ऋग्वेद का हिरण्यगर्भ-सूक्त (Hiranyagarbha Suktam in Rigveda)

भारतीय संस्कृति में वेदों (Vedas) का स्थान केवल ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और चेतना के स्रोत के रूप में है। ऋषियों के दिव्य चिंतन से उद्भूत यह वाङ्मय न केवल भारत, बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति की प्राचीनतम धरोहर है। वेद भारतीय वाङ्मय की अमूल्य निधि हैं। वे मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के प्रातिभ (प्रतिभा से उद्भूत) ज्ञान की अन्यतम उपलब्धि हैं। ऋषियों महर्षियों की अनन्त ज्ञानराशि का दुर्लभ संचय हैं। भारतीय मनीषा के अक्षय भण्डार हैं। वेद केवल भारत के ही नहीं विश्व के, निखिल मानव जाति के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषियों ने अपने गम्भीर चिन्तन-मनन द्वारा जो ज्ञान अर्जित किया, वह हमें वेदों में उपलब्ध होता है।
चारों वेदों में ऋग्वेद का स्थान प्रमुख है। ऋग्वेद के वर्णित सूक्तों में इन्द्र, विष्णु, रुद्र, उषा, पर्जन्य प्रभृति देवताओं की अत्यन्त सुन्दर एवं भावाभिव्यञ्जक प्रार्थनाएँ हैं। वैदिक देवताओं की स्तुतियों के साथ ऋग्वेद में लौकिक एवं धार्मिक विषयों से सम्बद्ध तथा आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अनेक सूक्त हैं। इनमें आध्यात्मिक सूक्त दिव्य ज्ञान से ओतप्रोत हैं। इन्हें दार्शनिक सूक्त के रूप में भी जाना जाता है। ऋग्वेद के दार्शनिक सूक्तों में पुरुषसूक्त (ऋक्०१०।९०), हिरण्यगर्भसूक्त (ऋ० १०।१२१), वाक्सूक्त (ऋ० १०। १२५) तथा नासदीय सूक्त (ऋक्० १०। १२९) अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
ऋग्वेद के ये सूक्त अपनी दार्शनिक गम्भीरता एवं प्रातिभ अनुभूति के कारण विशेष महिमा-मण्डित हैं। सूक्तों में ऋषियों की ज्ञान गम्भीरता तथा सर्वथा अभिनव कल्पना परिलक्षित होती है। समस्त दार्शनिक सूक्तों के बीच नासदीय सूक्त का अपना विशेष महत्व है। प्राञ्जल (स्वच्छ, निर्मल और स्पष्ट) भावों से परिपूर्ण यह सूक्त ऋषि की आध्यात्मिक चिन्तन-धारा का परिचायक है।
हिरण्यगर्भ-सूक्त (Hiranya Garbha Suktam)
ऋग्वेद के १०वें मण्डल के १२१वें सूक्त को 'हिरण्यगर्भ सूक्त' कहा जाता है। इस सूक्त के ऋषि प्रजापतिपुत्र हिरण्यगर्भ, देवता 'क' शब्दाभिधेय प्रजापति एवं छन्द त्रिष्टुप् है। ऋग्वेद में विभिन्न देवताओं के नामों के अन्तर्गत जो एकात्मभावना व्याप्त है, उसी को दार्शनिक शब्दों में सृष्टि उत्पत्ति के प्रसंग में यह सूक्त व्यक्त करता है। इस सूक्त में विविध देवताओं के पीछे एक परम सत्ता की अवधारणा है, जो सबका मूल है।
हिरण्यगर्भ को सृष्टि का आदितत्त्व माना गया है। हिरण्य को अग्रि का रेत कहते हैं। हिरण्यगर्भ अर्थात् सुवर्ण गर्भ सृष्टि के आदि में स्वयं प्रकट होने वाला बृहदाकार-अण्डाकार तत्त्व है। यह सृष्टि का आदि अग्रि तत्त्व माना गया है। महासलिल में प्रकट हुए हिरण्यगर्भ की तीन गतियाँ बतायी गयी हैं-
१- आपः (सलिल) में उर्मियों के उत्पन्न होने से समेषण हुआ।
२- आगे बढ़ने की क्रिया (प्रसर्पण) हुई।
३- उसने तैरते हुए चारों ओर बढ़ने (परिप्लवन) की क्रिया की।
