अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, माता जानकी ने हनुमान जी को यह वरदान कब और कैसे दिया?
अष्ट सिद्धि नव निधि का वरदान हनुमान जी को कब मिला? हनुमान चालीसा की इस चौपाई का असली रहस्य
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भारत करोड़ों लोगों की आस्था का देश है। हनुमान जी में आस्था रखने वाले लोग हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। हम सभी बचपन से सुनते आए हैं कि हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नव निधियों के दाता हैं। हनुमान चालीसा की यह प्रसिद्ध और लोकप्रिय चौपाई
सदियों से भक्तों के बीच श्रद्धा और जिज्ञासा दोनों का विषय रही है। हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) में लिखी यह चौपाई बताती है कि माता जानकी (सीता माता) ने ही हनुमान जी को अष्ट सिद्धि (Eight Powers) और नव निधि (Nine Treasures) प्रदान करने का वरदान दिया था।
लेकिन जब भक्त हनुमान चालीसा की इस लोकप्रिय चौपाई पढ़ते हैं तो उनके मन में अकसर एक बड़ा प्रश्न उठता है कि
- माता जानकी (सीता माता) ने हनुमान जी को अष्ट सिद्धि और नव निधि का वरदान कब दिया था?
- कौन सा ग्रंथ इसे विस्तार से बताता है?
- क्या वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों में यह घटना समान रूप में मिलती है?
- और “अष्ट सिद्धि–नव निधि” वास्तव में हैं क्या?
पहले जानते हैं कि अष्ट सिद्धि और नव निधि क्या हैं?
अष्ट सिद्धि क्या हैं? 8 दिव्य शक्तियाँ (8 Yogic Powers):
अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।1. अणिमा – सूक्ष्म से सूक्ष्म होने की शक्ति
2. महिमा – विराट रूप धारण करने की शक्ति
3. गरिमा – अत्यंत भारी होने की शक्ति
4. लघिमा – अत्यंत हल्के होने की शक्ति
5. प्राप्ति – दूरस्थ वस्तु को तत्काल प्राप्त कर लेना
6. प्राकाम्य – जो चाहे वह सिद्ध कर सकना
7. ईशित्व – प्रभुत्व प्राप्त होना
8. वशित्व – सभी को अपने अधीन कर लेना
नव निधि क्या हैं? 9 दिव्य धन/शक्तियाँ (9 Divine Treasures):
पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, नील, कुन्द, खर्व (या वर्चस)
1. पद्म
2. महापद्म
3. शंख
4. मकर
5. कच्छप
6. मुकुन्द
7. नील
8. कुन्द
9. खर्व (या वर्चस)
नव निधियाँ सिर्फ भौतिक धन नहीं हैं, ये समृद्धि, सिद्धि, सौभाग्य और दिव्य शक्ति का पूर्ण स्वरूप मानी जाती हैं। यह शक्तियाँ और निधियाँ सामान्य मनुष्य के बस की नहीं हैं। इन पर अधिकार वाला ही “दाता” हो सकता है।
माता सीता ने हनुमान जी को यह वरदान कब दिया था?
सीता माता ने हनुमान जी को यह वरदान अशोक वाटिका में दिया था, जब हनुमान जी ने उन्हें श्रीराम की अंगूठी देकर विश्वास दिलाया कि वे वास्तव में रामदूत हैं। उस समय उनके आशीर्वाद का मूल स्वरूप था
- अजर-अमरता
- दिव्य बल
- गुणों की निधि
- राम-कृपा
बाद में तुलसीदास जी ने इसी आशीर्वाद को चालीसा में “अष्ट सिद्धि नव निधि” के रूप में व्यक्त कर दिया।
माता सीता ने हनुमान जी को ये वरदान क्यों दिया?
कारण अत्यंत गहरे और अद्वितीय हैं:
- हनुमान जी रामभक्ति के सर्वोच्च उदाहरण थे। उन्होंने असंभव कार्य कर दिखाया, रावण की लंका में प्रवेश कर उन्होंने अकेले पूरे विश्व को दिखा दिया कि “जहाँ राम हैं, वहाँ हनुमान हैं।”
वे सीता माता के लिए आशा, विश्वास और रक्षा का प्रतीक बने। सीता माता के इस वरदान ने हनुमान जी को शक्ति, साहस, भक्ति, करुणा, और सिद्धि का सर्वोच्च स्वरूप बनाया।
क्या वाल्मीकि रामायण में सीता जी ने हनुमान जी को यह वरदान दिया है?
