हनुमान चालीसा का पाठ और उसका महत्व (Shri Hanuman Chalisa Path & Importance)

श्री हनुमान चालीसा का पाठ और उसका महत्व (Shri Hanuman Chalisa Path & Importance)

Shri Ram Sita and Hanuman ji

हनुमान जी (Hanuman ji) इस कलियुग के जागृत देवता हैं। हनुमान जी उन देवताओं में शामिल हैं जो कलियुग में भी अपने भक्तों के लिए धरती पर मौजूद हैं, यानी हनुमान जी का ध्यान करने से इनकी कृपा तुरंत प्राप्त होती है. हनुमान जी पर भगवान श्रीराम की विशेष कृपा है और जो भी सच्चे मन से भगवान राम और हनुमान जी का ध्यान करता है, उसकी परेशानियों का अंत हो जाता है.

हनुमान जी बल, बुद्धि, ज्ञान और भक्ति के अवतार हैं. इस धरती पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें हनुमान जी भी हैं. हनुमानजी भगवान शिवजी के 11वें रुद्रावतार, सबसे अधिक बलवान और बुद्धिमान हैं. वे माता सीता के अत्यधिक प्रिय पुत्र समान हैं. भक्त शिरोमणि श्री हनुमानजी के अनेक नाम हैं- बजरंगबली, मारुति नंदन, केसरीनंदन, अंजनि सुत, पवनपुत्र, संकटमोचक, महावीर, कपीश, शंकर सुवन आदि.

हनुमान जी के नाम और उनका स्वरूप

हनुमानजी का शरीर एक वज्र के समान है, इसलिए इन्हें बजरंगबली कहा जाता है. उनकी माता का नाम अंजना (अंजनी) और उनके पिता वानरराज केसरी हैं. वायु या पवन देवता ने हनुमानजी के पालन-पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और वे उनके गुरु भी हैं, इसलिए वे पवन-पुत्र या मारुति नंदन कहलाए. महावीर हनुमानजी का शरीर अत्यंत बलशाली है. उनके कंधे पर जनेऊ है. वे मस्तक पर स्वर्ण मुकुट और शरीर पर स्वर्ण आभूषण पहने हैं. उनका मुख्य अस्त्र गदा है. हनुमानजी अपने भक्तों के अहंकार का नाश उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

हनुमान चालीसा की महिमा (Hanuman Chalisa Paath ki mahima)

हनुमानजी संकटमोचक हैं, इसलिए जो स्त्री या पुरुष हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) का पाठ करता है, उसके जीवन के संकटों का नाश होता है. कहते हैं कि नित्य सुबह और शाम हनुमान चालीसा का पाठ करने वाले व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और उसे कोई भी बंधक नहीं बना सकता है.

अगर लोग आपकी तरक्की से जलते हों या आपके खिलाफ साजिश रचते हों, यदि आप बीमारियों से परेशान हैं, अगर आप कर्ज की समस्या से परेशान हैं, या जमीन के कानूनी विवादों में फंसे हुए हों या जमीन से जुड़े अन्य विवाद हों, या किसी भी तरह से आपके विरोधी या कोई शत्रु बिना कारण आपको परेशान कर रहे हों, यदि आपको अंधेरे से या भूत-प्रेत से या नकारात्मक शक्तियों से डर लगता हो या मन में किसी भी प्रकार का भय हो, तो आपको हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए. यह आपको ऐसे संकट से मुक्त करेगा.

एक-एक शब्द का बड़ा प्रभाव

हनुमान चालीसा के एक-एक शब्द का इतना प्रभाव है कि अगर पूरे मन से इसे पढ़ा जाए तो जीवन की बाधाएं दूर होने लगती हैं, रास्ते सरल और कार्य सफल होने लगते हैं. 

इसी प्रकार, जो लोग नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, उनके पास किसी भी तरह की कोई नकारात्मक ऊर्जा (निगेटिव एनर्जी) नहीं आती. हनुमान जी का सुरक्षा कवच आपके साथ रहता है.

भूत पिसाच निकट नहिं आवै,

महाबीर जब नाम सुनावै॥

इसके अतिरिक्त, शनिवार को सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करने से शनि भगवान भी आपसे प्रसन्न होने लगते हैं. बस, श्रीराम और जानकीजी के अत्यंत प्रिय पुत्र हनुमान जी की भक्ति करने वालों को एक बात का ध्यान सदैव रखना है कि वे मांस और शराब आदि के सेवन से बिल्कुल दूर रहें. साफ मन वाले भक्तों को हनुमानजी की कृपा निश्चित ही प्राप्त होती है, इसमें कोई संदेह भी नहीं है.