इसके बाद हिरण्यगर्भ दो भागों में विभक्त होकर पृथ्वी और द्युलोक बना-
संवत्सरे हि प्रजापतिरजायत।
स इदं हिरण्यमाण्डं व्यसृजत्।
अतः यह हिरण्यगर्भ ही सृष्टि का मूल है। मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने सृष्टि के आदि में स्थित इसी हिरण्यगर्भ के प्रति जिज्ञासा प्रकट की है जो सृष्टि के पहले विद्यमान था। और अन्त में, प्रजापति को सर्वव्यापक और सर्वनियन्ता मानते हुए प्रार्थना की गई है कि हमारी कामनाएँ पूर्ण हों और हम (दान-निमित्त) प्राप्त धनों के स्वामी हो जायें।
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हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥१॥
सूर्य के समान तेज जिनके भीतर है, वे परमात्मा सृष्टि की उत्पत्ति से पहले वर्तमान थे और वे ही परमात्मा जगत् के एकमात्र स्वामी हैं। वे ही परमात्मा जो इस भूमि और द्युलोक के धारणकर्ता हैं, उन्हीं ईश्वर के लिये हम हविका समर्पण करते हैं।
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।
यस्य छायामृतम् यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥२॥
जिन परमात्मा की महान् सामर्थ्य से ये बर्फ से ढके पर्वत बने हैं, जिनकी शक्ति से ये विशाल समुद्र निर्मित हुए हैं और जिनकी सामर्थ्य से बाहुओं के समान ये दिशाएँ-उपदिशाएँ फैली हुई हैं, उन सुखस्वरूप प्रजा के पालनकर्ता दिव्यगुणों से सबल परमात्मा के लिये हम हवि समर्पण करते हैं।
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव।
य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥३॥
जो परमात्मा अपनी महान् सामर्थ्य से जगत् के समस्त प्राणियों एवं चराचर जगत् के एकमात्र स्वामी हुए तथा जो इन दो पैर वाले मनुष्य, पक्षी और चार पैर वाले जानवरों के भी स्वामी हैं, उन आनन्दस्वरूप परमेश्वर के लिये हम भक्तिपूर्वक हवि अर्पित करते हैं।
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः।
यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥४॥
जो परमात्मा आत्मशक्ति और शारीरिक बल के प्रदाता हैं, जिनकी उत्तम शिक्षाओं का देवगण पालन करते हैं, जिनके आश्रय से मोक्षसुख प्राप्त होता है तथा जिनकी भक्ति और आश्रय न करना मृत्यु के समान है, उन देव को हम हवि अर्पित करते हैं।
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृळहा येन स्वः स्तभितं येन नाकः।
यो अंतरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥५॥
जिन्होंने द्युलोक को तेजस्वी तथा पृथ्वी को कठोर बनाया, जिन्होंने प्रकाश को स्थिर किया, जिन्होंने सुख और आनन्द को प्रदान किया, जो अन्तरिक्ष में लोकों का निर्माण करते हैं, उन आनन्दस्वरूप परमात्मा के लिये हम हवि अर्पित करते हैं। उनके स्थान पर अन्य किसी की पूजा करने योग्य नहीं है।
यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने।
यत्राधि सूर उदतो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम॥६॥
बल से स्थिर होते हुए परंतु वास्तव में चलायमान, गतिमान्, काँपने वाले अथवा तेजस्वी, द्युलोक और पृथ्वीलोक मननशक्ति से जिनको देखते हैं और जिनमें उदित होता हुआ सूर्य विशेषरूप से प्रकाशित होता है, उन आनन्दमय परमात्मा के लिये हम हवि अर्पित करते हैं।