वास्तव में सीधा “अष्ट सिद्धि नव निधि” शब्दों वाला वरदान वाल्मीकि रामायण में लिखा हुआ नहीं है। लेकिन वाल्मीकि रामायण में, सीता माता हनुमान जी को तीन प्रकार के बड़े वरदान देती हैं:
- सदैव सफल होने का आशीर्वाद, सिद्धि, सफलता और बल की प्राप्ति
- अजेयता (कोई शत्रु पराजित न कर सके), अमरता (Non-Decay, Non-Death), अवध्यता (No enemy can defeat him)
- रघुवंश के प्रति अटल भक्ति।
यहाँ सीता माता “अष्ट सिद्धि” और “नव निधि” शब्दों का सीधा उपयोग नहीं करतीं, लेकिन जो वरदान वे देती हैं, उनका स्वरूप वही दिव्य गुण है जिनका सार बाद में तुलसीदास जी ने चालीसा में शब्द दिया। इन वरदानों ने हनुमान जी को दिव्य शक्तियों के भंडार के रूप में स्थापित किया।
तुलसीदास जी की रामचरितमानस में क्या लिखा है? (Original Base of the Blessing)
जब हनुमान जी माता सीता को राम की अंगूठी देकर उनका दुःख दूर करते हैं, तो माता सीता अत्यंत प्रसन्न होती हैं और उनका आशीर्वाद (वरदान) कुछ इस प्रकार होता है:
सुंदरकांड में सीता माता कहती हैं :
“अजर अमर गुणनिधि सुत होहू।
करहु बहुत रघुनायक छोहू॥
करहु कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निरभर प्रेम मगन हनुमाना॥”
अर्थ: “पुत्र! तुम अजर-अमर रहो, गुणों के भंडार बनो, और प्रभु राम तुम पर सदैव निरंतर अत्यधिक कृपा करते रहें। यहाँ हनुमान जी प्रेम में मग्न हो जाते हैं।”
माता सीता हनुमान जी से कहती हैं कि वे उन्हें कोई प्रतिउपहार (return gift) नहीं दे सकतीं, लेकिन वे उन्हें अतुलनीय बल और भक्ति का वरदान देती हैं।
यहाँ ध्यान दें, माता सीता उन्हें गुणों की अनंत निधि बनने का वरदान देती हैं, अजर-अमर रहने का वरदान देती हैं और रामकृपा की अनंत धारा उनके लिए मांगती हैं। यहाँ सीता जी का वरदान
- अमरत्व
- दिव्य गुण
- अपरिमित शक्ति
- श्रीराम की कृपा
स्पष्ट रूप से दिया गया है। यही बातें आगे चलकर “अष्ट सिद्धि–नव निधि के दाता” का आधार बनती हैं। यही वह मूल ‘भाव’ है, जिसे आगे चलकर तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता” के रूप में व्यक्त किया।
हनुमान चालीसा में “अष्ट सिद्धि नव निधि” क्यों लिखा?
हनुमान चालीसा रामचरितमानस के भाव का संक्षिप्त, सार-रूप है। तुलसीदास जी ने चालीसा में यह बताना चाहा कि
- सीता माता ने हनुमान जी को ऐसा वरदान दिया, जिसके प्रभाव से वे अजर-अमर बने, गुणों के भंडार बने और दिव्य शक्तियों के स्वामी बने। इन दिव्य शक्तियों का सार ही है अष्ट सिद्धि (योग की पराकाष्ठा) और नव निधि (धन, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक)। इसलिए चालीसा में तुलसीदास जी ने परिणाम का स्वरूप इस तरह लिखा :
“अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।”
यह वरदान का शब्दशः विवरण नहीं, बल्कि उस वरदान का फल है।
हनुमान चालीसा में यह चौपाई श्री तुलसीदास जी द्वारा रचित है, और इसका आधार उनका महान ग्रन्थ 'रामचरितमानस' (Ramcharitmanas) है, विशेषकर सुंदरकांड (Sundarkand), जहाँ माता सीता और हनुमान जी का संवाद वर्णित है। यह एक सर्वमान्य और सत्यापित तथ्य है जो भारतीय पौराणिक ग्रन्थों पर आधारित है।
रामचरितमानस में, सुंदरकांड के संवाद में, यह बात सीधे इन शब्दों ('अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता') में नहीं लिखी गई है कि माता सीता ने हनुमान जी को वरदान दिया। तुलसीदास जी ने वरदान को भाव के रूप में प्रकट किया है। तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की रचना करते समय, रामचरितमानस में दिए गए इस "अजर-अमर" और "गुण-निधि" वाले वरदान को परिणाम के रूप में व्यक्त किया।
अजर अमर और गुणों का भण्डार वही व्यक्ति हो सकता है, जिसे अष्ट सिद्धि (शक्तियाँ) और नव निधि (समृद्धि) का स्वामी होने का अधिकार प्राप्त हो। इसलिए, हनुमान चालीसा में इस वरदान के फल को सीधे शब्दों में कहा गया :
"अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता।।"
रामचरितमानस में वरदान का मूल भाव है, और हनुमान चालीसा में उसी भाव का परिणाम या व्याख्या है। यह दोनों ग्रन्थ तुलसीदास जी द्वारा रचित हैं, इसलिए इन्हें एक-दूसरे का पूरक माना जाता है। हनुमान जी को ये सिद्धियाँ और निधियाँ माता सीता के प्रसन्न होकर दिए गए आशीर्वाद से ही मिली हैं। हनुमान चालीसा में वर्णित इस वरदान का उल्लेख और हनुमान जी की शक्तियों का वर्णन कई अन्य धार्मिक ग्रंथों, पुराणों और कथाओं में भी मिलता है।
हनुमान चालीसा स्वयं में एक अद्वितीय और भरोसेमंद स्रोत है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है। उन्होंने रामचरितमानस (जो वरदान का मूल है) और हनुमान चालीसा (जो वरदान का फल है) की रचना की। हनुमान चालीसा स्वयं इस दावे का सबसे भरोसेमंद प्रमाण है, जिसे रामचरितमानस का भाव-आधार प्राप्त है।
क्या यह अन्य किसी ग्रंथ में भी मिलता है?
