयकाल में न सत् था और न असत् था। उस समय न लोक था और आकाश से दूर जो कुछ है, वह भी नहीं था। उस समय सबका आवरण क्या था? कहाँ किसका आश्रय था? अगाध और गम्भीर जल क्या था? अर्थात् यह सब अनिश्चित ही था।

न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।

आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास॥२॥

उस समय न मृत्यु थी, न अमृत था। सूर्य और चन्द्रमा के अभाव में रात और दिन भी नहीं थे। वायु से रहित उस दशा में एक अकेला ब्रह्म ही अपनी शक्ति के साथ अनुप्राणित हो रहा था, उससे परे या भिन्न कोई और वस्तु नहीं थी।

तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्।

तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥३॥ 

सृष्टि से पूर्व प्रलयकाल में अन्धकार व्याप्त था, सब कुछ अन्धकार से आच्छादित था। अज्ञातावस्था में यह सब जल-ही-जल था और जो था वह चारों ओर होने वाले सत्-असत्-भाव से आच्छादित था। सब अविद्या से आच्छादित तम से एकाकार था और वह एक ब्रह्म तप के प्रभाव से हुआ।

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।

सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥४॥ 

सृष्टि के पहले ईश्वर के मन में सृष्टि की रचना का संकल्प हुआ, इच्छा पैदा हुई; क्योंकि पुरानी कर्मराशि का संचय जो बीजरूप में था, सृष्टि का उपादान कारण भूत हुआ। यह बीजरूपी सत् पदार्थ ब्रह्मरूपी असत् से पैदा हुआ।

तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्।

रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात्॥५॥

सूर्य की किरणों के समान सृष्टि-बीज को धारण करने वाले पुरुष (भोक्ता) हुए और भोग्य वस्तुएँ उत्पन्न हुईं। इन भोक्ता और भोग्य की किरणें ऊपर-नीचे, आड़ी-तिरछी फैलीं। इनमें चारों तरफ भोग्यशक्ति निकृष्ट थी और भोक्तृशक्ति उत्कृष्ट थी।

को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।

अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव॥६॥ 

यह सृष्टि किस विधि से और किस उपादान से प्रकट हुई? यह कौन जानता है? कौन बताये ? किसकी दृष्टि वहाँ पहुँच सकती है? क्योंकि सभी इस सृष्टि के बाद ही उत्पन्न हुए हैं, इसलिये यह सृष्टि किससे उत्पन्न हुई? यह कौन जानता है?

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।

यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद॥७॥

इस सृष्टि का अतिशय विस्तार जिससे पैदा हुआ, वह इसे धारण किये है, रखे है या बिना किसी आधार के ही है। हे विद्वन्! यह सब कुछ वही जानता है, जो परम आकाश में रहने वाला इस सृष्टि का नियन्ता है या शायद परमाकाश में स्थित वह भी नहीं जानता?

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नासदीय सूक्त के तीन भाग हैं-

प्रथम भाग में सृष्टि के पूर्व की स्थिति का वर्णन है। उस अवस्था में सत्-असत्, मृत्यु-अमरत्व अथवा रात्रि दिवस कुछ भी नहीं था। न अन्तरिक्ष था, न आकाश था, न कोई लोक था, न जल था। न कोई भोग्य था, न भोक्ता था। सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार था। उस समय तो बस, केवल एक तत्त्व का ही अस्तित्व था, जो वायु के बिना भी श्वास ले रहा था।

द्वितीय भाग में कहा गया है कि जो नाम-रूपादि विहीन एकमात्र सत्ता थी, उसी की महिमा से संसाररूपी कार्य-प्रपञ्च प्रादुर्भूत हुआ। इस परम सत्ता में सिसृक्षा भाव उत्पन्न हुआ और तब चर-अचर रूप निखिल सृष्टि ने आकार ग्रहण किया।

तृतीय भाग में सृष्टि की दुर्जेयता का निरूपण किया गया है। समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसा कोई भी नहीं है, जो यह कह सके कि यह सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई? सामर्थ्यवान् देवता भी नहीं कह सकते, क्योंकि वे भी तो सृष्टि-रचना के बाद ही अस्तित्व में आये थे। संसार-सृष्टि के परम गूढ रहस्य को यदि कोई जानते हैं तो केवल वे जो इस समस्त सृष्टिके अध्यक्ष हैं, अधिष्ठाता हैं। उनके अतिरिक्त इस गूढ तत्त्व को कोई नहीं जानता।

यहाँ भौतिक आकाश (space) की बात नहीं की गई है। यह चैतन्य का सर्वोच्च आकाश है, जहाँ सृष्टि का कारण भी लीन है, और परिणाम भी। भौतिक आकाश पाँचवा तत्व है (महाभूत), सृष्टि के बाद का। परम व्योम उससे भी सूक्ष्म, वह क्षेत्र है जहाँ ब्रह्मचेतना अनंत रूप में स्थित है। इसलिए परमात्मा आकाश में रहता है, यह कहना भौतिक अर्थ में गलत है। बल्कि आकाश परमात्मा में रहता है।

"शायद वह भी नहीं जानता", यह कोई संशय या नास्तिकता नहीं है। यह ऋषि की विनम्रता है, उस अवस्था की जब चेतना ब्रह्मांड के रहस्य के इतने गहरे स्तर तक पहुँच जाती है कि वहाँ ज्ञाता और ज्ञेय (जानने वाला और जिसे जाना जा रहा है), दोनों का भेद मिटने लगता है। जहाँ जानने और न जानने का भेद मिट जाता है, वहीं ब्रह्म है। यह वह बिंदु है जहाँ ज्ञान भी सीमित होकर मौन हो जाता है। यह अज्ञान नहीं, बल्कि पूर्ण ज्ञान का मौन है।

नासदीय सूक्त कहता है कि सृष्टि से पहले कुछ नहीं था, न अंधकार, न प्रकाश, बस एक मौन चेतना। उस चेतना में स्वयं को जानने की इच्छा उठी, यही पहला स्पंदन था। इच्छा से विचार बना, विचार से ऊर्जा, ऊर्जा से रूप। यही रूप बाद में ब्रह्मांड बन गया। लेकिन जब हम पूछते हैं कि कैसे बना, क्यों बना? तो ऋषि कहते हैं, शायद वह 'कोई' नहीं था, क्योंकि उस समय शायद 'किसी' का अस्तित्व ही नहीं था। और जब कोई जानने वाला ही नहीं था, तो 'जानना' भी असंभव था।

नासदीय सूक्त हमें यह सिखाता है कि सृष्टि का रहस्य केवल तर्क से नहीं जाना जा सकता। हर बार वहाँ एक बिंदु ऐसा आता है जहाँ ज्ञान मौन हो जाता है। यह सूक्त न केवल सृष्टि की उत्पत्ति की बात करता है, बल्कि यह भी बताता है कि जानना स्वयं एक सीमित प्रक्रिया है, और परम सत्य उससे परे है।

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