Indra Suktam Sanskrit Rigveda : ऋग्वेद में इन्द्र सूक्त (संस्कृत और हिंदी)
इन्द्र सूक्त ऋग्वेद का एक वीर रस से ओत-प्रोत स्तवन है, जिसमें इन्द्र की युद्धशक्ति, तेजस्विता, और देवसेनाओं के नेतृत्व की महिमा का वर्णन किया गया है। यह सूक्त केवल इन्द्र की स्तुति नहीं, बल्कि एक प्रकार का युद्ध उद्घोष है। इसमें दैवीय शक्ति और मानव वीरता का समन्वय है। कवच, बाण, रथ, सेना जैसे प्रतीकों के माध्यम से धार्मिक और सैन्य शक्ति का आह्वान किया गया है।
इन्द्र-सूक्त को समझने का अर्थ केवल देवता इन्द्र की प्रशंसा जानना नहीं है, बल्कि यह जानना है कि वेद किस अन्तःशक्ति की बात कर रहे हैं। वेदों में इन्द्र कोई केवल बिजली के देवता या वर्षा के देव नहीं हैं। वे मनुष्य की वह चेतन शक्ति हैं जो असुरता (अंधकार, अविद्या, भय, आलस्य, क्रोध, अहंकार, वासना, दुर्बलता) पर विजय पाती है।
संस्कृत शब्द इन्द्र का मूल धातु है इन्द्, यानी शक्ति, प्रभा, तेज, ज्ञान, स्वामीत्व। इसलिए इन्द्र का अर्थ है, जो इन्द्रिय-शक्तियों का स्वामी है, जो प्रकाश और सामर्थ्य का स्रोत है, जो भीतर के अंधकार को जीत लेता है।
इन्द्र-सूक्त को ऋग्वेद (१०.१०३) में अप्रतिरथ सूक्त कहा गया है। बाह्य अर्थ में यह एक युद्ध-सूक्त है, यानी जब आर्यजन शत्रु या असुर-सेना से लड़ने जा रहे हों, तब वे इन्द्र को पुकारते हैं कि
"हे इन्द्र! आप हमारी सेना की रक्षा करो, हमें बल दो, आप ही हमारे रथों का रक्षक बनो।"
इसमें रथ, बाण, वज्र, मरुत, वरुण, बृहस्पति, सोम आदि सबका आह्वान है। यह उस काल की दैव-सेनाओं का सामूहिक घोष था, एक प्रकार का Vedic War Hymn, जो केवल शारीरिक युद्ध के लिए नहीं, बल्कि धैर्य, साहस और मनोबल जगाने के लिए गाया जाता था।
वेदों का हर मंत्र दो तल पर कार्य करता है :
1. बाह्य (भौतिक) : देव, रथ, युद्ध, विजय।
2. अंतः (मानसिक/आध्यात्मिक) : चेतना की लड़ाई, आत्म-विजय।
इन्द्र-सूक्त का एक अर्थ है, मनुष्य के भीतर चल रही असुरता और देवत्व की लड़ाई। असुर यानी आलस्य, भय, वासना, मोह, क्रोध, अहंकार इत्यादि। इन्द्र यानी जागरूकता, चेतना, पराक्रम, विवेक इत्यादि। जब मनुष्य साधना में अपने ही विकारों से जूझता है, तब यह सूक्त उसके भीतर के इन्द्र को जागृत करता है। इसलिए ऋषि कहते हैं कि
हे इन्द्र! हमारी सेना की रक्षा करो (हे आत्मबल! मेरे विचारों और इन्द्रियों की रक्षा करो)। शत्रुओं को नष्ट कर दो (आलस्य, अज्ञान, भय, वासना, क्रोध, अहंकार और लोभ को मिटा दो)। हमारे रथ विजयी हों (हमारी जीवन-यात्रा धर्ममय और सफल हो)।
इस प्रकार यह सूक्त केवल बाह्य युद्ध नहीं, अंतर्मन के युध्द की साधना है। आत्म-शक्ति के जागरण का घोष है। प्रत्येक पंक्ति में प्रेरणा, साहस और विजयी मानसिकता का सूत्र है। इसलिए इन्द्र-सूक्त केवल धार्मिक पाठ नहीं, बल्कि Consciousness Empowerment Mantra है। इन्द्र-सूक्त हमें सिखाता है कि जीवन के हर युद्ध में पहले अपने भीतर के शत्रुओं को हराओ। जब चेतना का इन्द्र जागता है, तो बाह्य विजय स्वतः आती है। इन्द्र-सूक्त का गायन या चिंतन मनोबल, आत्मविश्वास, और रक्षण शक्ति को जागृत करता है।
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ऋषि : अप्रतिरथ
देवता : इन्द्र
छन्द : त्रिष्टुप्
प्रसिद्ध नाम : अप्रतिरथ सूक्त।