रखें कुछ बातों का ध्यान

एक बात का भी अवश्य ध्यान रखें कि जब भी हनुमान जी की पूजा-आराधना शुरू करें, तब सबसे पहले श्रीराम और माता सीता (Shree Sita Ram) का नाम लें और उनका ध्यान करके ही हनुमान जी की पूजा-आराधना शुरू करें. भक्त शिरोमणि हनुमान जी के सामने उनके स्वामी का गुणगान करने से हनुमानजी की कृपा प्राप्त होती है. जैसे भगवान् शिव जी की भक्ति करने से भगवान् श्री विष्णु जी अपने-आप ही प्रसन्न हो जाते हैं और श्री विष्णुजी की भक्ति करने से भगवान् शिव. श्री विष्णु जी की भक्ति करने वाले के घर माता श्री लक्ष्मीजी निवास करती हैं. भगवान् शिवजी की भक्ति से माता पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न होती हैं.

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भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त और सेवक बजरंगबली हनुमानजी के पावन यश का संक्षिप्त, परंतु अत्यंत प्रभावशाली वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीहनुमान चालीसा में किया है। कलियुग से त्रस्त मनुष्यों के लिए उन्होंने इसमें कल्याण का अद्भुत मार्ग प्रशस्त किया है। केवल चालीस चौपाइयों में तुलसीदास जी ने अपने हृदय के समस्त भक्तिभाव से महावीर पवनपुत्र के अनंत गुणों का गान किया है और उनसे अपने भक्तों के दुःख-विकार हरने की विनम्र प्रार्थना की है।

हनुमान जी राम-शक्ति के वाहक हैं। तुलसीदास जी ने चालीसा की शुरुआत “श्रीगुरु चरन सरोज रज” से की, यानी पहले शरण ली, फिर नाम लिया। जब हम हनुमान जी की स्तुति करते हैं, तो हम वास्तव में राम-तत्व के द्वार खोलते हैं, क्योंकि वे स्वयं रामदूत हैं। इसलिए चालीसा केवल हनुमान जी की प्रशंसा नहीं है, बल्कि रामभक्ति का साधन है, और श्रीराम का अर्थ है जो सबके भीतर रमता है, यानी आपकी चेतना का वह भाग जो भय से परे है। हनुमान जी का स्मरण ऊर्जा का संतुलन करता है, जिसे आज की भाषा में “न्यूरोलॉजिकल हार्मोनी” कहा जा सकता है।

हनुमान चालीसा में हनुमान जी के गुणों का वर्णन है : ज्ञान, बल, विनम्रता, बुद्धि, भक्ति, और सेवा की भावना। जब आप बार-बार उनका नाम लेते हैं या उनकी महिमा सुनते हैं तो मन भय या संकट की तरंगों से हटकर उनके गुणों की तरंगों पर ट्यून हो जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक और ऊर्जात्मक बदलाव है। जैसे डर के समय कोई व्यक्ति अपने साहसी मित्र या व्यक्ति को याद करता है और उसका आत्मबल बढ़ता है, वैसे ही हनुमान चालीसा सुनते या बोलते समय आपका अवचेतन साहस और सुरक्षा की भावना से भरता है।

कुछ मुख्य चौपाइयों पर ध्यान दें :

श्रीगुरु चरन सरोज रज

निज मन मुकुरु सुधारि।

“मैं अपने मन के दर्पण को गुरु की कृपा से स्वच्छ करता हूँ, ताकि राम की महिमा (शुद्ध चेतना) का वर्णन कर सकूँ।”

यानी पाठ शुरू करने से पहले मन की अशुद्धि (अहंकार, संदेह) मिटानी है, क्योंकि मन जब निर्मल होता है, तभी ऊर्जा प्रवाहित होती है। साधना या पाठ से पहले अहंकार का त्याग आवश्यक है, क्योंकि जब मन निर्मल होता है, तभी शक्ति उतरती है। जब मन साफ और पवित्र हो जाता है, तभी भक्त भगवान श्रीराम की पवित्र और निर्मल महिमा का वर्णन कर सकता है।

बुद्धिहीन तनु जानिके,

सुमिरौं पवन कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं,

हरहु कलेस बिकार॥

तुलसीदास जी यहाँ स्वीकार करते हैं कि “मेरा मन दुर्बल है, बुद्धि सीमित है", और तुलसीदास जी प्रार्थना कर रहे हैं कि "हे हनुमान जी! आप मेरे भीतर का साहस, विवेक और स्पष्टता जगाओ।"

यह पंक्ति आत्म-स्वीकार का प्रतीक है। जो व्यक्ति अपने अंदर की कमजोरी स्वीकारता है, अपनी भूल को स्वीकार करता है और सुधार करना चाहता है, वही वास्तविक बल प्राप्त करता है। यह अहंकार-शून्यता की ऊर्जा को सक्रिय करती है।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

