Is Radha real or imaginary?
आज मैं लगभग हर जगह यह पढ़ रही हूँ कि राधाजी का सर्वप्रथम उल्लेख 12वीं शताब्दी में जयदेव कवि की रचना गीतगोविन्द (Gita Govinda) में और ब्रह्मवैवर्त पुराण (Brahma Vaivarta Puran) में किया गया है. लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि सारे वेदों, महाकाव्यों, पुराणों आदि को इतर रखकर मात्र एक तत्कालीन कवि की रचना के आधार पर लोग कृष्णराधा के इतने सारे मंदिर बना देते, और उस समय कोई विरोध ही नहीं करता?
क्या ऐसा हो सकता है कि जयदेव कवि ने अपनी रचनाओं में श्रीकृष्ण की प्रेमिका के रूप में अचानक किसी स्त्री को प्रकट कर दिया होता, और उस समय के लोग उसे इतनी आसानी से स्वीकार कर लेते? किसी भी इतिहासकार ने राधा जी को जयदेव गोस्वामी का आविष्कार नहीं बताया है, क्योंकि जयदेव ने किसी का आविष्कार नहीं किया था.
राधा जी का उल्लेख केवल ब्रह्मवैवर्त पुराण में ही नहीं है. राधा जी का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण, देवी भागवत पुराण, शिव पुराण, स्कंद पुराण, वाराह पुराण, पद्म पुराण और गर्ग संहिता में स्पष्ट रूप से है, और सबमें समान बातें बताई गई हैं.
आदि शंकराचार्य, जो जयदेव कवि से काफी पहले आये थे, उन्होंने भी अपने अच्युताष्टकम और जगन्नाथ अष्टकम में राधा जी का उल्लेख किया है :
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ॥२॥
(अच्युताष्टकम)
"मैं अच्युत (जो कभी नष्ट नहीं होता), केशव (सुंदर केशों वाले), सत्यभामा के पति, माधव, श्रीधर, राधिका द्वारा पूजित, लक्ष्मी के निवास, मन को सुंदर लगने वाले, देवकी के पुत्र, नंद के पुत्र का ध्यान करता हूँ।"
परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
(जगन्नाथ अष्टकम)
"परब्रह्म के मुकुट वाले, कमल के समान खिले हुए नेत्रों वाले, नीलाचल पर्वत पर निवास करने वाले, अनंत (शेषनाग) के सिर पर चरण रखने वाले, रस में आनंदित, राधा के कोमल शरीर के आलिंगन के सुख का अनुभव करने वाले, जगन्नाथ स्वामी मेरी आँखों के सामने रहें।"
राधा जी का उल्लेख श्री देवकृत लक्ष्मी स्तोत्र में भी है, जिसे देवराज इंद्र की रचना माना जाता है -
कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम्।
रासे रासेश्वरी त्वं च वृंदावन वने- वने॥६॥
आप श्रीकृष्ण के प्राण की अधिष्ठात्री देवी हैं, गोलोक में राधिका, रास में रासेश्वरी और वनों में वृन्दावन हैं.
'चाणक्य नीति' (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) के अध्याय 12 में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि -
येषां श्रीमद्यशोदासुतपदकमले नास्ति भक्तिर्नराणां
येषांमाभीर कन्या प्रियगुण कथने नानुरक्ता रसज्ञा I
येषां कृष्णलीलाललितरसकथा सादरौ नैव कर्णौ
धिक् तान धिक् तान धिगेतान कथयति सततं कीर्तनस्थो मृदङ्ग :I
छंद- जो नर यसुमतिसुत चरणन में भक्ति हृदय से कीन नहीं ।
जो राधाप्रिय कृष्ण चन्द्र के गुण जिह्वा नाहिं कहीं ॥
जिनके दोउ कानन माहिं कथारस कृष्ण को पीय नहीं ।
कीर्तन माहिं मृदंग इन्हे धिक्कएहि भाँति कहेहि कहीं ॥5॥
अर्थ - कीर्तन के समय बजता हुआ मृदंग कहता है कि जिन मनुष्यों को श्रीकृष्णचन्द्रजी के चरण कमलों में भक्ति नहीं है, (श्रीकृष्ण की प्रिय सखी अभीर कन्या) श्रीराधारानी के प्रिय गुणों के कहने में जिसकी रसना अनुरक्त नहीं और श्रीकृष्ण भगवान् की लीलाओं को सुनने के लिए जिसके कान उत्सुक नहीं हैं, ऎसे लोगों को धिक्कार है, धिक्कार है।
'सरस्वतीकण्ठाभरण' के लेखक राजा भोज हैं. यह 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा लिखी गई एक संस्कृत व्याकरण की रचना है, और इसमें राजा भोज ने भी श्रीकृष्ण और राधाजी को नायक-नायिका के रूप में उल्लेखित कर व्याकरण के नियम को समझाने का प्रयास किया है.
इसी के साथ, भट्ट नारायण की वेणीसंहार, क्षेमेन्द्र की दशावतारचरित्र, वाक्पाठी की गौड़वाहो, राजशेखर की काव्यमीमांसा में भी राधाजी का उल्लेख किया गया है, और सभी रचनाएँ गीत गोविन्द से पहले की हैं. आप स्वयं पढ़ सकते हैं.