आपो ह यद् बृहतीर्विश्वमायन् गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम्।
ततो देवानाम् समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥७॥
निश्चय ही गर्भ को धारण करके अग्रि को प्रकट करता हुआ अपार जलसमूह जब संसार में प्रकट हुआ, तब उस गर्भ से देवताओं का एक प्राणरूप आत्मा प्रकट हुआ। उस जल से उत्पन्न देव के लिये हम हवि समर्पित करते हैं।
यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद् दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम्।
यो देवेष्वधि देवः एक आसीत कस्मै देवाय हविषा विधेम॥८॥
जिन परमात्मा ने सृष्टि जल का सृजन किया और जिनके द्वारा ही जल में सर्जन शक्ति पैदा हुई तथा सृष्टिरूपी यज्ञ उत्पन्न हुआ अर्थात् यह यज्ञमय सृष्टि उत्पन्न हुई, उन्हीं एकमात्र सर्वनियन्ता को हम हवि द्वारा अपनी अर्चना अर्पित करते हैं।
मा नो हिंसीज्जनिताः यः पृथिव्या यो वा दिवं सत्यधर्मा जजान।
यश्चापश्चन्द्रा बृहतीर्जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम॥९॥
इस पृथ्वी और नभ को उत्पन्न करने वाले परमेश्वर हमें दुःख न दें। जिन परमात्मा ने आह्लादकारी जल को उत्पन्न किया, उन्हीं देव को हम हवि द्वारा अपनी पूजा समर्पित करते हैं।
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव।
यत् कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं सरयाम पतयो रयीणाम्॥१०॥
हे प्रजा के पालनकर्ता ! आप सभी प्राणियों में व्याप्त हैं। दूसरा कोई इनमें व्याप्त नहीं है। अन्य किसी से अपनी कामनाओं के लिये प्रार्थना करना उपयुक्त नहीं है। जिस कामना से हम आहुति प्रदान कर रहे हैं, वह पूरी हो और हम (दान-निमित्त) प्राप्त धनों के स्वामी हो जायें।
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ऋग्वेद का नासदीय सूक्त (१०.१२९) उस समय की बात करता है जब न पृथ्वी थी, न आकाश, न दिन था, न रात, न मृत्यु थी, न अमरता। कुछ भी नहीं था, बस कुछ था जो था, वह था एक चेतना, एक अज्ञात शक्ति। धीरे-धीरे उस चेतना में इच्छा (कामना) जगी कि कुछ बनाऊँ, और यही सृष्टि का आरम्भ था। वह मन बना, फिर उस मन से संकल्प बना, फिर सृष्टि का बीज पड़ा। यह सब इतना रहस्यमय था कि ऋषि स्वयं अंत में कहते हैं कि शायद वह परम सत्ता जो ऊपर है, वही जानती हो, या शायद वह भी नहीं जानती!
ऋषि यहाँ सृष्टिकर्ता की खोज नहीं, सृष्टि के रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं। वेद यहाँ ‘कौन’ नहीं, ‘कैसे’ का प्रश्न उठाता है, और अंत में स्वीकार करता है कि यह रहस्य शायद स्वयं सृष्टिकर्ता के लिए भी अनिर्वचनीय है। यह सूक्त बताता है कि सृष्टि का रहस्य आज भी अनसुलझा है। और शायद यह अनसुलझा ही रहेगा, क्योंकि हर तर्क एक बिंदु पर आकर रुक जाता है। यह सूक्त ईश्वर की रचना की जगह चेतना और संकल्प की रचना की बात करता है।