राम दूत अतुलित बल धामा। 

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥

हनुमान जी वह चेतना हैं जो ज्ञान (प्रकाश) और गुण (सद्भाव) का सागर है। वो वह आंतरिक अग्नि हैं जो अंधकार मिटाकर प्रकाश फैलाती है। जब आप उनका स्मरण करते हैं, तो आप अपने भीतर के अंधकार और भय को नष्ट करने वाले प्रकाश-तत्व को पुकारते हैं।

हनुमान जी रामदूत हैं, आत्मा के संदेशवाहक हैं। अर्थात् हनुमान वह चेतना हैं जो ईश्वर और जीव के बीच सेतु हैं। हनुमान जी पवनसुत हैं, यानी प्राणशक्ति का रूप हैं। जब प्राण नियंत्रित होता है, भय और अस्थिरता मिटती है। इसलिए हनुमान चालीसा पढ़ने से नर्वस सिस्टम शांत होता है।

कुमति निवार सुमति के संगी॥

हनुमान जी की सबसे बड़ी शक्ति है, कुमति (भ्रम, नकारात्मक सोच) को हटाना। वे मन की कुमति मिटाकर हमें समाधान देखने योग्य बना देते हैं। जब आप हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करते हैं, आपके भीतर की नकारात्मक सोचें नष्ट होती हैं। भ्रम, डर, आत्म-संदेह दूर होने लगते हैं।

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै।

बज्र यानी दृढ़ संकल्प। और ध्वजा यानी विजय का प्रतीक। यह मन की निर्णय-शक्ति को प्रकट करती है। जो व्यक्ति मन में स्थिर रहता है, वही जीवन में अजेय बनता है।

संकर सुवन केसरी नंदन।

तेज प्रताप महा जगबंदन॥

हनुमान जी शिव के अंश हैं, अर्थात् शक्ति और चेतना का संतुलन। उनमें तेज (अग्नि) और प्रेम (जल) दोनों हैं। यही कारण है कि वे संयम और करुणा दोनों के प्रतीक हैं।

बिद्यावान गुनी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥

हनुमान जी ज्ञान और कर्म के बीच संतुलन हैं। वे केवल विद्वान नहीं, बल्कि कार्यशील या कर्मशील भी हैं। यहाँ यह सिखाया गया है कि सच्चा ज्ञान वही है जो सेवा में प्रकट हो।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया

राम लखन सीता मन बसिया॥

हनुमान जी का मन सदा श्रीराम नाम में रमा है। राम प्रतीक हैं, आत्मा के भीतर के प्रकाश का। जब मन ईश्वर में स्थिर होता है, तो बाहरी विकार (लोभ, भय, मोह, अज्ञानता) पास नहीं आते। यह पंक्ति हृदय चक्र (Heart Chakra) को सक्रिय करती है, जहाँ प्रेम और भक्ति की ऊर्जा प्रवाहित होती है।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

जो इसे भाव से पढ़ता है, उसके भीतर ‘सिद्धि’ (स्थिरता और पूर्णता) जागती है। यह अलौकिक सिद्धि नहीं, स्व-नियंत्रण की सिद्धि है।

हनुमान जी का ध्यान करने से और हनुमान चालीसा का पाठ करने से या हनुमान जी के भजन श्रद्धा के साथ सुनने से ध्यान केंद्रित होता है, डर कम होता है, शरीर और मन में कंपन बदलते हैं और भीतर “राम तत्व” का जागरण होता है। और तब हनुमान जी असंभव कार्य को संभव करने की ऊर्जा बन जाते हैं ।

भय किसी स्थिति से नहीं, अज्ञात से होता है। हनुमान जी उस अज्ञात अंधकार में जलती दीपशक्ति हैं। वे रामभक्ति के माध्यम से बताते हैं कि भक्ति का अर्थ है, अपनी छोटी चेतना को एक बड़े, अनंत स्रोत में समर्पित कर देना। जैसे ही यह भाव जगता है, भय स्वतः मिट जाता है, क्योंकि तब अहंकार “मैं अकेला हूँ” नहीं कहता।

संकट बाहर का नहीं, भीतर की अशक्ति का नाम है, और हनुमान चालीसा भीतर के दुर्बल केंद्र को सशक्त करती है। संकट का एक अर्थ है कि जब विचार, वाणी और कर्म असंगत हो जाएं। हनुमान जी उस असंतुलन को ठीक करते हैं। मन, वचन, कर्म तीनों जब एक दिशा में होते हैं, तभी जीवन से संकट मिटता है। यदि मन, वचन और कर्म तीनों से जुड़कर पाठ किया जाए, तो संकट का “बीज” ही जल जाता है। हनुमान जी का भजन सुप्त शक्तियों को जगाता है।