इन्द्र सूक्त युद्ध-उच्चारण, देव-रथ और इन्द्र के वीरत्व व असुरविनाशक स्वरूप का महाकाव्यात्मक वर्णन है। इस सूक्त में इन्द्र को वज्रहस्त, तेजस्वी, अजय, सेनाप्रधान तथा वर्षा-सर्जक देव के रूप में चित्रित किया गया है। सूक्त का उद्देश्य युद्ध के समय इन्द्र से विजय, रथ-रक्षकता और शत्रु विनाश की कामना करना है। प्रतीकात्मकरूप से इन्द्र अहं-मनोधैर्य, वरुण नियम/धर्म, सोम ब्रह्मज्ञान और मरुत्-शक्ति का संकेत हैं, जो मिलकर मनुष्य के संकट का नाश करते हैं।
इस सूक्त के ऋषि अप्रतिरथ, देवता इन्द्र तथा आर्षी त्रिष्टुप् छन्द है। इन्द्र वेद के प्रमुख देवता हैं। इन्द्र के विषय में अन्य देवताओं की अपेक्षा अधिक कथाएँ प्रचलित हैं। इनका समस्त स्वरूप स्वर्णिम तथा अरुण है। ये सर्वाधिक सुन्दर रूपों को धारण करते हैं तथा सूर्य की अरुण-आभा को धारण करते हैं, अतः इन्हें 'हिरण्य' कहा जाता है।
इन्द्र सूक्त (Indra Suktam)
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्।
संक्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः॥१॥
वेगगामी, वज्रतीक्ष्णकारी, वर्षण की उपमा वाले, भयंकर, मेघतुल्य वृष्टि करने वाले, मानवों के मोक्षकर्ता, निरन्तर गर्जनायुक्त, अपलक, अद्वितीय वीर इन्द्र ने शत्रुओं की सैकड़ों सेनाओं को एक साथ जीत लिया है।
संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना।
तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा॥२॥
हे योद्धाओं! गर्जनकारी, अपलक, जयशील, युद्धरत, अपराजेय, प्रतापी, हाथ में बाण सहित, कामनाओं की वृष्टि करने वाले इन्द्र की कृपा से शत्रु को जीतो और उसका संहार करो।
स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी संस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन।
संसृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता॥३॥
वह संयमी, युद्धार्थ उपस्थितों को जीतने वाला, शत्रुसमूहों से युद्ध करने वाला, सोमपान करने वाला, बाहुबल से युक्त, कठोर धनुष वाला इन्द्र बाणधारी एवं तूणीरधारी शत्रुओं से भिड़ जाता है और अपने फेंके गये बाणों से उन्हें परास्त करता है।
बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ अपबाधमानः।
प्रभञ्जन्त्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम् ॥४॥
हे व्याकरणकर्ता! तुम रथ से संचरण करने वाले, राक्षस-विनाशक, शत्रुपीड़ाकारक, उनकी सेनाओं के विध्वंसकर्ता एवं युद्ध द्वारा हिंसाकारियों के जेता हो। हमारे रथों के रक्षक बनो।
बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः।
अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्॥५॥
हे दूसरों के बल को जानने वाले, पुरातन शासक, शूर, साहसी, अन्नवान्, उग्र, वीरों से युक्त, परिचरों से युक्त, सहज ओजस्वी, स्तुति के ज्ञाता एवं शत्रुओं के तिरस्कर्ता इन्द्र! तुम अपने जयशील रथ पर आरूढ़ हो जाओ।
गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा।
इमं सजाता अनु वीरयध्वमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्॥६॥
हे तुल्यजन्मा इन्द्रसखा देवों। इस असुर संहारक, वेदज्ञ, वज्रबाहु, रणजेता, बलपूर्वक शत्रु-संहर्ता इन्द्र के अनुरूप हो। तुमलोग भी शौर्य दिखाओ और इसकी ओर से तुम भी आक्रमण करो।
अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः।
दुश्च्यवनः पृतनाषाळयुध्योऽस्माकं सेना अवतु प्र युत्सु॥७॥
शत्रुओं को निर्दयतापूर्वक, विविध क्रोधयुक्त हो सहसा मर्दित करने वाला और अडिग होकर उनके आक्रमणों को झेलने वाला वीर इन्द्र हमारी सेना की सर्वथा रक्षा करे।
इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः।
देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्॥८॥