कुछ लोग यह भी कह देते हैं कि ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रक्षिप्त है या फर्जी है. लेकिन श्रीमद्भागवत पुराण में ही 12.7.23-24 में जो 18 मुख्य पुराणों के नाम बताये गए हैं, उनमें ब्रह्मवैवर्त पुराण का नाम भी शामिल है -
ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं लैङ्गं सगारुडं।
नारदीयं भागवतमाग्नेयं स्कान्दसंज्ञितम्॥
भविष्यं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं सवामनम्।
वाराहं मात्स्यं कौर्मं च ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट्॥
और ब्रह्मवैवर्त पुराण को सभी पुराणों का सार कहा गया है और उसी में (श्रीकृष्णजन्मखण्ड के अध्याय १३० और १३१ में) यह बताया गया है कि कौन से पुराण में कितने श्लोक हैं.
लक्ष्मी-नारायण जी के धाम को बैकुंठ कहा गया है और राधा-कृष्ण के धाम को गोलोक. मैंने कई लोगों को यह लिखते हुए भी देखा है कि गोलोक धाम है ही नहीं और इसे गौड़ीय वैष्णवों ने बनाया है, जबकि गोलोक धाम का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी किया गया है -
देवगन्धर्व गोलोक न ब्रह्मलोकम् तथापरिन् |
प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणाः || 2.30.37
इसके अतिरिक्त लक्ष्मी नारायण संहिता, ब्रह्म संहिता, नारद पंचात्र, गर्गसंहिता, भृगु संहिता, ऋग्वेद से राधोपनिषद, अथर्ववेद से गोपाल तप्पनि उपनिषद (जो 108 उपनिषदों में से एक है), अथर्ववेद से राधा तप्पनि उपनिषद..... इन सभी में स्पष्ट रूप से राधा जी का उल्लेख है.
अब रही बात ब्रह्मवैवर्त पुराण में कामुक बातों की, तो मैंने भी यह पुराण (गीताप्रेस) पढ़ा है और मुझे इस पुराण में कहीं भी कोई गन्दी या कामुक बात नजर नहीं आई. या हो सकता है कि मुझे गन्दी बातों की ज्यादा समझ न हो.
लेकिन मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूँ कि जो लोग इस पुराण में कामुक बातों की बातें करते हैं, वे असल में उन्हीं अनुवादकों के अनुवादों को पढ़ते हैं, जो उनके एजेंडे को सूट करे. इतिहास में कई ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने हिन्दू ग्रंथों के अपने खुद के अनुवाद किये हैं, ताकि हिन्दुओं के दिमाग में यह ठूंसा जा सके कि उनके धर्म में कितनी गंदगी है, जिससे हिन्दू लोग दूसरे धर्मों की आपत्तिजनक बातों पर सवाल न उठा पाए. शिवलिंग को पुरुष का लिंग बताना हो, या भगवान् श्रीराम और ऋषि-मुनियों आदि को मांसाहारी, इन सब अनुवादों का मैं पूरे तर्कों और सबूतों के साथ खंडन कर सकती हूँ.
महाभारत में राधा जी का उल्लेख क्यों नहीं है?
क्योंकि रामायण और महाभारत, दोनों ही इतिहास महाकाव्य भगवान विष्णु के चतुर्भुज अवतारों को समर्पित हैं. ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवी भागवत पुराण में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि परब्रह्म श्रीकृष्ण दो रूपों में प्रकट हैं- द्विभुज और चतुर्भुज. उनके द्विभुज रूप में उनकी पत्नी राधाजी हैं और गोलोक उनका धाम है. और चतुर्भुज रूप में उनकी पत्नी लक्ष्मी जी हैं और बैकुंठ उनका धाम है.
श्रीकृष्ण जब तक गोकुल, वृन्दावन में रहे, तब तक अपने द्विभुज अवतार में रहे, और वहां उनके साथ राधा जी हैं. वहां श्रीकृष्ण ने किसी भी राक्षस या दैत्य का वध करने के लिए अपने शस्त्रों का प्रयोग नहीं किया. उसके बाद श्रीकृष्ण जब गोकुल-वृन्दावन से बाहर आ जाते हैं, तब वे अपने चतुर्भुज अवतार में आ जाते हैं, और तब वे अपनी गदा और चक्र को भी धारण करते हैं. महाभारत वाले श्रीकृष्ण, यानी जो गोकुल वृन्दावन से बाहर आ चुके हैं, वो चतुर्भुज अवतार यानी विष्णु अवतार में हैं, इसलिए वहां उनके साथ रुक्मिणी जी हैं.
यह मंदिर नेपाल में मां दुर्गा जी को समर्पित है. इस मंदिर की जड़ें लिच्छवी काल से जुड़ी हैं और इसका इतिहास 607 ईस्वी का है, जब राजा शंकरदेव ने तत्कालीन शिवालय का निर्माण कराया था. मंदिर में तत्कालीन राधा-श्यामसुंदर की भी प्रतिमा स्थापित है.
Credit by : Aditi Singhal
Note : Permission to copy the article has not been given by the author.


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