- पौराणिक कथाएँ (Skanda Purana आदि) हनुमान जी की दिव्य शक्तियों का वर्णन करती हैं
- कई क्षेत्रीय रामायणों में भी हनुमान जी की शक्तियों को सीता माता के आशीर्वाद से जोड़ते हैं
- लेकिन “अष्ट सिद्धि नव निधि” का सटीक संयोजन—
केवल हनुमान चालीसा में ही मिलता है।
- इसका आधार रामचरितमानस के सुंदरकांड में दिया गया “अजर-अमर” और “गुणनिधि” वाला वरदान है।
- “अष्ट सिद्धि नव निधि” शब्द वाल्मीकि रामायण में नहीं लिखे हैं, परंतु इसका भाव वहीं से उत्पन्न हुआ है।
- सीता माता ने हनुमान जी को वरदान अशोक वाटिका में प्रथम भेंट के समय दिया था।
- तुलसीदास जी ने इस वरदान के फल को चालीसा में “अष्ट सिद्धि, नव निधि दान/अधिकार” के रूप में प्रकट किया।
Quick FAQs
Q1. क्या वाल्मीकि रामायण में 'अष्ट सिद्धि नव निधि' शब्द हैं?
Q2. क्या रामचरितमानस में सीता माता यह वरदान देती हैं?
Q3. क्या हनुमान चालीसा तुलसीदास की व्याख्या है?
Q4. वरदान की शुरुआत कहाँ से होती है? कब और क्यों दिया गया वरदान?
Q5. “अष्ट सिद्धि नव निधि” कहाँ लिखा है?
- रामचरितमानस = आशीर्वाद का मूल
- हनुमान चालीसा = उसी आशीर्वाद का फल (Result)
Q6. अन्य प्रमुख संदर्भ
1. श्री मद्भागवत पुराण (Shrimad Bhagwat Puran)
- यह वरदान "अष्ट सिद्धि" और "नव निधि" का मूलतः योगिक और पौराणिक संदर्भ है। श्रीमद्भागवत पुराण और अन्य पुराणों में, इन सिद्धियों को महादेव शिव से जोड़कर देखा जाता है।
- यह माना जाता है कि हनुमान जी चूंकि भगवान शिव के एकादश रुद्र अवतार हैं और उन्हें भगवान शिव से ही ये शक्तियां प्राप्त हुईं, इसलिए जब माता सीता ने उन्हें वरदान दिया, तो उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से इन सिद्धियों पर हनुमान जी के अधिकार को पुष्टि दी।
- नव निधियों का संबंध कुबेर (धन के देवता) से है, जो शिव के सेवक हैं। माता सीता का आशीर्वाद हनुमान जी को इन निधियों पर भी अधिकार प्रदान करता है, ताकि वे अपनी सेवा बिना किसी बाधा के कर सकें।
2. स्कंद पुराण (Skanda Purana)
- स्कंद पुराण और विभिन्न उप-पुराणों में भी हनुमान जी की शक्तियों और उनकी अद्वितीय क्षमताओं का उल्लेख मिलता है, जो उनकी 'अष्ट सिद्धि' और 'नव निधि' के स्वामी होने की स्थिति को दर्शाता है। इन ग्रंथों में उनके महान कार्यों का वर्णन है, जो इन शक्तियों के बिना संभव नहीं थे।
3. अन्य राम कथाएं (Regional Ramayanas)
- तुलसीदास की रामचरितमानस के अलावा, विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित राम कथाओं (जैसे कि कंब रामायण, जो एक प्राचीन तमिल संस्करण है) में भी माता सीता द्वारा हनुमान जी को दिए गए आशीर्वाद और उनकी महानता का विस्तृत वर्णन मिलता है। हालांकि, शब्दों का प्रयोग भिन्न हो सकता है, लेकिन 'शक्तिदाता' के रूप में माता सीता की भूमिका सर्वमान्य है।
- वाल्मीकि रामायण - सुंदरकांड संवाद
- रामचरितमानस - सुंदरकांड
- तुलसीदास कृत हनुमान चालीसा
- प्रचलित पौराणिक व्याख्याएँ
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