Ganesh Aarti & Ganesh Mantra : गणेश जी की आरती और गणेश जी के प्रमुख मंत्र

गण अर्थात् इंद्रियाँ, मन, विचार, प्राण आदि जो हमारी चेतना की सेनाएँ हैं. ईश अर्थात् स्वामी. अतः गणेश का अर्थ है इंद्रियों और मन के स्वामी. अर्थात, वह चेतना जो मन, बुद्धि, अहंकार, इंद्रियों को संचालित करती है. किसी भी साधना या कर्म का पहला चरण है मन को स्थिर करना, बुद्धि को जागृत करना, और अहंकार को शांत करना, और यह सब तभी संभव है जब गणों के ईश (गणेश) की कृपा हो.
इसलिए आध्यात्मिक रूप से भी, गणेश जी वह प्रथम ऊर्जा हैं, जो चेतना को जागृत करती है. बिना उस बुद्धि और एकाग्रता के कोई भी कार्य या आरंभ सफल नहीं हो सकता.
गणेश पूजा का अर्थ है, मन की चंचलता को शांत कर बुद्धि को जागृत करना. यही किसी भी कर्म की शुरुआत का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार है. मूषक (चूहा) यानी चंचल मन,
जिसे नियंत्रित करने वाला ही सच्चा ज्ञानी है. गणेश जी उस मूषक पर सवार हैं, यानी मन उनके नियंत्रण में है. गणेश जी उस मन को अपने नियंत्रण में लेकर चलते हैं, अर्थात जो बुद्धिमान है, वही मन पर शासन कर सकता है.
किसी भी आरंभ में तीन बातें आवश्यक हैं :
1. बुद्धि (ज्ञान कौन-सा है?)
2. दिशा (किस ओर बढ़ना है?)
3. स्थिरता (मन विचलित न हो)
इन तीनों का संगम ही गणेश है, इसलिए हर शुभ कार्य में पहले कहा जाता है :
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अर्थात् हे गणेश जी, मेरे सभी कार्यों को बिना विघ्न के पूर्ण करें।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा गया है, यानी जो सभी विघ्नों (अवरोधों) को दूर करते हैं, इसलिए किसी भी पूजा, यज्ञ, पाठ, यात्रा या कार्य की शुरुआत इन्हीं की आरती से होती है. यह आरती आरंभ के मंगल सूचक के रूप में गाई जाती है. यह आरती अत्यंत सरल हिंदी में रची गई है, ताकि हर वर्ग, हर आयु और हर क्षेत्र का व्यक्ति इसे सहजता से गा सके. इसके बोल सीधे हृदय को छूते हैं, जटिल संस्कृत शब्द नहीं हैं. इस आरती के हर शब्द में गणपति जी की कृपा, दया और उनके स्वरूप का सुंदर वर्णन है. यही कारण है कि यह हर घर, हर मंदिर और हर आरती में सबसे अधिक गाई जाती है.
इस आरती में गणेश जी के रूप (एकदंत, चार भुजा, तिलक, मूषक वाहन), उनके स्वभाव (दयावान, करुणामय), और उनकी पूजा विधि (पान, फूल, मेवा, लड्डू) का पूर्ण चित्रण मिलता है. यह भक्त के मन में गणपति जी का सजीव रूप स्थापित करती है. यह आरती हमें याद दिलाती है कि गणपति जी सिद्धि और बुद्धि के दाता हैं. वे दुखियों को सुख, रोगियों को आरोग्य, निर्धनों को धन, और भक्तों को ज्ञान प्रदान करते हैं. उनकी पूजा आरंभ में इसलिए की जाती है ताकि हर कार्य विघ्नरहित और सफल हो.
इस आरती में बताया गया है कि गणेश जी अंधों को नेत्र, कोढ़ियों को शरीर, बांझों को पुत्र, भक्तों को ज्ञान और निर्धनों को धन देते हैं. यह दर्शाता है कि उनकी कृपा हर स्तर पर, यानी शारीरिक, मानसिक और भौतिक रूप से कार्य करती है. गणेश जी को ज्ञान, विवेक और स्मृति के देवता माना गया है. यह आरती हमें सिखाती है कि भक्ति का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि बुद्धि का जागरण है.
गणेश जी की आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत चार भुजा धारी।
माथे पर तिलक सोहे मूस की सवारी॥
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
अंधे को आंख देत कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतवारी।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
श्री गणेश जी के प्रमुख मंत्र
ऊँ नमो भगवते गजाननाय।
ऊँ नमो भगवते लम्बोदराय।
ॐ श्री गणेशाय नमः।
ॐ गं गणपतये नमः।
यह भगवान गणेश को समर्पित एक शक्तिशाली मंत्र है, जिसका अर्थ है "हे गणपतये! मेरा प्रणाम स्वीकार करें". यह मंत्र बुद्धि, समृद्धि और नए कार्यों में सफलता दिलाने वाला माना जाता है. इस मंत्र का नियमित जप करना चाहिए.
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छन्दों और मंगलों को करने वाली सरस्वतीजी और गणेशजी की मैं वंदना करता हूँ॥
गजाननं भूत गणादि सेवितं,
कपित्थ जम्बू फल चारु भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकम्,
नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥
मैं उन विघ्नेश्वर पार्वती पुत्र (गणपति) के चरण कमलों में प्रणाम करता हूं (करता हूं) जो हाथी के समान मुख वाले हैं, भूतगणों आदि सेवित हैं, जो स्वादिष्ट कपित्थ और जम्बू फलों का सेवन करते हैं, तथा जो समस्त प्राणियों के दुःखों का नाश करते हैं।
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलिमल दहन॥
जिन्हें स्मरण करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणों के स्वामी और सुंदर हाथी के मुख वाले हैं, वे ही बुद्धि के राशि और शुभ गुणों के धाम (श्री गणेशजी) मुझ पर कृपा करें॥ जिनकी कृपा से गूँगा बहुत सुंदर बोलने वाला हो जाता है और लँगड़ा-लूला दुर्गम पहाड़ पर चढ़ जाता है, वे कलियुग के सब पापों को जला डालने वाले दयालु (भगवान) मुझ पर द्रवित हों (दया करें)॥
स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम्।
वासरमणिरिव तमसां राशीन्नाशयति विघ्नानाम्॥
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
उन गजवदन देवदेव की जय हो, जिनके चरणकमल का स्मरण सम्पूर्ण विघ्नसमूह को इस प्रकार नष्ट कर देता है जैसे सूर्य अन्धकारराशि को॥ जो पुरुष विद्यारम्भ, विवाह, गृहप्रवेश, निर्गमन (घर से बाहर जाने), संग्राम अथवा सङ्कट के समय सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन - इन बारह नामों का पाठ या श्रवण भी करता है, उसे किसी प्रकार का विघ्न्न नहीं होता॥
आदिपूज्यं गणाध्यक्षं उमापुत्रं विनायकम्।
मंगलंपरमं रूपं श्रीगणेशं नमाम्यहम्॥
जो प्रथम पूज्य हैं, जो गणों के अध्यक्ष हैं, जो उमा (पार्वती) के पुत्र हैं और विघ्नों को हरने वाले हैं, जिनका रूप अत्यंत शुभ और श्रेष्ठ है, मैं उन श्री गणेश जी को नमस्कार करता हूँ।
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