वहीं, हिरण्यगर्भ सूक्त सृष्टि के दृश्य रूप का आरम्भ बताता है। जब अन्धकार से निकलकर एक चमकदार अण्डाकार सत्ता हिरण्यगर्भ (स्वर्ण गर्भ) प्रकट हुई। यही सृष्टि का प्रथम बीज, प्रथम ब्रह्म, प्रथम चेतन-तत्त्व था। इससे ही पृथ्वी, आकाश, जल, दिशा, सूर्य, अग्नि, सब उत्पन्न हुए। यहां ऋषि कहते हैं कि हिरण्यगर्भ ही सबका स्वामी है। उसी ने पृथ्वी को थामा, दिशाएँ फैलाईं, जलों में गर्भ धारण किया और अग्नि उत्पन्न की।
दोनों सूक्त मिलकर बताते हैं कि सृष्टि शून्य से नहीं बनी, चेतना से बनी है। पहले ‘चेतना’ ने स्वयं को जाना, फिर ‘इच्छा’ जगी, और उसी से ‘हिरण्यगर्भ’, सृष्टि का पहला बीज प्रकट हुआ।
‘हिरण्यगर्भ’ का अर्थ है, सुवर्ण गर्भ या सृष्टि का आदि बीज, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड की संभावनाएँ सुप्त रूप में निहित हैं। यह वही प्रथम चेतन तत्त्व है जो नासदीय सूक्त में वर्णित ‘अज्ञात अद्वैत’ से आगे प्रकट हुआ। यह सूक्त सृष्टि के आरम्भिक क्षण का वैदिक चित्रण है, जब चेतना ने स्वयं को रूप में व्यक्त करना प्रारम्भ किया।
वेद बताते हैं कि सृष्टि जल (आपः) में प्रकट हुए एक प्रकाशमय अण्डाकार तत्त्व से प्रारम्भ हुई, यही हिरण्यगर्भ है। यहाँ जल (आपः) को केवल भौतिक जल नहीं, बल्कि संभावनाओं के ब्रह्मांडीय तरल तत्व के रूप में लिया गया है, वह चेतना का तरल रूप है, जिसमें सृष्टि का बीज पल रहा था। जल को सृष्टि का गर्भ कहा गया है, जिससे यज्ञमय जगत उत्पन्न हुआ।
हर मंत्र के अंत में बार-बार यही पंक्ति आती है,
कस्मै देवाय हविषा विधेम?
हम किस देवता को हवि अर्पित करें?
यह प्रश्न स्वयं में दार्शनिक है, जो जिज्ञासा और श्रद्धा का अद्भुत संगम है। ऋषि यहाँ बाह्य देवताओं की नहीं, बल्कि उस एक अदृश्य, सर्वव्यापी परमात्मा की खोज कर रहे हैं जो सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान था।
इस सूक्त में सृष्टि की क्रमिक अवस्थाओं का बोध मिलता है -
पहले जल (आपः) : संभावनाओं का उद्गम,
फिर ऊर्जा (अग्नि) : गति और रूप का आरम्भ,
फिर चेतना का विभाजन : द्युलोक और पृथ्वी का निर्माण।
यह क्रम वास्तव में भौतिक नहीं, चेतनात्मक प्रक्रिया है। ऋषि ने यहाँ सृष्टि को ईश्वर की आंतरिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा है, अर्थात् जगत् ब्रह्म का विस्तार है (विवर्त, न कि निर्मिति)। अंतिम मंत्र में ऋषि सीधे प्रजापति से संवाद करते हैं,
"हे प्रजापते! आपसे बढ़कर कोई दूसरा नहीं है। आप ही सबके मूल हैं।"
सृष्टि कोई संयोग नहीं, बल्कि चेतना का क्रमिक प्रकट रूप है। हर देवता, हर ऊर्जा, हर जीव; उसी हिरण्यगर्भ के अंग हैं। ईश्वर कोई बाहर का देव नहीं, वह अंतर्यामी चेतना है जो सबमें व्याप्त है। इसलिए यह सूक्त हमें सिखाता है कि सृष्टि का रहस्य बाहर नहीं, अपने भीतर है।
वेदों का यह दृष्टिकोण हमें बताता है कि सृष्टि कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि चेतना की आत्मप्रकाशित प्रक्रिया है। जब हम भीतर की चेतना को पहचानते हैं, तब हम उसी हिरण्यगर्भ को अनुभव करते हैं जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है। यही वेद का ‘अद्वैत’ रहस्य है, एक से अनेक और अनेक से पुनः एक।
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