शत्रुओं का मानमर्दन करने वाली, विजयोन्मुखी-इन देवसेनाओं का नेता वेदज्ञ इन्द्र है। विष्णु इस के दाहिने ओर से आयें, सोम सामने से आयें तथा गण देवता आगे-आगे चलें।
इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुतां शर्ध उग्रम्।
महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्॥९॥
वर्षणशील इन्द्र की, राजा वरुण की, महामनस्वी आदित्यों और मरुतों की तथा भुवनों को दबाने वाले विजयी देवताओं की सेना का उग्र घोष हुआ।
उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्वनां मामकानां मनांसि।
उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषाः॥१०॥
हे इन्द्र! आयुधों को उठाकर चमका दो। हमारे जीवों के मन प्रसन्न कर दो। हे इन्द्र! घोड़ों की गति तीव्र कर दो और जयशील रथों के घोष तुमुल हों।
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु।
अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु॥११॥
हमारी ध्वजाओं के शत्रु ध्वजाओं से जा मिलने पर इन्द्र हमारी रक्षा करें। हमारे बाण विजयी हों। हमारे वीर शत्रुवीरों से उत्कृष्ट हों तथा युद्धों में देवता हमारी रक्षा करें।
अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्यप्वे परेहि।
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्॥१२॥
हे व्याधि देवि! इन शत्रुओं के चित्तों को मोहित करती हुई पृथक् हो जाओ। चारों ओर से अन्यान्य शत्रुओं को भी समेटती हुई पृथक् हो जाओ। उनके हृदयों को शोकाकुल कर दो और वे हमारे शत्रु तामस अहंकार से ग्रस्त हो जायें।
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते:।
गच्छामित्रान् प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः॥१३॥
ब्रह्ममन्त्र से अभिमन्त्रित हे हमारे बाण-ब्रह्मास्त्रों! हमारे द्वारा छोड़े जाने पर तुम शत्रुओं पर जा पड़ो। उनके पास जाओ और उनके शरीरों में प्रविष्ट हो जाओ तथा उनमें से किसी को भी न छोड़ो।
प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्मयच्छतु।
उग्रा वः सन्तु बाहवोऽनाधृष्या यथाऽसथ॥१४॥
हे हमारे नरों! जाओ और विजय करो। इन्द्र तुम्हें विजय सुख दें। तुम्हारी भुजाएँ उग्र हों, जिससे तुम अघर्षित होकर टिके रहो।
असौ या सेना मरुतः परेषामभ्यैति न ओजसा स्पर्धमाना।
तां गूहत तमसाऽपव्रतेन यथाऽमी अन्यो अन्यं न जानन्॥१५॥
हे मरुद्रण! यह जो शत्रुसेना बल में हमसे स्पर्धा करती हुई हमारी ओर चली आ रही है, उसे कर्महीनता के अन्धकार से आच्छादित कर दो, ताकि वे आपस में ही एक-दूसरे को न जानते हुए लड़ मरें।
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव।
तन्न इन्द्रो बृहस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु॥१६॥
शिखाहीन कुमारों की भाँति शत्रुप्रेरित बाण जहाँ-जहाँ पड़ें, वहाँ-वहाँ इन्द्र, बृहस्पति और अदिति हमारा कल्याण करें। विश्वसंहारक हमारा कल्याण करें।
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजाऽमृतेनानुवस्ताम्।
उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वाऽनु देवा मदन्तु॥१७॥
हे यजमान्। मैं तुम्हारे मर्मस्थानों को कवच से ढकता हूँ, ब्राह्मणों के राजा सोम तुमको मृत्यु के मुख से बचाने वाले कवच से आच्छादित करें, वरुण तुम्हारे कवच को उत्कृष्ट बनायें और अन्य सभी देवता विजय की ओर अग्रसर हुए तुम्हारा उत्साहवर्धन करें।
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देवराज इंद्र का वास्तविक चरित्र

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