हनुमान चालीसा के छंद जब उच्चारण किए जाते हैं, तो वे भीतर की निम्न आवृत्तियों (भय, संदेह, चिंता) को बदलकर उच्च आवृत्तियों (साहस, स्थिरता, निश्चय) में रूपांतरित कर देते हैं। यही कारण है कि इसे संकटमोचक भी कहा गया है। हनुमान चालीसा का पाठ जादुई चमत्कार नहीं, बल्कि चेतना का विज्ञान भी है। इसका प्रभाव पाठ करने के ढंग और भाव पर भी निर्भर करता है।

किसी भी मंत्र या श्लोक का पाठ या जप सुबह सूर्योदय से पहले (ब्राह्म मुहूर्त) या सूर्यास्त के बाद (संध्या समय), इन दो समयों पर अत्यंत प्रभावकारी होता है। पूर्व दिशा की ओर मुख रखकर बैठें। भूमि या कुश के आसन पर सीधे बैठें। पहले तीन बार गहरी साँस लें और मन को स्थिर करें। (यदि हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं), मन में श्रीराम का नाम लेकर और हनुमान जी का ध्यान करते हुए संकल्प करें :

“हे पवनसुत! मेरे मन के भय, दुर्बलता और अज्ञानता को हर लो; और मुझमें राम नाम की शक्ति और स्थिरता भर दो।”

हनुमान चालीसा प्रार्थना नहीं, स्मरण है। जब आप इसका पाठ करते हैं, तो कल्पना करें कि आप हनुमान जी की शक्ति में बैठे हैं। वो शक्ति जो रामकार्य के लिए जन्मी है, जो हर बाधा पर विजय पाती है, जो अहंकाररहित सेवा और ज्ञान का प्रतीक है। पाठ करते समय भाव अगर केवल डर हटाने का नहीं, बल्कि “मुझमें भी वही निर्भयता जागे” का हो, तब चालीसा चमत्कारी बन जाती है।

रोज एक बार पूरे भाव से पढ़ें। या मंगलवार/शनिवार को पढ़ें। यदि किसी भय या संकट में हों, तो लगातार ११ दिन तक पढ़ें। पढ़ते समय लय रखें, लेकिन जल्दी न करें, हर चौपाई को अनुभव करें। यदि आप हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, या हनुमान जी में श्रृद्धा रखते हैं, या हनुमान जी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो अपनी जीवनशैली, भोजन आदि में सात्विकता बनाए रखने का प्रयास अवश्य करें।

आज कुछ (मांसाहारी) लोगों की सोच होती है कि अगर वे मंगलवार या शनिवार को मांसाहार नहीं करते, तो भी वे सनातन धर्म का पालन कर रहे हैं। यानी ऐसे लोग बाकी दिनों में हनुमान जी में या भगवान में आस्था नहीं रखते? मंगलवार के दिन प्याज लहसुन का सेवन न करें, और बाकी दिनों में मांसाहार और शराब आदि से भी बिल्कुल दूर रहें। साथ ही, ऐसे लोगों से बिल्कुल दूर रहें, जो श्रीराम का अपमान करते हों।

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हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa)

नीलाम्बुजश्यामल कोमलांगम सीतासमारोपित वामभागम्।

पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥

॥ जय सीताराम ॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज

निज मनु मुकुरु सुधारि।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु

जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके

सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुधि बिद्या देहु मोहिं

हरहु कलेस बिकार ॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१

राम दूत अतुलित बल धामा।

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२

महाबीर बिक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥३

कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुण्डल कुँचित केसा॥४

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै।

काँधे मूँज जनेउ साजै॥५

संकर सुवन केसरी नंदन।

तेज प्रताप महा जगबंदन॥६

बिद्यावान गुनी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥७

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥८

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रूप धरि लंक जरावा॥९

भीम रूप धरि असुर सँहारे।

रामचन्द्र के काज सँवारे॥१०

लाय सजीवन लखन जियाए।

श्री रघुबीर हरषि उर लाये॥११

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥१३

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥१४

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना।

राम मिलाय राज पद दीह्ना॥१६

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना।

लंकेस्वर भए सब जग जाना॥१७

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥१८

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥१९

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०

राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥२१

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डरना॥२२

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हाँक तै काँपै॥२३

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै॥२४

नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५

संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिनके काज सकल तुम साजा॥२७

और मनोरथ जो कोई लावै।

सोई अमित जीवन फल पावै॥२८

चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९

साधु सन्त के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥३०

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥३१

राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥३२

तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३

अंतकाल रघुबरपुर जाई।

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४

और देवता चित्त ना धरई।

हनुमत सेई सर्ब सुख करई॥३५

संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६

जै जै जै हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥३७

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥३९

तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०

॥ दोहा ॥

पवन तनय संकट हरन,

मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित,

हृदय बसहु सुर भूप॥

।। जय सीताराम।।

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